
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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नियमित ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
वशिष्ठ अनूप व आत्ममुग्धता की शिकार हिंदी ग़ज़ल
हां! कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो हिंदी ग़ज़ल की दुनिया के प्रायः सभी रचनाकार सतत् सक्रिय रहने वाले रचनाकार हैं। दुःख की बात सिर्फ़ इतनी है कि उनकी सक्रियता रचनाधर्मिता से कम, जुगाड़ और तिकड़म से अधिक रब्त रखती है। यह अभियोग मैं सिर्फ़ समकालीन रचनाकारों पर ही नहीं लगा रहा बल्कि डंके की चोट पर कहता हूँ कि हमारा अतीत भी इस बीमारी से ग्रस्त था। कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि यह पद्धति दुष्यंत के समय में भी धड़ल्ले से चलन में थी, अगर ऐसा नहीं होता तो भवानी शंकर जैसा रचनाकार हिंदी ग़ज़ल से लुप्त नहीं होता, दुष्यंत सिर्फ़ 52 ग़ज़लों से इतने मक़बूल नहीं होते और शलभ जैसा ग़ज़लकार लुप्तप्राय नहीं होता। किसी की पुस्तक तक उपलब्ध नहीं है और किसी के नाम से सभागार हैं, पुरस्कार दिये जाते हैं! खैर…
इस लेख में मैं वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों से चूनी-चोकर अलग करने की कोशिश करूंगा। वशिष्ठ अनूप का हिंदी ग़ज़ल में बहुत नाम है। किसी ज़माने में आप विनय मिश्र नामक आकाशगंगा के तारों में से ही एक थे, अब इनका झुकाव बिहार की तरफ़ है। संभवतः बिहार की गैलेक्सी में पुरस्कारों के ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण इतना प्रभावी है कि कितनी ही आकाशगंगाओं को अपने आंख के तारों से हाथ धोना पड़ा है। ख़ैर, परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। चलिए आगे बढ़ते हैं।
हिंदी ग़ज़ल की एक बहुत बड़ी विशेषता इसकी आत्ममुग्धता तथा इसका क्षद्म वामपंथी होना है। कुछ और आगे बढ़कर कहें तो कह सकते हैं कुछ लोगों को छोड़कर हिंदी के अधिकांश ग़ज़लकार मौक़ापरस्त वामपंथी हैं। यहाँ हम सिर्फ़ हिंदी ग़ज़ल की आत्मभुग्धता पर ही बात करेंगे। हिंदी में ग़ज़लकार और ग़ज़ल दोनों में आत्ममुग्धता की बीमारी है। ग़ज़ल को आत्ममुग्ध कहने के पीछे एक बहुत बड़ी वजह है। इस पर बाद में विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस लेख में वशिष्ठ अनूप के बहाने हिंदी ग़ज़ल की आत्ममुग्धता देखते हैं। वशिष्ठ अनूप की एक पुस्तक अचानक मेरे हाथ लगी। पुस्तक का नाम है ‘हिंदी ग़ज़ल की प्रवृत्तियां’। इसे पढ़कर मैंने पहली बार जाना कि अपने द्वारा लिखे गये गद्य में अपने ही पद्यांशों का भी उदाहरण दिया जा सकता है। इस पुस्तक में आयी कमोबेश हर प्रवृत्ति में अपने शेरों को उद्धृत करके एक कमाल का कार्य वशिष्ठ अनूप साहब ने किया है।
हमारे गांव में एक कहावत है ‘आंधर बाँटइ सिन्नी फिर फिर अपुने देइ’। अपनी गद्य रचना में अपने ही शेरों को उद्धृत करने का सीधा मतलब निकलता है कि शायर अपने गद्य के माध्यम से शेरों में जिन चीज़ों का होना बड़ा मानता है, वे सारे महान गुण उसके अपने शेरों में हैं। इसे आत्ममुगधता नहीं तो और क्या कहेंगे? जब शायर अपने शेरों को महान मानता ही है, तो क्यों न इन शेरों की महानता परख ली जाये? कुछ शेर देखते हैं:
तुलसी के जायसी के रसखान के वारिस हैं
कविता में हम कबीर के ऐलान के वारिस हैं
××××××
हम सीकरी के आगे माथा नहीं झुकाते
कुंभन की फ़कीरी के अभियान के वारिस हैं
×××××××
सीने में दिल हमारे आज़ाद का धड़कता
हम वीर भगत सिंह के बलिदान के वारिस हैं
मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन
SSI SISS SSI SISS
रुक़्न की यह ग़ज़ल मतले से लेकर अंत तक बे-बह्र है। ऊपर से ढिठाई यह कि शायर अपने आप को तुलसी, जयसी, रसखान और कबीर का वारिस बता रहा है। यह अतिशय आत्ममुग्धता का परिणाम ही है। हिंदुस्तान की तमाम धरोहरों के वारिस वशिष्ठ अनूप ही हैं। बाक़ी लोग तो नून नेबुआ चाटेंगे। अत्यधिक आत्ममुग्धता आदमी को अपनी ग़लतियों के प्रति अंधा कर देती है। व्यक्ति को लगने लगता है वही सर्वश्रेष्ठ है। सारी चारित्रिक विशेषताएं उसी के अंदर हैं। एक और शेर देखें:
हमेशा रंग बदलने की कलाकारी नहीं आती
बदलते दौर की मुझको अदाकारी नहीं आती
यहां रचनाकार अपने को पाक-साफ़ बताने के चक्कर में भूल जाता है कि इस मतले में आये ‘हमेशा’ और ‘बदलते दौर’ पदबंध प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। क्या इस ‘हमेशा’ के माध्यम से रचनाकार यह बताना चाह रहा है कि शायर रंग बदलने की कलाकारी कभी-कभी करता है, तथा बदलते दौर में अदाकारी न करके किसी अपरिवर्तनशील दौर में अदाकारी किया करता था। क्या कोई ऐसा दौर भी हुआ करता था? आत्ममुग्धता के शिकार कुछ और शेर देखते हैं:
निगाहों में निगाहें डाल सच कहने की आदत है
ज़माने की तरह से मुझको ऐयारी नहीं आती
चलिए मान लेता हूं शायर इनोसेंट है, शायर को ज़माने की तरह ऐयारी नहीं आती। शायर की अपनी ख़ुद की तरह की ऐयारी होगी। मुझे इससे क्या लेना, लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि दूसरे मिसरे में ‘तरह’ के बाद आया ‘से’ डंके की चोट पर कह रहा है कि आप तुलसी या रसखान के वारिस नहीं हो सकते हैं। एक और शेर देखते हैं। इसे पढ़कर एक और प्रश्न दिमाग़ में कौंध रहा है कि वशिष्ठ अनूप, जो निदा फ़ाज़ली और बशीर बद्र को हिंदी का शायर मानते हैं, वे ‘शहर’ का वज़्न IS क्यों लिखते हैं! बशीर और निदा तो ‘शहर’ को SI लिखते थे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि उन्होंने ‘हिंदी ग़ज़ल की प्रवृत्तियां’ पुस्तक में निदा और बशीर को उद्धृत किया है। ख़ैर, आत्ममुग्धता थोड़ा लापरवाह कर ही देती है। एक और शेर देखें:
परिंदों के दिल में मची खलबली है
मिटाने लगे लोग क्यों हर शजर को
इस मिसरे में शजर को मिटाने वाली बात मुहावरे में ठीक बैठ नहीं रही है। मैं तो इसे मुहावरे की ग़लती ही मानूंगा। एक और बात कि इस पूरे शेर में जो मंज़रकशी है, उस पर ग़ौर करने पर ऐसा लग रहा है जैसे सारी घटना अकस्मात और तत्काल घट रही है। कोई आकर अचानक पेड़ों को काटने लगा हो, और परिंदे तुरंत खलबली मचाने लगे। जबकि पेड़ों को काटने की घटना एक धीरे-धीरे चलने वाली घटना है। शेर में जो तत्क्षण का भाव है, वो बड़ा ही अस्वाभाविक लग रहा है। यह भी देखें:
समंदर के तूफ़ां से वे क्या डरेंगे
चले ढूंढने हैं जो लालो-गुहर को
लालो-गुहर को वशिष्ठ साहब भले ही संस्कृत का मान लें मगर दूसरे मिसरे का वाक्य-विन्यास ‘चले ढूंढने हैं’ महाविद्यालयी हिंदी की कमीज़ पकड़ता-सा दिख रहा है। और ऐसे में आत्ममुग्धता ये कि ढेंपे का तोर मैं ही हूँ।
वशिष्ठ साहब की एक और पुस्तक है, इस पर लिखना इसलिए है क्योंकि पिछले लेख में जब मैंने डॉ. भावना पर लिखा तो एक प्रतिक्रिया यह भी आयी कि मैंने उनकी पुरानी पुस्तक पर लिखा, जिसके बारे में वह ख़ुद स्वीकारती हैं कि उसमें ग़लतियां थीं और कमज़ोर रचनाएं थीं। हालांकि किसी किताब पर बात करने की कोई समयसीमा तो होती नहीं। ख़ैर, चूंकि वशिष्ठ साहब की नवीनतम पुस्तकों में से एक है ‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था’। चलिए इससे होकर गुज़रते हैं। सबसे पहले इसकी भूमिका देखते हैं।
इस पुस्तक की भूमिका में लिखी गयी सारी बातें आत्ममुग्धता से ग्रस्त दिखायी देती हैं। लिखते हैं- “मुझे भी लिखते हुए लगभग 40 साल हो गये हैं। इस दौरान हिंदी ग़ज़ल ने अपने को सिद्ध और स्थापित किया। उसने दुराग्रही और सतही आलोचकों की उन आपत्तियों को भी अर्थहीन साबित किया कि ग़ज़ल में ज़िंदगी के व्यापक यथार्थ का चित्रण नहीं हो सकता।” इस उदाहरण के बाद यह कहना लाज़मी हो जाता है आपको लिखते यदि 40 साल हो गये हैं, जिसे आपने बड़ी शान से बताया है तो फिर इस पुस्तक की पहली ग़ज़ल के पहले मतले के बाद के सारे शेरों के क़ाफ़िये मूड़-फुड़ौवल क्यों कर रहे हैं? पहले उधेड़े जा चुके शेर को फिर देखें:
हमेशा रंग बदलने की कलाकारी नहीं आती
बदलते दौर की मुझको अदाकारी नहीं आती
मतले में क़ाफ़िया वाले शब्द ‘कलाकारी’ और ‘अदाकारी’ हैं, ठीक हैं, मगर इसके बाद रवादारी, खुद्दारी, उजियारी, ऐयारी, लाचारी, बीमारी और चिंगारी जैसे शब्द वशिष्ठ साहब के तमाम दावों को बे-पैरहन किये दे रहे हैं। ऊपर से ढिठाई कि भूमिका की दूसरी ही पंक्ति में लिख डाला है कि “मेरी मुख्य पहचान ग़ज़लकार और गीतकार की है”। इतनी छिछली रचनाओं से ही अगर यह पहचान है तो यह पूरी हिंदी ग़ज़ल की नेकर खींच रही है। क्या यह हिंदी ग़ज़ल में आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा नहीं है?
उपर्युक्त उदाहरण से जुड़ा मेरा दूसरा प्रश्न यह है कि आख़िर वशिष्ठ साहब ने सतही आलोचक किसे कहा है? क्या यह सतही आलोचक रामविलास शर्मा हैं? क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले शमशेर की ग़ज़लों को रिजेक्ट किया था। थोड़ी देर के लिए हम रामविलास शर्मा को दुराग्रही भले ही मान लें किंतु सतही आलोचक तो नहीं कह सकते। वशिष्ठ साहब ने भूमिका की पहली ही पंक्ति में अपने आप को आलोचक बताया है, हो सकता है उन्होंने अपनी तुलना में रामविलास शर्मा को सतही कहा हो, मगर क्या यह कहना सही है? थोड़ा और आगे बढ़कर कहें तो कह सकते हैं कि हिंदी के किसी भी बड़े आलोचक ने ग़ज़ल पर नहीं लिखा है, तो क्या सब के सब सतही हैं? नामवर सिंह, शिवदान सिंह चौहान, परमानंद श्रीवास्तव, सब सतही थे? वशिष्ठ साहब से कम हो सकते हैं, मगर सतही तो नहीं कहना चाहिए था।
वशिष्ठ साहब आप बुरा मत मानिएगा एक बात और पूछ ले रहा हूं। आपका कहना है आलोचक ग़ज़ल को ज़िंदगी के व्यापक यथार्थ के चित्रण के लिए पर्याप्त नहीं मानते थे। शायद इसीलिए आपने उन्हें सतही आलोचक कहा, लेकिन मज़े की बात तो यह है कि कुछ बड़े ग़ज़लकार भी ग़ज़ल को ज़िंदगी के व्यापक यथार्थ को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं मानते थे। उन्हें आप क्या कहेंगे? कुछ उदाहरण देख लें:
ब-क़द्रे-शौक नहीं ज़र्फ़े-तंगना-ए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयां के लिए
×××××××
कहानी मेरी रूह-ए-कायनात है सीमाब
सिमट के आ नहीं सकती है ये दो मिसरों में
×××××××
ज़िंदगी के थपेड़ों ने जो सिखाया है हमें
वो दास्तां दो मिसरों में समाये कैसे?
इन शायरों को वशिष्ठ साहब क्या कहेंगे, यह बात वशिष्ठ साहब से पूछी जानी चाहिए। क्या विज्ञ पाठक इन तमाम बातों को आत्ममुग्धता का जोश नहीं मानते? वशिष्ठ साहब ने अपने प्रचार की जगह अगर अध्ययन पर ध्यान दिया होता, तो इतनी आत्ममुग्धता नहीं आती। इतने बड़े महाविद्यालय का अध्यापक होकर पांच पंक्तियां तक ज़िम्मेदारी से आप लिख नहीं पाते और दूसरों को सतही कहते हैं, क्या कहा जाये? आपको किस कठघरे में खड़ा किया जाये? कितनी शर्म की बात है कि अपनी ग़ज़लों की प्रशंसा आप स्वयं कर रहे हैं, और वह भी मौखिक नहीं, लिखकर! आपको अंदाज़ा है, कितनी उंगलियां आपकी तरफ़ उठेंगी!
आपकी भूमिका से ही एक उदाहरण और दे रहा हूं, “विगत दशकों में ग़ज़ल ने यह प्रमाणित किया है कि उसके दायरे में जीवन जगत का हर विषय समाहित हो सकता है। यह बात मेरी ग़ज़लों के लिए भी सच है। ये ग़ज़लें हमारे समय के बहुआयामी यथार्थ और अनेकानेक प्रकार की चुनौतियों से रू-ब-रू होकर उनसे सीधी रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं।” इस उदाहरण को भूमिका लेखक की आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या कहा जाएगा? इस आत्ममुग्धता को बेशर्मी भी कहा जा सकता है, मगर मैं नहीं कहूंगा। आइए आगे बढ़ते हैं।
वशिष्ठ साहब को पढ़ते-पढ़ते उर्दू का एक शब्द तअल्ली याद आया। अरबी मूल के इस शब्द का हिंदी में अर्थ है ‘शेख़ी बघारना’ या ‘खुद की तारीफ़ करना’। तअल्ली की छूट उर्दू की शायरी में तो है किंतु किसी भी भाषा के गद्य में नहीं है। उर्दू के बहुत-से शायरों ने तअल्ली की छूट ली है। जिगर मुरादाबादी का शेर देखें:
शायरे फ़ितरत हूं जब भी फ़िक्र फरमाता हूं मैं
रूह बनकर ज़र्रे-ज़र्रे में समा जाता हूं मैं
इस शेर में तअल्ली यह कि उन्होंने स्वयं के बोलने को फ़रमाना कहा है, जो कि अनुचित है। उर्दू सकाफ़त (कल्चर) के अनुसार फ़रमाना की जगह अर्ज़ करना होना चाहिए, मगर शायरी में इसकी छूट है। इसे ही तअल्ली कहते हैं। मीर का शेर देखें:
सारे आलम पर हूं मैं छाया हुआ
मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ
फ़ैज़ का भी एक शेर:
फैज़ औज-ए-ख़याल से हमने
आसमां सिंध की ज़मीं की है
यहां फ़ैज़ साहब अपनी फ़िक्र की बुलंदी की प्रशंसा स्वयं कर रहे हैं। यहां फ़ैज़ साहब ने तअल्ली की छूट ली है, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि अपनी प्रशंसा में पूरा एक लेख ही लिख दिया जाये, जैसा कि वशिष्ठ साहब ने किया है। वशिष्ठ साहब शायरी के आदमी हैं, इतना तो पता होना चाहिए था कि अपने घर को ‘ग़रीबख़ाना’ और दूसरे के घर को ‘दौलतख़ाना’ तहज़ीब और तमीज़ है।
वशिष्ठ साहब की थोड़ी और ढिठाई देखते हैं। वह अपने लिए लिखते हैं, “मेरी ग़ज़लों पर 70-75 विद्वानों ने आलेख और समीक्षाएं लिखीं हैं”। इस पंक्ति को देखकर मुझे बरबस यह कहने का मन हो रहा है कि आख़िर जब इतने लोगों ने लिखा था तो ख़ुद लिखने की क्या ज़रूरत पड़ी? आख़िर कितना प्रसिद्ध होना चाहते हैं? नचिकेता साहब से कह दिया होता तो वे थोड़ा और लिख देते। उनकी तो आदत भी रही, नाल ठोककर गधों को घोड़ा बनाने की। उन्होंने सबको जैसे एक ही डंडे से हांका। उनके लिए जैसे वशिष्ठ अनूप रहे वैसे ही विनय मिश्र। जैसे देवेंद्र आर्य, वैसे ही कृषक। जैसे ज्ञान प्रकाश विवेक रहे, वैसी ही भावना और न जाने कौन-कौन।
नचिकेता ने अनूप साहब के लिए लिखा, “अनूप जी के रचना-संसार का पाट बेहद चौड़ा और उर्वर है।” चलिए वशिष्ठ जी की ग़ज़लों का चौड़ा पाट, मौलिक सोच और परंपरा-भंजकता देख लेते हैं। शेर देखें:
गदोरी पर रची मेहंदी की लाली याद आती है
मुझे अक्सर वो लड़की भोली-भाली याद आती है
यहां वशिष्ठ साहब ‘गदोरी’ की देशजता पर रीझकर शेर लिख तो देते हैं, मगर यह बात भूल जाते हैं कि मेहंदी हमेशा और सिर्फ़ गदोरी में तो नहीं लगायी जाती। एक बात और कहना चाहता हूं कि ‘गदोरी’ शब्द के इस्तेमाल से वशिष्ठ अनूप साहब लोक की जिस ख़ुशबू को शेर में लाना चाहते हैं, वह भी न आने पर ही अड़ गयी क्योंकि ‘गदोरी’ मात्र शब्द तक ही महदूद रह गयी। वशिष्ठ साहब ‘गदोरी’ के माध्यम से जिस परिवेश को शेर में लाना चाह रहे हैं, उस परिवेश में अगल-बगल की लड़कियों को याद करना भी पाप है। ये तमाम लड़कियां तो मां, बहन या बेटी होती हैं। यही कारण है कि बातें आपस में विरोधाभासी हैं। लोक की महक आप अंजुम बाराबंकवी के इस शेर में देखें:
जिस बात का मतलब ख़ुश्बू है हर गाँव के कच्चे रस्ते पर
उस बात का मतलब बदलेगा जब पक्की सड़क आ जाएगी
शायर का नाम एक बार को छोड़ दीजिए तो इसे किसका शेर कहेंगे? हिंदी ग़ज़ल या उर्दू ग़ज़ल? इस प्रश्न पर फिर कभी बात करेंगे, फ़िलहाल देखें कि इस शेर के पहले मिसरे में ‘ख़ुशबू’ ‘गांव’ और ‘कच्चे रास्ते’ लोक के जिस मंज़रनामे को दिखा रहे हैं, उससे निकलने वाली भीनी ख़ुशबू को हम महसूस कर पा रहे हैं। दूसरी बात कि दूसरे मिसरे में पक्की सड़क के आने से परिवेश में जो बदलाव आ रहा है, वह मल्टी डाइमेंशनल है। हम कई स्तरों पर इस बदलते परिवेश को देख सकते हैं। कुछ और शेर देखते हैं।
शहर के होटलों में रोटियां के दाम जब बदले
मुझे ममता भरी वह घर की थाली याद आती है
यह है हिंदी के ग़ज़लकार की तुकबंदी। इस एक शेर में इतनी ख़ामियां हैं कि कुछ कहते ही नहीं बन रहा है। यह ‘शहर के होटलों’ क्या होता है? क्या होटल सिर्फ़ शहर में होते हैं? होटल में सिर्फ़ रोटियों के ही दाम क्यों बढ़ते हैं? क्या किसी और चीज़ का दाम बढ़ने पर ममता भरी थाली याद नहीं आती? कहने का अर्थ यह है कि हिंदी ग़ज़लकार छोटी-छोटी बात कहने में भी इतना गैप छोड़ देते हैं कि फँस जाते हैं। या फिर भर्ती के शब्द घुसेड़ देते हैं।
हिंदी ग़ज़ल को अपनी फ़िटनेस पर ध्यान देना चाहिए। थोड़ी-सी ईमानदारी बरती जाये तो यह गड़बड़ी बड़ी आसानी से दूर हो सकती है, मगर उनकी भूख इतनी है कि ईमानदारी बरत ही नहीं सकते। ऊपर से करेला सो भी नीम चढ़ा वाली बात यह कि नचिकेता जैसे आलोचक हैं। ये ग़ज़लकार अगर आत्ममुग्ध नहीं होते तो इस तरह के वाहियात आलोचकों से बचने की कोशिश ज़रूर करते, मगर इन्हें तो यह लगता है कि ये इतनी अतिरंजना डिज़र्व करते हैं। आख़िर उनके शेरों में ऐसी कौन-सी मौलिकता या भिन्नता है? जिसकी बात नचिकेता साहब ने की है? जो बचकानापन सबमें है वहीं इनमें भी है। दूसरे मिसरे में घर के पहले आया ‘वो’ भी खटक रहा है। यह ‘वो’ ‘थाली’ के पहले आता तो शेर में कम-से-कम यह भद्दापन तो नहीं आता।
ख़ैर, पंकज गौतम साहब भी हिंदी ग़ज़ल आलोचना के क्षेत्र में इन दिनों काफ़ी उभरते दिख रहे हैं। लिखते हैं, “एक ग़ज़लकार के रूप में वशिष्ठ अनूप इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे लोकप्रियता के दबाव में भावों का सरलीकरण नहीं करते, और न आत्मग्रस्तता के शिकार होते हैं”। यह पूरा लेख ही मैं आत्ममुग्धता पर लिख रहा हूं। और अब मेरा विज्ञ पाठकों से सिर्फ़ यह पूछना है कि क्या सचमुच वशिष्ठ अनूप साहब लोकप्रियता के दबाव में भावों का सरलीकरण नहीं करते? ये शेर देखें:
मेरी हर ग़ज़ल हर कहानी में तुम हो
मेरी जिंदगी जिंदगानी में तुम हो
हंसी फूल जैसी बदन मरमरी है
किसी जादूगर की तू जादूगरी है
दरवाज़े के पीपल जैसे सब सहते थे बाबूजी
हमें देखकर पढ़ते लिखते खुश दिखते थे बाबूजी
बेड़ी और ज़ंजीर की भाषा
सन-सन चलते तीर की भाषा
हम तेरे मुखौटे को तार-तार करेंगे
और यह गुनाह यूं ही बार-बार करेंगे
इन शेरों को पढ़कर क्या आपको ऐसा नहीं लग रहा कि अनूप साहब लोकप्रियता के भार से इस क़दर दबे हैं कि उनके शेर तुकबंदी बनकर रह गये हैं।
रहा आत्ममुग्धता का सवाल, इस पुस्तक की पूरी भूमिका ही आत्ममुग्धता और आत्मग्रस्तता के बोझ से कराह रही है। अगर वे इस दबाव में नहीं होते तो स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं लिखते। भूमिका में हरगिज़ न लिखते कि 70-75 लोगों ने उन पर लिखा है। इनकी आत्ममुग्धता और आत्मग्रस्तता तो कहीं-कहीं बेहयाई के दायरे को पार कर जाती है।
ऊपर बतौर नमूना रखे गये पांच शेरों में पंकज गौतम साहब को आख़िर भावों की कौन-सी गूढ़ता दिख रही है? आपकी समझ में आये तो बताइएगा।
ख़ैर, पंकज गौतम साहब द्वारा कही एक और बात उद्धृत कर दूँ। लिखते हैं, “उर्दू ग़ज़ल की परंपरा की समझ रखने के बावजूद हिंदी के ग़ज़लकार हैं”। इस वाक्य के माध्यम से वह आख़िर क्या बताना चाह रहे हैं? वशिष्ठ साहब की महानता या दीनता, अगर पंकज साहब यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि इतना ज्ञान रखने के बावजूद उन्होंने हिंदी के लिए, हिंदी में लिखा, तो उन्हें बता दूं कि यह उनकी ग़लतफ़हमी है। इस लेख से वह जान सकते हैं कि वशिष्ठ साहब के यहां बहर से लेकर क़ाफ़िये तक और बेरब्त से लेकर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने तक, कितनी सलाहीयतें हैं।
था कहां तैयार झुकने को किसी दरबार में
पर ग़रीबी ले गयी अपमान के संसार में
इस शेर पर तो वैचारिक मतभेद ही है। मेरा कहना है किसी बहुत बड़ी आकस्मिक मजबूरी की वजह से किसी के सामने झुकना और बात है, तब तो कोफ़्त ही होती है कि ग़रीबी दूर करने के लिए वशिष्ठ साहब सत्ता के सामने झुकते हैं। कमाल है इतने बड़े विश्वविद्यालय के शिक्षक को ये मामूली सावधानियां रखना नहीं आता! क़तील शिफ़ाई लिखते हैं:
क़तील अपनी ज़बां क़ाबू में रख
सुख़न से आदमी पहचाना जाता है
पंकज गौतम के अनुसार अगर उन्हें उर्दू ग़ज़ल का इतना विशद ज्ञान है, तो इनके शेरों में इतना फूहड़पन क्यों है? बार-बार घिर क्यों जाते हैं? इन सब शेरों को आचरण में क्यों नहीं डाला? कहीं ये तमाम शेर आत्ममुग्धता के ही परिणाम तो नहीं?
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं साहित्य का संसार यदि इसी तरह के आत्मप्रचार और पारस्परिक प्रशस्ति-पत्रों से संचालित होता रहा, तो रचना पीछे छूट जाएगी। वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों के बहाने मैंने जिन बातों को सामने रखा है, उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उन कसौटियों की ओर लौटना है, जिन्हें हमने सुविधा के लिए भुला दिया है। कोई लेखक अपनी रचनाओं को अच्छा समझे, इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन जब वह स्वयं अपनी रचनाओं को प्रमाणित करने लगे, अपने ऊपर लिखे गये लेखों की संख्या गिनाने लगे और अपने लेखकीय महत्व की घोषणा स्वयं करने लगे, तब कठोर आलोचना का काम आवश्यक हो जाता है। अतः हिंदी ग़ज़ल को यदि सचमुच अपनी अलग पहचान बनानी है, तो उसे अपने भीतर की इस आत्ममुग्धता से निकलना होगा, क्योंकि समय बहुत निर्मम आलोचक है। वह रचनाकार के साथ नहीं, रचना के साथ खड़ा होता है।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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बहुत शानदार लिखा है आपने। ये विचारोत्तेजक तो है ही, इससे अपनी ग़लतियों को समझने में भी बहुत मदद मिलती है। आपकी लेखनी को नमन