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ख़बरनामा:200... हर शनिवार, इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....

हिंदी पत्रकारिता का मर्दलोक

            हिंदी पत्रकारिता के गठन में एक तत्व लगभग अदृश्य रहता है, मर्दाना सोच। यह हिडेन इन प्लेन साइट है, यानी नज़रों के सामने होकर भी ओझल। दो सौ साल पुराना वह फ़िल्टर, जिससे सब कुछ छनकर निकल रहा होता है। मर्दाना सोच या लैंगिक पूर्वाग्रह केवल पुरुषत्व नहीं, किसी पत्रकार की निजी विशिष्टता नहीं, न यह केवल न्यूज़रूमों की लैंगिक संरचना तक सीमित है। यह हिंदी पत्रकारिता की कल्पनाशीलता, उसके नायकों, उसके शत्रुओं, उसके शीर्षकों, ख़बरों के चयन और उसके नैतिक-सामाजिक संसार में गहराई से जमा हुआ है।

क्या हिंदी पत्रकारिता उत्तर भारतीय पुरुष प्रधान मानसिकता की सबसे बड़ी सार्वजनिक प्रयोगशालाओं में से एक नहीं है? इसकी पड़ताल की जानी चाहिए।

पुरुष ही है ‘डिफ़ॉल्ट’ मनुष्य

हिंदी पत्रकारिता का एकदम बुनियादी विरोधाभास उसके भाषिक ढाँचे में निहित है। समाचारों में आदमी, नागरिक, पाठक, नेता, युवा, कर्मचारी और यहाँ तक कि पत्रकार, ये सारे शब्द व्यवहार में पुरुष के ही पर्याय हैं। भाषा का डिफ़ॉल्ट मनुष्य ‘पुरुष’ है। समाचारों के शीर्षक अक्सर यूँ होते हैं। ‘युवाओं का ग़ुस्सा’, ‘किसानों का आक्रोश’, ‘मतदाता क्या चाहता है’, ‘आम आदमी परेशान’। यह भाषाई बुनावट भी है और भाषाई मानसिकता भी।

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यहाँ युवा, किसान, मतदाता और आम आदमी के पीछे जो छवि है, वह ख़ुद-ब-ख़ुद पुरुष की है। स्त्री या अन्य किसी जेंडर केवल तभी दर्ज किया जाता है, जब उसकी ख़ास तौर पर निशानदेही की जाये, जैसे महिला किसान, महिला वैज्ञानिक, महिला पत्रकार, यहाँ तक कि लेडी किलर, लेडी डॉक्टर आदि-आदि। पुरुष को विशेषण की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वह तो बुनियादी जेंडर है ही।

यह सिर्फ़ भाषाई आदत नहीं है। यह ऐसे भाषा-भाषियों के संसार का आईना है, जिसमें सार्वजनिक जीवन का स्वामी पुरुष है और बाक़ी सब उसके उत्पाद या अपवाद हैं।

हिंदी न्यूज़रूम यानी मेल क्लब

ऐतिहासिक नज़रिये से देखें तो पता चलता है कि हिंदी अख़बारों, पत्र-पत्रिकाओं के न्यूज़रूम उत्तर भारतीय सार्वजनिक जीवन की पुरुष सत्ता के ही विस्तार रहे। राजनीति, नौकरशाही, साहित्य और व्यापार, इन सभी के बीच जो पुरुष नेटवर्क काम कर रहे थे, हिंदी के न्यूज़रूम उसी नेटवर्क का हिस्सा थे।

चूँकि हिंदी में पत्रकारिता एक पेशेवर उद्योग नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने वाले पुरुषों की गतिविधि रही, तो शुरूआत से ही संपादक, लेखक और पत्रकार अक्सर एक साथ कई भूमिकाएँ निभा रहे थे। वो एक ही समय में साहित्यकार थे, समाज-सुधारक थे, राजनीतिक कार्यकर्ता थे और पत्रकार भी थे।

आज़ादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता में देश को खड़ा करने वाले का प्रतिबिंब भी पुरुष का ही था। वही नायक था, और केंद्र में था। मिसाल के लिए नेहरू, पटेल, लोहिया, जयप्रकाश नारायण, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी। राजनीति का समूचा सार्वजनिक मंच पुरुषों से भरा हुआ था और हिंदी पत्रकारिता ने उसी को स्वाभाविक माना।

यह उस दौर का चित्र है, जब सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की मौजूदगी बेहद सीमित थी। लेकिन समस्या केवल प्रतिनिधित्व की नहीं थी। समस्या यह थी कि हिंदी पत्रकारिता की पूरी कामकाजी संस्कृति पुरुष अनुभवों के आधार पर खड़ी हुई और पोषित की गयी।

हिंदी पत्रकारिता में प्रतिष्ठा है देर रात तक काम करने, राजनीतिक नेताओं, अफ़सरों और अपराधियों से घनिष्ठ संबंध बनाने, सत्ता के गलियारों में पहुँच रखने, जोखम उठाने से और आक्रामक रिपोर्टिंग करने में। अमूमन यह पेशेवर योग्यता से अधिक एक ख़ास किस्म की पुरुष सामाजिकता यानी मेल सोश्येबिलिटी, या ब्रदरहुड रही, जहाँ पेशेवर दक्षता की जगह परफ़ॉर्मेटिव मेस्क्युलेनिटी यानी प्रदर्शनकारी मर्दानगी का सम्मान और उसके लिए जगह तैयार की गयी।

2019 की ऑक्सफ़ैम-न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्ट और बाद के कई अध्ययन बताते हैं कि भारतीय मीडिया (मुख्यत: हिंदी) के संपादकीय नेतृत्व में महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों की उपस्थिति बेहद कम है। इस संस्कृति ने पत्रकारिता के पेशेवर मानकों पर भी असर डाला है।

‘मुँहतोड़ जवाब’ पत्रकारिता

1962, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान और बाद में हिंदी पत्रकारिता में राष्ट्रवाद की एक ज़बान विकसित हुई। इसकी शब्दावली में वीरता, बलिदान, शौर्य और प्रतिशोध अहम शब्द थे। सैनिक अब महज़ नागरिक नहीं था, वह आदर्श पुरुष बन गया था।

युद्धकालीन पत्रकारिता में यह प्रवृत्ति स्वाभाविक है और लगभग हर भाषाई पत्रकारिता में देखी जाती है। मगर युद्ध की यह शब्दावली धीरे-धीरे नागरिक जीवन की भाषा में उतर आयी।

1990 के दशक के बाद टीवी पत्रकारिता के साथ शीर्षक आये, मुँहतोड़ जवाब, करारा प्रहार, घुसकर मारा, नेस्तनाबूद, ठोक देंगे, दुश्मन को धूल चटायी… ऊपर से देखने पर ये पत्रकारिता के शब्द नहीं लगते। ये अखाड़े, युद्ध और प्रतिशोध की शब्दावली ज़्यादा है। मगर ये हैं, बल्कि यही हैं। ये हिंदी ख़बरें सूचना नहीं देतीं, उत्तेजना देती हैं, जज़्बाती बनाती हैं। ये नागरिक को सोचने के लिए नहीं, रोमांचित होने के लिए आमंत्रित करती हैं।

मीडिया अध्ययन के कई विद्वानों ने इसे मिलिटेराइज़्ड पब्लिक डिस्कोर्स कहा है यानी ऐसी सार्वजनिक भाषा जिसमें युद्ध और शक्ति का रूपक रोज़मर्रा की बातचीत में आ जाता है।

ताक़तवर नेता का सम्मोहन

हिंदी पत्रकारिता की एक स्थायी विशेषता है, स्ट्रॉन्गमैन पॉलिटिक्स की पक्षधरता और आकर्षण। पत्रकारिता में बार-बार दिखने वाले विशेषण कुछ यूँ रहते हैं, लौह पुरुष, कड़क प्रशासक, फ़ौलादी इच्छाशक्ति, निर्णायक नेता, सख़्त मुख्यमंत्री। इसके उलट सहमति बनाने वाले, समझौता कराने वाले, संवादप्रिय, बौद्धिक नेताओं को अक्सर कमज़ोर या अनिर्णायक दिखाया जाता है।

इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहने से लेकर नरेंद्र मोदी को ‘मज़बूत नेता’ के रूप में प्रस्तुत करने तक हिंदी पत्रकारिता ने बार-बार शक्ति प्रदर्शन को सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अधिक महत्व दिया है। मानो राजनीति संसद में नहीं, कुश्ती के दंगल में चल रही हो।

बहस नहीं, मुक़ाबला

हिंदी विज़ुअल मीडिया ने इस मर्दाना सोच को सबसे खुले तौर पर सामने रखा। टेलीविज़न पर डिबेट के नाम पर होने वाले दंगलों में शब्द-चयन यूँ होता है, उसने धो डाला, इसने उसको लताड़ा, उसने उसकी की बोलती बंद, फलाना पड़ा भारी। यह शब्दावली बहस की नहीं, बॉक्सिंग या कुश्ती रिंग में चल रही बाउट की कॉमेंट्री में इस्तेमाल होती है। दुनिया की लोकतांत्रिक पत्रकारिताओं में बहस का मक़सद रहा है सच के क़रीब पहुँचना, लेकिन हिंदी टेलिविज़न में बहस का उद्देश्य है शोर-शराबे से भरे एक मैच का आयोजन और एंकर द्वारा अंत में विजेता का ऐलान।

कोई ताज्जुब नहीं कि कई टीवी एंकर ख़ुद को कोई संचालक या कंपियर नहीं बल्कि उससे भी आगे या तो रेफ़री मानते हैं या योद्धा की तरह पेश करते हैं।

हिंसा के प्रति आकर्षण

अपराध पत्रकारिता में ख़बर का केंद्र बिंदु अक्सर यह होता है, कितनी गोलियाँ लगीं, कैसे काटा गया, कैसे बदला लिया गया, किसने किसे मार गिराया। यानी क्राइम ड्रामा, जिसमें सनसनी गूँथी गयी है। चाहे फिर वह पुलिस के साथ अपराधियों की मुठभेड़ की बात हो या अपराध के पहलुओं को लेकर विश्लेषण।

अगर पिछले 20 साल के टेलिविज़न की ख़बरें देखें तो पाएँगे कि अपराध वहाँ इनफ़ोटेनमेंट है। इसमें सूचना और मनोरंजन का घालमेल हिंसा को एक रोमांचक दृश्य में बदलता है। कई अपराध की ख़बरें किसी हिंदी फ़िल्म के संगीत, संवाद या उसके दृश्यों से शुरू होती हैं या उनमें जान-बूझकर नाटकीयता को घोटा जाता है। यानी अपराध सामाजिक समस्या की तरह नहीं आता बल्कि एक माचो प्रदर्शन की तरह परोसा जाता है, ताकि दर्शक या पाठक की दिलचस्पी की नसें फड़फड़ाती रहें और वह तुरंत फ़ैसला ले और किसी एक पक्ष को चुन ले।

जातीय मर्दानगी

उत्तर भारत में जाति केवल सामाजिक श्रेणी नहीं है। वह आक्रामक मर्दानगी का भी स्रोत है। जिस तरह आजकल हिंदी पट्टी में कारों के पीछे जातीय नारे लिखकर दबंग होने का प्रदर्शन किया जाता है, उसी तरह हिंदी अख़बारों, पत्र-पत्रिकाओं और टेलिविज़न के फ़्रेम में ये स्लग, शीर्षक, हैडिंग दिख जाते हैं, ठाकुरों की शान, यादवों का दबदबा, जाट शक्ति, गुर्जर आक्रोश।

यहाँ जाति एक सामुदायिक पहचान भर नहीं है बल्कि पुरुष की ताक़त का मुज़ाहिरा भी है। जातीय संघर्षों की रिपोर्टिंग में भी हिंदी के पत्रकार शक्ति और प्रतिष्ठा की भाषा का छौंका लगाते हैं, न कि सामाजिक न्याय और समानता का। और ऐसे में हिंदी की ख़बरों में किसी भी तरह की ऑब्जेक्टिविटी और संवेदनशीलता को बनाये रखना लगभग नामुमकिन होता है।

संवेदनशीलता यानी वल्नरेबिलिटी की अवमानना

चाहे टीवी हो, डिजिटल हो या अख़बार, हिंदी पत्रकारिता में हार्ड न्यूज़ और सॉफ़्ट न्यूज़ का विभाजन काफ़ी पुराना है। इसका रिश्ता भी मर्दवादी सोच से है। राजनीति, युद्ध, अपराध, चुनाव हार्ड न्यूज़ है, तो सॉफ्ट न्यूज़ में आते हैं सांस्कृतिक आयोजन और मनोरंजन, सेहत, मानसिक स्वास्थ्य, देखभाल, भावनात्मक जीवन, बच्चों और औरतों से जुड़ी ख़बरें और लैंगिक समानता की कवरेज।

हार्ड न्यूज़ और सॉफ़्ट न्यूज़ का यह वर्गीकरण भी क्रमश: पुरुष और महिला पत्रकारों के लिए आवंटित काम के लिए है। संपादकीय ढाँचे में हार्ड न्यूज़ अमूमन पुरुष पत्रकार ही कवर करते हैं। ज़ाहिर है कि सॉफ़्ट न्यूज़ महिला पत्रकारों के ज़िम्मे होती है। बरसों से सांस्कृतिक ख़बरें और किसी पत्र-पत्रिका के इन हिस्सों में सिर्फ़ महिलाएँ ही काम करती रही हैं और अभी भी करती हैं। संपादक बाक़ायदा इस वर्गीकरण को लागू करते हैं।

ग़रीब और कमज़ोर पुरुष ग़ायब

एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है। हिंदी पत्रकारिता को पुरुष तो चाहिए, पर उसे केवल विजयी पुरुष चाहिए। इसीलिए उसके यहाँ जगह है नेता की, अधिकारी की, अपराधी की, सैनिक की, उद्योगपति की। जो किसी न किसी रूप में पुरुष के माचो चरित्र की नुमाइंदगी करते हैं।

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जिनके लिए स्थान सीमित है या नहीं के बराबर है, वो हैं बेरोज़गार युवक, अवसादग्रस्त पुरुष, असफल पुरुष किसान, प्रवासी मज़दूर। यानी पुरुष तब तक दृश्य में है, जब तक वह शक्ति का प्रतीक है। जैसे ही वह असुरक्षित, कमज़ोर या असफल हुआ, वह अदृश्य हो जाएगा या हाशिये पर फेंक दिया जाएगा। पुरुष से यह उम्मीद ही नहीं की जाती कि वह कमज़ोर या वल्नरेबल हो। समाज का दर्पण ही तो है पत्रकारिता।

मर्द पत्रकार बनाम बौद्धिक पत्रकार

हिंदी पत्रकारिता में एक और रोचक चीज़ देखने को मिलती है। बहुत पढ़ने-लिखने वाला पत्रकार अक्सर किताबी, इलीट और ज़मीन से कटा हुआ कहा जाता है। उसे ख़बरों की तैयारी में, डेस्क की मुख़्तारी करने में, ख़बरों के अभियानों और आयोजनों में किसी दूसरे ऐसे पत्रकार के नीचे रखा जाता है, जो ख़बरों का अच्छा प्रबंधक है। ऊँची आवाज़ में बोलने वाला, आक्रामक और टकरावप्रिय पत्रकार मास अपील वाला माना जाता है। ऐसे ढेरों उदाहरण हिंदी टेलिविज़न और हिंदी अख़बारों में देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से इसे टीवी पत्रकारिता में देखा जा सकता है, जहाँ ज्ञान नहीं परफ़ॉर्मेंस यानी प्रदर्शन को महत्व दिया जाता है।

क्या हिंदी पत्रकारिता उत्तर भारतीय मर्दवादी सोच का कीर्तिगान है?

कई मायनों में, हाँ। उसके नायक ताक़तवर पुरुष, निर्णायक नेता, आक्रामक जाति वर्ग और समुदाय हैं। उसकी भाषा वीरता, शौर्य, सबक़ सिखाने और बदला लेने के इर्द-गिर्द ही घूमती है। उसकी कल्पना में दुनिया अक्सर संघर्ष का मैदान है, संवाद और विचार-विमर्श की जगह नहीं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में ऐसे ढेरों वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों के नाम श्रद्धेयों में लिये जाते हैं जो अमूमन बदतमीज़, गाली-गलौज करने वाले, चाटुकारिता को पसंद करने वाले और किसी राजा की तरह अख़बार या चैनल को चलाने में यक़ीन करते रहे हैं।

क्या हिंदी पत्रकार पितृसत्तात्मक मूल्यों के वाहक हैं?

इसका जवाब किसी व्यक्ति के स्तर पर नहीं, हिंदी पत्रकारिता की संरचना के स्तर पर देना चाहिए। हिंदी पत्रकार किसी भी रूप में अलग सत्ता नहीं है। वो उसी समाज से आते हैं, जो मूलत: पितृसत्तात्मक है, जाति-आधारित है, शक्ति का पुजारी है और जिसमें भावनात्मक जटिलताओं और संवेदनशीलता के लिए बहुत कम जगह है। इसलिए हिंदी की पत्रकारिता में भी वही मूल्य आये हैं।

मगर यह पितृसत्तात्मक सोच केवल अधिक पुरुषों की मौजूदगी से जुड़ी नहीं है। इस सोच की वाहक बहुत-सी महिला पत्रकार भी हैं जो बाक़ायदा इस एजेंडा को आगे बढ़ा रही हैं। अगर गहरी पड़ताल करें, तो पता चलता है कि चाहे पुरुष पत्रकार हो या महिला, दोनों के कथ्य, कथन और कथा में यह मर्दवादी झलक मौजूद होती है। ज़रूरी नहीं कि ये पत्रकार सचेत रूप से ऐसा करना ही चाहते हों। कई बार वे सिर्फ़ अपने घरेलू और सामाजिक-राजनीतिक वातावरण को ही प्रतिबिंबित कर रहे होते हैं।

अगर दो सौ साल की हिंदी पत्रकारिता को एक सांस्कृतिक संस्था की तरह देखें, तो कमो-बेश वह उत्तर भारतीय सामंती पुरुष मानसिकता का विस्तार है, जिसमें शक्ति का उत्सव है, संवाद की उपेक्षा है, संवेदनशीलता जहाँ कमज़ोरी है और जिसकी दुनिया में लगातार मित्र-शत्रु, वीर-कायर, विजेता-पराजित का द्वंद्व चल रहा है।

अजय शर्मा, ajay sharma

अजय शर्मा

पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

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