
- October 1, 2026
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प्रसंगवश... मूलत: 'हिंद स्वराज और महात्मा गांधी' शीर्षक वाले इस लेख में गांधी के गहन विचारों का अध्ययन एवं विश्लेषण पर्याप्त गहनता से है। 'हिन्द स्वराज' के शताब्दी वर्ष (2009) के आसपास लिखा गया, उसके बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान की पत्रिका 'गवेषणा' के गाँधी विशेषांक में प्रकाशित हुआ यह लंबा आलेख लेखक से प्राप्त हुआ, जिसके चुनिंदा अंश यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
जवरीमल्ल पारख की कलम से....
डीकोडिंग गांधी वाया हिंद स्वराज
गांधी चिंतन के मूल आधार: लगभग 55 साल के लंबे संघर्षशील सार्वजनिक जीवन में गांधीजी ने राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जो साधन अपनाये, वे निरंतर विवाद के विषय रहे। गांधीजी ने नागरिक अवज्ञा, धरना, बहिष्कार और उपवास के जो तरीक़े अपनाये, उनको उन्होंने सत्याग्रह नाम दिया। उनका आग्रह था, किसी भी स्थिति में हिंसा का सहारा न लेना। आंदोलन के दौरान हर तरह के उत्पीड़न को सहते हुए चाहे इसके कारण जान भी क्यों न चली जाये, प्रतिहिंसा का सहारा न लेने पर गांधीजी ने निरंतर बल दिया।
सत्याग्रह और अहिंसा का सर्वप्रथम प्रयोग गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में ही किया था। भारत आने के बाद भी वे इन दोनों के प्रति उतने ही आग्रही बने रहे। यदि उनके द्वारा छेड़े गये आंदोलन में हिंसा होती थी, तो वे आंदोलन को वापस लेना ज़्यादा उचित समझते थे। चौरी-चौरा कांड के बाद जिस तरह से उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया था, उसकी कांग्रेस के अंदर ही कड़ी आलोचना हुई थी। अहिंसा के प्रति इस समझौताहीन आग्रह से दूसरे नेता प्रायः सहमत नहीं हो पाते थे। लेकिन जनता के बीच गांधीजी के प्रभाव के कारण वे गांधीजी के विरोध में बहुत दूर तक नहीं जा सकते थे।
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इसी तरह, गांधीजी अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत-सी ऐसी बातों में विश्वास रखते थे और उसका पालन करते थे, जिनके मूल में उनके परिवार का, विशेष रूप से उनकी माता पुतलीबाई का प्रभाव था। गांधीजी की मां पर वैष्णव धर्म के साथ-साथ जैन धर्म का असर था और यही संस्कार गांधी जी को भी मिले थे। यही कारण है कि वे जीवनपर्यंत शाकाहारी बने रहे, ब्रह्मचर्य को भी उन्होंने एक व्रत की तरह बहुत जल्दी अपना लिया और उस पर बहुत अधिक ज़ोर देते रहे।
इसी तरह, ईश्वर और धर्म के प्रति अपनी आस्था को कभी डिगने नहीं दिया। यही नहीं इसी प्रभाव के कारण वे गौ-रक्षा को भी एक प्रमुख सार्वजनिक मुद्दा बनाकर लंबे समय तक पेश करते रहे। लेकिन अपने चारों ओर जिस दुनिया से उनका वास्ता पड़ता था, उसमें बहुत कम लोग ऐसे थे जो उनके विश्वासों और आग्रहों के अनुरूप जीवन जीते थे। जिस तरह पश्चिम के लोग भौतिक सुखों को हासिल करने की तरफ़ दौड़ रहे थे, बड़ी-बड़ी मशीनों, उद्योगों, तेज़ गाड़ियों, बड़े अस्पतालों और साथ ही आपसी लड़ाई-झगड़ों के कारण होने वाले आपसी मुक़द्दमों, देशों के बीच होने वाले युद्धों ने उन्हें यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि ऐसा क्यों है?
ऐसे समय ही उन्हें पश्चिम के ही ऐसे बुद्धिजीवियों की पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला, जो पश्चिम में उभर रही आधुनिक सभ्यता से गहरे रूप में असंतुष्ट थे और जो एक सादगीपूर्ण नैतिक जीवन अपनाने पर बल देते थे। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए ही प्रख्यात रूसी लेखक लियो ताॅल्स्ताॅय (1828-1910), अमरीकी लेखक हेनरी डेविड थोरो (1817-62), ब्रिटिश लेखक और कवि जाॅन रस्किन (1819-1900), इटली के दार्शनिक और राजनीतिज्ञ गेसिपी मेज़िनी (1805-1872), पारसी मूल के भारतीय बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ दादाभाई नौरोजी (1825-1917) आदि के विचारों को पढ़ा और जाना।
इसके अतिरिक्त उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का भी अध्ययन किया। जिन यूरोपीय लेखकों का गहन अध्ययन किया, वे सभी प्रायः आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के कटु आलोचक थे। यह उल्लेखनीय है कि ताॅल्स्ताॅय जिन्हें एक महान उपन्यासकार और कहानीकार के रूप में अधिक जाना जाता है, गांधीजी ने उनके उस लेखन को अधिक महत्त्व दिया जो एक आस्थावादी ईसाई के रूप में उन्होंने लिखा था। इन लेखकों के अध्ययनों और अपने जीवनानुभवों से ही वे उन विचारों की तरफ़ बढ़े, जिसका प्रभाव स्पष्ट रूप हमें पहली बार ‘हिंद स्वराज्य’ (1909) में दिखायी देता है।

आधुनिक सभ्यता की आलोचना
गांधीजी ने आधुनिक सभ्यता को तकनीकी विकास के साथ जोड़कर देखा है। वे मानते हैं कि “शरीर का सुख कैसे मिले यही आज की सभ्यता ढूंढती हैः और यही देने की कोशिश करती है” (हिंद स्वराज्य, पृ. 36)। उनके अनुसार यंत्रों ने ही भौतिक संपदा का विस्तार किया है। इसकी ज़बर्दस्त होड़ ने जहां कुछ लोगों को आरामतलब ज़िंदगी जीने के अवसर प्रदान किये हैं, तो दूसरी ओर उनसे कई गुना ज़्यादा लोगों का जीवन नारकीय बना दिया है।
वे बताते हैं कि “इंग्लैंड में ही चालीस लाख ग़रीब औरतों को पेट के लिए सख़्त मज़दूरी करनी पड़ती है” (वही, पृृ. 36)। कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूरों की “हालत जानवर से भी बदतर हो गयी है” (वही, पृ. 35)। इस लोभ-लालच पर टिकी सभ्यता ने न केवल ग़ैर-बराबरी बढ़ायी है, उनके अनुसार इसने लोगों को ग़ुलाम बनने के लिए मजबूर किया है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि “पहले लोगों को मार-पीटकर ग़ुलाम बनाया जाता था; आज लोगों को पैसे का और भोग का लालच देकर ग़ुलाम बनाया जाता है” (वही, पृ. 35)।
साम्राज्यवाद बनाम आधुनिक सभ्यता
इसी बिंदु पर गांधी जी इस प्रश्न को सामने रखते हैं कि ऐसी सभ्यता में फंसे हुए अंग्रेज़ भारत को कैसे अपने अधीन ले सके। इसी के साथ जुड़ा प्रश्न यह भी था कि क्या भारत इसी सभ्यता के प्रभाव में आकर अंग्रेज़ों का दास बना। इस संबंध में गांधी जी का स्पष्ट मत है कि अंग्रेज़ अपनी ताक़त के बल पर हम पर राज नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारी दुर्बलता की वजह से हमारे पर राज कर रहे हैं। अपनी दुर्बलता के लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार हैं।
वे लिखते हैं, “हिंदुस्तान अंग्रेज़ों ने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है। हिंदुस्तान में वे अपने बल से नहीं बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है” (वही, पृ. 37)। हमने अपने लोभ-लालच के लिए अंग्रेज़ों का साथ दिया। उन्होंने हमारी फूट का फ़ायदा उठाया। हमने वे अवसर पैदा किये, जिससे अंग्रेज़ अपनी सत्ता यहां क़ायम कर सके। गांधीजी का यह भी मानना था कि अंग्रेज़ अपनी तलवार के बल पर नहीं बल्कि हमारी इच्छा से यहां टिके हुए हैं।
इसी संदर्भ में गांधीजी साम्राज्यवाद की पहचान काफ़ी हद तक सही ढंग से करते हैं। वे अंग्रेज़ी साम्राज्य के वास्तविक चरित्र का उद्घाटन करते हुए लिखते हैं, “वे जिस देश को (अपने क़ाबू में) रखते हैं उसे व्यापार के लिए रखते हैं, यह जानने लायक़ है। उनकी फ़ौजें और जंगी बेड़े सिर्फ़ व्यापार की रक्षा के लिए हैं” (वही, पृ. 38)।
जो बात इस पुस्तक के लिखे जाने के साठ साल पहले ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखी थी कि “अपने माल के लिए बराबर फैलते हुए बाज़ार की ज़रूरत के कारण पूंजीपति वर्ग दुनिया के कोने-कोने की ख़ाक छानता है। वह हर जगह घुसने को, हर जगह पैर जमाने को, हर जगह संपर्क क़ायम करने को बाध्य होता है” (पृ. 40)। उसी बात को कुछ भिन्न ढंग से गांधी जी भी ‘हिंद स्वराज’ में कहते हैं, “अंग्रेज़ अपने माल के लिए सारी दुनिया को अपना बाज़ार बनाना चाहते हैं” (हिंद स्वराज, पृ. 39)। वे यह भी कहते हैं कि “अपनी कोशिश में वे कोई क़सर नहीं रखेंगे” (वही, पृ. 39)। लेकिन उनको इसमें कितनी सफलता मिलेगी, यह हमारे पर निर्भर करती है।
इन उद्धरणों से यह साफ़ है कि गांधी जी साम्राज्यवाद के चरित्र की सही पहचान कर पा रहे थे, लेकिन उनकी कठिनाई यह थी कि इसे ही वे आधुनिक सभ्यता की पहचान भी मान रहे थे या यह कहना चाहिए कि वे आधुनिक सभ्यता और साम्राज्यवाद को एकमेक कर रहे थे। यही कारण है वे अंग्रेजी दासता के अधीन हिंदुस्तान की दीन-हीन दशा के लिए अंग्रेज़ों को नहीं वरन आधुनिक सभ्यता को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह वे साम्राज्यवाद से संघर्ष करने या उसे परास्त करने को अपने कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाते बल्कि आधुनिक सभ्यता से मुक्त होने को अपना कार्यक्रम बनाते हैं।
आधुनिक सभ्यता, पूंजीवादी विकास और राष्ट्र की अवधारणा
इसी तरह गांधी जी आधुनिक सभ्यता को पूंजीवादी विकास के साथ भी गड्डमड्ड कर देते हैं। मसलन, जब वे इस मुद्दे पर आते हैं कि हिंदुस्तान की ग़रीबी का कारण क्या है, तो वे इसका कारण न तो अंग्रेज़ों के शासन को मानते हैं और न उनके द्वारा भारत की संपदा की लूट को। जबकि वे स्वयं कह चुके हैं कि अंग्रेज़ों ने भारत को व्यापार के लिए और अपने बाज़ार का विस्तार करने के लिए अपने अधीन किया है। लेकिन इसके विपरीत वे भारत की कंगाली का कारण रेलों को, वकीलों को और डाॅक्टरों को घोषित कर देते हैं (वही, पृ. 42)।
इसे व्यापक अर्थ में कहें तो यातायात के आधुनिक साधनों और आधुनिक मध्यवर्गीय पेशों को वे भारत की ग़रीबी का कारण बताते हैं। इसके लिए वे अपने तर्क भी देते हैं। रेलगाड़ी को वे महामारी के रूप में लेते हैं। उनका मानना है कि रेलगाड़ी की वजह से अकाल बढ़ता है, महंगाई बढ़ती है। क्योंकि जहां महंगाई होती है, अनाज वहां खिंचा चला जाता है। इसी तरह रेल से दुष्टता बढ़ती है क्योंकि “बुरे लोग अपनी बुराई तेज़ी से फैला सकते हैं” (वही, पृ.43)। पवित्र स्थान अपवित्र बन जाते हैं।
वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि रेल से भारतीयों में एक राष्ट्र होने की भावना बलवती होती है। वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि अंग्रेज़ों ने हमारे में एक राष्ट्र की भावनाओं का बीजारोपण किया है। इसके विपरीत वे यह मानते हैं कि “जब अंग्रेज़ हिंदुस्तान में नहीं थे तब हम एक-राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था” (वही, पृ. 43)।
यहां यह ग़ौरतलब है कि कांग्रेस की भूमिका की चर्चा करते हुए वे कांग्रेस को इस बात का श्रेय दे चुके हैं कि उसने “…‘हम एक-राष्ट्र हैं’ ऐसा जोश पैदा किया” (वही, पृ. 25)। इसका अर्थ यह भी है कि कांग्रेस की स्थापना से पहले हमारे में ‘एक-राष्ट्र’ होने की भावना थी या नहीं लेकिन जोश तो नहीं था। यानी कि अगर राष्ट्र जैसा कुछ था भी तो वह सुप्तावस्था में ही था। इसलिए इस बात को भले ही स्वीकार न करें कि रेलगाड़ी ने भारतीयों में ‘एक-राष्ट्र’ होने की भावना को पैदा किया लेकिन यह तो मानना होगा कि भारतीयों में ‘एक-राष्ट्र’ होने की भावना को जगाने में अंग्रेज़ी सत्ता की भूमिका अवश्य थी, प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप में। वह पहले से मौजूद भी थी तो, उसका कोई महत्त्व नहीं था।
राष्ट्र बनाम धर्म
राष्ट्र की अवधारणा में निहित अंतर्विरोध के बावजूद गांधी जी की ‘एक-राष्ट्र’ की अवधारणा कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। वे इस बात की आलोचना करते हैं कि भारत में कई राष्ट्र हैं। यहां राष्ट्र का अर्थ राष्ट्रीयताओं या जातीयताओें से नहीं है, जो आमतौर पर भाषाई समाजों के संदर्भ में प्रयुक्त की जाती हैं। यहां गांधी जी धर्म को राष्ट्र का आधार मानने की अवधारणा की आलोचना करते हैं। वे साफ़ तौर पर घोषणा करते हैं कि “दुनिया में किसी भी हिस्से में एक-राष्ट्र का अर्थ एक-धर्म नहीं किया गया है” (वही, पृ. 45)।
उनका यह भी मानना था कि “एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दख़ल नहीं देते; अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने के लायक़ नहीं हैं” (वही, पृ. 45)। भारत के बारे में उनका मानना था कि वह आरंभ से ही ऐसा था कि किसी भी धर्म का आदमी यहां आकर रह सकता था। इतिहास की ओर संकेत करते हुए वे कहते हैं कि “जो नये लोग उसमें दाख़िल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुल-मिल जाते हैं” (वही, पृ. 45)।
मशीनों और उद्योगीकरण का विरोध
‘हिंद स्वराज्य’ पुस्तक में आधुनिक सभ्यता की तीव्र आलोचना के साथ-साथ एक वैकल्पिक संकल्पना भी प्रस्तुत की गयी है। सार रूप में उन्होंने यंत्रों पर निर्भर समाज के व्यापक उद्योगीकरण पर आधारित विकास के मार्ग को पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने इसे वर्तमान सभ्यता के सभी रोगों का कारण माना। यही नहीं, उन क्षेत्रों को भी जिनकी प्रायः उद्योगीकरण का विरोध करने वाले भी आलोचना नहीं करते, उनको भी उन्होंने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मसलन, अदालतें, अस्पताल, ट्रेन आदि भी उन्हें इस सभ्यता के कुलक्षण ही दिखते थे। उनका मानना था कि “मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है”(वही, पृ. 82)।
उन्हें इस बात का तो अफ़सोस है कि मैनचेस्टर से बने कपड़े आने से भारत का परंपरागत शिल्प बर्बाद हो गया है। इसके लिए उन्होंने स्वदेशी का जो नारा दिया, वह भी एक सही राजनीतिक क़दम माना जा सकता है। लेकिन उन्होंने मशीनों को पूरी तरह अस्वीकार करने की बात कही उसे स्वयं कांग्रेस ने ही स्वीकार नहीं किया। उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए चरखा चलाना एक रिवाज अवश्य हो गया है। लेकिन उसे एक नीति के रूप में स्वीकार करने के लिए कांग्रेस कभी तैयार नहीं हुई।
5 अक्टूबर 1945 में गांधी जी ने नेहरू को जो पत्र लिखा, उसमें उन्होंने यंत्रों के बारे में कमोबेश वही बातें दोहरायीं जो वे मूल रूप में हिंद स्वराज में कह चुके थे। लेकिन नेहरू ने अपने 9 अक्टूबर 1945 के उत्तर में इसे स्वीकार नहीं किया। इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि जब 20 साल पहले उन्होंने हिंद स्वराज पढ़ा था, तब भी उन्हें यह अयथार्थ प्रतीत हुई थी। उन्होंने लिखा कि “हिंद स्वराज लिखे जाने के 38 साल बाद आज दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। मुमकिन है कि यह ग़लत दिशा की ओर जा रही हो। लेकिन हम आज के यथार्थ को ध्यान में नहीं रखेंगे तो ख़ुदकुशी करने के अलावा हमारे सामने कोई रास्ता नहीं रहेगा” (नेहरू का गांधी को पत्र, ‘हिंद स्वराज एंड अदर राइटिंग’ से उद्धृत, पृ. 154)।
उन्होंने विस्तार से आज़ाद भारत की अपनी संकल्पना प्रस्तुत की। गांधी जी की ग़रीबी को महिमामंडित करने की कोशिशों और यंत्रों के बहिष्कार के आगे प्रश्नचिह्न लगाते हुए उन्होंने पूछा कि “करोड़ों लोगों के लिए महलों का प्रश्न नहीं उठता। लेकिन उनके लिए एक आरामदेह घर क्यों न हो, जहां वे एक सुसंस्कृत जीवन जी सकें। हमारे आज के बहुत से शहरों में बहुत से बुराइयां पैदा हो गयी हैं और उनकी निश्चय ही निंदा की जानी चाहिए और उनको बढ़ावा भी नहीं देना चाहिए लेकिन साथ ही गांवों में भी शहरों जैसी सुविधा और वही संस्कृति को बढ़ावा भी दिया जाना चाहिए” वही, पृ. 153)।
अपने 13 नवंबर के उत्तर में गांधी जी नेहरू की बातों को सही परिप्रेक्ष्य में समझ जाते हैं और यहां तक लिखते हैं कि उनके और नेहरू के दृष्टिकोण में कोई बुनियादी अंतर नहीं है (वही, पृ. 155)। इससे स्पष्ट है कि गांधी जी ने विकास का जो रास्ता ‘हिंद स्वराज’ में पेश किया वह अव्यावहारिक था।

जवरीमल्ल पारख
साहित्य, सिनेमा और मीडिया जैसे क्षेत्रों में अपने आलोचनात्मक लेखन के लिए ख्यात। अब तक विभिन्न विषयों से संबंधित बीस पुस्तकें प्रमुख प्रकाशनों से प्रकाशित। प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं और इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। संपर्क: jparakh@gmail.com
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