
- October 1, 2026
- आब-ओ-हवा
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गूंज बाक़ी... साहित्य के ऐतिहासिक पन्नों से नायाब और दिलचस्प क़िस्से खोज लाते हैं विवेक मेहता। आब-ओ-हवा के लिए 'रंग-बिरंगी' ब्लॉग की प्रस्तुति ऐसे ही पन्नों की देन है। गांधी प्रसंग के सिलसिले में ऐसे ही कुछ सुनहरे पन्नों से एक विशेष प्रस्तुति में कुछ सुहानी यादें...
तीन क़िस्से: गांधीजी की दूरदृष्टि, स्पर्श व परिहास
गांधी जी का दांत, कई बीमार
गांधी जी का एक दांत सड़ गया था। उसके कारण दर्द भी था। डॉक्टर को बुलाया गया। गांधी जी को बताया गया- “डॉक्टर तैयार है। जब आपको सुविधा…”
गांधी जी तकिये पर सीधे हुए और बोले- “सुविधा.. अभी भी है।”
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डॉक्टर के आते ही गांधी जी कुर्सी पर बैठ गये। डॉक्टर दांत निकालने की तैयारी में लग गया। तभी जैनेंद्र कुमार के एक परिचित ने आकर फुसफुसाते हुए कहा- “जैनेंद्र, ध्यान रखना दांत डॉक्टर के पास ही नहीं रह जाये।”

हां, गांधी जी का दांत है। डॉक्टर उसे रखना तो चाहेगा, जैनेंद्र ने सोचा।
बुढ़ापे में दांत को क्या ज़्यादा समय लगना था। गांधी जी को भी कहां ज़्यादा कष्ट होना था! डॉक्टर ने खींचा और दांत बाहर निकल आया। जैनेंद्र कुमार ने आगे बढ़कर कहा- “लाइए मुझे दीजिए। मैं धो दूं।”
और सहज भाव में दांत जैनेंद्र के हाथ लग गया। जैनेंद्र ने धोया, पोंछा और रूई में लपेटकर एक लिफ़ाफ़े में रखकर जेब के हवाले कर लिया। गांधी जी के दांत को लेकर एक अनार सौ बीमार जैसे हालात हो गये।
कुछ लोगों को ख़बर लग गयी कि दांत जैनेंद्र कुमार के पास है। एक प्रभावशाली व्यक्ति जैनेंद्र कुमार से पूछने लगे- “वह दांत के आपके पास है?”
“जी, सर्वथा सुरक्षित है। भय की कोई बात नहीं।”- उनके आशय को समझकर भी न समझते हुए जैनेंद्र कुमार ने उत्तर दिया।
ऐसे वह दांत कई लोगों की महत्वाकांक्षा का विषय बन गया। उड़ते-उड़ते ख़बर गांधी जी तक भी पहुंची। एक रोज़ अचानक गांधी जी ने जैनेंद्र कुमार से पूछा- “जैनेंद्र, वह दांत तुम्हारे पास है?”
“जी.. है तो।”
“अभी है?”
“जी… आप क्या करेंगे”- डरते, झिझकते हुए जैनेंद्र कुमार ने पूछा।
“क्या करूंगा! वापस मुंह में तो लगा नहीं पाऊंगा।”- गांधी जी ने कहा।
हिम्मत जुटाकर जैनेंद्र कुमार ने कहा- “फिर रहने ही दीजिए ना। जैसा कहीं, वैसा मेरे पास।”
गांधी जी भी बैरिस्टर थे। बोले- “आख़िर भाई, है तो वह मेरा दांत ना। पास में हो तो अभी दो।”
अब कोई चारा नहीं था जैनेंद्र कुमार के पास। चुपचाप जेब से पुड़िया निकालकर गांधी जी के हवाले कर दी। गांधी जी ने अपने विश्वासपात्र आदमी को बुलाकर पुड़िया देते हुए कहा- “देखो, इसे किसी गहरे कुएं में डाल दो।”
व्यक्ति ने हां में सिर हिलाया। गांधी जी ने गहरी सांस ली, मानो वह अपनी ओर से छोटी से छोटी संभावनाओं को भी समाप्त कर देना चाहते हों।
———-*———-
गांधी बाबा की बेटी
लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो उस वक़्त तक यशपाल का न तो गांधीजी से मोहभंग हुआ था और न क्रांतिकारियों से जुड़ाव। वे आश्रम में ही रहते थे। महादेव भाई ने उन्हें ज़रूरी चिट्ठियों की नक़ल करने का काम सौंप रखा था। गांधी कुटिया में बैठकर वे यह काम करते थे। वहां कुछ काम निबटाकर दोपहर बाद तीन बजे बापू ज़रूरी पत्र लिखने बैठते थे। ज़रूरी मुलाक़ातियों और कार्यकर्ताओं से मिलने का भी वह समय था। यशपाल ने तब का एक संस्मरण लिखा…
एक दिन एक कार्यकर्ता महिला को लेकर अंदर आ गयी बोली, “सवेरे से भूखी-प्यासी आपसे मिलने की हठ लिये बैठी है। सिर्फ एक ही मिनिट की मुलाक़ात चाहती है।”
बापू कुछ हां-ना करें, इससे पहले ही वह महिला आगे आ गयी। प्रणाम किया और पैरों को हाथ लगाकर चरण-रज माथे चढ़ाकर उसने कहा, “बाबा, मैंने सुना है आप ग़रीबों के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। मैं ठहरी तवायफ़। पाप की कमाई आप जैसे महात्मा को कैसे दे सकती हूं। पर जब मैं छोटी थी तब सोने की ये चार चूड़ियां मेरी मां ने मुझे दी थीं। वही आपके चरणों में रखती हूं।”
इतना कहकर हाथों में से चार चूडियां उतारकर उसने बापू के चरणों में रख दी और जाने के लिए उठ खड़ी हई। बापू भी खड़े हो गये और उसकी तरफ़ ममता भरी नज़रों से एक-टक देखने लगे, फिर उसके सिर पर स्नेह से हाथ रखकर बोले, “ईश्वर तुम्हें सुखी रखे, बेटी!”
बापू के इतना कहते ही मानो उस महिला के हृदय का बांध टूट गया। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। बड़ी ही वेदना भरी कांपती आवाज़ में वह बोली, “यह आपने क्या किया, बाबा! आपने मुझे बेटी कहकर क्यों पुकारा? मेरे तो सात-सात जनम सफल हो गये, महाराज जी! मगर अब मैं अपना धंधा कैसे करूंगी? गांधी बाबा की बेटी कोठे पर तो हरगिज़ नहीं बैठ सकती!”
और बापू की चरण-रज माथे चढ़ाकर आंसुओं से तर चेहरे पर कृतार्थता का तेज लिये वह जीवन की किसी नवीन आराधना की पगडंडी पर चल निकली।
———-*———-
तब बंदूक़ चलाऊंगा..
गांधी जी के शांति पूर्वक चलने वाले असहयोग आंदोलन का असर हो रहा था। अचानक 4 फरवरी 1922 को गोरखपुर ज़िले के चौरी-चौरा में असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन पर हमला किया और वहां आग लगा दी। इस घटना में तीन नागरिकों और 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी।
महात्मा गांधी हिंसा के घोर विरोधी थे। उन्होंने इस घटना के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी।
उसके कुछ दिनों बाद स्वामी सत्यदेव ने एक दिन व्यंग्य-विनोद के मिले-जुले भाव में उनसे पूछा, “गांधी जी, उस आंदोलन को क्यों वापस लिया? बनिये के लड़के हो, क्षत्रिय के लड़के होते तो ऐसा न करते।”
गांधी जी ने हंसकर कहा, “सच बात है कि मैं बनिये का लड़का हूं, इसलिए मुझे इंतज़ाम करना आता है। क्या आपको मालूम है मैंने सत्याग्रह की लड़ाई क्यों बंद रखी? मैंने बंदूक़ तैयार की थी, निशाना लगाया था, लेकिन वह निशाना बैठा नहीं। उस निशाने के हट जाने के बाद भी यदि मैं गोली छोड़ दूं, तो वह निकम्मी जाएगी। और मेरी गोली के निकम्मे जाने पर हम सब निकम्मे हो जाएंगे। इसलिए सोच-विचारकर मैंने बंदूक़ न दागी, लेकिन असहयोग की उस भरी हुई बंदूक़ को दीवार के सहारे रख छोड़ा है। जब फिर वह निशाना मिलेगा, तब बंदूक़ चलाऊंगा।”

विवेक मेहता
पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ, 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470
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