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ख़बरनामा:200... हर शनिवार, इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....

हिंदी का पाठक: एक तफ़्तीश

          हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास का सबसे रहस्यमयी किरदार उसके संपादक या विचारधाराएँ नहीं हैं, बल्कि उसके पाठक हैं। वह कौन है और कहाँ है? उसे किसने खोजा? वह कैसे प्रतिक्रिया देता है? उसकी आकांक्षाएँ क्या हैं? न जाने कितने सवाल हैं पर सही-सही जवाब कोई नहीं।

पिछला लेख पढ़ें: हिंदी पत्रकारिता का मर्दलोक

जब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की शुरूआत हुई तो उसका कोई निश्चित समर्पित पाठक नहीं था। उत्तर भारत के इस इलाक़े में फ़ारसी लिपि में लिखने-बोलने-पढ़ने वाला, इलाक़ाई बोलियाँ जैसे अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुंदेली, बघेली, मैथिली, राजस्थानी बोलने वाला जातियों में कटा-फटा समाज था। मिसाल के लिए एक कायस्थ व्यक्ति घर में अवधी या भोजपुरी बोलता, अदालत में उर्दू में लिखता था और अपने धर्मग्रंथ संस्कृत में पढ़ता था। वह अंग्रेज़ी अभिजात वर्ग से दूर और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की रियाया था।

हिंदी पाठक का सामाजिक मानचित्र

  • हिंदी का पाठक 1826-1900 के बीच कोलकाता, बनारस, इलाहाबाद का शहरी, अनपेक्षित, उच्च-मध्य वर्ग, अमीर व्यापारी, ब्राह्मण, कायस्थ, पढ़ा-लिखा, संस्कृत-उर्दू-अरबी मिश्रित शिक्षा लिये हुए धार्मिक, सामाजिक सुधार और राजनीति में दिलचस्पी रखता था।
  • 1900-1947 के बीच वह 15-25% साक्षरता वाला शहरी-ग्रामीण, मध्य वर्ग, व्यापारी, छोटा ज़मींदार था, जिसकी दिलचस्पी राष्ट्रवादी आंदोलन, उसके नेताओं और भारत के गौरव में थी।
  • आज़ादी के बाद 1947-1980 के बीच यही पाठक 25-45% साक्षरता के साथ ज़्यादा ग्रामीण और कम शहरी हो गया। यह मध्य वर्ग, किसान, सरकारी कर्मचारी और कारोबारी था, जिसकी रुचि किसी तरह आर्थिक तंगी से बचते-बचाते सामान्य जीवन बिताने में ज़्यादा थी।
  • 1980 से 2000 के बीच हिंदी पाठक में 45 से 65% तक साक्षरता के साथ शहरी और ग्रामीण भागीदारी का संतुलन आया। यह पाठक अब मध्य वर्ग, किसान, व्यापारी, छोटा उद्यमी था, जो हिंदी और हिंग्लिश बोलता था। राजनीति, इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद और अपराध-मनोरंजन में उसकी दिलचस्पी थी।
  • साल 2000 से 2026 के बीच इंटरनेट-डिजिटल के दौरान 65 से 78% साक्षरता के बीच यह पाठक मूल रूप से शहरी-क़स्बाई हो गया है। यह पाठक मध्य वर्ग का ग़ैर-सरकारी कॉर्पोरेट प्रोफ़ेशनल, व्यापारी, टीनेजर और किसान है, जिसकी भाषा हिंदी, हिंग्लिश और इंग्लिश है। इसकी दिलचस्पी राष्ट्रीयता, धर्म, राजनीति के अलावा अंग्रेज़ी पाठक की तरह मनोरंजन और सेलिब्रिटी में बराबर है।

उपयोगिता का पाठक

भारतेंदु युग और द्विवेदी युग का पाठक ज्ञान से अधिक आत्मसम्मान की तलाश में था। वह अंग्रेज़ी पढ़ने वाले अभिजात वर्ग का हिस्सा नहीं था। वह सत्ता के केंद्र से दूर परिधि पर था। 1826 से 1900 के बीच यह पाठक साप्ताहिक अख़बारों में सरकारी-प्रशासनिक और धार्मिक कथाएँ, साहित्यिक लेख पढ़ता था। 1900-1947 के बीच दैनिक पत्र-पत्रिकाओं में उसने धर्म-समाज के अलावा राजनीति की ख़बरों में दिलचस्पी लेनी शुरू की। 1947 से 1980 के बीच ख़बरों में उसकी प्राथमिकता सरकारी योजनाएँ, कर, राष्ट्रीय एकता, धर्म-संस्कृति में रही। 1980 से 2000 के बीच दैनिक अख़बार और टीवी के ज़रिये नये प्रोडक्ट्स, राजनीति और धर्म-संस्कृति में उसकी मुख्य रुचि रही। 2000 से 2026 के बीच डिजिटल और टीवी के ज़रिये दैनिक और फिर इंस्टेंट ख़बरें उसका मुख्य आधार बनीं, जिनके विषय राष्ट्रवादी, करियर, धार्मिक-राजनीतिक हो गये।

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हिंदी का पाठक अमूमन सभी कालों में मूलत: उपयोगितावादी था। वह पढ़ना चाहता था, पर इसलिए नहीं कि उसे ब्रह्मांड की संरचना जाननी है। वह पढ़ना चाहता था क्योंकि उसे नौकरी चाहिए थी, उसे सामाजिक प्रतिष्ठा चाहिए थी, उसे अपने बच्चों को समाज में उठाना था। इसके लिए उसका सत्ता के इर्द-गिर्द होना और उसमें दिलचस्पी लेना ज़रूरी था।

आज़ादी के बाद हिंदी का पाठक लोकतंत्र का आधुनिक नागरिक नहीं बन पाया। वह प्रजा जैसा पर्यवेक्षक बना रहा। उसे दिल्ली की ख़बरें, प्रधानमंत्री की ख़बरें, सरकारी योजनाओं की ख़बरें चाहिए थीं। उसे सत्ता और राष्ट्रवाद में अपनी मुक्ति दिखायी देती थी। इस दौर में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं ने उसे नागरिक कम, सरकारी सूचनाओं का उपभोक्ता ज़्यादा बनाया। इसीलिए धीरे-धीरे हिंदी अख़बारों में नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी योजनाओं की ख़बरें बढ़ती गयीं। उदारीकरण के बाद हिंदी पाठक को उपभोग की वस्तुएँ चाहिए थीं, विदेश यात्रा करनी थी, वह सिर्फ़ बचत पर निर्भर नहीं था, वह निवेश करना चाहता था, महँगी चीज़ें ख़रीदना चाहता था।

2000 के बाद हिंदी पत्रकारिता ने उसे करियर, बिज़नेस, बाज़ार, शेयर मार्केट, रीयल एस्टेट की राह दिखायी। हिंदी पत्रकारिता ने वही परोसा, जिसकी माँग थी और उसने यह भी तय किया कि उसका पाठक क्या माँगे। इसीलिए हिंदी के पाठक को दिखाया जाने वाला भारत सीमित सामाजिक अनुभवों से छनकर आता है।

2020 के बाद हिंदी पाठक में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि वह अब पाठक कम और दर्शक अधिक हो गया है। वह यूट्यूब, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और शॉर्ट वीडियो से अपने समाचार और अपनी दुनिया का ख़ाका खींचता है। उसका समाचार उपभोग खंडित है।

2026 तक आते-आते कोई इकहरा हिंदी पाठक नहीं बचा है, कम से कम पाँच अलग-अलग समाचार उपभोक्ता हैं, राजनीतिक उपभोक्ता, धार्मिक सामग्री उपभोक्ता, प्रतियोगी परीक्षा उपभोक्ता, मनोरंजन उपभोक्ता और सीमित लेकिन कुछ गंभीर विषयों के डिजिटल उपभोक्ता। हिंदी पाठक धीरे-धीरे दर्शक में बदल चुका है जो कम धैर्यवान, कम जिज्ञासु, ज़्यादा प्रतिक्रियाशील है। उसे बहस चाहिए, उत्तेजना चाहिए और नाटकीयता चाहिए।

हिंदी पाठक का माइंडमैप

सैकड़ों साल से अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं, जातियों में बँटा, हिंदू और मुसलमान हिंदी पाठक हमेशा ख़ुद को बदलाव के इंतज़ार में खड़ा पाता है। वह पूरी तरह संतुष्ट और शांत नहीं है। वह लगातार ऊपर उठना चाहता है। उसे सम्मान चाहिए, पहचान चाहिए, प्रतिनिधित्व चाहिए। वह ज्ञान-विज्ञान को बस साधन के रूप में देखता है, लक्ष्य के रूप में नहीं।

हिंदी पाठक का सबसे रोचक पक्ष उसका मनोविज्ञान है। वह अक्सर तीन चीज़ों में झूलता दिखायी देता है।

  • पहला है असुरक्षा। उसे हमेशा लगता है कोई उससे आगे निकल गया है। पहले अंग्रेज़ी, फिर महानगर, फिर वैश्वीकरण, फिर तकनीक। यह असुरक्षा उसकी ख़बरों के चुनाव पर असर डालती है।
  • दूसरा है आकांक्षा। हिंदी पाठक शायद भारत का सबसे आकांक्षी पाठक है। वह नौकरी चाहता है, शहर जाना चाहता है, ऊपर उठना चाहता है, सम्मान चाहता है। इसीलिए हिंदी पत्रकारिता में ‘सफलता’ एक स्थायी विषय है।
  • तीसरा है पहचान। वह केवल आर्थिक इकाई और लोकतांत्रिक जीव नहीं है। वह जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्र के फ़िल्टर्स से ख़ुद को समझता है। इसके चलते पहचान आधारित सामग्री हिंदी में बहुत कामयाब रहती है।

पाठक प्रोडक्ट था, ग्राहक नहीं

पंडित जुगल किशोर के अख़बार ‘उदन्त मार्तण्ड’ के पहले अंक की 500 प्रतियाँ छपी थीं। यह सदस्यता (सब्सक्रिप्शन) पर आधारित अख़बार था। मगर यह कुछ ही समय तक छपा क्योंकि न तो इसे ज़रूरी सब्सक्रिप्शन मिला और न ही ब्रिटिश सरकार ने डाक दरों में रियायत दी, जिसकी माँग जुगल किशोर कर रहे थे। इसमें कुछ विज्ञापन भी छपे थे, मगर उससे अख़बार की छपाई का ख़र्च नहीं निकला था। इस प्रयोग ने हिंदी पत्रकारिता के आर्थिक मॉडल की नींव भी रखी। सदस्यता मॉडल फेल हो गया था। यह एक तरह से संदेश था कि ख़बरें या सूचनाएँ छापने के लिए पैसा हिंदी के पाठक से नहीं आएगा।

पाठकों से शुरू से ही कभी हिंदी पत्रकारिता ने यह माँग नहीं की कि ख़बरों के लिए उसे पैसा देना है। मीडिया इंडस्ट्री ने इसे दशकों से विज्ञापन के पैसे से इतना सब्सिडाइज़ कर दिया है कि अब उसका जीना-मरना विज्ञापनदाताओं के हाथ में है। भारत में आज 88.6 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, पर इनमें से मुश्किल से 15 लाख किसी भी तरह की डिजिटल ख़बरों के लिए पैसा अदा करते हैं यानी क़रीब 0.2 फ़ीसद।

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जिस पत्रकारिता में उसके पाठक का कोई निवेश न हो तो क्या उसमें उस पाठक की ज़रूरतें, उसकी मुश्किलें प्राथमिकता बन सकती हैं?

इसीलिए हिंदी में पाठक बहुत कम हैं। जो हैं वो ग्राहक नहीं हैं, बस उत्पाद हैं। अगर सही मायने में देखें तो हिंदी की पत्र-पत्रिकाएँ और मीडिया असल में अपने पाठक के बग़ैर ज़िंदा हैं। चूँकि हिंदी पाठक का अपनी भाषा की पत्रकारिता में कोई निवेश या दावेदारी नहीं है तो वहाँ उसकी कोई एजेंसी भी नहीं है, उसका कोई स्वर नहीं है। उसकी चाहत उसकी प्राथमिकताएँ, उसकी आकांक्षाएँ और चुनाव इस मीडिया में मायने नहीं रखते या प्रतिध्वनित नहीं होते। इसीलिए सनसनीखेज़ डिबेट्स, सेलिब्रिटी स्कैंडल्स या पक्षपाती प्रचार और ध्रुवीकरण को हिंदी मीडिया में प्राथमिकता मिलती है। बड़े मीडिया समूहों के मालिक संपादकीय आज़ादी पर अंकुश लगाते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि सरकारी मदद के बग़ैर वो ज़िंदा नहीं रह पाएँगे।

मालिक जानते हैं कि ईमानदारी से हिंदी में पत्र-पत्रकारिता करना घाटे का सौदा है। इसीलिए हिंदी पत्रकार को दिया गया मेहनताना मालिक को खलता है। उसे पता है ख़बरों के उत्पादन से उसे कुछ नहीं मिलने वाला। और इसीलिए विज्ञापन के अलावा नेताओं, कॉर्पोरेट से पैसे लेकर ख़बरें छापने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

2010 में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने ख़बरों में पेड न्यूज़ यानी पैसा लेकर ख़बरें छापने की प्रवृत्ति पर विचार किया था। हिंदी मीडिया में ऐसा ज़्यादा हुआ है। मुख्यधारा का हिंदी मीडिया पूरी तरह से विज्ञापन पर है। सरकारी विज्ञापन का बजट बढ़कर 2024-25 में 654.90 करोड़ रुपये हो चुका है जो पिछले 5 साल में सबसे ज़्यादा है। अगर यह सुरक्षा कवर हट जाये तो बहुत-सा हिंदी मीडिया डूब जाएगा। ऐसे में क्या हिंदी का पत्रकार सरकार से उसकी जवाबदेही माँग सकता है?

विडंबना का पाठक, पाठक की विडंबना

1947 में भारत की साक्षरता क़रीब 12–18 फ़ीसद के बीच बतायी जाती है। 1951 की पहली जनगणना में साक्षरता क़रीब 18.3 प्रतिशत थी। आज भारत की साक्षरता 77 प्रतिशत से ऊपर है। भारतीय पाठक सर्वेक्षण के अनुसार 2019 तक हिंदी दैनिकों की कुल पाठक संख्या क़रीब 18.6 करोड़ तक थी, जबकि प्रिंट के कुल पाठक 42.5 करोड़ के आस-पास थे यानी देश की एक-तिहाई जनसंख्या। यह संख्या किसी भी यूरोपीय भाषा के समाचार बाज़ार से कहीं बड़ी है।

मगर हिंदी पाठक अकादमिक विषय बहुत कम बना है। हम यह तो जानते हैं कि अख़बारों की कितनी प्रतियाँ बिकती हैं, कितने लोग टेलिविज़न देखते हैं, कौन-सा चैनल नंबर एक है, कितने लोगों के पास मोबाइल है। पर हम बहुत कम जानते हैं कि हिंदी का पाठक कौन है और क्या चाहता है, उसके सबसे बड़े डर क्या हैं, वह किस ज्ञान को महत्व देता है, वह किन विषयों को अप्रासंगिक मानता है। ऐसा कोई एकल, सर्वसमावेशी अध्ययन नहीं है जो पिछले 200 साल में हिंदी पाठकों को समेटता हो। फिर भी कुछ किताबें अहम हैं।

  • फ़्रांसेस्का ओर्सिनी की किताब द हिंदी पब्लिक स्फ़ियर 1920-1940: लैंग्वेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ़ नेशनलिज़्म (2002) शायद हिंदी पाठकों पर अहम अकादमिक काम है।
  • दूसरा है वसुधा डालमिया की द नेशनलाइज़ेशन ऑफ़ हिदू ट्रेडिशंस: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ऐंड नाइन्टींथ सेंचुरी बनारस (1997)। यह सीधे पत्रकारिता पर नहीं, लेकिन हिंदी की सार्वजनिक संस्कृति और पाठक वर्ग को समझने के लिए अहम है।
  • आलोक राय का काम हिंदी नेशनलिज़्म (2000) हिंदी भाषा आंदोलन के सामाजिक आधार पर महत्वपूर्ण काम है।
  • हिंदी-उर्दू विवाद और पाठक समुदायों के विभाजन पर क्रिस्टोफ़र आर किंग की किताब वन लैंग्वेज, टू स्क्रिप्ट्स (1994), रूपर्ट स्नैल की द हिंदी क्लासिकल ट्रेडिशन (1991) आदि ज़रूरी किताबें हैं।
  • रॉबिन जैफ़्री का काम इंडियाज़ न्यूज़पेपर रिवॉल्यूशन (2009) एक अच्छा अध्ययन है।
  • फिर सेवांती निनान का हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलेंड उत्तर भारत के पाठक और अख़बारों के संबंध पर अच्छी पुस्तक है।
  • हिंदी पाठक और लोकतंत्र पर क्रिस्टॉफ़ जैफ़्रेलो की किताबों में हिंदी पट्टी के पाठकों और उनकी राजनीतिक चेतना पर चर्चा मिलती है।
  • इनके अलावा नेशनल रीडरशिप सर्वे और इंडियन रीडरशिप सर्वे भी ऐतिहासिक डेटा उपलब्ध कराते हैं, जिनमें हिंदी पाठकों की संख्या, आय वर्ग, शिक्षा, शहर-गाँव और मीडिया आदतों की जानकारी मिलती है।

    चूँकि हिंदी पाठक एकाश्मिक घटना नहीं है, वह एक जटिल संरचना है, इसलिए उसे दूसरी भारतीय भाषाओं या अंग्रेज़ी के पाठकों की तरह किसी एक खाँचे में डालना उसके साथ नाइंसाफ़ी होगी। हिंदी पत्रकारिता ने उसे कभी ‘जनता’, तो कभी ‘हिंदी पट्टी का मानस’, कभी ‘आम आदमी’ तो कभी ‘देश की आत्मा’ कहा है। मगर ख़ुद हिंदी के पत्रकारों ने अपने पाठकों को समझा कम, उसके बारे में अनुमान ज़्यादा लगाये हैं। वह हिंदी के पत्रकारों और संपादकों की कल्पना में ज़्यादा रहा है। हिंदी पत्रकारिता ने इस मध्यवर्गीय चेतना को भाषा, पहचान और राजनीतिक अभिव्यक्ति तो दी है, पर लोकतंत्र का जागरूक नागरिक नहीं बनाया है।

मुझे लगता है कि यह हिंदी पत्रकारिता और उसके पाठक के रिश्ते की केंद्रीय त्रासदी है। दो सौ साल में उसने एक बड़ा-सा राजनीतिक सार्वजनिक क्षेत्र तो खड़ा किया, मगर उसका ज्ञान का सार्वजनिक क्षेत्र कमज़ोर ही रहा। शायद यही वजह है कि हिंदी पाठक आज भी नेताओं, चुनावों, धर्मों और पहचानों की दुनिया में ही ख़ुद को सहज महसूस करता है, मगर विश्वविद्यालयों, शोध, विज्ञान, अर्थशास्त्र और बौद्धिक बहसें उससे दूरी पर खड़ी दिखायी देती हैं। यह दूरी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की सबसे अहम और सबसे कम समझी गयी कहानी है।

अजय शर्मा, ajay sharma

अजय शर्मा

पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

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