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पृथ्वी दिवस पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

हमारी पृथ्वी को कौन-से उपाय बचाएंगे?

           धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस। उन्नीस सौ सत्तर की उस सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फ़िक्रमंद सुबह में ‘वर्ल्ड अर्थ डे’ सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आये थे। वह सब महज़ एक प्रदर्शन नहीं था। आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने का पहला सामूहिक संकल्प था, जिसे आज पूरी दुनिया 22 अप्रैल को कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेजकर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है, जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है, जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है। पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है। संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं, बल्कि अपनी उस मां से माफ़ी मांगना है, जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं।

विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर, हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिये पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

यह दिन हमें ठिठककर सोचने का मौक़ा देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ़ कभी समाप्त न किये जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और ज़हरीली प्रदूषित नदियां ही सौंपकर जाएंगे।

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भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर ज़मीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है। आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाये।

कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना, वह छोटी-सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाये।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें, जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाये, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाये, ये विकल्प हैं जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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