नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-4

पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से…. नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-4              पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के...

क्यों प्रासंगिक बनी हुई है ‘हज़ारों ख़्वा​हिशें ऐसी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...

हरिऔध के काव्य में संवेदना और संदेश

निबंध विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. हरिऔध के काव्य में संवेदना और संदेश              साहित्य की दुनिया में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं...

आशा भोसले: हमेशा जवां आवाज़ का ख़ामोश होना!

डॉ. दिनेश पाठक की कलम से…. आशा भोसले: हमेशा जवां आवाज़ का ख़ामोश होना!            आशा भोसले ने एक सुदीर्घ और यशस्वी जीवन जिया। उन्होंने...

डॉक्टर हड़ताल पर हैं!

हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से…. डॉक्टर हड़ताल पर हैं!              आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाक़ायदा दर्ज...

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से…. साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा              लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण,...

अब कहाँ मिलते हैं दादाजी जैसे लोग!

संस्मरण ब्रज श्रीवास्तव की कलम से…. अब कहाँ मिलते हैं दादाजी जैसे लोग!              दादाजी परिवार का एक अत्यंत प्रिय और गरिमामय रिश्ता होते...
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