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व्यंग्य विवेक श्रीवास्तव की कलम से....

राम नाम जपना पराया माल अपना

              माथे पर इतना चौड़ा और चमकदार तिलक लगाओ कि ‘पवित्रता’ पर संदेह न हो। यह कलयुग का बुनियादी और कारगर हड़प मंत्र है। धर्म और ‘ब्लैक-मनी’ के बीच की लकीर इतनी बारीक और धुंधली हो गयी है कि पता ही नहीं चलता, कहाँ से ईश्वर की सेवा शुरू होती है और कहाँ से ‘एसी वाली कोठी’ का नींव-पूजन।

मंदिरों के नाम पर उठी चंदे की सुनामी ने तो कमाल ही कर दिया है। जिसे देखो, वही आस्था का झोला लेकर दान की ‘मार्केटिंग’ पर निकला हुआ दिखने लगा है।

कोई ईंट के नाम पर मांग रहा है, तो कोई स्वर्ण कलश के लिए ‘क्राउड फ़ंडिंग’ का ड्रामा रच रहा है। भक्त अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा प्रभु के चरणों में अर्पित कर, ख़ुद को पाप मुक्त करने का भ्रम पाल लेता है।

प्रभु दर्शन की धक्का-मार लाइन के साथ बनी बड़ी-बड़ी दान पेटियां उस डिजिटल अकाउंट नंबर से जुड़ी हैं, जिसका बैलेंस चेक करना ‘महापाप’ और नास्तिकता की श्रेणी में आता है।

धर्म पर सवाल उठाना उतना ही जोखिम भरा है, जितना चलती ट्रेन में बिना टिकट टीटी से तर्क करना।

सच तो यह है कि चंदा वसूली भावना का दोहन करता एक ‘फ़ाइन आर्ट’ बन चुका है। इसमें राम का नाम ‘ब्रांड एंबेसडर’ की तरह इस्तेमाल होता है। जिस प्रोजेक्ट के साथ ‘राम’ का नाम जुड़ जाये, वहां हिसाब-किताब माँगना मर्यादा के विरुद्ध माना जाता है।

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यह पूछा नहीं जाता कि “चंदा कहाँ गया?” बेमानी है।

चंदा ‘राम-काज’ में गया। और इस ‘राम-काज’ की परिभाषा बड़ी ही लचीली है। इसमें वह लग्ज़री एसयूवी (SUV) भी आती है, जिसमें बैठकर धर्मरक्षक प्रवचन देने जाते हैं, और वह महंगा आईफ़ोन भी, जिससे वे भक्तों को व्हाट्सएप पर ‘दान का महत्व’ समझाते हैं।

जो लोग चंदा इकट्ठा करते हैं, उनके पास एक विशेष ‘आध्यात्मिक पारदर्शिता’ का चश्मा होता है। वे पारदर्शिता तो रखते हैं, लेकिन सिर्फ़ अपने व्यक्तिगत बैंक बैलेंस में। वहाँ सारी चीज़ें एकदम स्पष्ट और चमकती हुई दिखती हैं। भक्त जब दान पेटी में नोट डालता है, तो उसे स्वर्ग की सीढ़ी दिखती है। लेकिन जब वही नोट धर्म के ठेकेदारों की जेब में सरकता है, तो उसे अगले महीने की लग्ज़री ईएमआई (EMI) से राहत मिलती है। इसे आधुनिक भाषा में ‘भक्ति का निवेश’ कहते हैं।

वैसे, इसमें बुरा क्या है? धर्म तो हमेशा से ही एक मुनाफ़े वाला स्टार्टअप रहा है। पुराने ज़माने में राजा-महाराजाओं के राज-पुरोहित होते थे, आज के दौर में ‘इवेंट मैनेजमेंट’ वाली कंपनियां हैं। फ़र्क बस इतना है पहले ‘पुण्य’ के बदले सोने की मुहरें दी जाती थीं, अब ‘यूपीआई’ (UPI) से ट्रांज़ैक्शन होता है।

चंदा-चोरों का तर्क भी निहायत ही दार्शनिक है, “जो दिया है वो प्रभु का था, और जो बच गया, वो प्रभु की इच्छा से हमारे पास सुरक्षित है।”

लोग कहते हैं आस्था पर चोट मत करो। एसआईटी ‘आस्था के धंधे’ का पर्दाफ़ाश कर रही है, जिसने भगवान को भी एक ‘सेल्स-मैनेजर’ बना दिया है। भगवान के नाम पर हो रही लूट को ‘सेवा’ का चोग़ा पहनाकर ऐसे परोसा जा रहा है, जैसे यह कोई राष्ट्रीय कर्तव्य हो।

याद रखिए, मंदिर ईंट-पत्थर भर से नहीं, नीयत से बनते हैं। लेकिन आज जो मंदिर बन रहे हैं, उनमें ईंटें कम और ‘धर्म के ठेकेदारों की महत्त्वाकांक्षाएं’ ज़्यादा गड़ी हुई हैं। जब तक समाज आँखें मूँदकर राम को समझे बिना ‘राम नाम’ जपता रहेगा, तब तक ‘पराया माल अपना’ बनाने वालों की दीपावली हर दिन रहेगी।

धर्म व्यक्तिगत है और वह आपकी चेतना का विषय है, न कि मोटे गुलाबी चेहरे वालों की विलासिता का ज़रिया। असली भक्ति प्रार्थना की ख़ामोशी और तपस्या में होती है, न कि दान की घोषणा के शोर में। अगली बार जब कोई ‘प्रभु के नाम’ पर आपकी जेब टटोले, तो अपनी श्रद्धा से पहले अपनी अक़्ल की खिड़कियाँ ज़रूर खोलें।

याद रखें, भगवान को आपसे चंदे की नहीं, बल्कि आपके चरित्र की निर्मलता और सादगी भरे कर्मों की प्रतीक्षा है। दान दें, लेकिन अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर नहीं! सुपात्र को दीन-हीन-उपेक्षित को सीधे मदद शायद दान पेटी में उंड़ेले गये धन से ज़्यादा तार्किक और महत्वपूर्ण होती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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