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गूंज बाक़ी... 'कवि मिट जाता लेकिन उसका उच्छ्वास अमर हो जाता है', इस विचार पर केंद्रित हमारी इस शृंखला में इस बार बहुचर्चित, नयी ग़ज़ल के अग्रणी शायर के रूप में सुविख्यात डॉ. बशीर बद्र का एक लेख। विजय वाते के बरसों पहले प्रकाशित हुए ग़ज़ल संग्रह 'ग़ज़ल' से साभार, भूमिका का यह अंश एक स्वतंत्र लेख के रूप में भी बांचा जाना चाहिए...

ग़ज़ल की नयी भाषा

             विजय वाते कोई मशहूर और चर्चित कवि, शायर तो हैं नहीं, पत्र पत्रिकाओं में बहुत ज़्यादा छपे भी नहीं, इसलिए उनके पहले संकलन पर कुछ लिखने के पहले इसे सिलसिले में पढ़ जाना पड़ा और इन हिन्दी ग़ज़लों के बहाने ग़ज़ल की भाषा पर कुछ बातचीत करने का मन हुआ। दरअसल, सच्ची ग़ज़ल बोलचाल की उस ज़ुबान में कही जाती है, जो साहित्य की भाषा भी होती है। ग़ज़ल में ‘शब्द’ डिक्शनरी से जुड़ा रहकर भी स्वतंत्र हो जाता है। डिक्शनरी में जो शब्द लोहे के फ़्रेम में जड़ा एक फ़ोटोग्राफ़ होता है, वह ग़ज़ल में इस तरह इतनी ज़िन्दगियाँ जीता है, मानो वह हज़ारो-हज़ार पत्तियों वाला ऐसा फूल है, जिसकी हर पत्ती की एक अलग जीवन-शैली और अपना स्पन्दन होता है। दुनिया की हर अच्छी शायरी में ‘शब्द’ की यही अहमियत होती है। हज़ारों साल की ज़िन्दगी जीते हुए कितने ही शब्द, इस तरह आज़ाद हो गये और फिर ग़ज़ल के शे’रों के स्पर्श से बीते युगों की दास्तान, आज की कहानी और आने वाले ख़्वाबों की पहचान बन गये।

धरती, क़स्बा, गांव, घर, महल्ले, दादी, माँ, पिता, वालिद, शहर जैसे संज्ञावाचक शब्द अलग-अलग शे’रों में अपने साथ ऐसी दुनियाएं लाते हैं, जहाँ उनका डिक्शनरी से नाम मात्र का ही संबंध रह जाता है। अच्छी और सच्ची शायरी का यही कमाल है। यक़ीनन कोई भी ज़ुबान सिर्फ़ गीत, ग़ज़ल बनकर दुनिया में नहीं जी सकती, इसलिए मैं डिक्शनरी का अंकुश पूरी तरह हटाने की कोई मांग भी नहीं करता। लेकिन यह भी सच है कि ग़ज़ल में शब्द के संस्कार बोलते हैं, शब्दार्थ नहीं।

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उर्दू में मुआफ़ शब्द फ़ारसी से आया है, शायद मैं भी कभी-कभी मुआफ़ बोलता हूँ। लेकिन मैं इस तलफ़्फ़ुज़ को ग़ज़ल के शे’र में नहीं बांध सका। तहज़ीब और किताबों के इस लहजे का संस्कार, ग़ज़ल के संस्कारों से आईडेंटिफ़ाई नहीं करता। कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता। मैं यहाँ फिर साफ़ कहना चाहूँगा कि जो लोग तलफ़्फ़ुज़ की पाबन्दी करते हैं, मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ और इसलिए करता हूँ कि भाषा की हिफ़ाज़त होनी चाहिए और उस हिफ़ाज़त करने वाले की इज़्ज़त भी। लेकिन जहाँ तक ग़ज़ल का मसला है, वह हमारी रोज़मर्रा की तहज़ीब की नुमाइंदगी है, इसलिए मैं इंतज़ार करता हूँ कि डिक्शनरी का कोई शब्द, कब दिल में ग़ज़ल का दरवाज़ा खोले, और तब ग़ज़ल की भाषा में आये।

इस वक़्त मेरे सामने उर्दू लिपि में छपने वाला दैनिक अख़बार ‘हिन्द समाचार’ रखा है। उर्दू का यह सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार है, और इसके नाम में ‘हिन्द’ शब्द फ़ारसी से आया है, जबकि ‘समाचार’ हमारी भारतीय बोली से। इसमें छपी यह पंक्ति तीन शब्दों का एक फ़िकरा है ‘नक़्क़ाशी के अद्भुत फ़र्निचर्स’। ज़ाहिर है आज की हिन्दी और उर्दू में अनेकों विशेषण व संज्ञावाचक शब्द संस्कृत, फ़ारसी और अंग्रेज़ी से आ चुके हैं।

हम जो कुछ पहनते-ओढ़ते हैं, जैसे पेंट, शर्ट, कोट, टाई या जो कुछ ड्राइंगरूम में रखा होता है, जैसे टी.वी., फ़्रिज, टेबिल, बल्ब, फ़्रेम, फ़ोटो आदि या हमारे आस-पास के अन्य शब्द आफ़िस, एयरपोर्ट, स्टेशन, बस स्टैण्ड, टिकिट, रिज़र्वेशन, वग़ैरह-वग़ैरह, क्या इन शब्दों का रोमांच हम बिना कोई प्रयास किये किसी अन्य संज्ञा में महसूस कर पाएंगे? टिकिट और आफ़िस के लिए कौन सी संज्ञा आपके एकदम क़रीब है? जो शब्द हमारी ज़िन्दगी जीने लगें, हमारे हो जाते हैं। इसलिए अगर इस हेडलाइन को पूरी तरह, उर्दू के जानने वाले, अद्भुत और फ़र्निचर के कारण न समझ पाएं, तो मैं यह मानूँगा कि वो आज की उर्दू को समझने में कमज़ोर हैं। और जो लोग आज की उर्दू और हिन्दी को नहीं जानते, मैं मानता हूँ कि वे अच्छी हिन्दी और उर्दू नहीं जानते।

यही कारण है कि जब हिन्दी ग़ज़ल में फ़ारसी के कुछ शब्दों को अपने वज़न में बांधा गया जैसे- शहर, शमा, सुबह, पहर जैसे शब्दों को, जो उर्दू में दर्द के वज़न में लिखे जाते हैं और हिन्दी में दरद के वज़न पर, तो मैं मानता हूँ कि यह किसी भी बड़ी भाषा का हक़ है। बड़ी भाषा के कवि को यक़ीनन यह हक़ हासिल है कि वह ज़िन्दगी की बोलचाल के हवाले से जिसे अपने दिलो-दिमाग़ के क़रीब महसूस करे, वही लिखे या उसके अनुकूल तलफ़्फ़ुज़ और लहजा बदले। शर्त यही है कि सभी हिन्दी वाले यह बदला हुआ तलफ़्फ़ुज़ अपने चलन में रखें। अभी ऐसा देखा जा रहा है कि कोई तो इन शब्दों को फ़ारसी तलफ़्फ़ुज़ में बांध देता है और कोई बदले हुए तलफ़्फ़ुज़ में। इसमें ठहराव आना ज़रूरी है।

इसे थोड़ा यों समझें- उर्दू में लफ़्ज़ का बहुवचन अल्फ़ाज़ होता है, जज़्बा का बहुवचन जज़्बात, एहसास का बहुवचन एहसासात और वाक़या का बहुवचन वाक़यात होता है। कई बार देखा गया है हिन्दी में लफ़्ज़ के बहुवचन के लिए अल्फ़ाज़ों का प्रयोग किया जाता है, तो जज़्बे, एहसास और वाक़ये के बहुवचन के लिए जज़्बातों, एहसासातों, वाक़यातों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रयोग को मैं ग़लत नहीं कहूँगा, लेकिन हिन्दी के सभी लोगों को यह तय करना होगा कि जज़्बात को एकवचन और जज़्बातों को बहुवचन के रूप में प्रयोग किया जाएगा। इससे मैं समझूंगा कि हिन्दी ने फ़ारसी और उर्दू से अलग अपना ख़ुद का, एक लफ़्ज़ बनाया है।

आज जब हिन्दी में ग़ज़ल के नये शायर अंग्रेज़ी, फ़ारसी, संस्कृत के शब्दों से अपने-अपने लहजे में ग़ज़ल बना रहे हैं, तो मुझे सन् 60 के पहले का अपनी शायरी का बचपन याद आता है। कितनी हिम्मत जुटाने के बाद मैंने अंग्रेज़ी से आये हुए शब्दों को ग़ज़ल में पहली बार छुआ था; और आज ये महसूस करता हूँ अगर मुझे एक फ़ीसदी भी कामयाबी मिली है, तो यक़ीनन इसलिए कि वो शब्द मैंने अंग्रेज़ी डिक्शनरी से नहीं लिये थे, बल्कि भारतीय ज़िन्दगी से लिये थे। यही वह कारण है जब विजय वाते फ़ारसी के चन्द शब्दों को आज की बोल-चाल के वज़न पर बांधते हैं तो उनका डिक्शनरी से ताल्लुक नाममात्र का ही रह जाता है।

विजय वाते ने भी शब्दों का तलफ़्फ़ुज़ वही लिया है, जो उनके दिल के क़रीब है, साहित्य की भाषा के नहीं। उन्होंने एक जगह खुला शब्द के लिए ‘खुल्ला’ शब्द का प्रयोग किया है। इस इस्तेमाल से शायद वे अपनी बात ज्यादा ताक़त के साथ कह पा रहे हैं। लेकिन अगर यह उच्चारण आम स्वीकृति में नहीं है, तो फिर यह हिन्दी ग़ज़ल की भाषा का शब्द नहीं बन पाएगा। ऐसा ही सुन्दर प्रयोग उन्होंने एक शब्द ‘झिलती’, झेले जाने के स्थान पर किया है। ये उच्चारण मुझे दिल के क़रीब लगने से अच्छे लगे हैं। हालांकि इस सिलसिले में विजय वाते ने भी डरते हुए मगर सूझबूझ से काम लिया है। एक नये शायर के साथ यह न केवल स्वाभाविक है बल्कि ज़रूरी भी है। भाषा का एक अध्यापक होने के नाते, भाषा की शुद्धता का पक्षधर होने के नाते, और एक शायर होने के नाते मैं आज तक इस डर से मुक्त नहीं हो पाया हूँ, इसलिए ‘क़िल आ’ का तलफ़्फ़ुज़ क़िला या ‘मु-आफ़’ आज तक ग़ज़ल में नहीं बांध पाया।

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