loi ka taana, kabir, rangey raghav, shukriya kitab
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे ... मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'... इस बार कबीर साहित्य को समझाने में बेहद मददगार किताब पर चर्चा-संपादक)
मधूलिका श्रीवास्तव की कलम से....

कबीर के बहाने कई रहस्य समझाते रांगेय राघव

मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ
निरीह पग पर काल झुके हैं
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में

            मानव जीवन से अटूट प्यार करने वाले साहित्य साधना के अथक रचनाकार रांगेय राघव ने साहित्याकाश में अपनी अलग विलक्षण छवि अंकित की।

भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराणों का उनका विस्तृत अध्ययन किया था। ख़ास तौर से पुरातत्व और इतिहास से उन्हें प्यार था। जो कि उनकी रचनाओं में भी झलकता है। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आख़िरी सांस तक क़ुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नज़रिये से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नयी चेतना विकसित की। हिंदी साहित्य में इस मामले में सिर्फ़ राहुल सांस्कृत्यायन ही उनकी जोड़ी के हैं।

पौराणिक चरित्रों पर लिखे उनके उपन्यास जैसे लोई का ताना, यशोधरा जीत गयी, देवकी का बेटा, रत्ना की बात आदि अपने आप में अद्भुत हैं। ऐसा लगता है मानो ये सभी चरित्र उनके संगी-साथी रहे हों। इन चरित्रों का जीवन परिचय उनका रहन-सहन, समाज व साहित्य में उनके योगदान के वे जैसे चश्मदीद गवाह रहे हों।

आज मैं रांगेय राघवजी पर यहां बात नहीं करूंगी, उनके द्वारा संत कबीर के जीवन पर जो लेखन किया गया है, उस पर अपने विचार व्यक्त करूँगी। लेखक ने कबीर के पुत्र कमाल के माध्यम से कबीर के जीवन का ख़ूबसूरत चित्रण इतने रोचक ढंग से किया है, मानो वे स्वयं कमाल की उँगली पकड़ क़दम दर क़दम उनके साथ रहे हों।

संत कबीर के लिए रांगेय जी लिखते हैं कि उनके जीवन के तथ्य बहुत तो नहीं मिलते हैं पर उनके साहित्य को पढ़कर मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा, उसी के आधार पर यहाँ उनके पुत्र कमाल के माध्यम से आपके सामने परोसने का प्रयत्न किया है। संत कबीर जाति से जुलाहे थे तथा अनपढ़, पर उनका ज्ञान, उनकी अभिव्यक्ति जीवन की सच्चाई को उजागर करती थी। यह तो सर्वविदित है कि वह स्वयं नहीं लिखते थे, वे जो कहते उसे उनके संगी-साथी, उनके शिष्य लिपिबद्ध कर लेते। जो कि कहीं भी बहुत अच्छे से संकलित नहीं है, पर उनके दोहे, उनकी उक्तियाँ जैसे लोगों की ज़ुबान पर अंकित हो गयी थीं और मन-मस्तिष्क में टंकित।

loi ka taana, kabir, rangey raghav, shukriya kitab

कबीर निर्गुण के परे थे, उन्होंने जो राह दिखायी, वह मानवता को कल्याण की ओर ले जाने वाली थी। वह भेदभाव वाले ब्राह्मणवाद और इस्लाम का भी विरोध करते। वे कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ थे।

कबीर ने भारत में सांस्कृतिक जन-जागरण की नींव डाली। उनकी भाषा में क्रांति थी। उनकी भाषा में शृंगार था न ही लालित्य था, वह आम जन की भाषा थी। रांगेय जी कहते हैं कबीर के चेले कबीर पंथ चलाना चाहते थे पर उनके बेटे कमाल इस पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि वे कबीर की शिक्षा को तोड़-मरोड़कर पेश करना चाहते हैं। कमाल की असहमति पर चेलों ने कमाल के लिए प्रसिद्ध कर दिया कि-

बूड़ा बंस कबीर का
जब उपजा पूत कमाल

रांगेय जी ने ‘लोई का ताना’ को विभिन्न भागों में बाँटकर कबीर के जीवन का पूरा चित्र दर्शाने की कोशिश की है। पुस्तक का आरंभ कबीर की मृत्यु के दृश्य से होता है। कबीर कमाल से काम बंद कर अपने पास बुलाकर कहते हैं मेरे जाने का समय है। कमाल डर जाता है तब वे कहते हैं- “इस संसार में कोई भी सनातन होकर नहीं आया, सब आते हैं, सब चले जाते हैं। गुण-निर्गुण की पहचान करने वाले हों या राम-लक्ष्मण हों या पांडव! यहाँ तक कि रावण भी चला गया, सब ख़ाली हाथ आये थे ख़ाली हाथ चले गये।”

भूला लोग कहै घर मेरा
जा घरवा में फूला डोलैं
सो घर नाहीं तेरा
हाथी घोड़ा बैल खजाना
खूब यही सब रहा धरा

मृत्युशैया पर लेटे पिता के मुँह से मानो अमृत बरस रहा था। उनका स्वर गूंजा-

उठो सखी मोरी माँग सँवारो
दुलहा मोसे रूसल हो

यह रूठना कितना मधुर था। अंतिम क्षणों में भी जीवन के प्रति कितनी मादकता थी।

आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे
नैनन आँसू टूटल हो

कमाल कहते हैं उस समय वे मेरे पिता नहीं थे वरन् वहाँ मुझे अनेक शताब्दियों का ज्ञान रूपी मनुष्य की आत्मा के सच्चे दर्शन हो रहे थे।

चारि जने मिलि खाट उठाइन
चहुं दिसि धू धू ऊठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटत हो

उनके चेहरे पर शांति की मुस्कुराहट थी। वे तो सो गये… मैं उनका बेटा मंत्रमुग्ध-सा खड़ा रह गया। उनकी मृत्यु पर हिंदू और मुसलमानों में वबाल उठा कि वे हिंदू थे, कुछ कहते मुसलमान थे। तब कमाल कहता है-

“आख़िर तो जो जिस दायरे में रहता है, वहाँ उससे बाहर की बात सोच भी तो नहीं सकता। हिंदू और मुसलमान दोनों अलग-अलग कुएँ में पड़े हुए मेंढ़क थे। उनकी सारी परंपराएँ, उनके सारे फैलाव वहीं तक तो जाकर पहुँचते थे।”

कबीर की पत्नी का नाम लोई था, वह भी जुलाहिन थी और कबीर की प्रेरणा भी। वह कबीर के नारी पर कहे दोहों पर सवाल करती और उसका निचोड़ निकलवाती। कबीर ने कहा-

नारी की जानी परत अंधा होत भुजंग
कबीरा जिनकी कौन गति जो नित नारी संग

लोई के सवाल करने पर कहते हैं- “नारी माया है पर कब? वे जो नारी को विषय की वस्तु समझते हैं, और उसके भोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेते हैं। उनके लिए ऐसा क्यों न कहा जाये?”

कबीर और लोई दोनों एक ही रंग में रंगे हुए थे। एक बार कबीर घर छोड़ने की बात करते हैं, तब लोई कहती है- “जो लोग घर छोड़कर भागते हैं वे एक आँख से दुनिया को देखते हैं। उनके जीवन में हाँ और ना के पलड़े हमेशा होड़ करते रहते हैं, एक तरफ़ मरघट है, योग है, त्याग है वन है, संन्यास है और दूसरी तरफ़ दुनिया है, लोगों का लाभ है, मदद है, पाप का पर्दाफ़ाश करना है। दो पाँवों पर बोझ सँभाल, एक पर न चल दुख उठाकर भाग मत, यहीं रह कर सच्चाई से लड़। मैं तेरी साथिन हूँ तेरी राह का रोड़ा नहीं।”

कबीर ने तब एक नवीन मार्ग देखा। वह एक समन्वय था जो किसी प्रकार की दासता को अस्वीकार करता था।

कबीर ने लोई के सान्निध्य में प्रेम को देखा और उसकी साधना करते-करते उन्होंने देखा कि सारा संसार ही प्रेम के बल पर चल रहा है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय
एकै अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय

कमाल अपनी माँ से पूछते हैं- “माँ, लोग कहते हैं कि वे सबसे लड़ जाया करते थे?” तब लोई कहती हैं- “वे तो प्रेम के भूखे थे, क्रोध नहीं था उनमें, वे कहते हैं-

जब मैं था तब गुरु नहीं अब गुरु हैं मैं नाहिं
प्रेम गली अति साँकरी ता मैं दो न समाँहि

बेटा प्रेम रस पीने की चाह रखने वाला कभी मान नहीं रख सकता, एक म्यान में दो खड्ग तो साथ-साथ रह ही नहीं सकते।”

लोई कबीर की सच्ची साथिन थी। वह कबीर के कहे को कंठस्थ कर लेती और कमाल को सुनाया करती जिसके आधार पर ही कमाल कबीर के बारे में बहुत कुछ जान पाया और लिपिबद्ध करता गया। जब कबीर ने जाना किस तरह लोई कमाल को उनके कहे दोहों और उक्तियों को लिखवा रही है, तब उन्होंने लोई से कहा- “आज मैं मुक्त हो गया आज कोई फांस न रही-

कबीरा हम गुरु रस पिया बाकी रही न छाक
पाका कलस कुम्हार का बहुरि न चढसी चाक”

कबीर जो देखते उसी पर कुछ न कुछ कह देते। उनका कहना था-

मैं कहता हूँ आँखन देखी तू कहता कागद की लेखी

मंदिरों में भीड़ देखकर कबीर गा उठे-

ऐसी दुनिया भई दिवानी भक्ति भाव नहीं बूझै जी
कोई आवे तो बेटा माँगे कोई आवे तो दौलत माँगे
कोई करावे ब्याह सगाई साँचे का कोई गाहक नहीं

इस पर कुछ लोग कबीर की हत्या की साज़िश करने लगे, तो वे निडर होकर बोले-

जा को राखे साइयाँ मारि न सक्कै कोय
बाल न बाँका करि सकै जो जग बैरी होय

आगे कमाल कहते हैं मेरे पिता ने जोगियों पर कहा है- “रामा, श्रंगी चमकाने से क्या होता है? सारे बदन पर भभूत मल लेने से क्या मन का मैल जल जाता है, अगर नंगे रहने से ही योग हो जाता तो काशी के सारे ढोरों को योगी क्यों नहीं कहा जाता?”

मन न रँगाये, रँगाये जोगी कपरा
आसन मारि मँदिर में बैठे
नाम छाँडि पूजन लगे पथरा
कनवा फड़ाय जोगी जटवा बढौले
दाढ़ी बढ़ाय जोगी है गैले बकरा

आगे एक ब्राह्मण द्वारा गुज़रती हुई महिलाओं को माला फेरते हुए ताकते देख कबीर बोल पड़े-

माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर
कर का मनका डारि दे मन का मन का फेर

एसे ही पिंडदान के लिए लोगों को सिर मुंडवाते देख कबीर कह उठे-

मूँड़ मुँड़ाये हरि मिलैं सब कोई लेओ मुँड़ाय
बार बार के मूँड़ते भेड़ न बैकुँठ जाय

कबीर कहते हैं- “भीड़ की भीड़ यह साधुता के नाम पर जो भिखमंगों की जमात चलती है वह क्या दूसरों की मेहनत से कमाये हुए माल को हराम में नहीं खाती। उस अन्न का फल गृहस्थ भोगते हैं, साधु उसे खाकर भगवान को पाते हैं, यह कैसे हो सकता है? ये सब तो शून्य की आशा में वनखंड जाने वाले भटके हुए लोग हैं। यह धर्म के नाम पर मुफ़्त खाने वाले अधर्म कर रहे हैं।”

कमाल कहते हैं जब कबीर को गुरु रामानंद ने ठुकराया तो कबीर ने कहा- “क्या राम मेरा नहीं है।” रामानंद हतप्रभ रह गये और चिंतन में डूब गये। अगले दिन जब कबीर से सामना हुआ तो रामानंद कह उठे- “कबीर मैं अँधा हो गया था, सारा ब्रह्मांड राम है यह भेद मनुष्य के बनाये हैं, वही राम तू है, वही गंगा है, राम तो सबका है।”

कबीर को लगा जैसे वह मुक्त हो गया। ख़ुशी-ख़ुशी लोई को बताता है, तब वह हंसकर कहती है- “मुझे तो तू वैसा ही लग रहा है ब्राह्मण के मना कर देने से तू राम का नहीं रहा और उसके छू देने भर से तू मुक्त हो गया, यह क्या बात हुई!” कबीर गा उठे-

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
कह कबीर पिउ पाइए मन ही की परतीत

कमाल कहते हैं- “मेरे पिता अद्भुत थे उन्होंने कहा था-

काल करे सो आज कर आज करै सो अब्ब
पल में परलै होएगी बहुरि करेगा कब्ब

कर्तव्य के लिए वे देरी नहीं सह सकते थे, पर मैं सचमुच कुछ न कर सका। प्रलय हो ही गयी।

कबीर को चेलों ने डुबा ही दिया क्योंकि मठ बना, धन आया और मोह ने सत्य को ढँक लिया। पर यदि मैं कुछ नहीं करता तो क्या यह भी न कहूँ कि मेरा बाप वह ही नहीं था जिसे शून्य-शून्य कहकर सब बखानते हैं! वे उसे महान कह देते हैं पर उसकी उन बातों को नहीं कहते जो उसका अपना चिंतन थी। वह संस्कृति का पुनर्जागरण था, दीन जनता का पहला स्पष्ट स्वस्वर निनाद था पर लोगों ने उसे दबा दिया और उसको शून्यवाद से ढँक दिया।”

रांगेय राघव जी ने कबीर पर गहन अध्ययन किया और उनके कहे हर शब्द को इस पुस्तक में लगभग समाहित किया है। कबीर अद्भुत थे जिन पर लिखने का साहस रांगेय राघव ही कर सकते थे।

यह पुस्तक न केवल कबीर को समझने की दृष्टि देती है बल्कि कबीर की ज्ञान संपदा को एक कथा के ज़रिये आसानी से खोलकर रख देती है। यह पुस्तक मेरे जीवन की अनमोल यादों में रही है और इस पुस्तक से मेरा जुड़ाव सिर्फ़ अध्ययन के लिए नहीं बल्कि जीवन के रहस्यों को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा है। मेरा सुझाव यही है कि यदि आप कबीर या जीवन के रहस्यों को सचमुच बूझने की ओर जाना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपको अवश्य ही गुन लेना चाहिए।

(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है, तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए, हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव-संपादक)

मधूलिका श्रीवास्तव, madhulika shrivastav

मधूलिका श्रीवास्तव

श्री अरविन्दो स्कूल, भोपाल की संस्थापक सदस्य व संचालिका मधूलिका संस्कृत, भाषा शास्त्र एवं पत्रकारिता में दक्ष हैं। उपन्यास, लघुकथा, कथा एवं कविताओं के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अनेक साझा संकलनों में आपकी रचनाएं शामिल हुई हैं। मप्र हिन्दी लेखिका संघ समेत अनेक संस्थाओं से आप सम्मानित की जा चुकी हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!