
- April 15, 2026
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निबंध विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
हरिऔध के काव्य में संवेदना और संदेश
साहित्य की दुनिया में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जो केवल शब्दों का संसार नहीं रचते, बल्कि अपने युग की सोई हुई चेतना को नई ऊर्जा देते हैं। आधुनिक हिंदी काव्य के भोर के सारथी अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (15.04.1865-16.03.1947) एक ऐसे ही युग-प्रवर्तक साहित्यिक व्यक्तित्व हैं। उन्होंने उस संधिकाल में अपनी लेखनी उठाई जब ब्रजभाषा की मधुरता अपनी अंतिम साँसें ले रही थी और खड़ी बोली अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी। हरिऔध जी ने न केवल खड़ी बोली को महाकाव्य की गरिमा प्रदान की, बल्कि सदियों से पौराणिक आख्यानों में कैद ‘ईश्वर’ को जन-सामान्य की संवेदना के धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके काव्य की यात्रा वास्तव में अलौकिकता से लौकिकता की ओर और व्यक्ति से समष्टि की ओर एक महाप्रयाण है।
हरिऔध जी के साहित्य का सबसे प्राणवान पक्ष उनका उदात्त मानवतावाद है। उनके कालजयी महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाने वाले चमत्कारी देवता नहीं, बल्कि एक ऐसे धीरोदात्त नायक हैं जो अपनी प्रखर बुद्धि, कुशल संगठन शक्ति और अगाध करुणा से समाज की रक्षा करते हैं।
जब कृष्ण ब्रज छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान करते हैं, तो वह केवल एक नायक का गोपियों से विरह नहीं, बल्कि एक लोक-रक्षक का अपने कर्तव्य-पथ पर गमन है।
हरिऔध ने कृष्ण के चरित्र के माध्यम से यह शाश्वत संदेश दिया है कि समाज का हित सर्वोपरि है। यहाँ माता यशोदा का विलाप केवल पुत्र-मोह तक सीमित नहीं रहता, वह उस समाज की व्याकुलता बन जाता है जिसका संबल छिन गया है। “दुख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है?” की पुकार में पूरे ब्रज की वह वेदना छिपी है जो अपने रक्षक को विदा कर रही है।
नारी चेतना के प्रति हरिऔध जी का दृष्टिकोण प्रगतिशील और प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने राधा और सीता जैसे पात्रों को पारंपरिक विरह-विधुरा की छवि से निकालकर ‘लोक-सेविका’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह प्रयोग वर्तमान स्त्री विमर्श का पाथेय बना। मध्यकालीन कवियों की राधा जहाँ कृष्ण के वियोग में गलकर क्षीण हो जाती थी, वहीं हरिऔध की राधा उस वियोग की अग्नि में तपकर कुंदन बन जाती हैं। वे कृष्ण की अनुपस्थिति को शोक मनाने का अवसर नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा का संकल्प मानती हैं। राधा का यह रूपांतरण, व्यक्तिगत प्रेम का ‘विश्व-प्रेम’ में विलीन हो जाना, हरिऔध की मौलिक देन है।

उनका संदेश स्पष्ट है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को समाज के लिए उत्सर्ग कर देने की साधना है।
उनकी भाषा और शिल्प की सामर्थ्य भी किसी अचंभे से कम नहीं है। हरिऔध जी की लेखनी में एक तरफ यदि संस्कृत की ‘कांत-पदावली’ और तत्सम शब्दों की गरिमा है, तो दूसरी तरफ ‘ठेठ हिंदी’ का वह बेलौस माधुर्य भी है जो सीधे लोक-हृदय को स्पर्श करता है। ‘चोखे चौपदे’ और ‘चुभते चौपदे’ जैसी रचनाओं में उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मुहावरेदार बोलचाल की भाषा में भी गंभीर से गंभीर सामाजिक सत्य व्यक्त किये जा सकते हैं। वे कविता की भाषा के ऐसे जादूगर थे जो एक हाथ से महाकाव्य की शास्त्रीयता गढ़ रहे थे, तो दूसरे हाथ से आम आदमी की ज़ुबान में समाज की विसंगतियों पर चोट कर रहे थे।
हरिऔध जी का समय भारतीय पुनर्जागरण और स्वाधीनता आंदोलन का काल था। उनके काव्य में जहाँ पौराणिक कथाओं के सूत्र हैं, वहीं उनके भीतर तत्कालीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक बेचैनी भी स्पष्ट झलकती है। उनके नायक अप्रत्यक्ष रूप से गांधीवादी मूल्यों, सत्याग्रह, लोक-संग्रह और अहिंसा के संवाहक हैं।
‘वैदेही वनवास’ हो या ‘पारिजात’, उनकी हर कृति में मानवीय मूल्यों और सदाचार की एक मद्धम लेकिन अटूट धारा प्रवाहित है। उन्होंने छुआछूत, ऊँच-नीच और खोखली रूढ़ियों के विरुद्ध साहित्य के माध्यम से वैचारिक क्रांति की नींव रखी।
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का साहित्य केवल पन्नों पर रची इबारत नहीं, बल्कि एक जीती-जागती संस्कृति का अभिलेख है। उन्होंने हमें सिखाया कि महान कला वही है जो मनुष्य को संकुचित घेरों से निकालकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के विराट आंगन में ले आये।
आज के इस आपाधापी वाले युग में, जहाँ संवेदनाएँ मशीनी होती जा रही हैं, हरिऔध का यह शाश्वत संदेश प्रासंगिक है कि वही जीवन सार्थक है जो ‘परहित’ के लिए समर्पित हो।
उन्होंने खड़ी बोली की मरुभूमि में संवेदना की जो मंदाकिनी बहायी, वह आने वाली पीढ़ियों को युगों-युगों तक शीतलता और दिशा प्रदान करती रहेगी।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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