
आशा ज़िंदाबाद
अपने नाम को चरितार्थ करने वाली आशा जी यानी श्रीमती आशा सक्सेना अब सशरीर नहीं लेकिन कीर्तिशेष, स्मृतिशेष रहते हुए अपने शब्दों और मौन संदेशों में हमेशा हैं और रहेंगी। 08 जुलाई 2026 को इस फ़ानी संसार से विदा हुईं आशा जी लोकगीतों पर अपने अध्ययन के साथ ही दोहाकार के रूप में प्रशंसित एवं सम्मानित रहीं। मध्य प्रदेश हिंदी लेखिका संघ ने उन्हें ‘हिन्दी सेवी सम्मान’ से विभूषित किया तो अनेक संस्थाओं ने उन्हें उनके रचनाकर्म के लिए समय-समय पर नवाज़ा। रचनाओं की संख्या के लिहाज़ से आशा जी के पास बहुत साहित्य नहीं है, लेकिन कुछ काव्य पंक्तियां उनके उत्कृष्ट सृजन की साक्षी सदैव रहेंगी। विश्व उम्मीद दिवस का भी संयोग रहा, सो ‘आशा के कमल’ शीर्षक से 2021 में प्रकाशित उनके दोहा संग्रह से यहां 20 चुनिंदा दोहे, उनकी स्मृति को आब-ओ-हवा का प्रणाम…

चलनी से आटा कहे, आओ मेरे पास
छानो आशा इस तरह चोकर रहे न फांस
—*—*—
टाले से टलता नहीं, अन्त समय का वार
छोड़े यदि तलवार तो, करें फूल संहार
—*—*—
जीवन को हमने दिया, सिर्फ़ सुबह ही नाम
पीछे इसके रात है, आगे इसके शाम
—*—*—
आशा ही संस्कार है, आशा ही विज्ञान
आशा के पर्याय हैं, बीज, प्रीत औ’ प्राण
—*—*—
आशा पत्तों की तरह, रिश्तों का है हाल
आज हरे तो कल गिरे, रह जाएगी डाल
—*—*—
अंसुवन धारा बह चली, मत रोको तुम बाय
रोये में आनन्द है, मन हल्का हो जाय
—*—*—
आकाश परे स्पर्श से, पर्वत खड़े तटस्थ
बहती, गाती, सींचती, केवल नदी गृहस्थ
—*—*—
धरती हरा सिंगार कर, लहराये बलखाय
धूप-छांव-सी पैंजनी, सुर-लय-गति समझाय
—*—*—
जल्दी पकड़े आग औ’ जल्दी काटे आरि
उस लकड़ी का मोल क्या, जिसमें ना हो वारि
—*—*—
ऐसी पुस्तक ज़िन्दगी, पन्ना खुला न एक
उम्र कटी दायित्व में, जागा अन्त विवेक
—*—*—
मानव मन को चाहिए, सत्पथ बढ़ता जाय
पानी से कुछ सीखिए, ख़ुद ही राह बनाय
—*—*—
भाषा अविनाशी सदा, सतत प्रवाहित धार
वस्त्र पुराने त्याग कर, लेती नव अवतार
—*—*—
जीवन ही क्या मृत्यु भी, गीतों का विन्यास
गीतों का नैवैद्य है, गीतों का उपवास
—*—*—
रेखाएं कब वृत्त में, सीधी हों या वक्र
उगना, खिलना, टूटना, रूप-रंग का चक्र
—*—*—
कांटों का विस्तार ही, देता हमें निखार
जानत सब संसार है, आदत से लाचार
—*—*—
अलमारी से झांकते उन पत्रों के नैन
तुमने लिक्खे थे मुझे जो विरही दिन-रैन
—*—*—
पत्र तुम्हारे बन गये यादों की तस्वीर
आंसू आंखों को नहीं, दें अब मन को धीर
—*—*—
जय-जय वीणापाणि मां, शब्द-नाद-सुर स्रोत
ज्ञान-ध्यान-सोलह कला, तुम ही आशा-ज्योत
—*—*—
भजते-भजते थक गयी, नहीं मिले प्रभु धाम
फिर भी गाता कण्ठ है, सीतापति श्रीराम
—*—*—
घोर निराशा, घात या, कठिन समय की मार
आशा सब कुछ झेलती, उठती बारम्बार

टाले से टलता नहीं, अंत समय का वार
छोड़े यदि तलवार तो, करें फूल संहार।
कितनी गहरी और सच्ची बात कही गई है। आशा जी हमेशा हम सबके दिलों में जिंदा रहेंगी।
Wow shree radhe Beautiful lines
kamaal hai
आशा जी के जीवन को सार्थक करते सटीक दोहे
हमारी राह प्रशस्त करते रहेंगे ।
सादर नमन सखी ..
तुम्हे मुझसे पहले जाने का अधिकार तो नही था फिर तुम
क्यों चली गई ?
एक गहरा जीवन दर्शन है इन दोहों में। उनके दोहे बता रहे हैं कि उन्हें ज़िन्दगी की गहरी समझ थी। एक तरफ यह ज़िन्दगी और एक इस ज़िन्दगी के पार जाना ही है, यह एहसास! संघर्ष, समर्पण, प्रीति सब कुछ है इन दोहों में।
उनकी पुण्य स्मृतियों को विनम्र नमन।
आ आशा जी को विनम्र श्रद्धांजलि ।
उनके दोहे जीवन का सार हैं यदि यह कहा जाए तो अन्यथा न होगा।अद्भुत दोहा है।
जीवन की समझाइश है इनमें कि –
“जीवन को हमने दिया,सिर्फ़ शुभ और शाम,
पीछे इसके रात है,आगे इसके शाम।”
आगे वे कितनी गहरी बात कहती हैं –
“आकाश परे स्पर्श से,पर्वत खड़े तटस्थ,
बहती, गाती,सींचती केवल नदी गृहस्थ।”
मेरा अनुमान है कि वे जीवन को इस दोहे की तरह ही जीती रही होंगी एक गीत की तरह –
“जीवन ही क्या मृत्यु भी,गीतों का विन्यास,
गीतों का नैवेद्य है,गीतों का उपवास”।
ईश्वर आशा जी को अपने सानिध्य में रखें और
परिवार को अथाह संबल भी प्रदान करें।
हर दोहे में विचारों की ऊंचाई और भावों की गहराई का बेमिसाल संगम है।
पर अब यादें ही शेष… स्मृतियों को नमन
अपने नाम को चरितार्थ करने वाली आशा जी यानी आशा सक्सेना जी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जितना भी साहित्य रचा है, उत्कृष्ट है। उनके दोहे पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
“आशा ही संस्कार है, आशा ही विज्ञान,
आशा के पर्याय हैं, बीज, प्रीत और प्राण।
बहुत गहराई लिए हुए ये पंक्तियां हमें बहुत कुछ कहती हैं।
आशा पत्तों की तरह, रिश्तों का है हाल,
आज हरे तो कल गिरे, रह जाएगी डाल।
आजकल के जीवन की सच्चाई को उद्घाटित करती हुई पंक्तियां।
टाले से टलता नहीं, अंत समय का वार,
बहुत सही और सटीक बात कही है आशा जी ने।
उनकी स्मृति को नमन। -Divya Jain
वाह-वाह ,अद्भुत पंक्तियां हैं।एक से बढ़कर एक।सभी में एक दर्शन। यह तो गागर में सागर वाली बात है।मैं आशा जी को व्यक्तिगत रुप से नहीं जानती। लेकिन उनकी लेखनी उनके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं।ह्रदय से नमन उन्हें।
आदरणीय आशा दीदी हमारे मंच की प्रातःवंदिता रही हैं, हमको उनके दोहों की आदत है। बहुत सटीक दोहे लिखतीं रही थीं वे। आपके द्वारा हम उन्हें पुनः पुनः याद करेंगें।
आशा सक्सेना जी के दोहे एक साथ अतीत की यात्रा करवाते हैं और भविष्य की आपदा से बचने का मार्ग भी बताते हैं।आशा जी का नाम भी दोहों के साथ जुड़कर दोहों को नया अर्थ देता है। इन दोहों में प्रकृति के विराट रूप का दर्शन होता है और ब्रह्मांड का रहस्य भी, यह बात इन दोहों से समझ में आती है।
जैसे कि,
धरती हर सिंगार कर, लहराए बलखाय,
धूप छांव सी पैंजनी, सूर, लय, गति समझाए।
एक और दोहा देखिए,
रेखाएं कब वृत्त में,सीधी हो या वक्र
उगना, खिलना, टूटना, रूप रंग का चक्र।
मुझे लगता है कि ये दोहे पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने योग्य हैं।
-नीलांजना किशोर