
शुक्रिया.. हज़ारों पाठकों के नाम हमारी चिट्ठी
ज़िद ज़िंदाबाद दोस्तो,
आप सबके साथ का ही एक मक़ाम है, आब-ओ-हवा का दो बरस का हो जाना। आपको तहे-दिल से शुक्रिया अदा करने का मौक़ा है यह कि आपकी बदौलत ही हम किसी तरह यहां तक गाड़ी खींच पाये हैं। ज़िंदगी और दुनिया के तमाम तक़ाज़ों के मद्देनज़र या तो यह विशुद्ध मूर्खता है या कोई क़रिश्मा कि आब-ओ-हवा अपने 50वें अंक की तरफ़ है।
पहला बरस जब पूरा हुआ था, तब हमने आब-ओ-हवा का एक ख़ास अंक निकाला था। इस बार ऐसा कुछ न करते हुए बस एक नज़र डालते हैं कि इस दूसरे बरस में क्या कुछ याद करने लायक़ रहा:
- हम पीडीएफ़ के स्वरूप को बदलते हुए पूरी तरह से वेबसाइट पर आये।
- पाक्षिक ब्लॉगज़ीन के साथ ही रोज़ाना अपडेट हो रहे पोर्टल की शक्ल में उभरे।
- पोर्टल पर हम 25 हज़ार पाठक संख्या पार कर चुके हैं।
- पोर्टल पर 900 पन्ने और एक हज़ार पाठकीय कमेंट्स।
- ब्लॉग और लेखों की शक्ल में दस्तावेज़ी काम किया है (इरादे और बुलंद हैं)।
- बग़ैर कोई लकीर खींचे हिंदी-उर्दू दोनों के साहित्य व साहित्यकारों का मंच बने हैं।
- स्थापित विधाओं/लेखकों के समानांतर उपेक्षितों/नवोदितों को साथ लिया है।
और यह सब करते हुए न हमने किसी तरह के पुरस्कार/सम्मान के लिए अप्रोच करने जैसी कमज़र्फ़ी दिखायी है और न ही किसी तरह के लोभ में पड़े हैं। हम बस अपना काम कर रहे हैं, ख़ामोशी, ईमानदारी, बेबाकी से, बेलाग।
खोजी, दस्तावेज़ी और सरोकारों वाले काम करने के लिए जो जुनून चाहिए, वह बहुत है। अब एक नज़र उन कुछ बिंदुओं पर भी जो आगे हमारे इरादे हैं, चुनौतियां हैं, मन है या मिलते रहे सुझाव हैं:
- एक नहीं कई सुझाव मिले कि आब-ओ-हवा को प्रिंट में लाया जाये।
- ऑफ़लाइन आयोजनों के लिए भी मन/दबाव/सुझाव अक्सर रहे हैं।
- कई तरह की उपयोगी किताबें और विज़ुअल्स बनाने के लिए हमारी एक दृष्टि है।
- सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सशक्त उपस्थिति के लिए एक छटपटाहट है।
- एक पुस्तकालय खड़ा करने का मन है।
- अपने लेखकों को मानदेय देने की भी भावना और कुलबुलाहट भी रहती है…
जैसा आप समझते हैं हर बिंदु के लिए अपने एक ख़र्च और बजट की मांग करता है। अर्थाभाव के चलते या तो यह सब हम बहुत धीरे कर पा रहे हैं या फिर सब्र ही। योजनाएं और लगन बहुत कुछ कर डालने की बनी हुई है, बस…
देखिए, न हमने अब तक सदस्यता शुल्क के नाम पर कोई चंदा मांगा है, न हमने विज्ञापनों की तरफ़ रुख़ किया है और न ही हम पेड मार्केटिंग के ज़रिये बाज़ार में उतरकर किसी सोशल प्लेटफ़ॉर्म से कमाई की कोई तरक़ीब भिड़ा पाये हैं… कुल मिलाकर बात यह कि यह किसी टीम या परिवार तो छोड़िए, एक बंदे की भी दाल-रोटी का इंतज़ाम कर सके, ऐसा प्रकल्प नहीं है। यानी विशुद्ध रूप से साहित्य और सरोकारों के प्रति हमारी एक गति मात्र है। इसे हम ज़िद कहते हैं, कुछ दोस्त हौसला, कुछ पागलपन तो कुछ विशुद्ध… जो भी है शायद इसलिए भी अब तक हम अभिव्यक्ति के लिए न तो किसी का मुंह ताक रहे हैं, न किसी की पीठ खुजा रहे हैं।

एक ऐसे दौर में, जहां छोटे-मोटे स्वार्थों के लिए रोज़ प्रतिबद्धताएं बदल रही हैं, ख़ेमे बदल रहे हैं, ज़बानें गुलाटियां मार रही हैं और ईमान शीर्षासन लगा रहे हैं, तब आब-ओ-हवा के नियमित प्रकाशन के मायने क्या हो जाते हैं, यह बग़ैर किसी स्वार्थ के हमारे साथ आपका बराबर जुड़े रहना काफ़ी कुछ बयान करता ही है।
किसी सियासी पार्टी, किसी संस्था, किसी गुट, किसी ख़ेमे से जुड़े बग़ैर हम एक स्वतंत्र आवाज़ हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा रवैया ढुलमुल समझा जाएगा। नहीं। बस हमें इस सोच पर विश्वास करना चाहिए कि किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मनुष्य संघ की पर्ची कटवाना ही हमारे मनुष्य होने की शर्त तो नहीं हो सकता। हमारी अपनी आवाज़ ही सबूत है कि हम मानवता, संवेदना और विचार में किसके साथ हैं और किस तरफ़ हैं।
अगर सिस्टम में हम सुधार चाहते हैं और इसी मक़सद से आलोचना का पक्ष लेते हैं, तब इतने भर से वही सिस्टम हमें अलगाये, ग़ैर माने, तब यह हमारी नैतिकता नहीं बनती कि हम उस सिस्टम से किसी तरह के आर्थिक सहयोग के लिए अर्ज़ियां दें। तो विज्ञापन या मदद मांगने से हम यूं रहे। कुछ पत्रकार/साहित्यकार बंधु हैं, जिन्हें हुनर हासिल है कि वे किसी उद्यमी, प्रवासी, किसी ट्रस्ट या किसी अकादमी वग़ैरह के साथ सांठ-गांठ कर अपनी दुकान चलाते रहते हैं और घर भी। लेकिन यहां भी हम दुनियादारी के मेआर से बेहुनर ही ठहरे। ख़ुद को कोसते रह जाते हैं काश चरण-वंदना, जी-हुज़ूरी और क़सीदे काढ़ने, सिर झुकाने की अदा नसीब होती…
तो, अब आप ही तय करें कि आब-ओ-हवा का यह मक़ाम क़रिश्मा है या मूर्खता की पराकाष्ठा। जो भी है अब आगे की बात यह है कि हम इस तरह लगातार चलते नहीं रह सकते क्योंकि ज़िंदगी की मजबूरियां कुछ यूं हैं कि तन है तो मन की लगन है मतलब वही मीर का मिसरा कि जान है तो जहान है।
तमाम दुखड़ों के बीच राहत यह है कि कुछ व्यक्तित्व अनायास ही सामने आये, जिन्होंने हमें बग़ैर मांगे, बग़ैर कुछ कहे, अपनी भावना से आर्थिक सहयोग किया। किसी ने यूं ही कुछ रक़म भेज दी, किसी ने पुस्तकों के पूरे सेट भेजकर नवाज़ दिया तो किसी ने तकनीकी सहयोग देकर। ऐसी तमाम दिलदारियों के लिए हम अपने सभी सहयोगियों, ख़ैरख़्वाहों, लेखकों और पाठकों को फिर एक सलाम पेश करते हैं।
तो अब, क्राउड फ़ंडिंग की अपील के साथ जल्द ही हाज़िर होंगे। इसके लिए कुछ ज़रूरी इंतज़ाम और तैयारियां जारी हैं। आपके हर तरह के साथ और मोहब्बत की उम्मीद लगातार करते हैं। आख़िरश यह कहने का भी मौक़ा है कि वो आप ही हैं, जिनकी वजह से आब-ओ-हवा एक पागलपन की तरह ज़िंदा बनी हुई है। ज़िद ज़िंदाबाद दोस्तो।
-भवेश दिलशाद
पुन:श्च
आब-ओ-हवा की दूसरी सालगिरह के लिए फ़ेसबुक पर वरिष्ठ साहित्यकार रति सक्सेना के शब्द सनद बने…. इधर, अनेक पाठकों ने इस मौक़े पर हमें संदेश भेजे हैं, जिन्हें हमने ‘प्रतिध्वनि’ खंड में संकलित किया है। सर्वश्री नोमान शौक़, बकुला घासवाला, डॉ. मुकेश असीमित, अनामिका शिव, विवेक रंजन, मधु सक्सेना, ब्रज श्रीवास्तव, प्रीति जोशी, ख़ुदेजा ख़ान, तहसीन मुनव्वर, अनिता मंडा, राजीव सक्सेना, डॉ. मालिनी गौतम, डॉ. आक़िब जावेद, धृतिवर्धन गुप्त, स्मिता सक्सेना, धर्मेंद्र आज़ाद, विवेक मेहता, प्रदीप पाराशर, डॉ. बबीता और नमिता सिंह जैसे प्रतिष्ठित एवं स्वनामधन्य हस्ताक्षरों के ख़तों के लिए हम आभारी हैं। इन्हें यहां देखें…
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