विक्रम, बैताल, vikram, betaal, vaitaal, vikram betaal
हास्य-व्यंग्य श्रीकांत आप्टे की कलम से....

विक्रम, बैताल और भांडतंत्र

            हठी राजा विक्रम फिर चल पड़ा जंगल की ओर। जंगल पहुंच कर उसने पेड़ पर लटके बैताल को उतारा और उसे कंधे पर लादकर चल पड़ा नगर की ओर चुपचाप।

कुछ क्षणों पश्चात बैताल बोला, “राजन, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं… कहानी उस देश की है जहां आजकल भांडतंत्र की सरकार है। कभी उस देश में जनता के वोटों से चुनी लोकतंत्र की सरकार हुआ करती था। आजकल उस देश में लोकतंत्र की सरकार नहीं इसकी अफ़वाह हुआ करती है।

हुआ कुछ यूं कि चंद वर्षों पहले वहां एक भांड की झूठी लीलाओं में फंसकर जनता ने देश चलाने के लिए उसी भांड को गद्दी पर बैठा दिया।

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बस वो दिन है कि आज का दिन, वही भांड गद्दी पर कब्ज़ा जमाये हुए है। भांड तो भांड ठहरा। राजकाज क्या जाने। पर यह ज़रूर जानता है कि गद्दी पर बैठे रहने के लिए उसे लोकतंत्र को भांडतंत्र में बदलना होगा और उस भांडतंत्र को चलाने के लिए बनाना होगी एक भांडसेना। भांडसेना, भांड तानाशाह को अनश्वर देवता, विश्वगुरु, महाज्ञानी, अजेय और ऐसे ही नये-नये नामों से उसका प्रचार चौबीसों घंटे करती है। इसमें दिहाड़ी मज़दूरों के साथ ही यही काम बिना दिहाड़ी के करने वाले भी करोड़ों की संख्या में हैं। इनमें बेरोज़गार जवान हैं, दोपहर को बोर होती आंटियां हैं और बुढ़ापे में नींद न आने के कारण देर रात तक जगे रहने वाले अंकल, सभी हैं। सभी व्हाट्सऐपिया और ट्विटरिया। अब भांड के पास भांडतंत्र और भांड सेना दोनों हैं। भांड तो वह पहले से ही है। इनकी मदद से अब वह केवल भांड नहीं बल्कि भांड तानाशाह बन गया है। उसका हर क़दम, हर चाल ख़ुद ही सदा के लिए गद्दी पर बैठे रहने का प्लान होता है। देश ही नहीं, विदेशों में भी नित नये तमाशे दिखाता रहता है भांड तानाशाह।

तमाशों की लिस्ट इतनी लंबी है कि उसका चौथाई भी सुनाने में इतना वक़्त लगेगा राजन कि तब तक बैताल बनकर तू भी मेरे बाजू में पेड़ पर लटक रहा होगा। इसीलिए मैं सीधे प्रश्नों पर आता हूं।

पहला प्रश्न है कि जनता कब तक एक भांड को वोट देती रहेगी? दूसरा प्रश्न है कि भांडसेना में भर्ती के लिए आवश्यक अर्हता क्या है? तीसरा और अंतिम प्रश्न है कि सदा के लिए गद्दी पर बैठे रहने का भांड का सपना क्या पूरा होगा?

तू जानता ही है कि इधर तेरा मौन टूटा और उधर मैं हो जाऊंगा उड़न-छू। वापस जा बैठूंगा उसी पेड़ पर। परंतु इन प्रश्नों के उत्तर जानते हुए भी यदि तू ने इनके उत्तर नहीं दिये तो तेरा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।

विक्रम बोला कि बैताल तेरे प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार है: भांड तानाशाह ने इतना चालाक भांडतंत्र विकसित कर लिया है कि गद्दी पर बैठे रहने के लिए उसे अब जनता के वोटों की आवश्यकता ही नहीं रही। चुनाव जीतने की सारी व्यवस्था यह तंत्र ही कर देता है। ख़िलाफ़ जाने वाले वोटरों के नाम चुनाव से पहले ही वह वोटर लिस्ट से हटवा देता है। शेष में, भांड तो उसके अपने ही हैं। भांडों को छोड़कर जो बचे रहते हैं उनके लिए लिए आश्वासनों के तमाशे का जाल। हर महीने बुड्ढों के लिए पेंशन, औरतों को नगदनारायण का प्रसाद। भांति-भांति के तमाशे झोली में लिये चुनावी मैदान में सभा, रैलियां।

अब दूसरा प्रश्न। वज्र मूर्ख होना भांडसेना में भर्ती होने की इकलौती अर्हता है। भांडसेना में अशिक्षितों के अलावा शिक्षित और अति शिक्षित भी हैं भारी तादाद में। तीसरा और अंतिम प्रश्न। भांड तानाशाह के पूर्वज तानाशाहों ने भी सदा के लिए गद्दी पर बैठने का सपना देखा था। उनका हश्र दुनिया ने देखा है। फिर भी हर काल में कुछ मूर्ख यह सपना देखते ज़रूर हैं। जिस भांड तानाशाह की कथा तुमने सुनायी वह तो…

इस तरह राजा विक्रम का मौन भंग होते ही बैताल अट्टहास करते हुए राजा के कंधों से उड़कर पुन: पेड़ पर जा बैठा।

श्रीकांत आप्टे, shrikant apte

श्रीकांत आप्टे

चार दशकों से व्यंग्य लेखन में सक्रिय। रंगमंच पर भी लेखन, अभिनय और निर्देशन। 150 से अधिक रेडियो नाटक प्रसारित। फ़िल्मों के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन के साथ कविताओं एवं साहित्य के पोस्टरों पर भी काम। संपर्क: 91799 90388।

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