ela bhatt, इला भट्ट, महिलाएँ काम और शांति, mahilaayein kaam aur shanti, ela bhatt book
लाखों महिलाओं के स्वरोज़गार का संगठन 'सेवा' खड़ा करने वाली इला भट्ट के भाषणों का संग्रह हाल ही प्रकाशित हुआ है। नारी सशक्तिकरण और महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में यह किताब क्या कुछ कहती है, एक नज़र।
पुस्तक चर्चा प्रीति जोशी की कलम से....

युद्धों के बीच इलाबेन की यह किताब

           बकौल मार्गी जी – “आने वाले समय के लिए तैयार होने के वास्ते इसे पढ़ें क्योंकि जिस दुनिया में हम रहते हैं वह हिंसक, अशांत और ग़रीब है और अक्सर युद्ध के कगार पर दिखायी देती है। ‘महिलाएँ काम और शांति’ पुस्तक इसलिए उन भाषणों का एक संग्रह है, जिनमें हमारी दुनिया के भविष्य के बारे में चिंतित हर किसी की रुचि होनी चाहिए।”

‘महिलाएँ, काम और शांति’ पुस्तक में इलाबेन के कुल 27 (जिन्हें हमने बाद में व्याख्यान कहा है) भाषण शामिल हैं। ये मात्र भाषण नहीं हैं बल्कि इन्हें गहनता से देखें तो एक ऐसी दुनिया की संकल्पना सामने आती है जहाँ शांति है, समानता है, हरेक के लिए रोज़गार है और हर एक के लिए रोटी है। एक स्त्री के ज़रिये पूरी मानव जाति के कल्याण का सपना देखने वाली इलाबेन ने 30 लाख से भी ज़्यादा स्वाश्रयी महिलाओं को आत्मनिर्भरता का स्वाद चखाया। काम तो ये बहनें हमेशा से करती आयी थीं लेकिन अब उन्होंने मानो पहली बार जाना कि वे भी ‘कामगार’ हैं। उनकी भी एक ‘पहचान’ है और फिर इसी पहचान व भावना के साथ ही इन बहनों का हुनर ठेठ पेरिस के फैशन शो तक जा पहॅुंचा।

इलाबेन उस पीढी से थीं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत को जन्म लेते देखा और वे भी इलाबेन ही थीं जिन्होंने सालों पहले इन्हीं श्रमजीवी बहनों के हाथों में कैमरा और वीडियो जैसे मीडिया के साधन थमा दिये थे। श्रमजीवी बहनों के प्रति उनके मन में जितनी श्रद्धा थी, उससे कहीं ज़्यादा विश्वास था।

इलाबेन का मानना था कि, “हमारे विचार हमारी निजी संपत्ति नहीं हैं उनको साझा किया जाना चाहिए।” यह पुस्तक उनके विचारों को अन्यों तक पहुँचाने का प्रयास है।

पुस्तक में संकलित उनका पहला व्याख्यान नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइन के छात्रों को दिया गया कि “एक उत्कृष्ट डिज़ाइन का उत्पाद संपन्न लोग ही ख़रीद सकते हैं। आप सोचें कि कैसे आपके डिज़ाइन हमारी ज़िंदगियों को और अधिक बेहतर, सहनीय, रहने योग्य और सस्ता बना सकते हैं।” वे कहती थीं, “मैं ‘डिज़ाइन’ को जीवन और आजीविका से अलग करके नहीं देख सकती। डिज़ाइन एकीकृत है। ‘काम’ और ‘कामगार’ के शरीर के साथ गुंथा हुआ उसका हिस्सा है।”

‘सेवा’ अपने शुरूआती दिनों से ही फेरीवालों की समस्या से निपट रही है। यही वजह है कि ‘फिक्की’ (फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) में जब वे फेरीवालों की राष्ट्रीय नीति के लिए बोल रही थीं, तब अचानक से यह स्पष्ट हुआ कि समाज के एक बड़े तबक़े तक ताज़ा फल-फूल, दूध-दही जैसी अन्य चीज़ें पहुँचाने वाले ये ‘ग़रीब’, ‘स्वाश्रयी’ लोग न अपराधी हैं और न ही वे शहर को बदसूरत बनाते हैं बल्कि वे हमारी ही तरह इस देश के नागरिक हैं और सम्मान के पात्र हैं।

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इस वर्ग से पूरी तरह निश्चिंत होकर ही वे कहती थीं, “भारत के ग़रीब, ग़रीबी दूर करने में समर्थ हैं।” इसीलिए उन्होंने वनस्थली विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में वहाँ उपस्थित छात्राओं को कहा कि- “आपको अपनी शिक्षा का उपयोग यह पता लगाने में करना होगा कि कैसे अधिकांश लोगों के लिए ऐसे अवसर खड़े करना संभव है जिससे हर किसी की व्यक्तिगत तरक़्क़ी और सुधार हो सके।”

उनका मानना था कि ग़रीबी समाज की मौन स्वीकृति से होने वाली हिंसा है, इसलिए कॉर्पोरेट के दिग्गजों और उद्योगपतियों के लिए भी इलाबेन का यही कहना था, “जब कामगार सशक्त होते हैं तो पूरे उद्योग को ताक़त मिलती है। इस विशाल पिरामिड का आधार तो दरअसल यह श्रमजीवी वर्ग है।” इलाबेन हमेशा मेनस्ट्रीम के लोगों के बीच जाकर श्रमजीवियों की बात करती थीं ताकि वे लोग श्रमजीवियों का महत्व समझें और उनके बारे में सहानुभूतिपूर्वक विचार करें।

इलाबेन की ‘सेवा’ भले ही स्वाश्रयी महिलाओं का संगठन है लेकिन हक़ीक़त में तो इसमें यह एक स्त्री के माध्यम से उसके पूरे परिवार, पूरे समाज, पूरे देश और अंततः पूरे विश्व के कल्याण की अंतर्दृष्टि समायी हुई है। सेवा में बहनों को ‘किसी के विरुद्ध’ साथ में नहीं जुड़ना है बल्कि उन्हें केवल ‘अपने लिए’ साथ जुड़ना है। जब वे कहती हैं, “सामाजिक सुरक्षा एक अवधारणा है और एक व्यवस्था भी” तब उनका तात्पर्य “स्वास्थ्य, देखभाल, बच्चों की देखभाल, बीमा और आवास से है।” उनका दृढ़ विश्वास था, “ग़रीब महिलाओं में शक्ति, साहस और अंतर्दृष्टि है, वे रचनात्मक हैं और अपनी समस्याओं के हल स्वयं ढूँढ़ने में समर्थ भी इसलिए वे जोखम लेने से डरती नहीं हैं।” इन कामगार बहनों को बस ‘स्थायी’ काम की दरकार होती है।

जब वे विश्व के वरिष्ठों के समूह ‘द एल्डर्स’ के समक्ष एक गृहिणी के मार्फ़त से उसकी अनगिनत ज़िम्मेदारियों का हवाला देकर ‘गृहिणी के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत’ की व्याख्या करती हैं कि, “गृहिणी एक कार्यकर्ता, एक निर्माता, एक सर्जक, एक संरक्षक, एक पालक, संसाधनों की प्रबंधक, एक पोषणकर्ता, एक देखभालकर्ता है। वह बजट को संतुलित करती है, रिश्तेदारी और सामुदायिक संबंधों को पोषित करती है और निरंतरता बनाये रखती है।” तब वे ज़ोर देती हैं कि, “अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए घर और ‘गृहिणी’ दुनिया के लिए एक बहुत ही विश्वसनीय मॉडल है।”

हालाँकि घर के विचार को विश्व तक ले जाते हुए एक मॉडल के रूप में गृहिणी की उनकी अवधारणा के अनौपचारिक रूप, उसकी वैधता और कमज़ोरियों के बारे में वे अनिश्चित थीं लेकिन उनके भाषण के बाद में डारफुर मुद्दे पर बातचीत के दौरान इस दृष्टिकोण को ही आधार बनाया गया। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में गृहिणी का दृष्टिकोण आने वाले दिनों के लिए उनके लंबित एजेंडे में शामिल ही रहा।

वे कहती हैं, “हमने सेवा के हर क़दम में काम को केंद्र में रखा है। ग़रीब महिला के जीवन में काम केंद्रीय है। काम शांति लाता है क्योंकि काम से लोगों को अपनी जड़ें (मज़बूती/आधार) मिलती हैं यह समुदायों को बनाता है। शांति सीमाओं की समझ है, उदारता की वह भावना है, जिसमें रोटी के आख़िरी टुकड़े को भी बाँटकर खाया जाता है। शांति हमारे शरीर, प्रकृति और अपनों के साथ सद्भाव से जीवन जीने का तरीक़ा है।”

महिलाएँ, काम और शांति ये तीन शब्द इलाबेन के जीवन का सार हैं क्योंकि उनका समूचा जीवन श्रमजीवी स्त्रियों के इर्द-गिर्द ही रहा। दूरदर्शी इलाबेन के विचार और उनकी अवधारणाएं लंबे समय तक प्रभावी रहने वाली हैं। उन विचारों और अवधारणाओं का सार इस पुस्तक में समाहित है।

बात चाहे ‘सौ मील के सिद्धांत’ की हो या ‘खाद्य सुरक्षा’ की उनका ज़ोर ग़रीबों की स्थिति को सुधारने पर ही रहा। उनके सौ मील के सिद्धांत को कई गाँवों की महिलाओं ने लागू कर अपनी समस्याओं का हल निकाला है। उन्होंने ग़रीब महिलाओं को माइक्रो फ़ायनांस से जोड़ा क्योंकि ‘सेवा’ ग़रीबी को ख़त्म कर शांति स्थापित करने का मार्ग ढूंढ़ती है।

सेवा गॉंधी मूल्यों पर चलती है। इलाबेन गाँधीजी से इतनी ज़्यादा प्रभावित थीं कि मानो उन्होंने गाँधीजी को आत्मसात् ही कर लिया। संभवतः स्त्री-शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा उसी आत्मसात् का परिणाम रही। तभी वे दृढ़तापूर्वक मानती हैं, “पृथ्वी को लालच से बचाने के लिए महिला नेतृत्व की ज़रूरत है। महिला नेतृत्व चाहिए विकास के रास्ते बनाने के लिए, अवसर पैदा करने के लिए” और अंततः महिला नेतृत्व की आवश्यकता है, “समाज में शांति लाने के लिए। सच्ची शांति उसे कहते हैं जो युद्ध को नाकाम कर देती है। शांति तो ऐसी परिस्थिति का सृजन करती है जिसमें समस्त समुदाय न्यायपूर्ण फलप्रद राहत का अनुभव करते हैं। शांति अर्थात् समाज में समानता और संतुलन का बने रहना, तभी शांति टिकी रहती है।”

खादी, प्राकृतिक बाज़ार, श्रम के सहयोगी, तकनीकी और हं, झाड़ू भी– आप इस पुस्तक के चाहे जिस व्याख्यान को पढ़ेंगे, आपको वो गहन जीवन दर्शन मिलेगा जिसे अपनाकर आप जान पाएँगे कि अंतिम व्यक्ति की भूख को तृप्त करना भी संभव है बशर्ते कि आप अपने और जगत के बीच के अनुबंध को समझ सकें।

आज जब तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेली जा रही दुनिया युद्धों के ताप से जूझ रही है, तब यह किताब ठंडी हवा के झोंके की तरह आपको तसल्ली देती है कि अभी भी देर नहीं हुई है। धरती और प्रकृति के अनुबंध को जान लो फिर किसी युद्ध की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी।

सकारात्मक सोच और विनम्रता के साथ इलाबेन हर समस्या का विकल्प भी सुझा देती थीं। उनकी दूरदर्शिता की झलक उनके हर व्याख्यान में नज़र आती है। दरअसल, इस समय इस पुस्तक का हमारे हाथों में आना मानों हमें उस ‘स्वच्छ आकाश’ की ओर ले जाने का जतन है, जिसका ख़्वाब वे हमेशा से देखती थीं।

इन व्याख्यानों के चयन में मार्गी शास्त्रीजी ने जिस धीरज से काम लिया है, वह प्रशंसनीय है। मानो लहराते-बलखाते समुद्र से कुछ मोतियों को चुन लेना जबकि अथाह ख़ज़ाना आपके सामने हो। व्याख्यानों का उनका चयन सराहनीय है। इस पुस्तक को अंग्रेज़ी में तैयार और प्रकाशित किया गया। उसे हिंदी पाठकों तक पहुँचाने के लिए मिहिर भाई भट्ट के जज़्बे की भी तारीफ़ करनी ही चाहिए। हर व्याख्यान को हिंदी में अनुवाद करने का दायित्व नीलम गुप्ताजी ने बहुत कुशलता से निभाया। उन्होंने भरसक प्रयत्न करके पुस्तक की भाषा को वैसा ही रखा जैसा इलाबेन को रुचता। उन्होंने यह सावधानी इसलिए भी बरती कि इलाबेन शब्दों के चयन को लेकर बहुत सतर्क रहती थीं।

बहरहाल ‘महिलाएँ, काम और शांति’ – इस पुस्तक को पढ़ना संभावनाओं के अनेकानेक अवसर सुलभ हो जाने की तरह है, जहाँ आप एक शांतिपूर्ण जीवन जीने की कामना कर सकते हैं।

प्रीति जोशी, preeti joshi

प्रीति जोशी

'सेवा' संस्था और अनसूया अख़बार से पिछले 34 वर्षों से जुड़ी हैं और 12 वर्षों से इसका सम्पादन कर रही हैं। इलाबेन पर एक पुस्तक की तैयारी है। वरिष्ठ साथी स्वर्गीय ज्योत्सना मिलन से बहुत कुछ सीखा। फिर अनसूया ट्रस्ट की ओर से लेखन कार्यशालाओं का आयोजन शुरू किया। सेवा की कार्यकर्ताओं को रिपोर्टर बनाने की शुरूआत हुई। ऐसे आयोजन और सीखना, सिखाना अब भी जारी है। संपर्क : piyashant@gmail.com

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