गोपीबाई, gopibai, dadi ji, mataji
संस्मरण ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....

दादी या माताजी: लोकगीतों में रचा जीवन

खीर-पूड़ी खाने के लिए आये
कौए छत पर
श्राद्ध संपादन के लिए ब्राह्मण
अतिथियों की स्मृति से
निकलकर आया दादी का स्वभाव
उसकी कहानियों को याद दिलाते हुए
आये मेरे पास अनेक क्षण
अनेक रिश्तेदार आये
नहीं आयी दादी मगर
(दादी के श्राद्ध भोज के दिन लिखी कविता)

            अगर उनकी तस्वीर से उनके व्यक्तित्व का अंदाज़ा कोई लगाये तो बहुत औसत छवि ही बनेगी दादी की, मगर उनके ममतामयी स्वभाव को तो वे जानते हैं जिन्होंने उनकी संगत पायी है, थोड़ी या ज़्यादा। परिवार का होकर या संपर्क में आकर।

साधारण देहयष्टि, चौड़ा चेहरा, होंठ के पास एक बड़ा तिल, छोटा क़द, माथे पर सहज विस्तार और चेहरे पर ग्राम्य स्त्रियों जैसी निष्कपट गंभीरता— इतना भर देखकर कौन जान पाता कि इस सरल आकृति के भीतर कितनी विराट ममता, कितनी लोक-स्मृति, कितनी कर्मठता और कितनी जीवटता बसी हुई थी।

वे हमारी दादी थीं, पर धीरे-धीरे पूरा परिवार उन्हें “माताजी” कहने लगा था। यह संबोधन केवल उम्र का सम्मान नहीं था, बल्कि उस केंद्रीय उपस्थिति का स्वीकार था, जिसके चारों ओर परिवार का भावनात्मक संसार घूमता था।

उनका असली नाम गोपीबाई था, पर नाम से अधिक स्मृति में उनका स्वर बचा है— वह भारी, थोड़ा धीमा, किंतु सुर से भरा हुआ स्वर; वह स्वर जिसमें कभी कहानी उतरती थी, कभी लोकगीत, कभी पुकार, कभी दुलार और कभी प्रभाती।

सबसे पहले मुझे उनके साहस और निर्णय क्षमता का एक प्रसंग याद आता है, जो उन्होंने स्वयं मुझे सुनाया था। मैं तब छह महीने या एक वर्ष का रहा होऊँगा। मुझे निमोनिया ने बुरी तरह जकड़ लिया था। रात भर मैं हाँफता रहा। साँस जैसे छाती में अटक जाती थी। गाँव काँकर तब भी चिकित्सकीय सुविधाओं से वंचित था, आज भी बहुत बदला नहीं है। उन दिनों तो बीमारी और भाग्य का रिश्ता और अधिक प्रत्यक्ष था।

घर के पुरुष अपने-अपने काम पर निकल चुके थे। घर में मेरी माँ थीं, दादी थीं और मैं—एक बीमार शिशु। स्थिति विकट थी। तब दादी ने विलाप नहीं किया, भाग्य को दोष नहीं दिया, किसी के लौटने की प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने हरवाहे से कहा— “बैलगाड़ी तैयार करो, मैं बबलू को लेकर कुरवाई जाऊँगी।”

बैलगाड़ी तैयार हुई। धूल भरे रास्ते, काँपती देह, गोद में बीमार बच्चा और भीतर एक अडिग संकल्प लेकर वे निकल पड़ीं। कुरवाई के वैद्य या चिकित्सक ने वहाँ पहुँचने पर उनके निर्णय की सराहना की थी। उसने कहा था, थोड़ी देर और होती तो दवा के अभाव में कुछ भी हो सकता था। मेरे लिए यह केवल बचपन का प्रसंग नहीं, जीवन का पहला ऋण है, जो मेरी साँसों पर दादी के हस्ताक्षर की तरह दर्ज है।

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वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं। अक्षर-ज्ञान नहीं था, किंतु जीवन-ज्ञान था। निरक्षर होना और अज्ञानी होना दो भिन्न अवस्थाएँ हैं, यह मैंने उन्हीं को देखकर जाना। उन्हें बारहखड़ी का एक गीत याद था, जिसे वे ऐसी लय में गातीं कि अक्षर भी नाचते प्रतीत होते। उनकी स्मृति में लोकगीतों का एक अनंत भंडार था। वे केवल गीत याद नहीं रखती थीं, उन्हें जीती थीं। लगता था जैसे अवसर के अनुसार वे गीत रच भी लेती हों। हर स्थिति के लिए उनके पास कोई धुन, कोई पंक्ति, कोई कहावत मौजूद रहती। एक दुर्लभ लोकगीत मुझे विशेष रूप से याद है:

नये हाकिम तेज बचे रहियो,
नये हाकिम तेज बचे रहियो,
सब पटवारिन के चेहरा बदल गये,
घोड़े की टाप सुनत रहियो,
हाथ में बस्ता लिये रहियो।

इस छोटे से गीत में पूरा ग्रामीण प्रशासन, भय, व्यंग्य और घरेलू सावधानी एक साथ उपस्थित है। पत्नी अपने पटवारी पति को चेतावनी दे रही है कि नया अधिकारी आया है, अब चौकन्ने रहना। लोकगीत यहाँ मनोरंजन नहीं, सामाजिक टिप्पणी बन जाता है। दादी ऐसे गीत सहजता से गातीं और हम बच्चों को समझ में आये या न आये, हम उस रस में डूब जाते।

मेरे बचपन की नींद दादी की कहानियों से शुरू होती थी। मैं बाक़ायदा कहानी सुनकर ही सोता था। उनके पास राजाओं की कथाएँ थीं, रानियों के दुख-सुख थे, चिड़ियों के घर थे, साँपों के रहस्य थे, जंगल थे, भूत थे, देवता थे और सबसे बढ़कर था कथन का जादू। वे केवल कहानी नहीं सुनाती थीं, पात्रों को जीती थीं। जब राजा बोलता, उनके स्वर में अधिकार उतर आता; जब रानी रोती, उनकी आँखें सचमुच भर आतीं; जब चिड़िया फँसती, उनके चेहरे पर चिंता आ जाती; जब कोई मूर्ख पात्र ठगा जाता, वे स्वयं हँस पड़तीं। उनकी कहानियों में लोक था, लय थी, नैतिकता थी, हास्य था और जीवन की गहरी समझ थी। शायद मेरी भाषा, मेरी कल्पना, मेरे लेखन की पहली पाठशाला वही थीं।

दादी, मेरे पिताजी से कम बात करतीं थीं। पिताजी भी केवल उनकी तबीयत के बारे में पूछते थे। मगर परस्पर संवेदनशील रहते थे। दादी हमेशा पूछती घनश्याम ने खाना खा लिया। या आज घनश्याम कहाँ गये।

दादी और माँ का संबंध घर की परंपरागत सास-बहू की रूढ़ छवि जैसा नहीं था। उनमें अनुशासन था, पर दमन नहीं। वे माँ को जैसे एक शिक्षक की तरह गृह-संस्कार सिखातीं—रीतियाँ, व्रत-विधान, पूजा की विधियाँ, रिश्तों की मर्यादा, अवसरानुसार पकवान, लोकगीतों की पंक्तियाँ।

वे काम करते-करते सिखाती थीं। कोई त्यौहार आने वाला है तो उसके पीछे की कथा भी बताएँगी, पकवान भी बताएँगी, गीत भी गाएँगी। भुजरिया का एक गीत माँ ने हम तक उन्हीं से पाया:

आईं भुजररानी पाहुनी,
मेरे बाबा,
काहका बैठका डारूँ,
चौकीरा चंदन डारो।
सखी रघुनंदन खेले बागों
इनका हर देव जेवनार
अरी गोरी
सखी रघुनंदन

गीत में स्वागत है, श्रद्धा है, घर की आत्मीयता है। यही दादी का संसार था, जहाँ हर उत्सव गीत से शुरू होता था।

मध्य प्रदेश का तीजा पर्व उनके जीवन का विशेष अध्याय था। चौबीस घंटे निर्जल और निराहार रहकर शिव की उपासना। यह व्रत वे अत्यंत श्रद्धा से करती थीं। हमारे गाँव काँकर में यह आयोजन केवल हमारे घर पर होता था। इसलिए पूरा गाँव झाँकी देखने आता। रात भर भजन, कीर्तन, गम्मत, लोक-नाट्य जैसा वातावरण रहता। बड़े-बड़े गैस लालटेन जलते। हम बच्चे दूसरे गाँव से केले के पत्ते लाने जाते। घर मानो एक सांस्कृतिक मंच बन जाता। उस उत्सव का केंद्र कोई मूर्ति नहीं, दादी थीं… उनकी तैयारी, उनका संयम, उनका नेतृत्व, उनका उत्साह। धर्म उनके लिए प्रदर्शन नहीं… जैसे समुदाय को जोड़ने का अवसर था।

सन् 1981-82 के आसपास जब पिताजी को कटनी के पास शाहनगर नौकरी पर जाना था, तब हमारे परिवार के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया। हम गाँव से अलग होकर बाहर बसने जा रहे थे। संयुक्त परिवार का ताना-बाना ढीला पड़ रहा था।

दादी के चेहरे पर उस टूटन का अवसाद साफ़ दिखता था। उन्होंने कहा— “हम भी चलेंगे।” पहली यात्रा में वे न जा सकीं, पर कुछ महीनों बाद उन्हें भी वहाँ लाया गया। बड़े बेटे का रुतबा देखकर वे प्रसन्न थीं। लेकिन दादाजी के निधन के बाद उनका मन कहीं स्थिर नहीं रहता था। यहाँ आतीं तो कुछ दिन बाद गाँव लौटने की बात करतीं। गाँव जातीं तो फिर यहाँ आने की इच्छा जतातीं। छोटे चाचाजी दूर बस्तर में थे, वहाँ भी पहुँच जातीं।

असल में उनका मन जगहों में नहीं, अपने लोगों में बसता था। वे घर नहीं बदलती थीं, अपनों के बीच चलती रहती थीं।

उन्हें भोजन में कढ़ी बहुत पसंद थी। खड़यीं का रायता, चीले, गुलगुले, इन व्यंजनों के नाम लेते ही उनका चेहरा खिल उठता। उनके कारण घर में ये चीज़ें बनतीं और हम बच्चों की मौज हो जाती।

उनकी पेंशन बहुत छोटी राशि थी, पर हमारे लिए वह किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी। उसी में से कुल्फी, मिठाई, आइसक्रीम के पैसे निकल आते। हम भाई-बहन उनकी सेवा-संभाल में विशेष तत्पर रहते, कभी पैर दबाना, कभी पानी देना, कभी चश्मा ढूँढ़ना और अंत में दो-चार रुपये मिल जाना। घर में उनकी जय-जय होती रहती।

सुबह वे उठतीं तो लेटे-लेटे कुछ गुनगुनातीं। वह एक प्रकार का प्रभात-गान था। कुछ-कुछ पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं:

आज सखी सपने में आये
राम लखन सिय जनकलली
चारों भैया बैठे सिंह पौर पे
मैं अपने घर से निकली
मोर मुकट कानों में कुंडल
केसर खौर लिलार लिखी

रात का भोजन जिसे आजकल डिनर कहा जाता है, पर गाँव में ब्यारु कहा जाता है। ब्यारु के लिए भी दादी एक लोकगीत गाया करतीं थीं:

आओ करहुँ लाला ब्यारी
श्रीलाल जी खों टेरत हैं महतारी
चार भैया जैवन बैठे
परसत जनक दुलारी
पूरी कचोरी और रायता परमल की तरकारी

शब्द हमें पूरे समझ न आते पर स्वर से लगता कि वे दिन की शुरूआत एक सकारात्मक ऊर्जा से कर रही हैं।

आँखों का ऑपरेशन हो चुका था, दृष्टि कमज़ोर थी। फिर भी उठकर सबसे पहले झाड़ू लगातीं। यह केवल सफ़ाई नहीं थी, उनका व्यायाम था, दिनचर्या थी और शायद जीवन-दर्शन भी, दिन की शुरूआत श्रम से।

उन्हें पोते-पोतियों के विवाह देखने की बड़ी इच्छा थी। उन्होंने बहन कल्पना और कविता के विवाह बड़े उत्साह से देखे। नानी के साथ बैठकर लोकगीत गाये, रात-दिन रस्मों में भाग लिया, दामादों के पाँव पखारे, पकवानों का स्वाद लिया और ख़ुश रहीं।

मेरी शादी को लेकर वे और अधिक उत्साहित थीं। जब मेरा रिश्ता तय करने के लिए घर वाले गये थे, तब वे बीमार होकर बिस्तर पर थीं। मैं उनसे मिलने बासौदा गया। वे मूर्छा में थीं। अचानक आँखें खोलीं और मुझसे पूछा, “तुम्हारी ससुराल कैसी है बेटा?” यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं था; यह उस पीढ़ी का प्रेम था जो अपने बच्चों का भविष्य देखकर ही निश्चिंत होती थी। पता नहीं उन्होंने मेरा उत्तर सुना या नहीं।

मैं अपनी नौकरी की जगह रुसल्ली साहू में था, जब एक रात ख़बर मिली, दादी नहीं रहीं। मैं अकेला बहुत देर तक रोता रहा। सुबह पहली बस से निकला। उनके अंतिम दर्शन मुझे अग्निज्वालाओं में मिले। एक पूरी कहानी मेरे सामने समाप्त हो रही थी… एक लंबी यात्रा, अभावों से भरा जीवन, प्रेम से लबालब हृदय, त्याग, लोकगीत, रीति-रिवाज, भोला हास्य, बच्चों के लिए खुला हाथ, और हर परिस्थिति में जीवित रहने की जिजीविषा।

उस दिन केवल एक स्त्री नहीं गयी थी, घर का एक युग विदा हुआ था। हर ओर ख़बर फैल गयी… माताजी नहीं रहीं।

आज सोचता हूँ, दादी जैसी स्त्रियाँ इतिहास की किताबों में नहीं मिलतीं, पर समाज का असली इतिहास उन्हीं के कंधों पर चलता है। वे निरक्षर होकर भी संस्कृति की वाहक थीं। निर्धन होकर भी दानशील थीं। साधारण दिखकर भी असाधारण थीं।

मेरी भाषा में यदि कहीं लोक की मिट्टी है, मेरे लेखन में यदि कहीं कविता की लय है, मेरे मन में यदि कहीं परिवार का अर्थ बचा है, तो उसमें दादी का हिस्सा है।

वे अब नहीं हैं, किसी पुराने लोकगीत की धुन में, रसोई में या बच्चों को सुनायी जाती किसी कहानी में अचानक लौट आती हैं।

और तब लगता है दादी कहीं गयी नहीं हैं, बस दिखायी देना छोड़ दिया है। बरसों बीत गये पर आज दादी यादों में चली आयीं, ऐसे जैसे हम भी उनके समय में फिर लौट गये हैं, समूचे वातावरण और दृश्यों के साथ मैंने उस दौर की एक परिक्रमा कर ली। हमारे गढ़ने में जिन जुदा लोगों का हाथ होता है उनके लिए हम क्या कर सकते हैं कुछ भी नहीं। याद कर सकते हैं। और ये याद करना मनुष्यता है कृतज्ञता है।

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