
- April 24, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
फ़िल्म चर्चा रति सक्सेना की कलम से....
"द ग्रेट इंडियन किचन" बनाम "मिसेज़"
कोरोनाकाल में ओटीटी का महत्व बढ़ गया था, उस वक़्त एक मलयालम फ़िल्म आयी थी, “द ग्रेट इंडियन किचन”। इस फ़िल्म ने बहुत धूम मचा दी थी और अनेक अवॉर्ड भी बटोरे। निर्देशक लेखक जो बेबी थे। नायक नायिका निमिषा और सूरज। यूं तो इस फ़िल्म में ग्लैमर की दृष्टि से सब कुछ सामान्य-सा था। सामान्य-सा मिडिल क्लास परिवार, सामान्य-से दिखने वाले अदाकार, लेकिन उनकी सामान्यता ही फ़िल्म को असामान्य बनाती है। ग्लैमर सिर्फ़ एक बात का था, वह था भोजन।
खाना बनाने की क्रिया को जिस ख़ूबसूरती से फ़िल्माया गया है, मनमोहक लगने लगता है। लेकिन उसके पीछे की कहानी उतनी ही कुरूप लगती है, जिसमें अधेड़ महिला दिन रात पकाने में ही जुटी रहती है, जब बेटे की शादी होती है तो सास बहू को सब सिखाने में जुट जाती है। ये दो महिलाएं केवल दो पुरुषों के जिह्वा मोह को पूरा करने में लगी रहती हैं। चटनी सिलबट्टे पर ही चाहिए, हर बार तीन-चार व्यंजन, मांस-मछली सब कुछ होना चाहिए, साथ में ये पुरुष जिस बेहूदगी से खाते हैं कि देखकर कोफ़्त होती है। दोनों स्त्रियों के हिस्से में आती है जूठी मेज़, जिस पर सब कुछ बिखरा पड़ा है, गन्दी रसोई, जिसके वॉश-बेसिन तक को ठीक नहीं करवाया गया है, और अथक मेहनत।
युवा प्रेम जल्दी ही विदा हो जाता है और पढ़ी-लिखी लड़की परेशान होने लगती है। वह ट्रेंड डांसर रही थी, बच्चों को डांस सिखाती थी। उसके पास राजनैतिक चेतना थी, वह सरकारी नीतियों का विरोध करना भी जानती थी, लेकिन इस घर में वह मशीन बन जाती है। अन्ततः यह ग़ुस्सा फूटता है और वह अपनी नृत्य की दुनिया में लौट जाती है। बात यहीं ख़त्म नहीं होती, लड़के को दूसरी पत्नी भी मिल जाती है, जो उसकी मां के साथ घर चलाना सीखने लगी है।
इस सहज-सी कहानी का फ़िल्मांकन बेहद ज़बरदस्त है। सामाजिक, राजनैतिक सभी तरह की स्थितियों से गुज़रती सामान्य-से चेहरे वाली नायिका बेहद सशक्त लगने लगती है। सब्ज़ियों का कटना, भगोने उछलते हुए गिरना आदि भोजन से जुड़ी क्रियाओं का बेहद ख़ूबसूरती से दृश्यांकन हुआ है।
केरल को नहीं जानने वाले सोच सकते हैं कि यहां मातृसत्तात्मक स्थिति है, तो पुरुषों का इतना दवाब कैसे? लेकिन मैंने यहां देखा है कि मध्यमवर्गीय घरों से लेकर निम्नवर्गीय घरों में पुरुष खाने-पीने के अलावा कुछ नहीं करते और उनका खाना भी निश्चित होता है कि मछली भी दो तरह की होनी चाहिए… मांएं शान से बताती हैं।

इस फ़िल्म को तमिल और हिन्दी में रीमेक किया गया। मैंने हिन्दी की रीमेक को देखा, बेहद निराशा हुई। कहानी तो मलयालम वाली थी, लेकिन परिवेश बदलना था, इसलिए बम्बई का परिवेश महसूस होता है। परिवार के दोनों पुरुष डॉक्टर हैं, एक तो स्त्री विशेषज्ञ भी है। दो डॉक्टरों वाले घर में एक भी सहायक का न होना ज़रा खलता है। साथ ही यहां, न तो सान्या अपने चेहरे की रेखाओं को व्यक्त कर पायीं, न ही निशान्त दहिया। सान्या अपने नृत्य के प्रति दीवानगी की बात करती हैं, लेकिन एक भी मुद्रा क्लासिकल नहीं थी। सबसे बड़ी कमी जो महसूस हुई, वह यह थी कि पाक कला को कला की तरह नहीं, अपितु वस्तु के रूप में दिखाया गया। सब्ज़ियों का जो चित्रांकन मलयालम फ़िल्म में था, वह यहां नज़र नहीं आया। उत्तर भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए करवा चौथ को ज़बरदस्ती जोड़ा गया, जो महाराष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है।
इस तरह से मलयालम में एक साधारण-सी कथा विशिष्ट बन जाती है। और विशिष्ट बनी फ़िल्म हिन्दी में साधारण बन जाती है।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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नमस्ते.
बहुत कमाल की फिल्म याद दिला दी आपने. The great Indian kitchen पिछले कुछ सालों की कई फ़िल्मों के मुकाबले बहुत यादगार वाली फिल्म बनी रहेगी. आपने जितनी बातें लिखीं, खासतौर पर साधारण और विशिष्ट की तुलना एकदम सटीक लगी.
मुझे इस फिल्म का कैमरा भी हमेशा याद आता है. कितने ही सामान्य लेकिन ज़रूरी scene पर ठहराया गया था. कभी आँगन, कभी बरामदा, कभी सिंक के नीचे, कभी मेज़.
एक बात जो और ध्यान आती है कि कई फ़िल्में बहुत मुद्दे उठाकर हर मुद्दा खो देती हैं. लेकिन यह फिल्म एक घर aur परिवार के माध्यम से कितने ही सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और वित्तीय मुद्दे दर्शाती है, और हर मुद्दा सही तरीके से हमारे ज़हन में जगह बनाता है.
इस कमाल फिल्म को याद करवाने के लिए शुक्रिया.
आकांक्षा
सटीक तुलनात्मक विश्लेषण।