चुनाव, election, hasya vyangya, election cartoon, chunav
हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....

चुनाव है, खड़े होने का नहीं बैठने का मज़ा

             आप कहेंगे, चुनाव तो खड़े होने के लिए होते हैं। बिल्कुल होते हैं, पर जनाब, चुनावी गणित यूँ ही नहीं जमता। यहाँ असली खेल यह नहीं कि कौन खड़ा है, बल्कि यह है कि कौन किसे बैठा सकता है। जो जितने ज़्यादा प्रत्याशियों को अपने पक्ष में “बैठा” ले, वही असली विजेता होता है। कई नेता तो जनता से वोट माँगने से पहले ही आधे प्रत्याशी खड़े कर लेते हैं, ताकि समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में बैठा सकें। और कुछ को जानबूझकर खड़ा रहने दिया जाता है, ताकि वे विरोधी के वोट काट सकें। यह भी लोकतंत्र का एक सूक्ष्म, किंतु सशक्त गणित है।

इसी गणित के स्थायी अध्यापक हैं, हमारे मोहल्ले के बब्बन चाचा, चुनाव चाहे विधानसभा का हो, संसद का, पार्षद का या सरपंच का, चाचा हर बार खड़े मिलेंगे। ऐसे खड़े जैसे बगुला ध्यान लगाये किसी शिकार की प्रतीक्षा में खड़ा हो। बब्बन चाचा की निगाह किसी ऐसे प्रत्याशी पर टिकी होती है, जो आकर उन्हें सम्मानपूर्वक “बैठा” दे। बचपन से हमने उन्हें इसी मुद्रा में देखा है, पोस्टरों में, जुलूसों में, नामांकन के दिन, सत्ता की छोटी या बड़ी हर कुर्सी के आस-पास मंडराते हुए, मगर कुर्सी पर नहीं। और मज़े की बात ये है, उन्हें कुर्सी से कोई प्रेम भी नहीं है!

उन्हें मालूम है जीतना जोखिम भरा काम है।
सोचिए, ग़लती से जीत गये तो?
“भाभी विधायक” का तमगा हट जाएगा, और पाँच साल बाद “भूतपूर्व” का भूत पीछे पड़ जाएगा। उन्होंने कई भूतपूर्वों की दुर्दशा देख रखी है, राजनीति के खंडहरों में उल्टे चमगादड़ों की तरह लटके हुए। चाचा इतनी बड़ी भूल नहीं करेंगे।

इसलिए वे खड़े होते हैं ताकि कोई उन्हें “बैठा” दे। यह भी एक कला है, “खड़े होकर बैठ जाना।” उनकी विचारधारा पानी की तरह है, जिस रंग में डालो, उसी में घुल जाती है। राजनीति की वह मक्खी है, जो गुड़ पर भी बराबर बैठती है और… पर भी! बाक़ी आप समझदार हैं।

अब सवाल, खड़े होते ही क्यों हैं?
तो जनाब, यह भी एक व्यवस्थित व्यवसाय है, चुनाव उद्योग का एक मज़बूत सेक्टर।

लोग चुनाव जीतकर जेब भरते हैं, ये चुनाव हारकर जेब भरते हैं। एक का “सत्ता निवेश” होता है, दूसरे का “संभावना निवेश”।

चुनाव, election, hasya vyangya, election cartoon, chunav

ये राजनीति के सेंसेक्स के वे खिलाड़ी हैं, जो गिरते भावों पर भी मुनाफ़ा कमा लेते हैं।
नामांकन के दिन इनका जलवा देखते ही बनता है। पूरा शहर बारात-सा लगने लगता है। घोड़े, तांगे, बाइक रैलियाँ, झंडे, नारे, ढोल-ताशे, सब कुछ फुल बब्बन चाचा के नाम। और जुलूस के बाद ये बाक़ायदा दूसरे प्रत्याशियों को अपनी “रेट-लिस्ट” भिजवाते हैं, इस सम्भावना के गणित के साथ कि कितने वोट काट सकते हैं, कितना दिला सकते हैं, पूरा गणित समझा देते हैं।

ऊपर से घोषणा, “देख लेना भाई, इस बार तो हम जीतकर ही मानेंगे!”
उन्हें भी पता, सामने वाले को भी पता, और जनता को तो सबसे ज़्यादा… यह जीतने का नहीं, “दाम बढ़ाने” का जुलूस है।

राजनीति का सीधा फॉर्मूला है, भीड़ × शोर = बैठने का भाव

महँगाई के इस दौर में चाचा ने अपनी रेट-लिस्ट भी अपडेट कर ली है, पहले जो “बैठने” का भाव था, वह बढ़कर ज़मानत ज़ब्त होने का 50 गुना हो गया है।

नामांकन वापसी की तारीख नज़दीक आते ही चाचा का मोबाइल सबसे ज़्यादा व्यस्त रहता है।

उधर से ऑफ़र, “भाई साहब, आप बैठ जाइए…”
“आप देख लीजिए, आपमें दम है तो बिठा कर दिखाइए, हाँ दाम है तो सोचेंगे।”

फिर एक-दो दिन की पार्टी, कुछ गुप्त बैठकें और अचानक प्रेस नोट, “व्यक्तिगत कारणों से नामांकन वापस ले लिया है।”

लेकिन इस बार तो बब्बन चाचा खड़े ही हुए हैं, नामंकन वापस लेने की तारीख़ निकल गयी। मोहल्ले का गजोधर चीख पड़ा, “अरे कोई बैठाओ इन्हें… ग़ज़ब बेइज़्ज़ती हो रही है यार!”

सचमुच, चाचा बेचारे इधर-उधर टहल रहे थे, मानो लोकतंत्र ने उन्हें खड़े रहने की सज़ा दे दी हो। मैंने चाचा से पूछा, “क्या हुआ, इस बार बैठे नहीं?”

वे कुटिल मुस्कान के साथ बोले, “भतीजे, इस बार खड़े रहने का अच्छा ऑफ़र मिला है!” मैं चौंका, “खड़े रहने का?” चाचा बोले, “अरे, हमारी जाति का प्रत्याशी बैठाने का कम भाव दे रहा था। दूसरे ने कहा, तुम बस खड़े रहो, पाँच हज़ार वोट भी काट दोगे तो मेरा काम हो जाएगा!”

तो जनाब, चुनाव केवल लोकतंत्र का उत्सव नहीं, रोज़गार का मेला भी है। किसी के लिए कुर्सी, किसी के लिए कमीशन और बब्बन चाचा जैसे कलाकारों के लिए, खड़े होकर भी कमाने की कला!

डॉ. मुकेश असीमित, dr mukesh aseemit

डॉ. मुकेश असीमित

हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!