
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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एक कहानी के बहाने राकेश कायस्थ की कलम से....
बफ़रिंग ट्रुथ Vs ब्रेकिंग झूठ
सच के चलने की रफ़्तार बहुत धीमी होती है लेकिन झूठ किसी महाविस्फोट से पैदा हुई आग की लपटों की तरह फैलता है। मुझे मशहूर अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन के नाम से प्रचलित एक उक्ति याद आती है, “सच जब जूते पहन रहा होता है, झूठ तब तक आधी दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है।” मार्क ट्वेन ने ऐसा कहा अथवा यह पहले से प्रचलित एक लोकोक्ति है, इस पर कुछ विवाद है लेकिन बात बिल्कुल दुरुस्त है।

हरिशंकर परसाई ने लिखा है, “सत्य को प्रचार चाहिए अन्यथा उसे झूठ मान लिया जाएगा।” प्रेमचंद की एक लाइन भी इस संदर्भ में बहुत ही मानीख़ेज़ है, “बच्चों में खेल-खेल में मिथ्या को सत्य बना देने की वैसी ही शक्ति होती है, जैसी हम बड़ों में सत्य को मिथ्या साबित करने की होती है।”
सच और झूठ के अनोखे रिश्तों पर पिछले महीने वरिष्ठ पत्रकार और सुपरिचित लेखक मुकेश कुमार की एक कहानी ‘नेशन फ़र्स्ट’ पिछले महीने पाखी पत्रिका में पढ़ी। उसके बाद से यह कहानी लगातार दिमाग़ में घूम रही है। अगर सच वास्तव में सबसे ताक़तवर होता है, तो फिर वह बार-बार क्यों हारता है? हत्यारे राजनेता लाखों की तादाद में वोट पाते हैं और शांति के लिए बरसों तक भूख हड़ताल करने वाली शर्मिला इरोम को कुल जमा 90 वोट मिलते हैं। समाज आख़िर सत्य क्यों नहीं देख पाता है?
‘नेशन फ़र्स्ट’ मौजूदा भारतीय और वैश्विक परिस्थितियों को केंद्र में रखकर लिखी गयी कहानी है। कथा नायिका अन्विता एक सीनियर मीडिया प्रोफ़ेशनल है और मानती है कि सत्य तभी बचेगा जब उसे उपभोक्तावादी भाषाई आवरण पहना दिया जाये, उसे खोजने योग्य बना दिया जाये। झूठ की बुनियाद जब छद्मामवरण है तो सत्य किसी बड़े लक्ष्य के लिए किसी आवरण का सहारा क्यों नहीं ले सकता है?
इसी दिलचस्प आइडिया को आधार बनाकर अन्विता ने कुछ इस तरह सत्य को पैकेज किया कि एल्गोरिद्म धोखा खाने लगा कि झूठ के बाज़ार में सत्य बिकने लगा। झूठ को प्रमोट करने के लिए बनाया गया साइबर तंत्र धोखे में आकर सत्य बेचने लगा तो पीछे बैठे बड़े खिलाड़ियों के होश उड़े। उसके बाद शुरू हुई पूँजी पोषित फ़ासीवादी ग्लोबल नेटवर्क और सत्य के टिमटिमाते दीये को बचाये रखने के लिए मुट्ठी भर लोगों की लड़ाई।
यह लड़ाई बहुत ही दिलचस्प है। चूहे और बिल्ली की तरह। कभी कोई आगे कोई पीछे। अटैक के बदले काउंटर अटैक। ज़बरदस्त व्यूह रचना और हमले का उतना शातिर कोई नया तरीक़ा। राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का लबादा ओढ़कर बैठे संगठित वैश्विक अपराध तंत्र और अथाह पूंजी के हाथों बार-बार रौंदे जाने के बावजूद इस कहानी में सत्य का दीया आख़िर तक टिमटिमाता ही रहता है।
यह मूलत: एक विचार प्रधान कहानी है, जिसमें किरदारों की कोई ख़ास अहमियत नहीं है। घटनाएं, स्थितियां और विचार ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। मुकेश कुमार ने इस जटिल कहानी को कहने के लिए फैंटेसी या जादुई यथार्थवाद जैसी तकनीकों का इस्तेमाल जिस कुशलता से किया है, वो इसे पठनीय और पाठक के दिमाग़ पर गहरा असर छोड़ने वाला बनाती हैं। भाषाई कसावट के बिना इतनी कांप्लेक्स कहानी आसानी से पटरी से उतर सकती थी, लेकिन मुकेश कुमार के भाषाई सधाव ने पाठक के तौर पर मुझे बांधे रखा।
भारतीय मीडिया की पतन गाथा पुरानी है। मुझे याद है आज से कोई बीस साल पहले अजित अंजुम और राजेंद्र यादव की पहल पर हंस ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर आधारित कहानियों का एक विशेषांक निकाला था। उसमें मुकेश जी के साथ एक कहानी मेरी भी थी। उसके बाद से बहुत सारा पानी बह चुका है।
2007 के आसपास का टेलिविज़न जो कर रहा था कि उसका प्रयोजन किसी भी तरह दर्शक संख्या बढ़ाकर विज्ञापन हासिल करना था। उस दौर में राजनीतिक ख़बरें टेलिविज़न पर लगभग प्रतिबंधित थीं। अंधिवश्वास और अचरज भरी अजब-गजब ख़बरों के अलावा न्यूज़ टेलिविज़न मनोरंजन पर केंद्रित थे। बिग बॉस और इंडियन आइडल में चैंपियन कौन बना, यह नौ बजे की हेडलाइन हुआ करती थी।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है वो दौर आज से कहीं बेहतर था। कम से कम जनहित से जुड़े मुद्दों पर व्यवस्थित ढंग से झूठ फैलाने का काम नहीं होता था। जाति और सांप्रदायिकता न्यूज़ रूम से दूर थे। आज टेलिविज़न और तमाम डिजिटल माध्यम एक संगठित अपराध तंत्र का हिस्सा नज़र आते हैं, जिनका उदेश्य ख़ास तरह की राजनीति को बढ़ावा देना, समाज में विभाजक रेखा गहरी करना और इस खेल में सहभागी कॉरपोरेट तंत्र के हितों की रक्षा करना मात्र है।
भारतीय मीडिया पूरी दुनिया में इसलिए अनोखा नहीं है क्योंकि वह ख़बरें छिपाता है और सत्ता तंत्र का पीआर करता है। भारतीय मीडिया की ज़्यादा बड़ी विशेषता यह है कि वह पत्रकारिता के दमन को सेलिब्रेट करता है। सांवैधानिक संस्थाओं के अपहरण पर ताली बजाता है और सवाल का जवाब न दिये जाने को मास्टर स्ट्रोक बताता है।
अपने दौर के चर्चित पत्रकार और पूर्व भाजपा नेता अरुण शौरी ने एक बड़ी मार्के की बात कही थी, “आख़िर भारतीय मीडिया के मौजूदा आचरण के पीछे क्या वजह है? क्या कारण सिर्फ़ सरकार का भय है? भय तो इमरजेंसी में भी था लेकिन उस दौरान कई आवाज़ें स्वतंत्र थी। भय से ज़्यादा बड़ी वजह लालच है। सरकार ने हड्डी फेंकी और सबके मुँह बंद हो गये।”
इज़रायली प्रतिरक्षा तंत्र आयरन डोम की पूरी दुनिया में चर्चा है। आयरन डोम वह प्रणाली है जो किसी भी मिसाइल अटैक को हवा में बेअसर करने के लिए पहचाना जाता है। भारतीय मीडिया ने सत्ता तंत्र के लिए आयरन डोम की भूमिका अख़्तियार कर ली है। यह बात समझने के लिए किसी गहरी दृष्टि की ज़रूरत नहीं है। आप शाम को टीवी खोलिए, आपकी समझ में आएगा कि जो भी बात लोक-विमर्श में बड़ी बनती जा रही है, उसे काउंटर करने के लिए कॉरपोरेट मीडिया अपना नैरेटिव लेकर आएगा।
मीडिया संस्थानों का काम जनहित से जुड़ी सूचनाएं नागरिकों तक पहुंचाने का है। इसीलिए सरकार ने उन्हें ब्रॉडकास्ट लाइसेंस और दूसरी ज़रूरी सहूलियतें दी हैं। लेकिन तमाम मीडिया संस्थानों ने न्यूज़ गैदरिंग की व्यवस्था को ध्वस्त किया है। रिपोर्ट्स की संख्या घटायी गयी है और उनकी जगह ऐसे इंफ्लुएंसर ने ले ली है, जिन्हें मीडिया की भाषा में एंकर कहा जाता है।
आज से दो दशक पहले तक पत्रकार बनने की जो सामान्य अहर्तताएं थीं, यानी कॉपी लिखना, बेहतर अनुवाद कर पाना और सामान्य ज्ञान के टेस्ट में उत्तीर्ण होना, उस कसौटी पर कसा जाये तो ज़्यादातर प्राइम टाइम एंकर फेल हो जाएंगे। लेकिन उनके पास यह तय करने की ताक़त है कि आज शाम किसी भी मुद्दे पर देश क्या सोचेगा। अब ख़बरें नहीं दिखायी जातीं बल्कि तमाशे से भरे ऐसे पक्षपातपूर्ण डिबेट किये जाते हैं, जिसका लाभ सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्ता तंत्र को हो।
संपादक नाम की संस्था दम तोड़ चुकी है। बीस-पच्चीस साल के अनुभव वाला अगर कोई व्यक्ति न्यूज़रूम में हो तो आप उससे सवाल पूछिए कि आपके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? इसके जवाब में आपको यूपीएकालीन किसी घटना या स्टिंग ऑपरेशन का ज़िक्र करेगा। इसका सीधा मतलब है कि पत्रकारिता आप उसी वक़्त तक कर पाये, जिस वक़्त सरकार ने आपको करने दी।
कोलकाता का टेलीग्राफ़ एक बहुत आक्रामक अख़बार माना जाता था, जिसने केंद्र सरकार की नीतियों पर लगातर कड़े सवाल पूछे और अपनी रचनात्मक हेडलाइन्स की वजह से भरपूर सुर्ख़ियां बटोरीं। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ रातो-रात इस अख़बार के सुर बदल गये। इससे यह समझ में आता है कि भारतीय पत्रकारिता लाभ के लिए चलने वाले एक व्यावसायिक उपक्रम के सिवा कुछ भी नहीं है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में संपादक नाम की संस्था अब दिवंगत हो चुकी है और पूरी ताक़त इंफ्लुएंसर सरीख़े एंकर्स के हाथ में है। मीडिया संस्थान अपनी नैतिक शक्ति हो चुके हैं और इसका नुक़सान इस देश की भावी पीढ़ियों और लोकतंत्र को भुगतना पड़ेगा। एक बार जब आपने अपनी कलम गिरवी रखकर पांव में घुंघरू बांध लिये तो फिर जो सत्ता में आएगा आपको वही नचवाएगा।
वैकल्पिक मीडिया की तरह उभरी यूट्यूब पत्रकारिता का भी तेज़ी से क्षरण हो रहा है। सरकार समर्थक और सरकार विरोधी दोनों क़िस्म के जनसमूह अपने आप में एक क़िस्म का बाज़ार है और इस बाज़ार का लाभ उठाने के लिए कंटेट बनाये जा रहे हैं। मक़सद सच लोगों को तक पहुंचाना नहीं बल्कि एक तरह से अपनी दुकान चलाना रह गया है।

ऐसे में सत्य के वास्तविक आग्रही क्या करें? सच को प्रचार तो चाहिए लेकिन प्रचार ढूंढने निकला सत्य कब अर्धसत्य में बदल जाये यह कहना कठिन है। सत्य का एल्गोरिद्म एक विचारोत्तेजक आइडिया है, जो मुकेश कुमार की कहानी से निकलकर आता है लेकिन ये आइडिया सवालों के जवाब नहीं देता क्योंकि असल में जवाब कहीं है नहीं। असंख्य सवाल हैं और इनके चक्रव्यूह में सत्य का आग्रही अभिमन्यु की तरह अकेला है।
(मुकेश कुमार की कहानी के साथ छपा यह रेखांकन ‘पाखी’ से साभार)

राकेश कायस्थ
पेशे से पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रोफेशनल राकेश कायस्थ ने लेखन की लगभग हर विधा में कलम चलायी है। व्यंग्य संग्रह 'कोस-कोस शब्दकोश', फ़ैंटेसी नॉवेल 'प्रजातंत्र के पकौड़े' और उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज़' चर्चित कृतियां हैं। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'ओपन' ने 'रामभक्त रंगबाज़' को 2022 की दस सर्वश्रेष्ठ भारतीय किताबों की सूची में शामिल किया। किताब का अंग्रेज़ी अनुवाद 'आरामगंज 1990' से लोकप्रिय हुआ। साहित्यिक लेखन से इतर ऑडिबल के लिए 'दिल लोकल' और 'टुकटुक की कहानियां' जैसे ऑडियो बुक और लोकप्रिय टेलिविज़न शो 'मूवर्स एंड शेकर्स' की स्क्रिप्टिंग भी खाते में दर्ज है।
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