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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

प्रकृति अनावश्यक कुछ नहीं करती

             बचपन में एक बार कड़वा खीरा खा लिया और मुंह खराब हो गया। फिर बहुत ग़ुस्सा आया था। आख़िर ये फ़ालतू चीज़ें प्रकृति में बनती ही क्यों हैं? अब जब थोड़ी समझ बढ़ी तो लगा कि प्रकृति अत्यंत कुशलता और गहन बुद्धिमत्ता के साथ कार्य करती है।

उदाहरण के लिए कुछ पौधों को ही लेते हैं। पादप जगत में कुछ भी व्यर्थ या बिना उद्देश्य के नहीं बनाया जाता। हर कड़वा स्वाद, जलन पैदा करने वाले तत्व, तीखा दंश या विषैला प्रभाव एक स्पष्ट उद्विकास के लक्ष्य की पूर्ति करता है। मुख्य रूप से शाकाहारी जानवरों, कीटों, रोगजनकों और प्रतिस्पर्धी पौधों से रक्षा, लेकिन उसका लाभ मानव को भी होता है या हो सकता है अगर उसे सही तरीक़े से उपयोग में लाया जाये।

प्रकृति की रसायनशाला, खाद्य पदार्थों का रासायनिक विश्लेषण, food analysis

विज्ञान भी इस दिशा में कार्य कर रहा है और कुछ सफलता भी मिली है। अब जबकि विकास के नाम में प्रकृति का भरपूर दोहन हो रहा है [इर्रिवर्सिबल डैमेज=अनुत्क्रमणीय नुक़सान] हो रहा है तो यह चर्चा सार्थक हो जाती है कि कितना हम ले सकते हैं प्रकृति से और हम क्या खोएंगे, क्या पाएंगे।

प्रकृति का कड़वा सच ऐसे समझें

जिन पादप यौगिकों (phyto-compounds) को मनुष्य अक्सर “अप्रिय” या “अनचाहा” मानते हैं, वे लाखों वर्षों में परिष्कृत हुए परिष्कृत रासायनिक हथियार हैं। लेकिन इन्हीं अणुओं को जब अध्ययन, प्रसंस्करण और बुद्धिमानी से उपयोग किया जाता है, तो ये चिकित्सा, उद्योग, पोषण और स्थिरता के शक्तिशाली समाधान बन जाते हैं।

  1. काजू का उदाहरण लें। इसके बाहरी छिलके में एनाकार्डिक एसिड और कार्डोल जैसे शक्तिशाली फेनोलिक यौगिक होते हैं, जो अत्यधिक caustic (जलन पैदा करने वाले) और vesicant (फफोले पैदा करने वाले) हैं। ये लंबे संपर्क में गंभीर त्वचा जलन, खुले घाव और ऊतक क्षति का कारण बनते हैं। ये यौगिक अपनी amphiphilic प्रकृति के कारण कार्य करते हैं— फेनोलिक रिंग और लंबी अल्काइल साइड चेन सेल झिल्लियों को बाधित कर सीधी रासायनिक जलन या क्षरण पैदा करते हैं। असल में ये जानवरों और कीटों को दूर रखने के लिए विकसित हुए हैं। छिलका हटाकर और दाने को ठीक से भूनने या स्टीम करने के बाद यह खाने योग्य भाग सुरक्षित और पोषक तत्वों से भरपूर हो जाता है। छिलके का तरल (CNSL) रेजिन, कोटिंग्स और ब्रेक लाइनिंग में उपयोग होता है, जबकि शोध बताते हैं कि एनाकार्डिक एसिड हिस्टोन एसिटाइलट्रांसफरेज (HATs) जैसे एंज़ाइम्स को रोककर एंटीमाइक्रोबियल और एंटीकैंसर प्रभाव दिखाते हैं। इसमें अभी और गहन शोध की आवश्यकता है।
  2. खीरा इस सिद्धांत को और सुंदर ढंग से दर्शाता है। तनावग्रस्त खीरों में कड़वाहट क्यूकरबिटेसिन नामक अत्यधिक ऑक्सीजनयुक्त टेट्रासाइक्लिक ट्राइटरपेनॉइड्स से आती है। ये इतने तीव्र कड़वे होते हैं कि नगण्य मात्रा में भी शाकाहारियों को रोक देते हैं। तनाव की स्थिति में पौधा इनका उत्पादन बढ़ाकर फल में भेज देता है— जो एक चेतावनी का संकेत है। यंत्रवत रूप से (mechanistically), क्यूकरबिटेसिन JAK/STAT3, NF-κB और mTOR जैसे महत्वपूर्ण सिग्नलिंग पाथवे को रोककर एंटीकैंसर गतिविधि दिखाते हैं। वे apoptosis (कोशिका की सुनियोजित मृत्यु) को प्रेरित करते हैं, सेल साइकल को रोकते हैं, साइटोस्केलेटन को बाधित करते हैं और विभिन्न कैंसर मॉडलों में प्रोलिफ़रेशन, इनवेजन और एंजियोजेनेसिस को रोकते हैं। साथ ही ये प्रो-इंफ्लेमेटरी मध्यस्थों को दबाकर सूजन-रोधी गुण भी प्रदर्शित करते हैं। यह पैटर्न पूरे प्रकृति जगत में दोहराया जाता है।
  3. मिर्च में कैप्साइसिन नाम का एक यौगिक पाया जाता है, जो कि TRPV1 रिसेप्टर्स (शरीर के गर्मी और दर्द सेंसर) को सक्रिय कर जलन पैदा करता है, जो स्तनधारियों को दूर रखता है। समय के साथ यह सब्स्टेंस P को कम कर नसों को desensitize कर दर्द निवारक बन जाता है… सब्स्टेंस P एक न्यूरोपेप्टिड है जो शरीर में दर्द, जलन और सूजन के संकेतों को तंत्रिकाओं (नेर्वेस) से मेरुरज्जु (spinal कॉर्ड) और मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करता है। जब शरीर को चोट, गर्मी, जलन या capsaicin (मिर्च वाला यौगिक) जैसी उत्तेजना मिलती है, तब संवेदी तंत्रिका (सेंसरी न्यूरॉन्स) इसे रिलीज़ करते हैं। यह मुख्यतः Neurokinin-1 (NK1) रिसेप्टर्स से जुड़कर दर्द के संकेतों और प्रदाह (inflammation) को बढ़ाता है। कैप्साइसिन जब TRPV1 रिसेप्टर्स को बार-बार सक्रिय करता है, तो शुरुआती जलन के बाद तंत्रिका में सब्स्टेंस P की मात्रा घटने लगती है, जिससे तंत्रिका डेसेंसिटीज़ हो जाती हैं और दर्द की अनुभूति कम होने लगती है। इसी कारण कैप्साइसिन का उपयोग कुछ दर्द निवारक चिकित्सा में किया जाता है।
  4. कड़वे बादाम में अमिग्डालिन एक साइनोजेनिक ग्लाइकोसाइड है। β-ग्लूकोसिडेज एंजाइम द्वारा टूटने पर यह हाइड्रोजन साइनाइड, बेंजएल्डिहाइड और ग्लूकोज छोड़ता है जो कि एक शक्तिशाली रक्षा तंत्र। नियंत्रित संदर्भ में इस साइनाइड रिलीज़ की कैंसर कोशिकाओं में चुनिंदा cytotoxicity के लिए जांच की गयी है (हालांकि क्लिनिकल प्रमाण सीमित हैं और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं)।
  5. अखरोट (खासकर ब्लैक वॉलनट) में जुग्लोन एक naphthoquinone है, जो allelopathic प्रभाव दिखाता है— प्रतिस्पर्धी पौधों की श्वसन और प्रकाश संश्लेषण में बाधा डालता है। यह एंटीमाइक्रोबियल और एंटीपैरासाइटिक गतिविधि रखता है। कैंसर शोध में यह mitochondrial पाथवे के ज़रिये apoptosis को प्रेरित करता है, reactive oxygen species (ROS) बढ़ाता है, सेल साइकल को रोकता है (S या G2/M फेज़) और Bax/Bcl-2 जैसे प्रोटीन को नियंत्रित करता है।
  6. कुनैन (सिनकोना छाल से) अत्यधिक कड़वा होता है। यह मलेरिया परजीवी के हीम को detoxify करने की क्षमता में बाधा डालकर उसके लिए विषैला संचय पैदा करता है। ब्रोकोली और वासाबी में ग्लूकोसाइनोलेट्स ऊतक क्षति पर isothiocyanates (जैसे सल्फोराफेन) में बदल जाते हैं। ये Nrf2 पाथवे को सक्रिय करते हैं, एंटीऑक्सीडेंट और detoxification एंजाइम्स को बढ़ाते हैं, साथ ही कैंसर कोशिकाओं में apoptosis को बढ़ावा देते हैं और सूजन कम करते हैं।

हर मामले में प्रकृति बेकार कुछ नहीं करती। ये यौगिक हमारे आराम या सुख के लिए नहीं बने; वे पौधे की सुरक्षा के लिए हैं। उनकी प्रभावशीलता—कड़वाहट, जलन या विषाक्तता—पूरी तरह संदर्भ और मात्रा पर निर्भर है। उच्च मात्रा और सीधा संपर्क नुक़सान पहुंचाते हैं। उचित प्रसंस्करण, सटीक मात्रा और लक्षित उपयोग इन्हें उपचारक या मूल्यवान संसाधन बना देते हैं। यह समझ पादप जगत के प्रति गहरी श्रद्धा जगाती है।

“अप्रिय” भागों को अस्वीकार करने की बजाय हमें उनके कार्यप्रणाली का विस्तृत अध्ययन, निष्कर्षण के तरीक़ों को अनुकूलित करने और जोखिम-लाभ का संतुलन बनाने पर ध्यान देना चाहिए। कल की कई बड़ी खोजें शायद उन्हीं यौगिकों में छिपी हैं जिन्हें हम आज कड़वा, जलाने वाला या बेकार कचरा समझ रहे हैं। प्रकृति का औषधालय एक रासायनिक भाषा बोलता है। इसे बिना अतिसरलीकरण या भावुकता के द्वारा समझना यह साबित करता है कि जो बेकार लगता है, वह अक्सर सुंदर, उद्देश्यपूर्ण बुद्धिमत्ता होती है, जिसका मनुष्य की प्रतिभा द्वारा समाधानों में अनुवाद होने का इंतज़ार है।

ये सारे उदाहरण सागर में एक बूंद के समान हैं। प्रकृति की विराट् सोच को एक व्यक्ति क्या कुछ पीढ़ियों के जीवन काल में समझ पाना दुरूह है, या सत्यतः असंभव। मैंने इन उदाहरणों के माध्यम से सिर्फ़ यह प्रस्ताव देने का प्रयास किया कि प्रकृति स्वयं में सम्पूर्ण है। उसके हर आयाम को आत्मसात करना ही मानव जीवन के सिद्ध होने का भरोसा है। इसके साथ जीवन का समन्वय कीजिए। यह हमारे उन पूर्वजों ने सिद्ध किया और हम मूर्खों को जीने का मार्ग प्रशस्त किया है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

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