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प्रदीप पाराशर की कलम से....

समाज और मान की कसौ​टियां

             एक युवा सहयोगी ने सहज भाव से दो प्रश्न पूछे। पहला यह कि समाज में बड़े पद, शक्ति या प्रभाव रखने वाले लोगों को अधिक सम्मान क्यों मिलता है? और दूसरा, मज़ाक़िया अंदाज़ में उसने कहा कि सुंदर लड़कियाँ भी अक्सर धनवान या ऊँचे पद वाले व्यक्तियों को जीवनसाथी के रूप में चुनना पसंद करती हैं।

पहली नज़र में ये प्रश्न सामान्य लग रहे हैं, लेकिन मैंने विचार किया तो पाया कि ये मानव समाज की उन मूल प्रवृत्तियों से जुड़े हैं, जो आदिमकाल से ही लगभग अपरिवर्तित बनी हुई हैं। वास्तव में ये बातें केवल किसी युवा मन की जिज्ञासा नहीं, बल्कि वो प्रश्न हैं जो हर युग में मनुष्य स्वयं से पूछता रहा है, समाज आख़िर किसे सिर पर बिठाये रखता है और क्यों?

इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमें केवल प्रकृति और स्वयं मनुष्य के विकासक्रम को देखना है।

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विज्ञान बताता है मानव विकास के प्रारंभिक चरणों में शरीर पर घने बाल थे और पूँछ जैसी संरचना भी थी। समय के साथ जब उनकी उपयोगिता नहीं रही तो प्रकृति ने उन्हें शरीर का अंग भी न रहने दिया। आज न तो शरीर पर वैसे घने बाल हैं और न ही पूँछ। प्रकृति का यह नियम बड़ा स्पष्ट है, जो उपयोगी है बना रहता है; जो अनुपयोगी हो जाता है, वह धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है।

अब यदि वही जीव, अर्थात मनुष्य, अपने समाज का निर्माण करता है तो क्या उससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह उपयोगिता को महत्व नहीं देगा?

शायद नहीं।

मानव समाज भी कमोबेश इसी सिद्धांत पर विकसित हुआ है। समाज कैसे बना? समाजशास्त्र में ​अनेक विद्वानों के अनेक सिद्धांत/मत मिलते हैं। एक थ्योरी के अनुसार आदिम सभ्यताओं में जो व्यक्ति सबसे अधिक शक्तिशाली था, जो शिकार कर सकता था, अपने समूह की रक्षा और संकट में नेतृत्व कर सकता था, वही सम्मानित होता था। वह समूह का प्रधान बनता था और स्वाभाविक रूप से समाज में उसका स्थान सबसे ऊँचा होता था। यानी शक्ति ही प्रतिष्ठा का आधार थी।

समय बदला, सभ्यताएँ विकसित हुईं, लेकिन सम्मान का आधार पूरी तरह नहीं बदला। केवल उसके स्वरूप बदल गये। पहले सम्मान तलवार और शारीरिक बल को मिलता था, आज ज्ञान, धन, पद, प्रभाव, सत्ता और उपलब्धियों को मिलता है, जो प्रकारांतर से बल के ही आयाम हैं। समाज आज भी उसी व्यक्ति को सर चढ़ाता है जिसे उपयोगी, सक्षम या प्रभावशाली मानता है।

यही कारण है एक सफल उद्योगपति, उच्च अधिकारी, प्रसिद्ध चिकित्सक, न्यायाधीश, वैज्ञानिक या प्रभावशाली नेता आदि को सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सम्मान प्राप्त होता है। सम्मान का इस भाव को नकारात्मक दृष्टिकोणों से ही नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में मानने वाले भी हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है, क्या सम्मान का आधार केवल उपयोगिता, धन या शक्ति होना चाहिए?

यहीं से चर्चा का दूसरा पक्ष शुरू होता है।

यदि कोई व्यक्ति समाज के लिए उपयोगी है, लोगों की सहायता करता है, रोज़गार देता है, ज्ञान बाँटता है, न्याय करता है या समाज को बेहतर दिशा देता है, तो उसे सम्मान मिलना उचित है। परंतु बड़ा वर्ग कौन सा है? जिसे हम सामान्यतया ‘सर्वसाधारण’ से संबोधित करते हैं, वो कौन लोग हैं? समाज की बड़ी आबादी इन्हीं लोगों से बनती है जो अपेक्षाकृत ग़रीब, कमज़ोर, भोले या विकास के लगभग हर पहलू से पिछड़े नज़र आते हैं। तो क्या ये सब अनुपयोगी हैं?

जब सम्मान का आधार केवल धन या पद रह जाये और चरित्र, ईमानदारी तथा नैतिकता पीछे छूट जाएँ, तब समस्या उत्पन्न होती है।

आज हम अक्सर देखते हैं एक मेहनतकश, एक ईमानदार व्यक्ति, एक समर्पित शिक्षक या एक सच्चा समाजसेवी उतना सम्मान नहीं पाता जितना एक धनी व्यक्ति प्राप्त कर लेता है। यह स्थिति केवल व्यक्तियों की नहीं, समाज की प्राथमिकताओं की कहानी भी कहती है।

समाज जिन लोगों को सम्मान देता है, अगली पीढ़ी वैसा ही बनने का प्रयास करती है। यदि सम्मान का केंद्र धन होगा, तो लोग धन के पीछे भागेंगे। यदि सम्मान का केंद्र शक्ति होगी तो लोग शक्ति प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। यदि सम्मान का केंद्र चरित्र होगा तो लोग चरित्रवान बनने का प्रयास करेंगे।

यदि आप याद करें और ध्यान दें तो प्रतिष्ठित धर्मगुरु, चिंतक, दार्शनिक, कवि, कलाकार, वैज्ञानिक आदि लगभग सभी विद्वानों ने यही तो कहा कि समाज को बदलना/सुधरना होगा।

एक और तथ्य पर ध्यान दीजिए। जब कोई बड़ा अधिकारी अपने पद पर होता है तो उसके आसपास लोगों की भीड़ रहती है। उसकी बातों को महत्व दिया जाता है। लेकिन वही व्यक्ति जब सेवानिवृत्त हो जाता है तो धीरे-धीरे वही समाज उसके प्रति उदासीन होने लगता है। इससे प्रश्न उठता है सम्मान व्यक्ति को दिया जा रहा था या उसके पद को?

यहीं मानव समाज का एक कठोर यथार्थ दिखता है, समाज में व्यक्ति या यों कहें मानव समाज में मानव ही हाशिये पर है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा: “समरथ को नहिं दोष गुसाईं।”

यह पंक्ति व्यंग्य या उलाहना ही नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान का भी वर्णन है। समाज अक्सर सामर्थ्यवान व्यक्ति की कमियों को अनदेखा कर देता है, जबकि साधारण व्यक्ति की छोटी भूल भी चर्चा का विषय बन जाती है।

अब यह कहना उचित है या अनुचित कि समाज पूरी तरह ग़लत है, यह आप विचार करें। मेरे विचार से किसी भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए उसे योग्य, सक्षम और उपयोगी लोगों का सम्मान तो करना चाहिए पर समस्या तब शुरू होती है जब योग्यता और उपयोगिता की जगह केवल धन और बाहरी प्रभावों को कसौटी बना लिया जाता है।

यदि समाज ऐसे लोगों को सम्मान देने लगे जो समाज के लिए अहितकर हैं, तो लोग भी वैसा ही बनने का प्रयास करेंगे। परिणामस्वरूप समाज धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ेगा। दुर्भाग्य से आज हम इस प्रवृत्ति को देख भी रहे हैं, जहाँ कई बार सद्गुणों से अधिक दुर्गुणों को समाज ने उच्चतर स्थापित किया हुआ है।

अब प्रश्न आप सभी के लिए है— समाज कौन है? हम सभी मिलकर ही तो समाज हैं। तो क्या हमें अपनी कसौटियों का पुरावलोकन नहीं करना चाहिए? शुरू कहां से करना है, इसके लिए एक रास्ता दो तरह से याद कीजिए। कबीर के शब्द:

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिल्या कोय
जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय

और पिछली सदी में हुए एक आध्यात्मिक/धार्मिक गुरु श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्द: हम बदलेंगे युग बदलेगा।

आप किस तरह का समाज चाहते हैं जो पूंजी, भय और निरंकुशता जैसे गुणों को सर पर बिठाये या ईमानदारी, योग्यता, साफ़ नीयत जैसे गुणों को? विचार कीजिए क्योंकि सवाल सिर्फ़ एक या कुछ युवाओं का नहीं, हम सबका है।

प्रदीप पाराशर, pradeep parashar

प्रदीप पाराशर

पेशे से वकील, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर के बाद से वकालत के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां। साहित्य में रुचि और काव्य लेखन का रियाज़ करते रहने के शौक़ीन। फ़ोटोग्राफ़ी और यात्राओं के लिए विशेष उत्साह।

1 comment on “समाज की कसौ​टियां

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