
- June 2, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
भोपाल और डॉ. बशीर बद्र का जाना
भोपाल की इस ऐतिहासिक और साहित्यिक सरज़मीं की यह तासीर रही है कि इसने हमेशा बड़े फ़नकारों को अपनी गोद में पनाह दी है और निखारा है। बशीर बद्र साहब ने अपने जीवन के आख़िरी तीन दशक भोपाल की आबो-हवा में गुज़ारे। जब हम बशीर बद्र के अवदान को देखते हैं, तो स्वतः ही भोपाल के उन समकक्ष और समकालीन दिग्गजों की याद हो आती है, जिन्होंने अपने-अपने दौर में शब्दों की हुकूमत चलायी।
एक तरफ़ दुष्यंत कुमार ने इसी भोपाल की ज़मीन से हिंदी गज़ल को आम आदमी के ग़ुस्से और व्यवस्था के ख़िलाफ़ तल्ख़ी का हथियार बनाया और कहा, ‘सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए’, दूसरी तरफ़ शरद जोशी ने अपने तीखे और बेबाक व्यंग्य से सत्ता और समाज की विसंगतियों की धज्जियां उड़ा दीं।
जहाँ दुष्यंत की गज़ल में इंक़लाब की तड़प थी और शरद जोशी के लेखन में समाज को आईना दिखाने वाला अचूक तंज़ था, वहीं बशीर बद्र ने इस त्रिवेणी में अपनी बेहद मखमली, रूमानी और सीधे दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल का रंग घोला था।
इन महान रचनाकारों की उपस्थिति ने भोपाल को अदब का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बना दिया, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती। बशीर साहब के जाने से भोपाल की साहित्यिक थाती का एक और विशाल स्तंभ ढह गया है। और उनके जाने के बाद अगर ये ख़बरें तथ्यात्मक हैं कि उनकी अंतिम विदाई में भोपाल को जिस तरह शरीक होना चाहिए था, नहीं हुआ, तो यह वाक़ई दुखद है। भोपाल का साहित्यिक व सांस्कृतिक माहौल कठघरे में आ जाता है।
डॉ. बशीर बद्र केवल पन्नों पर लिखे जाने वाले शायर नहीं थे, वे मुशायरों की जान और महफ़िलों की धड़कन थे। उन्होंने उर्दू अदब को जो मिज़ाज और रूमानी शिद्दत दी, उसका कोई दूसरा सानी नहीं है। उनका काव्य हिंदी और उर्दू की भोपाल की साझी तहज़ीब का ऐसा अनमोल दस्तावेज़ है, जो पीढ़ियों तक इंसानी दिलों को आपस में जोड़ने का काम करता रहेगा।
बशीर बद्र जी के साथ उनके एक युग का अंत, हुआ है पर उनकी किताबें और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी। उर्दू अदब के इतिहास में, शायरी की दुनिया को अपनी सादगी से रोशन करने वाले अज़ीम शायर, पद्मश्री से सम्मानित डॉ. बशीर बद्र ने गत 28 मई 2026 को 91 वर्ष की आयु में भोपाल में अपनी अंतिम सांस ली। शब्दों का प्रणाम।
बशीर बद्र साहब की विदाई के ग़मगीन मौक़े पर उनकी ही लिखी पंक्तियां आज हमारी भावनाओं को ज़बान दे रही हैं। ज़िंदगी के फ़लसफ़े और इसके आख़िरी पड़ाव को उन्होंने बरसों पहले जिस ख़ूबसूरती से पिरोया था, वह आज पूरी तरह मौज़ूं है:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये
बशीर साहब जाते-जाते हमारे पास अपनी यादों और ग़ज़लों के ऐसे चिराग़ छोड़ गये हैं, जिनकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ेगी।
बशीर साहब का जाना एक जिस्म का रुख़सत होना नहीं, बल्कि उर्दू गज़ल के उस सुनहरे दौर का अवसान है जिसने शायरी को महलों और दरबारों से निकालकर आम आदमी की दहलीज़ पर ला खड़ा किया था।
अयोध्या की सरज़मीं पर जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल कर प्रोफ़ेसर बने बशीर बद्र ने ताउम्र शब्दों की साधना की। उन्होंने भारी-भरकम और जटिल उर्दू अल्फ़ाज़ के बजाय आम बोलचाल की ज़ुबान को अपनी ग़ज़लों का ज़ेवर बनाया। यही वजह है कि उनकी शायरी सीधे रूह में उतर जाती है।
उनके सफ़र का थमना हमें उनकी उस बेहद मशहूर गज़ल की याद दिलाता है, जिसे फ़िल्म मसान में भी बेहद शिद्दत के साथ इस्तेमाल किया गया था:
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
बशीर बद्र जी मानवीय संवेदनाओं और मोहब्बत के अमर हस्ताक्षर थे। उनकी शायरी की सबसे बड़ी ताक़त यह थी कि वे हर दिल के जज़्बात को बख़ूबी शब्द देना जानते थे। समाज का दर्द हो, मोहब्बत की कशिश हो या फिर इंसानी रिश्तों की मजबूरियां, उन्होंने हर रंग को अपनी कलम से मुकम्मल किया।
आइए, अदब के इस उस्ताद के कुछ और चुनिंदा और बेहद मक़बूल शेरों के ज़रिये उनके फ़न को याद करें। सभी सोशल मीडिया और छिटपुट सभाओं इस तरह उन्हें याद कर ही रहे हैं और हमेशा करते रहेंगे। यहां उनके कुछ यादगार अशआर:
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझको चाहेगा
दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों
शायर कभी मरते नहीं, वे अपने शेरों के ज़रिये कायनात के हर ज़र्रे में हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। बशीर साहब भले ही आज हमारे बीच जिस्मानी तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन दुष्यंत और शरद जोशी की तरह वे भी अपने कालजयी शब्दों के ज़रिये भोपाल की फ़िज़ाओं में, यहां के तालाब में बनते उनके अक्स में हमेशा के लिए रचे-बसे रहेंगे। उर्दू अदब के इस बेताज बादशाह को अश्रुपूर्ण और कोटि-कोटि श्रद्धांजलि।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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