
बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने की सियासत
आब-ओ-हवा, भोपाल | नाम बदले जाने की सियासत पिछले एक दशक से लगातार चर्चा में बनी ही रही है। 1970 में भोपाल में विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी और इसी भोपाल विश्वविद्यालय को 1988 में बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय नाम मिला था, जिसे अब 2026 में बदले जाने की राजनीति चर्चा में है। कार्यकारी परिषद ने नाम बदलकर वागदेवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है।
9 जून को हमने बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट देखी] तो पता चला कि होम पेज पर उस शख़्स की तस्वीर या कोई जानकारी नहीं है, जिसके नाम पर, जिसकी याद में इस यूनिवर्सिटी का नाम है। एक अलग पेज ‘अबाउट प्रो. बरकतुल्लाह’ पर क्लिक करके आप उनकी संक्षिप्त जीवन परिचय देख सकते हैं।

दअरसल मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली एक स्वतंत्रता सेनानी और ‘स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री’ थे, क्योंकि उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों, विशेष रूप से राजा महेंद्र प्रताप के साथ मिलकर, 1915 में काबुल में भारत की पहली ‘निर्वासित सरकार’ की स्थापना की थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज भोपाल के इस गौरवशाली व्यक्तित्व का नाम हटाये जाने के पर्याप्त कारण भी अब तक स्पष्ट तौर से सामने नहीं आये हैं।
मौलाना बरकतुल्लाह के बारे में भी आपको यहां कुछ ज़रूरी बातें बताएंगे, इससे पहले नाम बदलने की राजनीति के ख़िलाफ़ छात्रों के एक समूह के विरोध प्रदर्शन के बारे में भी जानिए।
एसएफ़आई (स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया) के छात्रों ने प्रदर्शन के दौरान आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा व्यवस्था की कमियों से ध्यान भटकाने के लिए विश्वविद्यालय का नाम बदलने का मुद्दा उठा रही है। इन छात्रों के हवाले से आ रही ख़बरों की मानें तो विश्वविद्यालय के भीतर स्कॉलरशिप व फ़ंड आदि से जुड़े भ्रष्टाचार के साथ ही नीतियों और व्यवस्था संबंधी अनेक समस्याएं बनी हुई हैं। इन पर ध्यान न जाये और चर्चा न हो, इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन नाम बदलने का कार्ड खेल रहा है ताकि सारा विचार विमर्श राजनीति पर केंद्रित हो जाये।
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था विश्वविद्यालय में शिक्षा, शोध, आधारभूत सुविधाओं और विद्यार्थियों से जुड़ी समस्याओं के समाधान पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नारेबाज़ी के बाद एसएफ़आई ने यह मांग भी रखी कि सरकार नाम बदलने के बजाय विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान दे।
क्यों अहम हैं बरकतुल्लाह?
“मौलाना बरकतउल्ला ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित किया और वह विदेश दर विदेश कोशिशें करते रहे। जापान से लेकर इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, रूस और अफ़गानिस्तान तक, उन्होंने कई देशों का सफ़र किया और भारत की आज़ादी के लिए समर्थन जुटाने, गठबंधन बनाने जैसे प्रयास किये। 1927 में अंतिम सांस भी उन्होंने अमेरिका में ही ली। शायद यही वजह रही कि भारत में उनकी कोशिशों और संघर्षों को लेकर बहुत जागरूकता या पर्याप्त सूचनाओं के प्रसार का अभाव रहा। हालांकि उनके संघर्षों को एक सम्मान तब मिला, जब 1988 में उनके गृहनगर में विश्वविद्यालय का नामकरण उनके नाम पर किया गया, यह एक लंबे समय के क़र्ज़ से उबरने जैसा था”। यह बात इंडियन एक्सप्रेस की रपट में चमन लाल के हवाले से दर्ज है, जो दिल्ली स्थित भगत सिंह अभिलेखागार एवं संसाधन केंद्र के मानद सलाहकार और जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हैं।
लाल का कहना यह भी है कि विश्वविद्यालय का नाम बदलने के बजाय, बरकतुल्लाह की विरासत को लोकप्रिय बनाने के लिए और अधिक प्रयासों की ज़रूरत बनी हुई है। और यह बात इसलिए भी ठीक है क्योंकि भोपाल में रहने वाले, पढ़ने वाले अधिकतर लोग उनकी शख़्सियत और उनके अंजाम दिये गये कारनामों के बारे में न के बराबर ही जानते हैं।
काबुल में सरकार, लेनिन से मुलाकात
एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अंशों के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, बरकतुल्लाह और उनके साथियों ने जर्मनी की यात्रा की। जर्मनों द्वारा बंदी बनाये गये भारतीय सैनिकों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक सेना बनाने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया। उन्होंने लाला हरदयाल द्वारा 1913 में स्थापित गदर पार्टी के लिए भी प्रमुखता से काम किया, जो सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहती थी।
फिर 1 दिसंबर 1915 को काबुल में ‘भारत की अंतरिम सरकार’ बनी। चार साल बाद, इस ‘सरकार’ के नेता मॉस्को गये ताकि सोवियत रूस के राष्ट्राध्यक्ष व्लादिमीर लेनिन से मिल सकें। रूस में बरकतुल्लाह ने बयान दिया, “मैं न तो कम्युनिस्ट हूँ और न ही समाजवादी, लेकिन मेरे राजनीतिक कार्यक्रम में एशिया से अंग्रेज़ों को बाहर निकालना शामिल है। मैं यूरोप द्वारा एशिया के पूंजीकरण का कट्टर विरोधी हूँ, जिसके प्रमुख प्रतिनिधि अंग्रेज़ हैं। इस मामले में मैं कम्युनिस्टों के समान हूँ, और इस संदर्भ में हम स्वाभाविक सहयोगी हैं,” जैसा कि ऊपर उल्लिखित भारतीय इतिहास कांग्रेस पत्रिका में उद्धृत है।
प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की जीत के बाद, भारतीय क्रांतिकारियों की योजनाओं को भारी झटका लगा। हालांकि, बरकतुल्लाह अपने उद्देश्य के लिए काम करते हुए ब्रुसेल्स, स्विट्जरलैंड, फ्रांस आदि की यात्रा करते रहे।
“देश के भीतर रहकर काम करने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों के विपरीत, बरकतुल्लाह ने अपना अधिकांश जीवन निर्वासन में बिताया। वे दुनिया भर के उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों से जुड़े और अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण भारतीय क्रांतिकारियों में शुमार हुए। मुस्लिम जगत में चल रहे प्रतिरोध के प्रयासों से प्रेरित होकर, उनका मानना था न्याय एक वैश्विक मुद्दा है और भारत की स्वतंत्रता उस व्यापक संघर्ष का ही हिस्सा है।” यह बात अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में इतिहास के प्रोफ़ेसर अली नदीम रेजावी ने कही।
1927 में, ख़राब सेहत के बावजूद, वे ग़दर पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होने अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया गये। यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें सैक्रामेंटो में दफ़नाया गया, जहां अंत तक राजा महेंद्र प्रताप उनके साथ रहे।
रेजावी और चमन लाल दोनों ने इस पर ज़ोर दिया कि केंद्र सरकार राजा महेंद्र प्रताप को लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रही है तो उनके क़रीबी सहयोगी होने के नाते बरकतुल्लाह भी उसी सम्मान के हक़दार हैं।
(चित्र परिचय: विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर बरकतुल्लाह के परिचय का स्क्रीनशॉट)
