
- June 8, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
गीत अब — मनोज जैन मधुर
1.
हर टीपकार का
धन्यवाद।
जो मुझसे घोर असहमत हैं
हां थोड़े-थोड़े सहमत हैं
या फिर पूरे घटनाक्रम पर,
आये हैं देने मुझे दाद
हर टीपकार का
धन्यवाद।
यह खेल नहीं जो खेला है
दुनिया दो दिन का मेला है
प्यादा वज़ीर ना बादशाह,
मैं चिंतन को दे रहा खाद
हर टीपकार का
धन्यवाद।
मुझमें विचारधारा बहती
संताप सदी का जो सहती
कुछ आकर गले लगाते हैं,
कुछ कहकर जाते नामुराद!
हर टीपकार का
धन्यवाद।
सच को सच कहना आदत है
यह सबसे बड़ी इबादत है
बेशक तुम पालो शत्रुभाव,
सच बोलूंगा मैं निर्विवाद
हर टीपकार का
धन्यवाद।
हद में रह अनहद सुनता हूँ
मैं हर पल जीवन चुनता हूँ
प्रासंगिक था सब बोलेंगे,
मेरे जाने के ठीक बाद
हर टीपकार का
धन्यवाद।
2.
सूरज उठकर बाँधा,
करते
रोज़ सुबह रूमाल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में
बहुत प्यार है वैसे इनको
सागर झील किनारों से
करते रहते, जी भर बातें
सूरज चाँद सितारों से
फाँस रखी हैं कई
तितलियाँ
नयनों के संजाल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं!
रहते हैं करनाल में
इन्हें भरम है पूरी दुनिया
इनके बल पर चलती है
लेकिन इनकी दाल सबल के
आगे कभी न गलती है
काले दिल के पके
हुए फल धँसे पेड़ की छाल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में
सारी चालें दाँव पैंतरे
गिरगिट इनसे सीख रहे
अंदर से हैं बहुत हरामी
संत सरीखे दीख रहे
मंच मिलें तो पड़
जाते हैं
डिम्पल इनके गाल में
कविवर मथुरा
में जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में।
हाथ साफ़ कर लेने भर को
कर लेते हैं शायरी
ख़तो-क़िताबत वाली जाने कब
लिख डाली डायरी
छुपा हुआ ख़ूंख़्वार
भेड़िया
मढ़ी भेड़ की खाल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में।
संपादक क्या ऐसे वैसे
पूरे रँगे सियार हैं!
छैल-छबीली सूरत जिनकी
उनके ही ये यार हैं
पैदा करते
लाल बुझक्कड़
चार नये दो साल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में।
हाथ मिलाना इनसे भाई
खुद को ज़रा संभालकर
ख़ुश होने की फ़ितरत इनकी
पगड़ी बँधी उछालकर
सोच रहा हूँ कह दूँ
सबसे
काला है कुछ दाल में
कविवर मथुरा में
जन्मे हैं
रहते हैं करनाल में।
3.
नदिया निर्झर सरवर सूखे
धरती जलती है
मौसम वाली गरम कड़ाही
जमकर तलती है
नागिन-सी फुफकार रही है
बैरिन दोपहरी
पता नहीं है कौन देश में
छाया जा ठहरी
मन बहलाने वाली ठंडी
हवा न चलती है।
सूरज का आतंक कहें क्या
जग को जला रहा?
अपनी कौन बिसात धधक-
कर लोहा गला रहा
दिशा-दिशा फुफकार रही है
आग उगलती है।
धूल भरी आँधी चुड़ैल-सी
पीछे पड़ जाती
गर्म हवा आँखें तरेरकर
चाँटे जड़ जाती
ऐसे कैसे जिएं बताओ
जान निकलती है।

मनोज जैन मधुर
समकालीन हिंदी काव्य जगत में चर्चित नवगीतकार। लगभग आधा दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित। नियमित प्रकाशन और अनेक पुरस्कार/सम्मान। कुछ साहित्यिक संस्थाओं एवं आनलाइन काव्य समूहों आदि का संचालन। पेशे से फार्मा व्यवसाय से संबद्ध लेकिन साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में विशेष रुचि।
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