
- June 11, 2026
- आब-ओ-हवा
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व्यंग्य विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
सेंसस-2026 के लिए नये वर्ग संघर्ष के कॉलम
जब समाज का सॉफ्टवेयर अपडेट होता है, तो वर्ग-संघर्ष भी पुराने वर्जन को छोड़कर सीधे क्लाउड पर चले जाते हैं।
एक ज़माना था जब लोग कुल, गोत्र और जातियों के दलदल में लाठियां भांजते थे, लेकिन आज का नया भारत मॉडर्न हो चुका है। संघर्ष के बिलकुल नये, चमचमाते और डिजिटल पैरामीटर सेट कर चुका है। अब पुरानी वर्ण व्यवस्था किसी कबाड़खाने में पड़ी ज़ंग लगी मशीन जैसी लग रही है क्योंकि अब देश की अस्मिता इस बात से तय नहीं होती कि आप किस कुल में पैदा हुए, बल्कि इस बात से कि नेशनल टेलीविज़न पर आपको “दो कौड़ी” का कहा गया है या फिर वातानुकूलित कोर्ट की खिड़की से आपको कॉकरोच की तरह रेंगते हुए देखा जा रहा है।
सरकारी नौकरियों का सूरज धीरे-धीरे अस्त हो चुका है, इसलिए आरक्षण की वो पुरानी, तीखी और कड़वी बहसें भी कड़ाही पनीर की ख़ुशबू में विलीन हो चुकी हैं, जहां आरक्षित और अनारक्षित दोनों ही वर्ग अब एक ही प्राइवेट कंपनी के काउंटर पर अपने सीवी लेकर डिलिवरी बॉय या एजेंट बनने के लिए कतार में खड़े हैं।

इस नये दौर के समाजशास्त्रियों को अगर देश का नया वर्गीकरण करना हो, तो उन्हें पुराने सेंसस के पन्नों को फाड़कर फेंकना होगा।
जनगणना अधिकारी, किसी के घर का दरवाज़ा खटखटाता है और पुराना सवाल पूछने के बजाय सीधे मुद्दे पर आता है कि हुज़ूर, यह बताइए कि आप इस देश के सजग, संघर्षशील नागरिक हैं या फिर किसी आलीशान चैनल की नज़र में दो कौड़ी के यूट्यूबर और उनके दर्शक हैं। आपके घर में कितने कॉकरोच हैं? और कितने दो कौड़ी के लोग?
आज इज़्ज़त इस बात की नहीं कि आपके पास कितनी ज़मीन है, कौन सी कार है, वह तो सबको पता है कि ईएमआई पर ली जाती है।
महत्व इस बात का है कि आपका स्क्रीन टाइम कितना है। यदि आप हाथ में चॉक और डस्टर लेकर या डिजिटल बोर्ड पर लाखों ग़रीब बच्चों को परीक्षा पास करने का हुनर सिखा रहे हैं, तो बड़े एलीट क्लास की नज़र में आपकी क़ीमत दो कौड़ी की है।
अगर आप टीआरपी की अंधी दौड़ में चीखते हुए पूरे देश को कॉकरोच समझ रहे हैं, तो आप ख़ुद को एलीट क्लास का स्वयंभू शहंशाह मान सकते हैं।
यह वर्ग संघर्ष इतना दिलचस्प है कि इसमें बंदूक़ें नहीं चलतीं, बल्कि हैशटैग और व्यूज़ के एक्स तीर चलते हैं।
जहां एक तरफ़ करोड़ों की भीड़ अपने गुरुओं के सम्मान में मोर्चा खोले बैठी है और दूसरी तरफ़ पारंपरिक मीडिया अपनी ढहती साख को बचाने के लिए चैट जीपीटी पर नये-नये विशेषण ढूंढ रहा है।
जनगणना के न्यू फ़ॉर्म में जब आप थोड़ा आगे बढ़ें, तो आपको एक और ख़ामोश लेकिन बेहद जानलेवा युद्ध दिखायी देगा, जिसे जेन-ज़ी बनाम बूमर्स का नाम दिया जा सकता है। यह एक ऐसा विभाजन है, जिसके सामने पुरानी तमाम दीवारें छोटी पड़ जाती हैं। एक तरफ़ वो पीढ़ी है, जो सुबह उठकर सबसे पहले चाय की चुस्की के साथ अख़बार टटोलती है और कहती है हमारे ज़माने में हमने कितनी तकलीफ़ें झेली हैं, और दूसरी तरफ़ वो नयी उम्र है, जो जीवन के किसी भी छोटे-से तनाव पर सीधे थेरेपी लेने चली जाती है, जिनका आधा जीवन सिचुएशनशिप के असमंजस में कट रहा है और जो इंस्टाग्राम रील्स के चौदह सेकंड में ब्रह्मांड का सारा ज्ञान समेट लेना चाहते हैं। इन दोनों के बीच कोई संवाद संभव ही नहीं है, क्योंकि एक वर्ग की भाषा मुहावरों से चलती है और दूसरे की मीम्स से।
सेंसस कमिश्नर को इस कॉलम में बाक़ायदा दर्ज करना होगा कि देश में कितने लोग अपनी पुरानी यादों के मलबे में वर्तमान को कोसते हुए जी रहे हैं और कितने लोग अटेंशन डेफ़िसिट के शिकार होकर हर पांच सेकंड में अपने फ़ोन का नोटिफ़िकेशन चेक कर रहे हैं।
शादियों के रजिस्ट्रेशन में भी अब जातियों का पुराना रुतबा ख़त्म हो चला है क्योंकि अब वहां असली जंग अरेंज्ड मैरिज के पारंपरिक सस्टेनेबिलिटी मॉडल्स और लव मैरिज के आधुनिक क़यामत वाले सिद्धांतों के बीच छिड़ गयी है।
यह समाज का वह नया वर्गीकरण है, जहां एक तरफ़ वो लोग हैं जो कुंडली के छत्तीस गुण मिलाकर, ख़ानदान की रज़ामंदी से मय दहेज ब्याहे गये हैं और पूरी ज़िंदगी इस भ्रम को पालने में गुज़ार देते हैं कि बिना किसी ख़ास लगाव के भी बर्तनों को बिना खड़काये ज़िंदगी काटी जा सकती है।
दूसरी तरफ़ वो क्रांतिकारी प्रेमी जोड़े हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया से लड़कर, सात जन्मों के वादे करके आनलाइन लव मैरिज की है। जाति, धर्म और भूगोल की सीमा से पार जाकर आशियाना बसाया है।
लेकिन अब उनका सबसे बड़ा संघर्ष दुनिया के सामने यह छुपाना है कि इतनी बेपनाह मोहब्बत के बाद भी उनके घर के भीतर रोज़ महाभारत क्यों हो रही है।
समाज अब इन दो नये ख़ेमों में बंट चुका है, जहां एक पक्ष दूसरे को देखकर मुस्कुराता है और दूसरा पक्ष पहले की बोरियत पर तरस खाता है।
जब इस नये सेंसस का फ़ाइनल डेटा देश के सामने आएगा, तो नज़ारा वाक़ई अद्भुत होगा। रिपोर्ट में लिखा होगा कि देश की साठ प्रतिशत से ज़्यादा आबादी सुबह-सुबह अपने फ़ोन की टूटी हुई स्क्रीन पर दो कौड़ी के शिक्षकों से गणित और कोडिंग सीखकर अपना भविष्य बनाने में जुटी है, जबकि बीस प्रतिशत आबादी ख़ुद को सुबह पार्क में मंहगा कुत्ता घुमाते और उसकी पॉटी काली पालीथीन में समेटते हुए, एलीट मानकर बाक़ी के अस्सी प्रतिशत को काकरोच, कीड़े-मकौड़े साबित करने के नये-नये नैरेटिव गढ़ रही है।
उसी रिपोर्ट के एक कोने में लिखा होगा देश के पंद्रह प्रतिशत युवा रील स्क्रॉल करते-करते सेंसस का फ़ॉर्म बीच में ही अधूरा छोड़कर भाग गये क्योंकि उनका ध्यान भटक गया था, और बाक़ी बचे पांच प्रतिशत लोग इस गंभीर विमर्श में व्यस्त हैं कि पारंपरिक समझौते वाली ज़िंदगी बेहतर है या रोमांटिक धोखे वाली।
वक़्त वाक़ई बदल चुका है, अब लोग अपना गोत्र नहीं, अपना ओपिनियन छुपाते हैं। पुराना संघर्ष रोटी, कपड़ा और मकान का था, जबकि यह नया संघर्ष पूरी तरह से व्यूज़, यूट्यूब और मेटा अर्निग, वैलिडेशन और वाई-फ़ाई की स्पीड पर आकर टिक चुका है, जिसे हमारे देश का नया और अपग्रेडेड वर्ग संघर्ष कहा जा सकता है। जो राजनेता इस डेटा को समझ लेंगे वे अगले चुनावी मौसम में ट्रेंड करेंगे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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