
- August 14, 2026
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सिनेमा जगत में एक ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी आज़ादी का माहौल है तो दूसरी ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी पाबंदी का। इस बीच एक निर्देशक अपनी बात पहुंचा पा रहा है। 'आज़ादी का ऑडिट' अंक में एक ख़ास रंग के सिनेमा की पड़ताल... इस स्तंभ में 21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन...
नियमित ब्लॉग (भाग-12) मानस की कलम से ...
'मुल्क' से बदलते सिनेमा का अनुभव
अनुभव सिन्हा का सिनेमा “मुद्दों का” नहीं, बल्कि “Statement (कथन) का सिनेमा” है।
“मुल्क” अनुभव सिन्हा की फ़िल्मोग्राफ़ी में केवल सांप्रदायिकता पर बनी फ़िल्म नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा में मुस्लिम किरदारों के पुनर्लेखन की एक सराहनीय शुरूआत है। लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में मुस्लिम पात्र या तो रूढ़ छवियों तक सीमित रहे—शायर, नवाब, आतंकवादी— या फिर सहायक किरदार। मुल्क इन सभी छवियों को तोड़ते हुए एक साधारण भारतीय मुस्लिम परिवार को केंद्र में रखती है, जिसकी पहचान उसका धर्म नहीं, बल्कि उसकी नागरिकता और इंसानियत है। फ़िल्म का सबसे बड़ा कथन यह है कि किसी भारतीय मुसलमान को इस देश में रहने के लिए बार-बार अपनी देशभक्ति साबित करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है।

अनुभव सिन्हा की यह फ़िल्म बताती है कि आम नागरिकों के बीच फैला अविश्वास स्वाभाविक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से निर्मित है। मुसलमान यहां एक नागरिक की तरह देखा गया है जिसकी ख़ुशियाँ, दुख, रिश्ते, संघर्ष और संवैधानिक अधिकार किसी भी दूसरे भारतीय नागरिक के समान हैं। यही दृष्टिकोण मुल्क को केवल सांप्रदायिक सद्भाव की फ़िल्म नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और समान नागरिकता की फ़िल्म बनाता है।
अनुभव सिन्हा के फ़िल्मी सफ़र को मोटे तौर पर दो कालखंडों में बाँटकर देखा जा सकता है— 2018 से पहले का अनुभव सिन्हा और 2018 के बाद का अनुभव सिन्हा। पहले दौर में वे मुख्यधारा के मनोरंजन प्रधान सिनेमा का हिस्सा थे, जबकि मुल्क (2018) के बाद उनका सिनेमा एक बिल्कुल अलग वैचारिक दिशा में मुड़ता दिखायी देता है। मुल्क, आर्टिकल 15, थप्पड़, अनेक, भीड़ और अस्सी जैसी फ़िल्में केवल कहानियाँ नहीं सुनातीं, वे समाज के सामने एक स्टेटमेंट रखती हैं। यही बयान/अभिव्यक्ति इन फ़िल्मों की असली पटकथा बन जाता है।
स्टेटमेंट का एक अनुभव
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि अनुभव सिन्हा जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे नये नहीं हैं। सांप्रदायिकता, जातिवाद, घरेलू हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार या सामाजिक असमानता सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं। यदि इन विषयों में कुछ नया है, तो वह है दृष्टिकोण। अनुभव सिन्हा उन समस्याओं को वहाँ से देखते हैं, जहाँ शायद हमारी नज़र कभी गयी ही नहीं, या जहाँ देखने से हमने जान-बूझकर परहेज़ किया। उनका कैमरा उसी भूले हुए कोण पर जाकर टिकता है, और वहीं से उनकी फ़िल्म एक कहानी से आगे बढ़कर एक सामाजिक कथन बन जाती है।
दूसरे दौर की उनकी प्रत्येक फ़िल्म का केंद्र कोई घटना नहीं, बल्कि उस घटना से निकला एक विचार है। यह विचार ही फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण संवाद बनकर सामने आता है।
यहाँ स्टेटमेंट से अर्थ है, वह बयान या प्रश्न जो किसी भी मुद्दे के विमर्श में ज़रूरी विचार है, जिसे हम नज़रअंदाज़ किये बैठे हैं।
स्टेटमेंट जैसे “न्यायालय में न्याय नहीं फ़ैसले होते हैं” (अस्सी), हमारे न्याय व्यवस्था को आड़े हाथों लेता है। सिर्फ़ किसी रेपिस्ट को सजा सुनाना न्याय नहीं है। न्याय वो सारी प्रक्रिया है, जिससे एक रेप पीड़ित गुज़रती है और जहाँ-जहाँ उसे अपना सर झुकाना पड़े, या चेहरा ढंकना पड़े, वहाँ-वहाँ उसके साथ अन्याय हुआ है।
मुल्क में मुराद अली मोहम्मद का संवाद— “हमें कोई हम और वो में बाँटे तो कैलेंडर देख लीजिए, चुनाव कब है?” (मुल्क का ये संवाद बताता है एक नागरिक या हिंदू-मुस्लिम के तौर पर हम एक-दूसरे से नफ़रत नहीं करते बल्कि इसके राजनीतिकरण की वजह से करते हैं।
आर्टिकल 15 में कहा जाता है— “हम कभी हरिजन हो जाते हैं, कभी बहुजन हो जाते हैं, लेकिन जन नहीं बन पाते।” यह संवाद भारतीय समाज की सबसे गहरी विडंबना को उजागर करता है। आर्टिकल 15 बताता है कि इंसानी ज़मीन पर खिंची रेखाएँ हमे बाँट देती हैं, किसी को छोटा तो किसी को बड़ा बना देती हैं, लेकिन इंसान नहीं रहने देतीं।
थप्पड़ का सबसे चर्चित संवाद— “सिर्फ़ एक थप्पड़ ही तो था, लेकिन मार नहीं सकते।” दरअसल घरेलू हिंसा की चर्चा नहीं करता, बल्कि सम्मान की परिभाषा बदल देता है। फ़िल्म यह नहीं पूछती कि थप्पड़ कितना बड़ा था; वह पूछती है कि किसी रिश्ते में किसी को यह अधिकार मिला ही कैसे कि वह हाथ उठा सके?
यही अनुभव सिन्हा के सिनेमा की सबसे बड़ी विशेषता है। वे समस्या की उस दुखती रग पर हाथ रखते हैं, जिसे समाज ने धीरे-धीरे भुला दिया है या उससे एडजस्ट कर लिया है। यही सामान्यीकरण उनके सिनेमा का वास्तविक प्रतिपक्ष है।
दृष्टिकोण का अनुभव
इन एंगल्स के छूट जाने की एक बड़ी वजह भी यही है कि समाज इनके साथ इतना यूज़-टू हो चुका है कि ये विचार हमारे मन में होते हुए भी हमारी अभिव्यक्ति से, मनोभाव से सिरे से ग़ायब हैं। हमने मान लिया कि जाति व्यवस्था तो है ही, (आर्टकल 15), हमने ये मान लिया कि पति-पत्नी में नोक-झोक मे पति ग़ुस्सा होता ही है (थप्पड़), हमने मान लिया कि मर्द तो मर्द है ही, घर के खाने की जगह बाहर छोले-भटूरे खा सकता है (अस्सी), हमने मान लिया कि मुस्लिम को अपनी सफ़ाई देनी पड़ती है, देश का हिस्सा दिखने के लिए (मुल्क)।

यही कारण है उनकी फ़िल्मों में नायक पारंपरिक अर्थों में हीरो नहीं है। वह न तो अकेले व्यवस्था बदल देता है और न ही क्लाइमेक्स में सारी समस्याओं का समाधान कर देता है। वह एक खोजी की तरह काम करता है। वह दर्शक की ओर से सवाल पूछता है, तथ्यों को जोड़ता है और समाज की परतें खोलता है।
मिसाल के तौर पर ‘अस्सी’ के कोणों को देखें, तो यह फ़िल्म रेप को एक बच्चे की नज़र से, एक हसबैंड की नज़र से, पीड़िता की नजर से, पड़ोसी की नज़र से, स्कूल और काम करने वाले संस्थान की नज़र से, बड़े होते स्कूल के बच्चों की नज़र से, जो बताते हैं कि हम उन्हें कैसे बड़ा कर रहे हैं, गुनहगार की नज़र से, क़ानून की नज़र से, एक स्वस्थ समाज का सपना संजो रही एक ईमानदार वकील की नज़र से, दीमक लगे सिस्टम की नज़र से, अन्याय से उपजे समाज में भरे ग़ुस्से को रिप्रेज़ेंट करते इंसान की नज़र से… इतनी नज़रों से आपके सामने आती है कि अपने ‘आज़ाद’ देश, ‘विकसित होते भारत’ की वास्तविकता को अपने भीतर ही फिर खोजने, खंगालने लगते हैं।
समाधान का बदलता अनुभव
यह दृष्टिकोण अनुभव सिन्हा को समाधान की राजनीति से अलग करता है। उनके लिए अपराधी को सज़ा दिलाना अंतिम लक्ष्य नहीं है। वे जानना चाहते हैं कि वह मानसिकता बनी कैसे? समाज किस मोड़ पर विफल हुआ? हमारी परवरिश, हमारी भाषा, हमारे चुटकुले, हमारे परिवार और हमारी चुप्पियाँ किस तरह एक अपराधी का निर्माण करने लगीं?
इसी वजह से उनका सिनेमा पत्तों पर पानी नहीं डालता, बल्कि जड़ों तक पहुँचने की कोशिश करता है। यदि पौधे को सचमुच हरा-भरा रखना है, तो पानी जड़ों में देना होगा। अनुभव सिन्हा का कैमरा भी हमेशा उन्हीं जड़ों की तलाश करता है।
उनकी फ़िल्में दर्शक को भावुक बनाकर छोड़ नहीं देतीं; वे उसे ज़िम्मेदार बनाती हैं। ‘थप्पड़’ में समाधान केवल तलाक़ या माफ़ी नहीं है। समाधान यह है कि कोई स्त्री स्वयं को किसी पुरुष के लिए कभी “फ़ॉर ग्रांटेड” न होने दे। ‘आर्टिकल 15’ का समाधान केवल क़ानून नहीं, बल्कि इंसान को जाति से पहले इंसान मानने की चेतना है। ‘मुल्क’ का समाधान केवल सांप्रदायिक सौहार्द्र नहीं, बल्कि उस राजनीति को पहचानना है जो नागरिकों को “हम” और “वे” में बाँटती है। ‘अस्सी’ याद दिलाती है कि बलात्कार केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज की असफलताओं का परिणाम है।
फ़ाइनल स्टेटमेंट
यहीं अनुभव सिन्हा का सबसे बड़ा सिनेमाई हस्तक्षेप दिखता है। वे पारंपरिक “मसीहा नायक” की अवधारणा को तोड़ देते हैं। दशकों तक भारतीय सिनेमा ने हमें यह विश्वास दिलाया कि चाहे समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंत में एक हीरो आएगा और सब ठीक कर देगा। धीरे-धीरे यह कल्पना हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा बन गयी। हम सामाजिक बदलाव की ज़िम्मेदारी स्वयं लेने के बजाय किसी नेता, किसी नायक या किसी सुपरहीरो का इंतज़ार करने लगे।
झकझोरना पड़ेगा ज़मीर-ए-अवाम को
अब कुछ नहीं मिलेगा सियासत को कोसकर
जैसे भवेश दिलशाद का यह स्टेटमेंट मैं इसी स्थिति का प्रतिपक्ष पाता हूं। अनुभव सिन्हा का सिनेमा यही समझता हुआ दिखता है कि मौजूदा हालात में ‘हीरो’ या ‘मसीहा नायक’ की गुंजाइशें समाज में नहीं हैं, अब समाज ही आंदोलित होकर ख़ुद को बदल पाने की तरफ़ बढ़े तो बढ़े।
सुपरहीरो के भ्रम को तोड़ती अनुभव सिन्हा की फ़िल्मों में असली नायक पर्दे पर नहीं, बल्कि पर्दे के सामने बैठा दर्शक है। कार्रवाई हमें करनी है। अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होना हमें है। समाज को बदलने का दायित्व किसी एक का नहीं, हर नागरिक का है।
यही कारण है अनुभव सिन्हा का सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि नागरिकता के अधिकार और दायित्व का बोध कराता है। उनकी फ़िल्में हमें यह नहीं सिखातीं कि हीरो कैसे बनते हैं; वे हमें याद दिलाती हैं हीरो हर दर्शक के भीतर है यदि हर दर्शक अपने भीतर के नागरिक को जगाये। शायद यही उनके सिनेमा का सबसे बड़ा स्टेटमेंट है।

मानस
विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।
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