
गूंज बाक़ी… डॉ. जाफ़र रज़ा संपादित किताब ‘बज़्मे ज़िंदगी:रंगे शायरी’ की भूमिका फ़िराक़ गोरखपुरी (28.08.1896-03.03.1982) ने 12 अक्टूबर 1970 को ‘मैं और मेरी शायरी’ शीर्षक से लिखी थी। भाषा व काव्य की बारीकियों, संदेशों और आयामों को समझने के लिहाज़ से ये शब्द आज भी कितने प्रासंगिक हैं। फ़िराक़ की जयंती पर उनकी याद के बतौर उसी भूमिका का अंश साभार।
फ़िराक़ की शायरी के रहस्य
युनिवर्सिटी में अध्यापक का पद ग्रहण करने के बाद मुझे चुनी हुई किताबों के अध्ययन, जीवन और जीवन की समस्याओं पर मनन-चिन्तन, अपने मानसिक जीवन की पृष्ठभूमि को भरपूर बनाने, अपनी रचना और लेखन-शैली को क्रमशः अधिक विकसित करने का अवसर मिलने लगा। अँग्रेज़ी साहित्य और विश्व-साहित्य के पठन-पाठन से मेरी लेखन-शैली में प्रौढ़ता आती गयी। मुझे उर्दू कविता को अधिक रचाने और सँवारने के मौक़े हाथ आने लगे। यूँ तो युनिवर्सिटी-अध्यापक का पद ग्रहण करने से तेरह-चौदह बरस पहले ही उर्दू-काव्य रचना का अभ्यास प्राप्त करना मैंने शुरू कर दिया था। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तात्त्विक सत्य को बता देना आवश्यक समझता हूँ। मुझे, उर्दू-काव्य साहित्य में, और गद्य साहित्य में भी, अच्छी-से-अच्छी और सुन्दर-से-सुन्दर, ऊँची-से-ऊँची चीज़ें मिल चुकी थीं और मिलती रहती थीं। इन बातों के होते हुए भी मुझे मजमूई हैसियत से एक असन्तोष का आभास होता रहता था। शायद इस कारण से कि मेरे अन्दर हिन्दू विचारों और हिन्दू संस्कृति की गहरी-से-गहरी, बहुमूल्य-से-बहुमूल्य सचाइयाँ और अनुभूतियाँ विद्यमान थीं, जो उर्दू कविता में कम ही मिलती थीं। हिन्दू संस्कृति का मिज़ाज और उस मिज़ाज की ध्वनि, उर्दू कविता में कदाचित् ही मिलती थी। अलबत्ता खड़ी बोली की शैली, उर्दू कविता में बहुत रचे हुए ढंग से और रंगारंग तरीक़ों से उपलब्ध थी।
जीवन का काव्यात्मक और कलात्मक अनुभव प्राप्त करना और दूसरों तक इस अनुभव को पहुँचाना साहित्य का एकमात्र लक्ष्य है। हिन्दू संस्कृति और इस संस्कृति के मिज़ाज ने मुझे यह अनुभव कराया कि प्रेमी-प्रेमिका का सम्बन्ध, घरेलू जीवन, सामाजिक जीवन, प्रकृति के दृश्य, धरती, नदियाँ, सागर, पहाड़, लहलहाते खेत, बाग़ और जंगल, अग्नि, हवा, सूर्य, चन्द्रमा, सितारे, मौसमों का जुलूस-किसी भी ईश्वर-पैग़म्बर, धार्मिक ग्रन्थ, काबा या काशी से कहीं अधिक दिव्य और पवित्र हैं। भौतिकता के चमत्कार के अनुभव को ही मैं उच्च-से-उच्च आध्यात्मिकता महसूस करता था। जिसे हम भौतिक कहते हैं, वही दिव्य भी है और उसके अतिरिक्त कोई विचार दिव्य नहीं है। लेकिन जिस ठण्डे रूप से मैं यह बातें कह रहा हूँ अगर यही बातें इसी ढंग से मैं कविता में कहता, तो मुझे सन्तोष न होता। मैं जिन विषयों पर काव्य-रचना करना चाहता था-स्वर, ध्वनि और संकेत के सहारे उन्हें काव्यात्मक और कलात्मक बनाकर दिव्य भी बनाता था। साथ-ही-साथ ठेठ मानवता का लबो-लहजा भी अपनी कविता में मुझे पैदा करना था। कविता में बातें कहनी पड़तीं लेकिन यह भी देखना और करना होता है कि:
बात पहुँचती है कहाँ से कहाँ
ऐसा करने ही से सत्य का अधिक-से-अधिक साक्षात्कार होता है और फिर वह और अधिक रहस्यमय तथा संगीतमय बन जाता है। मुझे उस ज़मीन को, जिसे उर्दू के बड़े-बड़े कवियों ने अपने कलेजे के ख़ून से सींचकर तैयार किया था, फिर से गोड़ना और जोतना था। अपनी कविता की शैली को मुझे एक सहज सुझाव देना था। उसके साथ-ही-साथ मानवता और दिव्यता प्रदान करनी थी। जिन विषयों को मुझे वाणी देनी थी, वे अनित्य होते हुए भी अमृतपान कर चुके हैं और अमरत्व पा चुके हैं। दिव्यता, भौतिकता से पृथक् वस्तु नहीं है। यही अनुभव अनेक पहलुओं से व्यक्त करना- मेरे लिए कविता का मुख्य लक्ष्य रहा है।

साधारण-से-साधारण विषयों को सुगम-से-सुगम भाषा में और स्वाभाविक-से-स्वाभाविक शैली में इतना उठा देना कि पंक्तियों की उँगलियाँ सितारों को छू लें, यही उच्चतम काव्य-रचना है। मैं प्रकृति या परमाणुओं के अतिरिक्त आत्मा या परमात्मा के अलग और स्वतन्त्र अस्तित्व को नहीं मानता। संस्कृत काव्य में रसों का सिद्धान्त भौतिकता में निहित गुणों के अनुभव करने-कराने का ही दूसरा नाम है। देखना यही रहता है कि ये रस किन गहराइयों से निकलते हैं। क्या वे केवल होठ और जीभ को ही छू पाते हैं या हमारी चेतना के तालुओं को भी छू लेते हैं!
अब मैं एक ऐसी बात कहने का साहस करूँगा जो कुछ लोगों को शायद चकित कर दे। साहित्य बनता तो शब्दों से है, लेकिन ये शब्द जब एक नीरवता में लय-लीन हो जायें, जब शे’र विस्मृत हो जाये और उससे उत्पन्न होने वाली एक अकथनीय स्थिति पैदा हो जाये, वही स्थिति साहित्य और काव्य की सबसे बड़ी देन है। महाभारत का युद्ध तो हम कविता का सहारा लिये बिना भी लड़ सकते हैं। औद्योगिक क्रान्ति, फ़्रान्स की क्रान्ति, रूस की क्रान्ति, चीन की क्रान्ति को साहित्य और कविता का बहुत कम सहारा लेना पड़ा। महान्-से-महान् कार्य, जो संसार में हो रहे हैं, साहित्य के सहारे नहीं हो रहे हैं। साहित्य किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है। वह इतिहास का स्वयंसेवक भी नहीं है। साहित्य हमारी चेतना की वह तपस्या है, वह साधना है, जिससे हमारी विश्व या आत्मचेतना दिव्य बन जाये। चेतना-प्राप्ति किसी दूसरे उद्देश्य या लक्ष्य का साधन मात्र नहीं है बल्कि वह स्वयं अपना लक्ष्य है। बर्नार्ड शॉ ने अपने एक नाटक में उस समय का चित्रण किया है, जब मनुष्य विकास और उन्नति की अन्तिम मंज़िलों तक पहुँच चुकेगा। यहाँ पहुँचकर बर्नार्ड शॉ एक सवाल उठाता है-उस स्थिति को प्राप्त करके या उस सिद्धि को पाकर मनुष्य क्या किया करेगा? जवाब देता है कि वह जीवन कारोबारी जीवन नहीं होगा। राजनीति, अर्थशास्त्र और दौड़-धूप के कामों से वह जीवन मुक्त होगा। वह जीवन एकमात्र विचारों और अनुभवों में निमग्न रहेगा। साहित्य हमें उस कर्म और कार्य-मुक्त, बन्धनग्रसित जीवन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता है। ज्ञान-ध्यान आडम्बर नहीं है, हम भले उन्हें ज्ञान-ध्यान से रहित होकर एक आडम्बर बना दें। अपना एक शेर मुझे याद आया:
जाओ न तुम इस बेख़बरी पर कि हमारे
हर ख़्वाब से इक अह्द की बुनियाद पड़ी है
यहाँ ‘अह्द’ का मतलब ‘युग’ है। दुनिया और मानव-जाति कर्म के बन्धन ग्रहण करके आगे बढ़ती है और आगे बढ़ती जायेगी और ज्यूँ-ज्यूँ आगे बढ़ती जायेगी, कर्म हल्का होता जायेगा और कम-से-कम होकर रह जायेगा। विज्ञान और वैज्ञानिक आविष्कारों की उन्नति इसी ओर संकेत कर रही है। मशीनों ने इसीलिए जन्म लिया है कि मनुष्य को कम-से-कम शारीरिक बल लगाये बिना ही सब कुछ मिलता रहे और जो कुछ वह चाहता है, सब कुछ होता रहे। कर्म का महत्त्व एक बीच की मंज़िल है।
मैंने अपनी रचना में यही प्रयास किया है कि हम काव्यात्मक और कलात्मक चेतना से, मनन और विवेक से ऐसे अनुभव प्राप्त कर सकें जिससे संसार से अलग किसी ख़ुदा, ईश्वर, मज़हब, पूजा-पाठ, सिज्दा-दण्डवत् या साम्प्रदायिकता का कोई स्थान न हो। हिन्दू-विचार साम्प्रदायिक विचार नहीं है। किसी विशेष जाति या सम्प्रदाय को दूसरी जातियों और सम्प्रदाय से अलग करके हिन्दू-विचारों का निर्माण नहीं हुआ है। जब ये विचार ईश्वरवादिता से मुक्त हैं, तो सम्प्रदायवादिता में कैसे जकड़े रह सकते हैं! मेरी कविताओं की अपील सार्वजनिक है। आज यूरोप, अमरीका और दूसरे देशों में भी भारतीय विचारधारा का गहरा अध्ययन किया जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि मैंने सामाजिक या राजनीतिक जागृति पैदा करने के लिए कविताएँ रची ही न हों, ‘धरती की करवट’, ‘मार्क्स और लेनिन की सेवाएँ’, ‘इकाबे-बीन रोटियाँ’, ‘हिंडोला’ मेरी वे कविताएँ हैं, और मेरी बहुत-सी रुबाइयाँ मेरी वे रचनाएँ हैं, जिनमें कर्म के महत्त्व को समझने के लिए समाज को ललकारा गया है, लेकिन यहाँ भी चिन्तन और मनन कलात्मक हैं। ये कविताएँ सामयिकता से ऊपर के स्तरों को छूती हैं। इनमें कर्म के लिए उपदेश नहीं है बल्कि कर्म अपनी सीमाओं में रहता हुआ भी दिव्य बन गया है।
अन्त में यही कहूँगा कि मेरे नज़दीक कविता वही है, जिसकी शब्दावली कोशों के उन शब्दों से न बनायी जाये जो समाज में प्रचलित नहीं हैं। जैसा कि अँग्रेज़ी के महाकवि वर्ड्स्वर्थ ने बताया है- शब्दों और वाक्यों में भाव और रस तभी पैदा होता है जब भावनाओं से प्रेरित होकर सैकड़ों बरस तक जनसाधारण की शब्दावली में अपने आन्तरिक अनुभवों को व्यक्त करे। कविता की भाषा न कोशों में दफ़्न रहती है, न दावात की रोशनाई में। करोड़ों की बोल-चाल को सुसंगठित करके कविता की भाषा बनती है। यही किया है सूर ने, तुलसी ने, कबीर और मीरा ने। और यही किया है समझदार उर्दू कवियों ने। जिस तरह देहात का दर्ज़ी फूहड़पन से कपड़े को काटकर और भद्देपन से सीकर कोट, कमीज़, कुरता और दूसरे वस्त्र बनाता है, उसी तरह बोली का फूहड़ या मुर्दार ढंग से प्रयोग कविता की रचना, नागरता को चौपट कर देता है। खड़ी बोली के साथ बेढंगेपन का व्यवहार करके उसे अपरिचित शब्दों से बोझिल करके, शब्द-क्रम बिगाड़कर कविता करना खड़ी बोली की कोई सेवा नहीं है। अलबत्ता हमें एक-दूसरे ख़तरे से भी सावधान रहना है, वह ख़तरा यह है कि हम केवल ऊपरी चमक-दमक और दिखावे की भाषा को खड़ी बोली कविता की भाषा न बनने दें। यह भाषा केवल शुद्ध, स्वाभाविक या टकसाली नहीं होनी चाहिए, इसे प्रभावात्मक भी होना चाहिए, जिसमें हमारी चेतना डूब सके, जो हमारी चेतना को तल्लीन बना सके, जो कविता में संगीत और कर्णप्रिय झंकारें पैदा कर सके। शैली को न तो ठुकराने से काम चलता है, न उसके ऊपरी और बाहरी सजावटों या बनावटों से काग़ज़ी फूल तराशने से काम चलता है। साधारण शब्दों के जीवित और दुखती हुई रगों को छू देने से जो भाषा बनती है, वही कविता की भाषा है।
मेरी कविताओं का यह संकलन रवा-रवी या हलचल में पड़कर इसके कुछ टुकड़े ले भागने के लिए प्रकाशित नहीं हो रहा है। ठहर-ठहर के, डूब-डूब के पढ़ने के लिए और बार-बार पढ़ने के लिए इन कविताओं की रचना हुई है। मैं युनिवर्सिटी में 1930 से 1958 तक काम कर चुकने के बाद 1959 ई. में रिटायर हो गया।
अब मैं 75 बरस का हो रहा हूँ और शिथिलताएँ मुझ पर छाती जा रही हैं। यह मेरी जीवन की सन्ध्या है। शायरी मैंने इरादे से कभी नहीं की। किसी गुप्त-स्रोत से अकस्मात् उत्पन्न होने वाली प्रेरणाएँ मुझसे काव्य-रचना कराती रही हैं। जब कोई कविता स्वयं गुनगुनाती हुई मेरे अन्तःकरण से निकलकर पंक्तियों का रूप धारण करके आरम्भ हो जाती थी, तो पूरी कविता इसी प्रारम्भ से बनती चली जाती थी। मेरा हाथ और कलम इसी प्रेरणा के बस में होती थी। कविता करना तो दूर रहा, मैं साधारण मनोरंजन के लिए, अध्ययन के लिए या किसी हृदयग्राही कार्य के लिए हिसाब-किताब लगा के, हानि-लाभ जोड़ के, ज़बरदस्ती किसी इरादे को अपने ऊपर लादकर, किसी काम को काम या कर्तव्य समझकर कदाचित् ही कोई काम करता था। मालूम होता है कि मेरा पूरा अस्तित्व गुप्त शक्तियों के हाथ में रहा है। मेरा सब-कुछ करना-धरना इन्हीं शक्तियों के द्वारा रहा है। मैंने अपना जीवन-सम्बन्धी अध्ययन और विद्या-सम्बन्धी विचार, कविता-सम्बन्धी धारणाएँ और अन्य केन्द्रित विचार इस कथन में बताने का यत्न किया है। बयान लम्बा होता जाता है, अपने आपको कहाँ तक समझूँ या समझाऊँ। कुछ आप भी मुझे, इन कविताओं द्वारा, इस कथन द्वारा सही या ग़लत समझने का प्रयत्न करें और देखें कि मेरी कविताओं में हर-एक के दिल का चोर कहाँ तक निकला है। क्या इन कविताओं को पढ़कर, गुनगुनाकर आप अपने-आपको फिर से पा सके हैं? अगर आप इनके ज़रिये कुछ भी अपने-आपको पा सके हैं, जीवन को कहीं से भी छू सके हैं, मेरे अनुभवों को अपना जीवन-साथी बना सके हैं, तो मैं इसे अपनी कविताओं की सफलता समझूँगा। कहा गया है कि अगर हम शेक्सपियर की कोई रचना पढ़ते हुए उससे सही ढंग से और सही मात्रा तक प्रभावित हो सकें तो उतनी देर के लिए हम शेक्सपियर के बराबर हो जाते हैं। ‘फ़िराक़’ ने बस इतना ही चाहा है कि इन्सानी ज़िन्दगी को अपनी ज़िन्दगी बना ले और इन्सानी ‘फ़िराक़’ की ज़िन्दगी को अपनी ज़िन्दगी बना ले। मेरा अलग कोई अस्तित्व नहीं है। मैं आप ही लोगों में से एक आप ही लोगों-जैसा व्यक्ति हूँ। कार्लाइल ने ठीक ही कहा है कि पूरा समाज गुप्त और अर्ध-चैतन्य ढंग से जिन बातों को धुँधलके में अनुभव करता है, कवि उन्हीं अनुभवों को धुँधलके से उभारकर खुली रोशनी में प्रस्तुत करता है। इतना कह के आप लोगों से रुख़सत चाहूँगा। अब मेरे जीवन और मेरे संगीत दोनों को नींद आ रही है:
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साज़े-ग़ज़ल
नये तराने छेड़ो मेरे नग़्मों को नींद आती है
