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इंद्रधनुष-11: देवेंद्र आर्य की कविताई

गीत, ग़ज़ल, गद्य कविता यानी हिंदी में तीन काव्य रूपों/माध्यमों में अपनी एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने वाले कवि हैं देवेंद्र आर्य। आलोचना भी लिखते हैं और गाहे-गाहे एक्टिविज़म में भी दिखते हैं। आपकी रचनाओं के अनुवाद हो चुके हैं और दर्जन भर पुस्तकों के साथ दर्जन भर से अधिक सम्मानों से आप नवाज़े जा चुके हैं। अपनी रचनाओं में प्रयोगों और नवाचारों के लिए भी चर्चित रहते हैं। आब-ओ-हवा की इस शृंखला के लिए विशेष रूप से प्राप्त इन रचनाओं पर पाठकों की राय का इंतज़ार…

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देवेंद्र आर्य की 7 रचनाएं

नवगीत

पेड़ हंस रहे होते हैं
जब बादल रोता है
अक्सर ऐसा ही होता है

जिसका कोई परिवार नहीं
जीने का कोई आधार नहीं
उसके भी दायित्व हैं अपने
यह कोई पहली बार नहीं

जीवन भर पाता है कोई
कोई खोता है
कभी-कभी यह भी होता है

किसको कोसें !
कितना कोसें !
ख़ुद को या अपनी क़िस्मत को
किसको ढांपें
शोहरत या अपनी चाहत को

मर्यादाओं की मजबूरी
बढ़ती जाती प्यार में दूरी
इज़्ज़त जाग रही होती है,
सपना सोता है
जी हाँ, ऐसा भी होता है

मन बेमन से ‘तन’ ढोता है
तन बिन मन के जी लेता है
अगर आदमी तुल ही जाये
ग़म का दरिया पी लेता है

मन के खेत में ‘हां’ बोता है
‘नहीं’ उगाता है
अक्सर ही ऐसा होता है
हाँ जी, ऐसा भी होता है

——-*——-

नवगीत

घर कर जाती एक उदासी
घर आने पर
लगता सब कुछ बासी-बासी
घर आने पर

पपड़ी पड़ते घाव खुरच उठते हैं फिर से
बाहर भटक रहा हूँ तनहाई के डर से

बाहर का विश्वास छला जाएगा घर में
होगी फिर से एक तलाशी
घर आने पर

मेरा घर है कुछ घंटों का साथ सफ़र का
एक अदद चूल्हे का
एक अदद बिस्तर का

बाहर-बाहर घर को ही सोचा करता है
मन हो जाता है सन्यासी
घर आने पर

घर ने ही विद्रोह कर दिया अपने घर से
जैसे कोई घर में रह कर घर को तरसे

ना जाने कितने घर हैं मेरे ही घर में
सोचूँ मैं किस घर का वासी
घर आने पर

——-*——-

कविता: घर

लौटूंगा
बार-बार लौटूंगा

लौटने के लिए ही होता है घर
घर न हो तो लौटना कहाँ?
लौटना न हो तो जाना कहाँ?

एक घर ही तो है
जहाँ से जाया जा सकता है कहीं
जहाँ लौटा जा सकता है
कहीं से भी कभी

घर है तो इंतज़ार है
इंतज़ार ही घर है

——-*——-

ग़ज़ल

कई दिनों से है डलनेस मेरी तबीयत में
कि जैसे खोट निकल आये मेरी नीयत में

ज़मीं बचेगी नहीं हो गया जब इसका यक़ीं
ख़ुदा ने नाम मेरा लिख दिया वसीयत में

किसी ने उसको मिलाया कुछ और ही कहकर
दरार पड़ने लगी मेरी वाक़फ़ीयत में

मैं ग़ैर ज़ात हूँ जबसे पता चला उनको
वे कीड़े देखते हैं मेरी क़ाबिलियत में

कलम की मंडी में बेशक न हो मक़ाम मेरा
कमी न आये कभी मेरी आदमीयत में

नहीं है वक़्त के अनुसार कुछ तो ख़ारिज कर
भले लिखा हो पुराणों में या शरीयत में

——-*——-

ग़ज़ल

शाइरी संघर्ष करने का नया मज़मून है
कुछ न हो गर पास तो भी दांत है? नाखून है?

क्या नज़र और क्या हुनर, पानी बिना सब ‘सून’ है
सिर्फ़ पानी की बदौलत ‘मोती मानुष चून’ है

आंकड़े पर्यावरण के यूँ सुधारे जा रहे
मुम्बई को कर दिया साबित कि देहरादून है

एक झंडा, एक भाषा, एक मज़हब, एक देश
कल जो पैजामा हुआ करता था अब पतलून है

धर्म के ही लैब में मंत्रों से जांचा जाएगा
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई कौन किसका ख़ून है

आपकी क़िस्मत ही खोटी है तो कोई क्या करे
वोट का अधिकार है, इस देश में क़ानून है

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कविता: डर

डरने की ज़रूरत नहीं
बताते हैं वे जो बेहद डरे हुए हैं

डर के ख़िलाफ खड़ा कर दिया गया है एक डर
कि काम आ सके मुसीबत पर
मरा भले न जा सके
पर सुकून से डरा तो जा सके

आपका नहीं
अपना डर भगाते हैं वे
जब ताली के साथ गाते हैं
डरना नहीं देसवा बिराना है
यह संसार काग़ज़ की पुड़िया
वाइरस से मर जाना है
डरना नहीं देसवा बिराना है

डरना मगर डरते हुए न दिखना
निडर होने का सियासी फ़लसफ़ा है

डर को वे धर्म में बदल देते हैं
और बताते हैं कि ग़रीबी से डरने की ज़रूरत नहीं
डरना है तो भगवान से डरो
जो तुम्हारी परीक्षा ले रहा है

नंगा डर है
दंगा-दर्शन!

पंद्रह करोड़ लोगों को एक सौ तीस करोड़ों से
डरने की कतई ज़रूरत नहीं
गिरते हुए सूचकांक से मत डरो
डरना है तो आस्थाओं के स्खलन से डरो
ढहते हुए बैंकों से क्या डरना
जब ढह चुका हो गुम्बद

कोई भी डर इतना निडर नहीं जो घंटा-शास्त्र से न डरे
वे डर के मनोविज्ञान को समझते हैं
विज्ञान का डर कभी आरती कभी अज़ान से दूर किया है

मनोविज्ञान के डर का उपयोग उन्हें आता है
वे ही निर्धारित करते हैं कि कब गांधी से डरना है
कब गोडसे से
कब वोट से डरना है
कब बालाकोट से
उन्हें पता है कि डरी हुई क़ौम से कब डरना है

नये धर्मशास्त्र का
डरांत-दर्शन!

डरो
कि डर बिना प्रीति असम्भव है
डर की सच्ची राह सिर्फ़ गुरू दिखा सकता है
गुरू जिसने घंटाल को साध लिया हो

डरो मगर किसानों की हत्याओं से नहीं
डरो मगर बेरोज़गारों से नहीं
डरो मगर उदारीकरण से नहीं
बाज़ारीकरण से बिल्कुल नहीं

डरो मगर नागरिकता से नहीं
अशिक्षा से कतई न डरो
प्राणायाम करो
डरो सिर्फ़ भाषा से
निराशा से नहीं
सुना है डर की लाठी में आवाज़ नहीं होती

डरो कि मुझे डर है
कहीं तुम अफ़वाहों से न डर जाओ
जो बता रही हैं इन दिनों कि डरने की ज़रूरत नहीं।

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कविता: भव

विचार अनुभव
जीवन अनुभव
और कविता अनुभव
तीनों ‘भव’ के अनुगामी हैं

अनुभवों का विचार बन जाना
विचारों का जीवन बन जाना
और जीवन का कविता बन जाना

कुल यही यात्रा है जीवन की
जो अधूरी है
इसलिए जीवित है

अधूरी यात्रा के जीवित कवि
यशस्वी भव!

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