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प्रसंगवश... मूलत: 'गांधी के जीवनादर्शों का हिंदी सिनेमा पर प्रभाव' शीर्षक वाले इस लेख में गांधी के विचारों को परदे पर लाती फ़िल्मों का समाजशास्त्रीय ​विश्लेषण पर्याप्त है। अनहद (2022) में प्रकाशित हुआ यह लंबा आलेख लेखक से प्राप्त हुआ, जिसके अंश यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
जवरीमल्ल पारख की कलम से....

गांधी और हिंदी सिनेमा: एक यात्रा

             महात्मा गांधी के जन्म को 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 1869 में गुजरात के पोरबंदर में उनका जन्म हुआ था। उनकी शहादत को भी सात दशक से ज़्यादा हो चुके हैं। 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सदस्य और हिंदू महासभा के सक्रिय कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की छाती को निशाना बनाकर अपनी पिस्तौल से तीन गोलियां दाग दीं। अंतिम शब्द उनके मुंह से निकले थेः ‘हे राम!’

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महात्मा गांधी को जान से मारने की कोशिशें कई बार हुईं। पहली बार वे दक्षिण अफ़्रीका में गोरों के हाथों से मारे जाने से बचे थे और भारत में ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक हिंदुओं ने उन्हें बार-बार मारने की कोशिशें की थीं। इन हमलों से यह स्पष्ट है कि गांधीजी को सांप्रदायिक और नस्लवादी लोग अपना शत्रु समझते थे। सवर्ण हिंदू सिर्फ़ इस बात से नाराज़ नहीं थे कि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का समर्थन करते थे बल्कि इस बात से भी कि वे अछूत समझे जाने वाले हिंदुओं को बराबरी का दर्जा देने की बात करते थे।

गांधी जो कहते थे, उसे करते भी थे और उनका करना ही उनके शत्रुओं के लिए चिंता का विषय था। यही नहीं गांधीजी अपने विश्वासों को जन-जन तक पहुंचाने का हर संभव प्रयत्न करते थे, लोगों को अपने जीवन में उसे ढालने का आग्रह करते थे। गांधीजी के प्रति नाराज़गी का घृणा की हद तक बढ़ने का मुख्य कारण ही यह था। देश के बंटवारे के समय जब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफ़रत चरम पर थी और हिंसक कार्रवाइयों के द्वारा दोनों समुदायों के बीच की यह नफरत भयावह दावानल का रूप ले चुकी थी, उस समय इस आग को बुझाने के लिए गांधी का देश के एक कोने से दूसरे कोने तक निपट अकेले भटकना और निहत्थे इस आग को बुझाने का प्रयत्न करना उन लोगों को नागवार गुज़र रहा था, जो आज़ाद हिंदुस्तान को हिंदुओं का राष्ट्र बनाने के लिए कृतसंकल्प थे और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते थे।

15 अगस्त 1947 को विभाजन के साथ देश आज़ाद हो गया। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल क़िले पर तिरंगा फहराया लेकिन ठीक उस समय महात्मा गांधी बंगाल के नोआखाली में डेरा डाले बैठे थे और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की नफ़रत की आग को बुझाने में लगे थे। आज जब हम गांधी को आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा नेता मानते हैं, वही नेता आजादी की पूर्वसंध्या को आज़ादी के जश्नों से बहुत-बहुत दूर था। ऐसा क्यों था?

गांधी के व्यक्तित्व की, उनके विचारों की और उनके जीवन-लक्ष्यों को समझने की कुंजी ही इसी एक तथ्य में है कि गांधी हमेशा उन करोड़ों साधारण लोगों के साथ खड़े दिखना चाहते थे, उन्हीं की तरह, उन जैसा ही, उनसे अलग और उनसे ऊपर नहीं। कांग्रेस के दूसरे नेताओं से गांधी का बुनियादी अंतर इसी एक तथ्य में छुपा है। गांधी की देखा-देखी खादी पहनने वाले तो हज़ारों-हज़ार नेता थे। लेकिन गांधी की तरह ग़रीब किसानों-मज़दूरों के साथ अपने को एकमेक करने वाला शायद ही कोई और था।

भारत औपनिवेशिक दासता से तो मुक्त हो गया लेकिन इस मुक्ति की उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। गांधी की अंतिम यात्रा को देखकर अमरीकी जीवनीकार और पत्रकार लुई फ़िशर ने लिखा था, “महात्मा गांधी जैसा कि वे हमेशा थेः एक ऐसे नागरिक जिसके पास न कभी धन रहा, न संपत्ति, न सरकारी पदवी, न सरकारी पद, न कोई उच्च श्रेणी की शैक्षिक डिग्री, न वैज्ञानिक उपलब्धि और न ही कलात्मक उपहार। फिर भी घुटनों से ऊपर की धोती पहनने वाले इस 78 वर्ष के दुबले-पतले सांवले आदमी के पीछे कई सरकारें और सेनाएं हाथ बांधे श्रद्धांजलि देने के लिए मौजूद थीं”।

ऐसे महान व्यक्तित्व का भारतीय सिनेमा पर प्रभाव पड़ना बहुत स्वाभाविक है।

परदे पर गांधीवाद

हिंदी सिनेमा के लिए महात्मा गांधी अपरिचित नाम नहीं है। गांधी से प्रेरित होकर 1950-60 के दशकों में कई फ़िल्में बन चुकी थीं। भले ही वहां सीधे-सीधे गांधी का नाम न लिया गया हो। व्ही. शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ (1957) में अहिंसा का हथियार की तरह उपयोग किया गया था। इस फ़िल्म में जघन्य अपराधों में जेल की सज़ा भुगत रहे कुछ ख़ूंख़ार अपराधियों को एक आश्रम में रखकर सुधारने का प्रयत्न जेलर करता है।

इसी तरह राज कपूर की फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) का नायक भी अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलकर ही डाकुओं को हिंसा का मार्ग छोड़ने और शांति और सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर पाता है। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘अनाड़ी’ (1959) का नायक भी ऐसा ही है जिसके लिए सच्चाई और ईमानदारी सहज मानवीय मूल्य है और जो अपने लाभ-लोभ के लिए दूसरों को धोखा देना या दूसरे को नुक़सान पहुंचाने की सोचना भी पाप समझता है।

ऋषिकेश मुखर्जी ने बावर्ची (1972) में इसी संदेश को घर-परिवार में शांति और सद्भाव क़ायम करने के लिए इस्तेमाल किया था। ‘दो बीघा ज़मीन’ (1953) और ‘नया दौर’ (1957) में उद्योगीकरण के दुष्परिणामों को कहानी का विषय बनाया गया। महात्मा गांधी उद्योगीकरण को ग़रीब और ग्रामीण जनता के लिए विनाशकारी मानते थे। राज कपूर की फ़िल्म ‘बूट पालिश’ (1954) गांधी जी के इस संदेश से प्रेरित थी कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता।

इनके अलावा जागृति (1954), मदर इंडिया (1957), दोस्ती (1964), सीमा (1955), सुजाता (1959), सत्यकाम (1969) आदि कई फ़िल्मों का उदाहरण दिया जा सकता है, जिन पर महात्मा गांधी के जीवनादर्शों का प्रभाव देखा जा सकता है।

1959 में बनी फ़िल्म ‘धूल का फूल’ का प्रख्यात गीत ‘तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा/इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ में साहिर ने हिंदू-मुस्लिम एकता का वही संदेश दिया था, जिस पर महात्मा गांधी विश्वास करते थे, साथ ही उस अंधराष्ट्रवाद की आलोचना भी की थी, जिसे महात्मा गांधी विश्व मानवता के लिए ख़तरनाक समझते थे।

इस अंधराष्ट्रवाद का विरोध आज़ादी के आंदोलन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद, जवाहरलाल नेहरू और भगत सिंह ने भी किया था। ये सभी गांधी जी की तरह न केवल हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे, बल्कि धर्म को राष्ट्रीयता का आधार मानने के भी प्रबल विरोधी थे। इस गीत के पहले अंतरे में ही साहिर लुधियानवी ने लिखा थाः

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है
जिस इल्म ने इंसानों को तक़सीम किया है
उस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है

ज़ाहिर है कि साहिर का संकेत यहां विभाजन की ओर ही है। इसी गीत में वे अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहते हैंः

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिंदू औ’ मुसलमान बनाया
क़ुदरत ने तो बख़्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया

साहिर को विभाजन के समय हुए दंगों की स्मृतियां भी थीं इसलिए उन्होंने एक अंतरे में यह भी लिखाः

नफ़रत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है
इंसां को जो रौंदे वो क़दम तेरा नहीं है

और वे उम्मीद करते हैं कि यह बच्चा बड़ा होकर ‘अम्न और सुलह का अरमान बनेगा’।

रंगभूमि से नये दौर तक

आज़ादी हासिल होने के बाद नये संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश प्रगति की ओर बढ़ने लगा। उनको यह यक़ीन था कि यदि देश औद्योगिक दृष्टि से उन्नति करता है तो उसका लाभ देश के ग़रीब और मेहनतकश जनता को भी मिलेगा। लेकिन महात्मा गांधी उद्योगीकरण को संदेह की दृष्टि से देखते थे। हिंद स्वराज पुस्तक में आधुनिक सभ्यता की तीव्र आलोचना के साथ-साथ एक वैकल्पिक संकल्पना भी है। लेकिन उन्होंने मशीनों को पूरी तरह अस्वीकार करने की जो बात कही, उसे स्वयं कांग्रेस ने ही स्वीकार नहीं किया। इसे लेकर नेहरू के साथ उनका पत्र व्यवहार अनेक तथ्य देता है, जिसका विस्तार से ज़िक्र अगले लेख में मिलेगा। एक पत्र के उत्तर में गांधी जी नेहरू की बातों को सही परिप्रेक्ष्य में समझ जाते हैं और यहां तक लिखते हैं कि उनके और नेहरू के दृष्टिकोण में कोई बुनियादी अंतर नहीं है।

दरअसल, उद्योगीकरण की यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी। प्रेमचंद रंगभूमि में बता चुके थे कि उद्योग स्थापित करने के लिए जिनकी ज़मीनें छीनी जाती हैं, वे इसे आसानी से देने को तैयार नहीं होते। आज़ादी के बाद शुरू हुए उद्योगीकरण की क़ीमत भी ग़रीब किसान को चुकानी पड़ी। किसानों से उनकी ज़मीनें छीनी गयीं और उनको खेती छोड़कर शहर में मज़दूरी करनी पड़ी। बिमल राय ने आज़ादी के छह साल बाद अपनी फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ (1953) में उद्योगीकरण और किसानों के विस्थापन को मुद्दा बनाया था।

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संगीतकार सलिल चौधरी की ‘रिक्शावाला’ नामक कहानी पर आधारित ‘दो बीघा ज़मीन’ की कहानी उद्योगीकरण के कारण किसानों के विस्थापित होने की समस्या को केंद्र में रखकर चलती है। शंभु महतो (बलराज साहनी) यानी एक छोटे से किसान के विस्थापन की कहानी। त्रासद मोड़ लेती हुई कहानी के अंत में शंभु महतो का न केवल खेत छिन जाता है, वह बेघर भी हो जाता है। उस ज़मीन पर ‘दि ग्रेट जनता मिल’ के नाम से एक कारख़ाना स्थापित हो जाता है। मिल का नाम उस विडंबना को दर्शाता है जो नेहरू युग की केंद्रीय पहचान है।

शंभु महतो उस शोषणकारी व्यवस्था का शिकार है, जिसका उल्लेख इस फ़िल्म के प्रदर्शन से सत्रह साल पहले प्रेमचंद ने अपने उपन्यास ‘गोदान’ (1936) में किया था। आज़ादी के आरंभिक सालों तक गांव की यह शोषणकारी व्यवस्था नहीं बदली है। किसानों का ज़मींदारों और साहूकारों से क़र्ज़ लेना और उस क़र्ज़ के बदले अपनी और अपने परिवार की ज़िंदगी रेहन रख देना, यही वह हक़ीक़त है, जो गोदान से लेकर दो बीघा ज़मीन तक ही नहीं ‘मदर इंडिया’ (1957) तक में अभिव्यक्त हुई है।

ग़रीब किसान के परिप्रेक्ष्य से उद्योगीकरण के जिस प्रश्न को ‘दो बीघा ज़मीन’ में उठाया गया था, उसका एक पहलू मशीनीकरण भी है। उद्योगीकरण के कारण परंपरागत तकनीक पर आधारित उद्योग-धंधे बंद होने लगे थे। इन धंधों से जुड़े मज़दूर और कारीगर बेकार होने लगे थे। उनके सामने जीवनयापन का बड़ा संकट पैदा हो गया था। इस प्रश्न को बी. आर. चोपड़ा ने ‘नया दौर’ (1957) के माध्यम से उठाया था। यह वह ज्वलंत प्रश्न था, जिसका उत्तर उद्योगीकरण की उस मुहिम के पास नहीं था। यह फ़िल्म भी कोई उत्तर नहीं दे पाती सिवाय इसके कि दोनों साथ-साथ बने रहें, लेकिन कब तक और कैसे?

​सिद्धांत और विडंबना

इस दौर में शासक वर्ग राष्ट्र निर्माण के एजेंडे को शांति और सद्भाव के द्वारा यानी दूसरे शब्दों में वर्ग सहयोग द्वारा स्थापित करना चाहता है। यही कारण है कि ग्रामीण जीवन के अंतर्विरोधों को गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के द्वारा हल करने की कोशिश की जाती है। शोषण और उत्पीड़न पर आधारित ग्रामीण समाज में प्रतिरोध सदैव लोकतांत्रिक तरीक़े से ही व्यक्त हो, यह ज़रूरी नहीं है। हिंदी सिनेमा में डाकुओं पर आधारित फ़िल्में दरअसल गाँवों में व्याप्त इन संघर्षों का ही परिणाम है।

‘मदर इंडिया’ के ज़रिये इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। नायिका राधा (नरगिस) का छोटा बेटा बिरजू (सुनील दत्त) साहूकार सुखीलाला (कन्हैया लाल) के अत्याचारों का बदला हिंसा के द्वारा लेना चाहता है। वह समझता है कि जितने दुख लाला ने उसकी मां और उसके परिवार को दिये हैं, उसकी सज़ा उसे अवश्य मिलनी चाहिए। लेकिन राधा की सोच अलग तरह की है। यह भिन्नता इसी आरंभिक आदर्शवाद का परिणाम है जिसका निर्माण गांधीवाद के प्रभाव में हुआ है। इस प्रभाव को उन बहुत सी फ़िल्मों में देखा जा सकता है, जिनमें बताया गया कि कोई व्यक्ति जन्म से बुरा नहीं होता, परिस्थितियां उसे अच्छा या बुरा बनाती है। इसलिए किसी को बल प्रयोग द्वारा नहीं सुधारा जा सकता। यदि लोगों को अच्छा माहौल मिले तो वे स्वतः ही बुराई से दूर रहेंगे।

राज कपूर की ‘आवारा’ (1951) इसी सिद्धांत पर आधारित है। व्ही. शांताराम की फ़िल्म ‘दो आँखें बारह हाथ’ (1957) में यही आदर्श कहानी का आधार बनता है। हत्या जैसे क्रूर अपराधों में क़ैद लोगों को सुधारने का बीड़ा जेलर उठाता है। ये अपराधी मेहनत के पाठ द्वारा सीखते हैं कि अपराध नहीं बल्कि श्रम ही जीवन की सही पहचान है। ‘मुझे जीने दो’ (1963) और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) और कुछ हद तक ‘गंगा जमुना’ (1961) में भी डाकुओं को प्रेम और सद्भाव के ज़रिये अहिंसा के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया है।

इन फ़िल्मों में गीतों से यह याद दिलाया गया है कि अब देश आज़ाद है (अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आज़ाद है-मुझे जीने दो) और अपराध के मार्ग पर चलने की आवश्यकता नहीं है। इस देश की महान परंपरा की याद दिलाते हुए (मिलजुल के रहो और प्यार करो, एक चीज़ यही जो रहती है- जिस देश में गंगा बहती है) हिंसा के मार्ग को छोड़ने का आह्वान किया जाता है और बच्चों को संदेश दिया जाता है कि वे इंसाफ़ की डगर पर चलें (सच्चाइयों के बल पर आगे तो बढ़ते रहना- गंगा जमुना)।

गांधीवादी ह्रदय परिवर्तन की इन कहानियों की विडंबना यह है कि जिनका ह्रदय परिवर्तन होता है, वे ऐसे साधारण लोग हैं जो इस शोषणकारी व्यवस्था के चालक नहीं बल्कि उसके शिकार हैं।

‘दो आंखें बारह हाथ’ में भी गांधीवादी जेलर (व्ही. शांताराम) कथित ख़ूंख़ार अपराधियों का ह्रदय परिवर्तन कराने में तो कामयाब हो जाता है, लेकिन उन व्यापारियों का ह्रदय परिवर्तन नहीं होता जिनका व्यवसाय ही किसानों को ठगने और लूटने पर निर्भर है। स्वयं महात्मा गांधी जिन्हें नोआखाली में दंगा कर रहे साधारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अमन क़ायम करने में कामयाबी मिली थी, एक फ़ासिस्ट हिंदू के हाथों मारे गये।

सामाजिक न्याय के विचार

ग्रामीण यथार्थ की बात करने पर जातिवाद और दलित उत्थान का प्रश्न भी उभरकर सामने आता है। हिंदू समाज जातिवाद, छुआछूत, ऊंच-नीच के भेदभाव से ग्रस्त था। दलित कही जाने वाली जातियों को सामान्य मानवाधिकार भी हासिल नहीं थे (और आज भी नहीं है)। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभिक दौर में ही दलित आंदोलन धीरे-धीरे मज़बूत होने लगा था और दलितों के आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की मांग तेज़ी से उठने लगी थी। 1932 में जब दलितों के लिए बाबा साहब आंबेडकर ने अलग मताधिकार की मांग उठायी तो गांधी जी ने उसका विरोध किया और अनशन पर बैठ गये। आख़िरकार गांधी और आंबेडकर में समझौता हुआ, जो पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है।

यह विवाद का मुद्दा है कि इस समझौते से दलितों ने क्या हासिल किया और क्या खोया लेकिन इसने दलित उत्थान के प्रश्न को आज़ादी के आंदोलन से पूरी तरह जोड़ दिया, जिसकी उपेक्षा करना नामुमकिन था। लेखकों और कलाकारों का ध्यान दलित प्रश्न की तरफ़ जाना स्वाभाविक हो गया। 1936 में बनी ‘अछूत कन्या’ में ब्राह्मण लड़के और दलित लड़की की प्रेम कहानी को पेश किया गया था। इसके बाद भी कई फ़िल्में इस विषय पर बनीं। लेकिन इनमें सर्वाधिक प्रमुख है, ‘सुजाता’।

1959 में निर्मित ‘सुजाता’ प्रख्यात फ़िल्मकार बिमल राय के निर्देशन में बनी बहुचर्चित फ़िल्म है। इसकी कथा बांग्ला कथाकार सुबोध घोष की कहानी पर आधारित है। बिमल राय की अन्य फ़िल्मों की तरह सुजाता का संबंध भी सामाजिक यथार्थ से है। इस फ़िल्म का कथानक अछूत समस्या पर आधारित है, लेकिन इस समस्या को दलितों की नज़र से नहीं देखा गया है। यह कहना ज़्यादा सही है कि फ़िल्म दरअसल दलित यथार्थ पर आधारित नहीं है बल्कि दलितों के प्रति सवर्णों के रवैये को कहानी का आधार बनाया गया है।

दलित प्रश्न को इस दृष्टि से देखने का अपना महत्त्व है क्योंकि जातिगत भेदभाव के लिए और जातिवाद की समाप्ति के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि सवर्ण हिंदू अपने उच्च होने के अभिमान का त्याग करे और दलित को न केवल इंसान समझे बल्कि उनके साथ रोटी-बेटी का संबंध भी बनाये। दूसरे शब्दों में, यह फ़िल्म दलितों के उत्थान के प्रश्न से संबंधित नहीं है हालांकि यह भी एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न रहा है।

हिंदी में उस दौर में ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनी हैं जिनमें जाति का उल्लेख सीधे तौर पर किया गया हो। इस दौर में बनी ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘बूट पालिश’, ‘जागते रहो’ (1956), ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ (1957) के केंद्रीय पात्र दलित या पिछड़े वर्ग के ही माने जा सकते हैं। 1954 में बनी ‘बूट पालिश’ का संबंध महानगर की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले उन ग़रीबों से है, जो या तो भीख मांगकर अपना जीवन-यापन करते हैं या छोटे-मोटे काम करके, जिन्हें आमतौर पर भारत में निम्न समझी जाने वाली जातियां ही करती रही हैं।

यह फ़िल्म महात्मा गांधी के उस आदर्श की ही कथात्मक अभिव्यक्ति है कि कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता। गांधी की बुनियादी शिक्षा के आदर्श में भी हाथ से काम करने को बहुत महत्व दिया गया है।

फिर बहस के केंद्र में गांधीवाद

गांधी के आदर्शों की ओर एक बार फिर आकर्षण 1990 के दशक में बढ़ा जब एक ओर सांप्रदायिक हिंसा और आतंकवाद ने, तो दूसरी ओर भूमंडलीकरण की वजह से बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति ने सामान्य जनता के जीवन को गहरे आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट में डाल दिया था। 1984 में बनी ‘सारांश’ और ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ तथा 1993 में बनी ‘दामिनी’ ने सत्य के लिए अहिंसात्मक तरीक़े से हर क़ीमत पर संघर्ष करने के गांधी के आदर्श की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। दामिनी ‘फ़िल्म’ के अंत में जज अपना फ़ैसला सुनाने के बाद सत्य के लिए नायिका दामिनी (मीनाक्षी शेषाद्रि) के संघर्ष की प्रशंसा करते हुए महात्मा गांधी को याद करता है और दामिनी के संघर्ष की तुलना महात्मा गांधी के संघर्ष से करता है।

महात्मा गांधी के जीवन को केंद्र में रखकर बनी रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म ‘गांधी’ (1982) को न सिर्फ़ लोकप्रियता प्राप्त हुई बल्कि उसे कई ऑस्कर अवार्डों से नवाज़ा गया। इस फ़िल्म में गांधी के सबसे महान आदर्श सत्याग्रह और अहिंसा को उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंगों द्वारा शक्तिशाली ढंग से व्यक्त किया गया है। गांधी के जीवन को आधार बनाकर बाद में श्याम बेनेगल ने भी ‘द मेकिंग ऑफ़ द महात्मा’ (1996) नामक फ़िल्म का निर्माण किया था, जिसमें महात्मा गांधी के दक्षिण अफ़्रीका प्रवास के दौरान के जीवन संघर्ष को कथा का आधार बनाया गया था।

2000 में कमल हासन ने देश विभाजन को आधार बनाकर ‘हे राम!’ फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें गांधी न सिर्फ़ एक पात्र के रूप में मौजूद थे बल्कि गांधीजी की हत्या को कहानी का विषय बनाया गया था। गांधी की हत्या को रूपक के रूप में इस्तेमाल करते हुए प्रख्यात असमी निर्देशक जॉन बरुआ ने अपनी पहली हिंदी फ़िल्म ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ (2005) बनायी और 2006 में राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने गांधी और उनके आदर्शों को चर्चा के केंद्र में ला दिया था।

1970-80 के दशकों में हिंदी सिनेमा में सत्य और अहिंसा पर आधारित आदर्शवाद का प्रभाव कम होने लगा था। ग़ुस्सैल नायक के रूप में अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद प्रतिशोध पर आधारित सिनेमा ने हर तरह के आदर्शवाद को नकार दिया। प्रतिशोध की भावना जितनी तीव्र होती गयी, फ़िल्मों में हिंसा की मात्रा भी उतनी ही बढ़ती गयी। प्रतिशोध के लिए महात्मा गांधी के आदर्शों में कोई जगह नहीं थी। जबकि इस दौर की फ़िल्मों में हिंसा के कई-कई रूप देखे जा सकते थे। फ़िल्मों में दिखायी जाने वाली हिंसा सिनेमा को लोकप्रिय बनाने वाली प्रविधि नहीं थी बल्कि यह समाज में लगातार बढ़ रही हिंसा की ही अभिव्यक्ति थी।

इस बढ़ती हिंसा के ठोस राजनीतिक और सामाजिक कारण थे। लूट, अपराध, जातिवादी और सांप्रदायिक नरसंहार, आतंकवाद, युद्ध आदि आज की एकध्रुवीय दुनिया की ऐसी हक़ीक़त है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे दौर में उन भुला दिये गये आदर्शों की तरफ़ ध्यान जाना स्वाभाविक है जिन आदर्शों ने हमारे जैसे उपनिवेश बने देशों को आज़ादी दिलायी। दुनिया के कुछ हिस्सों में शोषण और उत्पीड़न पर आधारित व्यवस्थाओं को समाप्त कर बराबरी और न्याय पर आधारित व्यवस्थाओं को काय़म करना मुमकिन बनाया और इस धारणा को लोकप्रिय बनाया कि सभी मनुष्य बराबर हैं चाहे उनका रंग, नस्ल, धर्म, जाति, लिंग और भाषा कुछ भी क्यों न हो।

ऐसा नहीं है कि हिंदी सिनेमा ने गांधी के सिद्धांतों को सहज रूप से स्वीकार कर लिया था। हिंसा और अहिंसा दोनों के प्रति हिंदी सिनेमा का एक-सा आग्रह रहा है। हिंदी सिनेमा ने भगत सिंह और गांधी को समान रूप से स्वीकारा है। यदि आज भगत सिंह के नायकत्व को दुबारा स्थापित करने वाली फ़िल्म ‘रंग दे बसंती’ (2006) को अपार सफलता मिली है, तो, गांधी के आदर्शों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फ़िल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ को भी वैसी ही सफलता मिली है।

ध्यान दें तो हिंदी फ़िल्मों ने दोनों को एक-सा ही नायकत्व प्रदान किया है। भगत सिंह ने भी देश के लिए वैसे ही अपना बलिदान दिया था, जैसे गांधी ने दिया था। जनता के मन में भगत सिंह के उस क़दम के प्रति भी उतनी ही श्रद्धा है, जो सांडर्स की हत्या के रूप में सामने आयी थी। ‘रंग दे बसंती’ में रक्षामंत्री की हत्या करने वाले युवक इसलिए नायक बन सके क्योंकि देश के एक सिपाही की हत्या करने के लिए ज़िम्मेदार रक्षामंत्री को उन्होंने सज़ा दी थी। नतीजतन ख़ुद उन्हें अपने जीवन की आहुति देनी पड़ी थी। अपने देश और समाज के लिए प्राणों को उत्सर्ग करने वाले भगत सिंह और गांधी दोनों इसीलिए जनता की नज़र में नायक बन सके।

पिछले कई दशकों में सांप्रदायिकता, आतंकवाद और राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण ने गांधी को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। ‘हे राम!’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ फ़िल्में किसी न किसी रूप में गांधी की प्रासंगिकता को ही बताती है।

1992 में संघ परिवार के कथित कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ध्वंस कर दिया था और उसके बाद देश भर में हुए सांप्रदायिक दंगों में निरपराध लोगों को मारा गया, जिनमें भी मरने वाले ज़्यादातर ग़रीब मुसलमान ही थे। 2002 में एक बार फिर गोधरा कांड का बहाना बनाकर गुजरात में मुसलमानों का बड़े पैमाने पर क़त्ले-आम किया गया। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से राजसत्ता द्वारा निरंतर ऐसे क़दम उठाये जा रहे हैं जो संविधान के आधारभूत सिद्धांतों मसलन, धर्मनिरपेक्षता, समानता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के विपरीत हैं। उनका मक़सद भारत को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य की जगह हिंदू राष्ट्र बनाना है।

गांधी के आदर्शो और संविधान के आधारभूत सिद्धांतों की रक्षा के लिए जनता को संगठित होकर वैसा ही संघर्ष करने की आवश्यकता है, जैसा संघर्ष आज़ादी के दौर में गांधी के नेतृत्व में किया गया था। सत्य और अहिंसा पर आधारित संघर्ष ही भारत की उस आत्मा को जीवित कर सकता है, जिसकी रक्षा के लिए गांधी ने अपना बलिदान दिया था।

जवरीमल्ल पारख, jawari mal parakh

जवरीमल्ल पारख

साहित्य, सिनेमा और मीडिया जैसे क्षेत्रों में अपने आलोचनात्मक लेखन के लिए ख्यात। अब तक विभिन्न विषयों से संबंधित बीस पुस्तकें प्रमुख प्रकाशनों से प्रकाशित। प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं और इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। संपर्क: jparakh@gmail.com

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