
- October 2, 2026
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पुस्तक चर्चा हरियश राय की कलम से....
गांधी के बहाने: क्या कहती है यह किताब?
गांधी बार-बार लौटकर क्यों आते हैं? क्या आज भी उनकी कोई प्रासंगिकता बची हुई है? वैसे हमारा देश सघन श्रद्धा वाला है! तो क्या जैसा राव साहेब कस्बे ने उन्हें “पराजित राजनीतिज्ञ और विजयी महात्मा” कहा, वह सटीक और सही दृष्टि है?
गांधी के जीवनकाल से ही गांधी पर हज़ारों किताबें प्रकाशित हुईं और इनके प्रकाशन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इसी कड़ी में पराग मांदले ने अपनी किताब ‘गांधी के बहाने’ में गांधी के विचारों को फिर याद किया है और यह बताने की कोशिश की है कि गांधी के विचार जितने गांधी के समय प्रासंगिक थे, तबसे कहीं ज़्यादा आज हैं। आज हम जितना गांधी को भुलाने की कोशिश करते हैं, गांधी उतनी ही शिद्धत से याद आते हैं। यही ताक़त गांधी की है।
गांधी एक ऐसा नाम, जो लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ में गहरे धंसा हुआ है। इतना धंसा हुआ है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यह नाम और भी ज़्यादा चमकदार और भी ज़्यादा गरिमामय व और भी ज़्यादा भव्य हो उठता है। गांधी नाम में एक ऐसी कशिश है जो हर इंसान को अपनी ओर खींचती है और बताती है कि सच की राह में किस तरह स्वाभिमानी होकर खड़ा हुआ जा सकता है; और सादगी, अहिंसा, सच्चाई, सत्याग्रह, स्वदेशी, परिश्रम, सर्वधर्म समभाव क्या होता है; और ये जीवन मूल्य किस तरह इंसान के जीवन को बदल सकते हैं।
गांधी ने देश के ग़रीब किसानों और आम जनता के साथ एकजुटता दिखाने के लिए केवल धोती और चादर पहनना शुरू किया था। इसी कारण ब्रिटेन के तत्कालीन नेता विंस्टन चर्चिल ने गांधी को ‘आधा नंगा फ़क़ीर’ कहा।
इसमें कोई शक नहीं कि गांधी के प्रति जितना श्रद्धा भाव रखा गया, उतना ही उसका विरोध हुआ। यदि हम गांधी और टैगोर की बहसें को पढ़ें या गांधी और आंबेडकर और भगत सिंह को साथ-साथ पढ़ें तो गांधी के विचारों से सहमत शायद नहीं हो पाएंगे लेकिन इन असहमतियों के बावजूद गांधी को ख़ारिज क़तई नहीं किया जा सकता। गांधी देश के जन-जागरण और जन-आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता उभरकर सामने आये और यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी।

पराग मांदले की यह किताब आज के माहौल में गांधी के मूल्यों और मान्यताओं को नयी सोच के साथ सामने रखती है और गांधी के बारे में फैलायी जा रही धुंध को साफ़ करती है। लेखक ने गांधी से संबंधित उन सवालों और विचारों को सामने रखा है जिन पर आज कल गांधी की आलोचना की जाती है। अपनी बात के समर्थन में पराग मांदले गांधी के युग के राजनैतिक इतिहास को खँगालते हैं और वहां से प्रमाण जुटाकर आज कल गांधी के बारे में फैलायी जा रही भ्रांतियों को ख़ारिज करते हैं। वे ‘हरिजन’ के संपादकीयों से अपनी बात के समर्थन में तर्क जुटाते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह कि यह पराग मांदले की यह किताब गांधी के विचारों को ही सामने नहीं रखती है बल्कि उन विचारों की प्रासंगिकता और उपयोगिता को भी सामने रखती है और यह बताती है कि गांधी की राह पर चलकर ही इस देश में हर नागरिक की आँख का आंसू पोंछा जा सकता है।
गांधी अहिंसा को प्रेम का पर्याय मानते थे। पराग मांदले का मानना है, ‘अहिंसा के स्थान पर प्रेम शब्द का प्रयोग करना अधिक समीचीन है जिसके व्यापक स्वरूप में अहिंसा का समावेश हो ही जाता है। यह प्रेम ही है, जो सत्य और अहिंसा की सघन साधना के परिणामस्वरूप उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य अंग बन गया था।’
अपने लेख ‘गांधी से कौन डरता है’ में पराग मांदले ज़ोर देकर कहते हैं कि गांधी से वे लोग डरते हैं, जो धर्म की सहायता से राजनीतिक सत्ता हासिल करना चाहते हैं और जो धार्मिक विद्वेष पैदा कर सत्ता में टिके रहना चाहते हैं। वे लोग भी गांधी से डरते हैं, जिन्होंने गांधी को सेवा की जगह भ्रष्टाचार का माध्यम बना दिया और अपनी ज़रूरत से कई गुना संग्रह किया। वे यह बताना भी नहीं भूलते कि ग़रीब और ज़रूरतमंद वर्ग का शोषण करने वाले लोग भी गांधी से डरते हैं क्योंकि गांधी इनकी राह में रोड़ा बनकर किसी न किसी रुप में आ खड़ा होता है।
आज जब पूंजी और राजनीति के घालमेल से सत्ता पर बने रहने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है, तब गांधी की याद आना स्वाभाविक है, जिसने कहा कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। क्या आज कोई ऐसा कह सकता है?
पिछले पचहत्तर से भी ज़्यादा सालों से विभाजन का ठीकरा महात्मा गांधी के सर पर फोड़ा जाता रहा है। “भारत का विभाजन और गांधी” नाम के अध्याय में पराग मांदले सवाल करते हैं कि आज़ादी से पहले के दौर में हिन्दू-मुस्लिम एकता का सबसे प्रबल पैरोकार कौन था? और हिन्दू-मुस्लिम एकता को असंभव बताने वाले कौन थे? और दोनों समुदायों के बीच के बैर को पनपाने और भड़काने वाले कौन थे?
वे ज़ोर देकर कहते हैं कि गांधी जी ने मन से विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया और अंतिम सांस तक उनको यह उम्मीद थी कि किसी दिन विभाजन अनावश्यक सिद्ध होकर अर्थहीन हो जाएगा।
‘गांधी विचारों की हत्या की नयी साज़िश’ लेख में पराग मांदले ‘गोडसे@गांधी’ नाम की फ़िल्म का विश्लेषण करते हुए यह बताने की कोशिश करते हैं कि किस तरह यह फ़िल्म बुरी नीयत से और इतिहास के साथ तोड़-फोड़ करके बनायी गयी है। उनका मानना है कि यह फ़िल्म गांधी को चरखे, चश्मे, नोट और समाधि तक प्रतीकात्मक रूप से सीमित और ज़िंदा रखकर उनकी वैचारिक हत्या की कोशिशों पर बल देती है।
गांधी और आत्मनिर्भर भारत, खादी: अस्तित्व का संकट और भविष्य की दिशा, गांधी की विरासत, मज़दूर आंदोलन और गांधी का पहला अनशन, गांधी के रचनात्म्क कार्य, गांधी की वैज्ञानिकता, गांधी को समझने की कुंजी जैसे अध्यायों में गांधी के विचारों की परख आज के संदर्भ में करते हुए पराग मांदले गांधी के विचारों को ही ‘गहराते निराशा के अंधकार में उम्मीद की किरण’ मानते हैं।
साम्प्रदायिक नफ़रत के आज के माहौल में हमें गांधी बार-बार याद आते हैं और इसलिए हम बार-बार उन्हें पढ़ते हैं। तब हमें यह भी लगता है कि अपनी सीमाओं के बावजूद गांधी आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। शायद इसीलिए राव साहेब कस्बे ने उन्हें ‘पराजित राजनीतिज्ञ और विजयी महात्मा’ कहा था, जो सोलह आने सच है।
वैसे तो किसी भी महान् व्यक्तित्व के जाने के 50 साल बाद उसमें आलोचना के कारक को ढूंढ़ पाना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के वैज्ञानिक विकास जो राह चुनी, उस राह में एक गहरी छाया गांधी की मौजूद थी।
चार्ली चैपलिन की फ़िल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ के अंत में तानाशाह बना नाई एक संदेश देता है कि ‘अपने आपको क्रूर लोगों के हवाले मत करो। जो तुम्हें ग़ुलाम बनाते हैं, जो तुम्हारी ज़िंदगी तय करते हैं, जो तुम्हें इस्तेमाल करते हैं, वे खा जाते हैं – मवेशी की तरह पेश आते हैं, चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं, अपने आप को उन अमानवीय आदमियों के हवाले मत करो। ये मशीनी आदमी, मशीनी दिमाग़ वाले मशीनी दिल वाले हैं। आप मशीन नहीं हैं। आप मवेशी नहीं हैं बल्कि आप मनुष्य हैं। आपके हृदय में मानवता के लिए प्यार है, आप नफ़रत नहीं करते। केवल वे नफ़रत करते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिलता। वही अप्राकृतिक है। सैनिको! ग़ुलामी के लिए मत लड़ो, स्वतंत्रता के लिए लड़ो।’
गांधी उसी स्वतंत्रता के हिमायती थे और यही बात पराग मांदले की किताब ‘गांधी के बहाने’ ज़ोर देकर हमें बताती है।
पुस्तक: गांधी के बहाने
लेखक: पराग मांदले
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, नोएडा
प्रथम संस्करण 2025, मूल्य: 275 रु.

हरियश राय
32 साल बैंकर रहते हुए उप-महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा समय लेखन में ही। उपन्यासों के साथ ही अनेक कथा संग्रह प्रकाशित। कुल मिलाकर क़रीब डेढ़ दर्जन पुस्तकें, जिनमें प्रतिनिधि कहानियों के संकलन भी। साथ ही सामयिक विषयों पर ‘भारत-विभाजन और हिंदी उपन्यास’, ‘सूचना तकनीक, बाज़ार एवं बैंकिंग’, ‘समय के सरोकार’, ‘शिक्षा, भाषा और औपनिवेशिक दासता’ जैसी पुस्तकें भी। 'उद्भावना' पत्रिका के भीष्म साहनी अंक का संपादन। कई सम्मान। संपर्क: 9873225505
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