
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
हिंदी पत्रकारिता दिवस... 200 साल की हो गयी हिंदी की पत्रकारिता और कहां से कहां पहुंच गयी! भले ही अब मीडिया जैसे शब्द प्रचलन में हैं पर अख़बार शब्द पत्रकारिता का जैसे पर्याय रहा है। इस लफ़्ज़ के इर्द-गिर्द शायरों के कितने बयान सुने हैं आपने? कौन-से आपके ज़ेह्न में उभरते हैं? देवदत्त संगेप लाये हैं एक संकलन : आब-ओ-हवा की ख़ास पेशकश...
शायरी के निशाने पर 'अख़बार'

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो
-अकबर इलाहाबादी
***
अद्ल-गाहें तो दूर की शय हैं
क़त्ल अख़बार तक नहीं पहुँचा
-साहिर लुधियानवी
***
इसमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं
देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाये
-मुनव्वर राना
***
बन के एक हादसा बाज़ार में आ जाएगा
जो नहीं होगा वो अख़बार में आ जाएगा
-डॉ. राहत इन्दौरी
***
तुम किताबों को खंगाले जा रहे हो
ज़िंदगी अख़बार में बिख़री हुई है
-राजेश रेड्डी
***
रात-भर सोचा किये और सुब्ह-दम अख़बार में
अपने हाथों अपने मरने की ख़बर देखा किये
-मोहम्मद अल्वी
***
कल के अख़बार में तू झूटी ही
एक तो अच्छी सी ख़बर रख दे
-शीन काफ़ निज़ाम
***
सुबह ख़ुशियों से तरबतर गुज़री
उसने अख़बार दोपहर डाला
-एजाज़ शेख़
***
शब्दों के दरमियाँ कुछ तक़रार लग रही थी
ख़ामोश-सी नज़र भी अख़बार लग रही थी
-अज़ीम अंसारी
***
जुर्म ये भी तेरे दरबार में आ जाएगा
ख्वाब देखूंगा तो अख़बार में आ जाएगा
-डॉ. असद निज़ामी
***
तेरी नज़रों मे मुजरिम पारसा है
तू मेरे शह्र के अख़बार-सा है
-बिलाल राज़
***
हवा के रुख़ से वो भी हो गये लाचार चुटकी में
हवा का रुख़ बदल देते थे जो अख़बार चुटकी में
-द्विजेन्द्र द्विज
***
अख़बार की ख़बर पे भरोसा ग़लत किया
हमको जगह मिली भी तो कागज़ की नाव में
-हसीब सोज़
***
कभी जो एक पन्ना तोप का मुँह तोड़ देता था
कहाँ गुम हो गयी है आज उस अख़बार की ताक़त
-हरीश दरवेश
***
ख़बर तो सारी ख़बरदार लिये बैठे हैं
बेवजह आप ये अख़बार लिये बैठे हैं
-मध्यम सक्सेना
***
रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे
सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो गये
-नुसरत ग्वालियरी
***
मर गया परसों पड़ोसी भूख से लड़ते हुए
ये ख़बर मुझको मिली है आज के अख़बार से
-नज़्म सुभाष
***
चिंगारियों की फ़स्ल उगाते हैं बर्फ़ में
अख़बार जल रहे हैं ख़बर पानियों में है
-नूर मोहम्मद नूर
***
रोज़ हमें अख़बार दिखाते ख़ून सने किरदार नये
वही पुरानी तस्वीरों में दिखते अत्याचार नये
-राजीव कुमार
***
कितने अख़बार-फ़रोशों को सहाफ़ी लिक्खा
नामुकम्मल को भी ख़ादिम ने इज़ाफ़ी लिखा
पड़ोसी पड़ोसी से है बे-ख़बर
मगर सब के हाथों में अख़बार है
-शकील जमाली
***
अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग
नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए
-शकील आज़मी
***
मर्सिया के वक़्त भी कैसे क़सीदे गढ़ रहा
बेशरम इस दौर के अख़बार पे धिक्कार है
-विवेक मिश्र
***
वसीम ज़ेह्न बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते
-वसीम बरेलवी
***
किसको दफनाऊं किसको जलाऊं बची-खुची मेरी वो जान भी निकाल देता है
सुबह-सुबह अंधेरे-अंधेरे अख़बार वाला मेरे दर पर सैकड़ों लाशें डाल देता है
-अब्बास ताबिश
***
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है
तुम झूठ को सच लिख दो अख़बार तुम्हारा है
-अर्जुन सिंह चांद
***
अब चाय सवेरे की भी लगने लगी कड़वी
अख़बार मुहब्बत की ख़बर काट रहा है
एजाज़ शेख़
***
यारों का हाल भी अब अख़बार से मिलेगा
सोचा न था ये ग़म भी बाज़ार से मिलेगा
-डाॅ. गणेश गायकवाड़
***
फ़र्क़ पड़ता था कभी मारे गये लोगों से
चाय पीता हूँ फ़क़त अब तो मैं अख़बार के साथ
-दख़लन भोपाली
***
अम्न-ओ-अमाँ की बात कहाँ जुर्म हो गयी
अख़बार में छपा हूँ मुझे क़ैद कीजिए
-शिवओम मिश्रा
***
घोल देता है मिरी चाय में ख़ूं की रंगत
हो बुरा सुब्ह के अख़बार बुरा हो तेरा
-ज़मीर दरवेश
***
हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
-अदा जाफ़री
***
जो गुमनामी से थक जाऊंगा औ’ बदनामी चाहूंगा
बनाता था ख़बर अख़बार था मैं सब बता दूंगा
-भवेश दिलशाद

देवदत्त संगेप
बैंक अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त। शायरी के प्रति ख़ास लगाव। उर्दू, हिन्दी और मराठी ग़ज़लों में गहरी दिलचस्पी। मिज़ाह शायरी करने के भी शौक़ीन और चुनिंदा शेरों और ग़ज़लों के संकलनकर्ता के रूप में पहचान।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
