
- May 30, 2026
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प्रो. संजय द्विवेदी की कलम से....
जनसंचार शिक्षा के सामने चुनौतियां
शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति को आत्मनिर्भर, संवेदनशील और मूल्यनिष्ठ नागरिक बनाना है। ऐसा नागरिक जो अपनी विधा में दक्ष होकर समाज को दिशा दे सके। जनसंचार शिक्षा भी इसी लक्ष्य से जुड़ी है। आज मीडिया क्षेत्र को ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता है, जो ‘फ़ॉर्मूला पत्रकारिता’ से आगे बढ़कर समाज के वास्तविक सरोकारों को समझें और उन्हें अभिव्यक्ति दें। मीडिया केवल एजेंडा तय करने का माध्यम न होकर जन-मन की आकांक्षाओं और सपनों का प्रतिनिधि बने, यह तभी संभव है जब मीडिया शिक्षा को संवेदना, भारतबोध और सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ा जाये।

वर्तमान मीडिया का एक बड़ा संकट यह है कि वह सीमित नागरबोध के साथ कार्य कर रहा है। देश की विशाल लोकचेतना और विविधता के बजाय मीडिया का बड़ा हिस्सा शहरी जीवन के कुछ प्रतिशत लोगों की छवि को प्रस्तुत करता है। जबकि भारत की असली ताक़त उसकी लोकपरंपरा, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक संवेदनशीलता में निहित है। ऐसे में ज़रूरी है कि मीडिया शिक्षा पश्चिमी मानकों तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय संचार परंपरा से भी जुड़कर संवाद की उस संस्कृति को पुनर्जीवित करे, जहां संचार केवल व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी माना जाता रहा है।
एक समय यह माना जाता था कि पत्रकार पैदा होते हैं, बनाये नहीं जाते। किंतु आज जनसंचार शिक्षा एक महत्वपूर्ण अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित हो रही है। इसके बावजूद सिद्धांत और व्यवहार के बीच संतुलन का प्रश्न अब भी बना हुआ है। कुछ संस्थान केवल प्रशिक्षण पर ज़ोर देते हैं, जबकि कुछ केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित हैं। वास्तव में, मीडिया शिक्षा में सिद्धांत और व्यवहार दोनों का समन्वय आवश्यक है। शोध और अनुसंधान से नये विचार आते हैं, वहीं व्यावहारिक प्रशिक्षण से छात्र वास्तविक मीडिया जगत की चुनौतियों को समझते हैं।
भारत में पत्रकारिता शिक्षा का इतिहास भी समृद्ध रहा है। वर्ष 1920 में थियोसोफ़िकल सोसायटी के सहयोग से मद्रास में डॉ. एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम प्रारंभ किया। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय और मद्रास विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थानों ने पत्रकारिता शिक्षा को आगे बढ़ाया। 1965 में भारतीय जनसंचार संस्थान की स्थापना ने मीडिया शिक्षा को नयी दिशा दी। आज देश के लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जनसंचार विभाग हैं, साथ ही कई पत्रकारिता विश्वविद्यालय और निजी संस्थान भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
हालांकि विस्तार के साथ गुणवत्ता का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। देश में अनेक संस्थानों में मीडिया शिक्षा दी जा रही है, लेकिन उनके बीच समन्वय, शोध और नवाचार की कमी दिखायी देती है। आवश्यक है कि प्रमुख मीडिया विश्वविद्यालय आपसी सहयोग से ज्ञान, शोध और पाठ्यक्रमों का आदान-प्रदान करें। इससे मीडिया शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।
मीडिया शिक्षा के सामने एक और चुनौती है— समर्पित विद्यार्थियों की कमी। आज कई छात्र केवल ग्लैमर या रोज़गार की दृष्टि से इस क्षेत्र में आते हैं, जबकि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को दिशा देना है। ऐसे विद्यार्थियों की ज़रूरत है, जो धैर्यपूर्वक सीखने को तैयार हों और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव रखते हों। मीडिया शिक्षकों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा, जिसमें विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, संवाद क्षमता और समाज की समझ विकसित हो।
मीडिया शिक्षा के नियमन की आवश्यकता भी लंबे समय से महसूस की जा रही है। देश भर में अनेक निजी संस्थान भारी शुल्क लेकर पत्रकारिता के अल्पकालिक पाठ्यक्रम चला रहे हैं, जिससे गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। यदि ‘मीडिया एजुकेशन काउंसिल’ जैसी कोई संस्था गठित हो, तो पाठ्यक्रमों का मानकीकरण, शिक्षकों की योग्यता और प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
एक महत्वपूर्ण समस्या पाठ्यपुस्तकों की भी है। भारत में मीडिया शिक्षा काफ़ी हद तक विदेशी पुस्तकों पर निर्भर है, जबकि भारतीय मीडिया की संरचना और कार्यप्रणाली अलग है। इसलिए भारतीय संदर्भों पर आधारित पुस्तकों की रचना आवश्यक है। शिक्षकों और शोधकर्ताओं को इस दिशा में पहल करनी होगी, ताकि विद्यार्थियों को देश की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़ा ज्ञान मिल सके।
तकनीकी बदलावों ने मीडिया जगत को तेज़ी से प्रभावित किया है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने संचार की प्रकृति बदल दी है। ऐसे में मीडिया शिक्षा को भी तकनीक के साथ क़दम मिलाना होगा। पारंपरिक मीडिया और डिजिटल मीडिया अब प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक बन चुके हैं। मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में डिजिटल पत्रकारिता, डेटा पत्रकारिता, मल्टीमीडिया उत्पादन और नयी तकनीकों को शामिल करना होगा।
भाषा का महत्व मीडिया शिक्षा में सबसे अधिक है। पत्रकारिता का पहला औज़ार भाषा ही है। तकनीक सीखी जा सकती है, लेकिन भाषा अभ्यास और संस्कार से आती है। पढ़ना, लिखना, सुनना और संवाद करना भाषा को परिष्कृत करते हैं। अनेक सफल पत्रकार और वक्ता अपनी भाषा की शक्ति के कारण ही प्रभावी बने हैं। इसलिए मीडिया शिक्षा में भाषा प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने कौशल, भारतीय भाषाओं और भारतबोध पर ज़ोर दिया है। मीडिया शिक्षा में भी क्षेत्रीय भाषाओं के पाठ्यक्रम विकसित करना आवश्यक है। भारतीय भाषाओं का डिजिटल बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में स्थानीय भाषाओं में सामग्री की मांग और बढ़ेगी। ऐसे में जनसंचार संस्थानों को भारतीय भाषाओं में प्रशिक्षण देकर छात्रों को नयी संभावनाओं के लिए तैयार करना चाहिए।
मीडिया शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे संप्रेषक तैयार करना है, जो समाज के संकटों के समाधान में भूमिका निभा सकें। संवाद के माध्यम से सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सकारात्मक सोच को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसलिए मीडिया शिक्षा को संवेदनशील, ज़िम्मेदार और रचनात्मक दिशा में विकसित करना समय की मांग है।
अंततः पत्रकारिता समाज से अलग नहीं है। समाज में सकारात्मकता, नैतिकता और ज़िम्मेदारी का भाव होगा तो मीडिया भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। इसलिए मीडिया शिक्षा को समाज, संस्कृति और मूल्यों से जोड़कर ही एक सशक्त और उत्तरदायी मीडिया का निर्माण किया जा सकता है। यही प्रयास जनसंचार शिक्षा को सार्थक और प्रभावी बनाएगा।

संजय द्विवेदी
लेखक और वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया शिक्षा, शोध और व्यावहारिक पत्रकारिता-तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली के महानिदेशक रहे और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में कुलसचिव व प्रभारी कुलपति रहने के बाद अब विभाग अध्यक्ष हैं। राष्ट्रबोध और संचार विमर्श संबंधी विषयों पर 33 पुस्तकों का लेखन एवं संपादन। पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ के सलाहकार संपादक भी। संपर्क: 123dwivedi@gmail.com
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