
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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बादल सरोज की कलम से....
उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक
यूं तो हाल के लगभग डेढ़ दशक भारतीय प्रेस – विशेषकर हिंदीभाषी प्रेस – के धीरे-धीरे तेज़ से तेज़तर हुए पराभव और गिरावट के बरस हैं। मगर पिछले दो ढाई महीने, ईरान पर इज़रायल और अमरीका के हमले के बाद के पिछले दो-ढाई महीने, कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से हुए पतन के महीने हैं। इनके विस्तार में जाये बिना सिर्फ़ बीते सप्ताह के हिंदी अख़बारों की मुख्य ख़बरों पर ही नज़र डालने से ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। अभी हाल में मोदी विदेश दौरे से लौटे हैं: क़ायदे से तो प्रेस का काम था कि वह पाँचों देशों की यात्रा के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कर यह पता लगाती कि ये सफ़र शुद्ध अडानी के धंधे के लिए की गयी उसके श्रवण कुमार की यात्रा थी या पसीना बहाने वाली गर्मी से बचने के लिए किया गया ठंडे देशों का पर्यटन। मगर उसका ध्यान किन बातों पर रहा?

नॉर्वे की एक युवा पत्रकार के प्रश्न पूछने की कोशिश भर से प्रधानमंत्री मोदी के लगभग भागने की ख़बर पर सिर्फ़ नॉर्वे ही नहीं दुनिया भर के मीडिया में मज़ाक़ उड़ा: भारत की हिंदी पत्रकारिता के वीर और वीरांगनाएँ पूरी ताक़त से उस युवा पत्रकार के ऐसा पीछे पड़े कि सारी मर्यादाएं तोड़कर चरित्र हनन तक आ गये। इससे भी ज़्यादा हल्कापन इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट खिलाने के प्रधानमंत्री मोदी के हद दर्जे के बचपने के कवरेज में दिखी; जो इस क़दर अशोभनीय हो गयी कि आजिज़ आकर इटली की प्रधानमंत्री को सोशल मीडिया पर मोदी से पल्ला छुड़ाना पड़ा।
लाखों युवाओं सहित उनके परिवारों की ज़िन्दगी में भूकंप ला देने वाले नीट और सीबीएसई घोटाले की जांच-परख, उत्तरदायित्व का निर्धारण प्रेस का काम था – मगर बजाय ऐसा करने के, अख़बार या तो दोषियों की ढाल बने दिखे या जैसे ‘कुछ हुआ ही नहीं हो’ के भाव में नज़र आये। ठीक यही रुख़ सोना न खरीदने, घर में बंद रहने, पेट्रोल और खाने का तेल कम करने की मोदी की सुधार सप्तपदी को लेकर दिखा। कोई भी ज़िम्मेदार प्रेस इस घोषणा के समाज और समूचे अर्थतंत्र पर पड़ने वाले असर का आंकलन करती, उन कारणों की समालोचनात्मक समीक्षा करती जिनके चलते ऐसे कड़े क़दम उठाने का दावा किया गया है। विकल्पों पर विचार करती: मगर लगभग पूरा मीडिया राजा का बाजा बजाते हुए दिखा – उसमे भी हिंदी प्रेस की पीपनी कुछ ज़्यादा ही बेसुरी तान छेड़े मिली।
30 मई 2026 को हिंदी पत्रकारिता के 200 बरस पूरे हो जाएंगे। ताज़े इतिहास में हिंदीभाषी समाज इतिहास से सबक़ लेने की आदत छोड़कर ऐतिहासिक तिथियों को उत्सव बनाने की कला में सिद्ध हो चुका है। ऐसा ही इसके साथ भी होगा, असल में तो होना शुरू भी हो चुका है। 30 मई को यह उरूज पर पहुंचेगा और जिनकी लेखनी और बोलनी दोनों अशुद्धियों से भरी है, ऐसे अनेक महानुभाव हिंदी पत्रकारिता पर प्रवचन देते हुए नज़र आएंगे। इन 200 बरस में इसका कितना और क्या योगदान रहा, कितनी नीचाई पायी, कितना उत्थान रहा, इस पर चर्चा से बचने के सभी तरीक़े ढूंढे जाएंगे।
30 मई 1826 को कलकत्ता – अब कोलकता – से पण्डित जुगल किशोर शुक्ला कानपुर वालों ने उदंत मार्तंड नाम का, हिंदी का पहला अख़बार निकाला था। अंग्रेज़ी, फ़ारसी, उर्दू वग़ैरह भाषाओं में अख़बार इससे पहले भी निकलते थे। छापाख़ाना वर्ष 1674 में ही बॉम्बे – अब मुम्बई – में क़ायम हो चुका था। इस प्रेस से बंगाल गज़ट वग़ैरह अख़बारों के छपने का सिलसिला भी शुरू हो चुका था। मगर हिंदी अख़बार के निकलने में 150 साल लग गये – मज़ेदार बात यह है कि उसका भी प्रकाशन उस बंगाल से हुआ, जिसकी भाषा हिंदी नहीं थी। इस अख़बार का घोषित उद्देश्य हिन्दुस्तानियों के हित सामने लाना और राष्ट्रीय चेतना का संचार करना था।
इसमें दो मत नहीं कि अधिकांश अख़बारों का स्वामित्व अंग्रेज़ या देशी धनाढ्यों के हाथ में रहने के बावजूद प्रेस ने भारत की जनता को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों की भूमिका उल्लेखनीय थी। भारत की आज़ादी का समर्थक हर नेता पत्रकार और सम्पादक भी हुआ था। उसके अख़बार प्रतिबंधित भी हुआ करते थे, उनमें लिखे के लिए जुर्माने भुगतने पड़ते थे, जेलें हुआ करती थीं। कृपया ध्यान दें, यहाँ नियमों की बात की जा रही है, अपवादों की नहीं।
आज़ादी के बाद भी भारतीय भाषाओं में छपने वाले अख़बारों ने आम तौर से समाज को संस्कारित करने, सभ्य बनाने, आगे की ओर देखने वाला बनाने और एकजुट करने में अपनी भूमिका निबाही। अख़बार सिर्फ़ ख़बर भर नहीं देते थे, नज़रिया भी दिया करते थे। सिर्फ़ मत, सम्मत या सत्ता पक्ष को ही जगह नहीं देते थे: विमत, असहमत और विपक्ष को भी प्राथमिकता से स्थान मिलता था। स्तुति और वन्दना से बचते थे, समालोचना और आलोचना को तरजीह देते थे। अख़बार – हिंदी अख़बार भी – देश और दुनिया के हाल बताते थे, सिर्फ़ राजनीति ही नहीं साहित्य, विज्ञान, प्रकृति और ब्रह्माण्ड, संस्कृति और कला के अवदान बताया करते थे। दूर-दूर के खेलकूद के मैदान दिखाया करते थे। बच्चों से लेकर बूढ़ों, आदमियों से लेकर औरतों तक की जानकारी और ज्ञान को नयी उड़ान प्रदान करते थे।
व्यक्ति को इंसान बनाने में शिक्षक और सूचना स्रोत दोनों की भूमिका निबाहा करते थे। पाठकों को सिर्फ़ पाठक नहीं मानते थे, उनकी राय के लिए भी जगह रखते थे। अपनी वर्ग सापेक्ष पक्षधरता के बावजूद यथासंभव समावेशी दिखने की कोशिश की जाती थी। ख़बरों के चयन और सम्पादकीय के मामले में सेठ नहीं, सम्पादक सर्वोच्च होता था। आमतौर से अख़बार मुनाफ़ा कमाने का ज़रिया नहीं हुआ करते थे। मोटा-मोटी यह बात हिंदी के अख़बारों के बारे में भी सच थी।
आमतौर से पूरी और ख़ासतौर से हिंदी की पत्रकारिता के बारे में, अब जब वह 200 वर्ष पूरे कर रही है, यह बात नहीं कही जा सकती। प्रायोजित प्रोपेगंडा, झूठी ख़बरें, नफ़रत बुझी सामग्री, अज्ञान और अंधविश्वास से भरी जानकारियाँ और पूर्वाग्रह में पगी ख़बरें तथा पेड न्यूज़ अब इसकी मुख्य पहचान बन गयी है। सम्पादक विलुप्त हो चुका है, उसके नाम पर जो बचे हैं उनकी मेरुदण्ड – रीढ़ की हड्डी – लुप्त हो चुकी है। पत्रकार हर तरह से असुरक्षित हैं और जो सच में समाचार कहे जा सकते हैं, वे अप्रकाशित हैं। पूरी निर्लज्जता के साथ सत्ता में बैठे – भले वे कितने भी जघन्य अपराधी क्यों न हो – लोगों का गुणगान किया जा रहा है। कई बार तो मालिकों से भी ज्यादा वफ़ादार दिखने के लिए चाटुकारिता की सभी सीमाएं लांघी जा रही हैं।
पत्रकारों के बारे में कहा जाता था उन्हें निष्पक्ष दिखना ही नहीं चाहिए, होना भी चाहिए। आज उस सबको भुलाकर पत्रकारिता – विशेषकर हिंदी पत्रकारिता – लिजलिजाते हुए रेंगते, सत्ता में बैठे राजनेताओं के पांवों में लोटते प्राणियों के झुण्ड में बदलकर रह गयी है। पहरेदार – ‘वॉच डॉग’ – से गोदी मीडिया – लैप डॉग – में बदलकर रह गयी है।
इसी का एक जुगुप्सा जगाने वाला नमूना हाल ही में सामने आया। पत्रकारों की नयी पीढ़ी तैयार करने वाले संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति – जिन्हें (जबसे इस विश्वविद्यालय ने पौराणिक चरित्र नारद को विश्व का पहला पत्रकार माना है और गौमूत्र तथा गोबर पर शोध को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आतुरता दिखायी है, तबसे) कुलगुरु कहा जाता है – ने हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी के मौक़े पर हुए ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ समारोह में इसका उदाहरण प्रस्तुत किया।
कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने सत्ता पार्टी के चरणों की निहारते हुए भावविगलित होते हुए कहा कि “पहले हम यह आयोजन बंगाल में ही करना चाहते थे मगर शायद नियति को यही मंज़ूर था कि पहले बंगाल और कलकत्ता की भूमि का शुद्धिकरण हो, उसके बाद हम उदंत मार्तंड को प्रणाम करने के लिए वहां पहुंचे। बंगाल के लोगों ने शुद्दिकरण का काम संपन्न कर दिया है। इस कार्यक्रम के बाद हम वहीं जाने वाले हैं।”
उनके इस विभाजनकारी और राजनीतिक बयान को बाक़ियों ने ही नहीं, स्वयं इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों ने भी लज्जाजनक बताया है: मगर कुलगुरु लज्जित होना कबका त्याग चुके हैं। बहरहाल पण्डित तिवारी बौने संस्करण हैं, उनसे ज़्यादा निराट बिरादरी के उनसे बड़े, महाकाय, दीर्घाकाय, विराट और भी पधरे हुए हैं। बात व्यक्ति की नहीं है, प्रवृत्ति की है।
इस प्रवृत्ति के फलने–फूलने की एक वजह मीडिया पर धन–पिशाचों का सम्पूर्ण एकाधिकारी वर्चस्व स्थापित हो जाना है। अख़बार सहित मीडिया संस्थानों पर पूंजी का स्वामित्व पहले भी था। मगर यह उनकी तुलना में नया और ताज़ा है। इस आवारा और सटोरिया पूँजी को विज्ञान और आधुनिक चेतना से संपन्न समाज की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उसका निषेध करना अब उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। कुपढ़, वहशी, हिंसक और टूटा–बिखरा अमानुषिक समाज उसकी आपराधिक कमाई के लिए मुफ़ीद भी होगा, मददगार भी। उस तरह का समाज बनाने के लायक़ अख़बार और मीडिया उसे चाहिए। उन्हें ही तैयार किया जा रहा है।

उदंत मार्तंड अंग्रेज़ी राज के चरमोत्कर्ष के समय उन दिनों की उसकी राजधानी कलकत्ता से निकलता था और दो वर्ष तक – जब तक वह आर्थिक संकट के चलते बंद नहीं हुआ तब तक – चलता रहा। आज ऐसा नहीं हो सकता। आज असहमत अख़बार या प्रकाशन संस्थान का चल पाना असंभव बना दिया गया है। यह रुजहान बढ़ता ही जा रहा है। किसी समय जो भारत, 1975-77 के आपातकाल के कोई 21 महीनों को छोड़कर, दुनिया भर में प्रेस की स्वतन्त्रता के लिए तुलनात्मक रूप से निरापद माना जाता था, आज वह प्रेस स्वतंत्रता रसातल में पहुँच चुकी है। दुनिया के 180 देशों में वह पिछली वर्ष के 150वें स्थान से और नीचे गिरकर 157 पर आ गया है। फ़ौजी तानाशाही वाले पाकिस्तान से भी दो श्रेणी और राजशाही वाले भूटान से सात श्रेणी नीचे पहुँच गया है।
यह कहना अच्छा नहीं लगता, मगर स्वयं को धोखा देना भी अच्छी बात नहीं है इसलिए कहना ही होगा कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस, उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक के दो सौ बरस हैं।

बादल सरोज
पत्रकारिता और विचारधारा की राजनीति में चर्चित हस्ताक्षर। कम्युनिस्ट पार्टियों व आंदोलनों में बरसों से सक्रिय। 'लोकजतन' पत्र के संपादक। प्रख्यात जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की अगली पीढ़ी के तौर पर साहित्य में भी आवाजाही। विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में लेखन, आयोजनों में वक्ता के रूप में भी प्रसिद्ध। संपर्क: 94250 06716
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