
- May 30, 2026
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— एल्गोरिदम और प्रो-बिज़नेस नैरैटिव पर आधारित पत्रकारिता का वर्तमान व भविष्य — पत्रकारिता के पतन के लिए ज़िम्मेदार कौन है और किस तरह? — संपादक गुम हुआ और पत्रकार नौकर बन गया! इसके कारण और परिणाम — पत्रकारिता के बेहतर भविष्य के लिए विचारणीय नीतियों की चर्चा
हरीश बी. शर्मा की कलम से....
ज़रूरत जवाबदेह पत्रकारिता की, यह हो कैसे?
इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि अख़बार व्याकरण सिखाने के साधन नहीं होते। समाचार ऐसा होना चाहिए, जो हर आम और ख़ास को एक ही नज़र में समझ आ जाये, लेकिन इस सहमति से मेरा आशय यह भी नहीं है कि हम अख़बार की भाषा को ही बिगाड़ कर दो कौड़ी की कर दें। ऐसी कि सवेरे पढ़ते हुए इस बात की चर्चा करें कि आख़िर इस अख़बार को हो क्या गया है?

अगर हम वर्ष 2026 में यह सवाल करते हैं तो यह बेमानी है, क्योंकि यह इक्कीसवीं सदी की पत्रकारिता है बल्कि इसे मीडिया कहें और अगर आप इसे पत्रकारिता कह रहे हैं तो आप अपने हर्जे-ख़र्चे के लिए ज़िम्मेदार हैं। क्योंकि पत्रकारिता तो तब होगी, जब पत्रकार बचेंगे। अब मीडिया-पर्सन होते हैं, एंकर होते हैं, मीडिया इन्फ्लूएंसर होते हैं। बेशक ये सारे पत्रकारों के वेश में ही होते हैं, लेकिन मजाल है इनसे पत्रकारों वाली अपेक्षा की जा सके। ‘पांच डब्ल्यू’ और ‘एक एच’ का ज्ञान, ख़बर का विवेक और गंभीरता हवा हुई जा रही है।
कहीं ख़बर पढ़ाने के लिए बेसिर-पैर की सनसनी क्रिएट की जा रही है ताकि रीच बढ़ सके तो कहीं ‘मिलते हैं ब्रेक के बाद’ की तर्ज़ पर रहस्य-रोमांच गढ़े जा रहे हैं। यहां तक कि अख़बारों में कैंची हैडिंग को तो फिर भी स्वीकार कर लिया जाता, शब्दों को तोड़-ताड़कर पाठकों को अख़बार पर ठहराने की ट्रिक लगायी जा रही है। सभी को एक स्वर में पत्रकार कहा जा रहा है, लेकिन क्या इन्हें पत्रकार कहना सही है। पत्रकार का सही-सही अर्थ पत्र यानी अख़बार को शक्ल देने वाला होता था। यह संपादक से थोड़ा छोटा और उप-संपादकों के साथ संवाददाता से परिभाषित होने लगा, जिसका अंग्रेज़ीकरण रिपोर्टर हुआ, यही चल रहा है। इस तरह अख़बार के लिए काम करने वालों को पत्रकार कहा जाने लगा। लिहाज़ा सारे पत्रकार हैं।
कहां है पत्रकारिता और पत्रकार?
लेकिन क्या वाक़ई हम पत्रकार हैं? यह सोचना तो पड़ेगा ही। ख़ास तौर से हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मनाये जा रहे जश्न में यह विमर्श ज़रूरी है कि क्या हम पत्रकार कहलाते हुए अपने पूर्ववर्ती किसी पत्रकार जैसे होने की इच्छाशक्ति को लिये हैं या बतर्ज़, ‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना सीना ताने, मंज़िल कहां, कहां रुकना है, ऊपर वाला जाने’ वाला ढर्रा अपनाये हैं। क्या हम अपने पूर्ववर्तियों के इतिहास को जानते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के आदर्श रचे, सिद्धांत गढ़े और मूल्यों से समझौता किये बग़ैर सत्यान्वेषी की छवि बनायी।
भले ही पत्रकारिता में पिछले कुछ सालों में क्षरण आया हो। भरोसे का प्रतीक पत्रकारिता अब निशाने पर रहने लगी है, लेकिन इस बात से मैं सहमत हूं कि आज भी पत्रकार होना सत्य का पक्षधर होना माना जाता है। हालांकि, कुछ उदाहरण परेशान करने वाले हैं, लेकिन यह कुछ ही हैं।
हालात इतने भी बिगड़े नहीं है। आज भी देश में शिक्षक के बाद पत्रकार ही हैं, जिनसे उम्मीद बाक़ी है, लेकिन यह तब संभव है कि पत्रकार रहे। पत्रकार होना पहली शर्त है। इस पहली शर्त में समाहित है, उसे अपनी भाषा, परिवेश और अच्छे-बुरे का ज्ञान। हिंदी पत्रकारिता के दो सौवें साल में खड़ा, जबकि मैं यह कहने से नहीं चूकना चाहता कि यह समय पत्रकारिता के लिए निराशा भरा दौर है, लेकिन मानता हूं कि यहीं से एक धारा निकलने वाली है, जो पत्रकारिता से जुड़ी हर अपेक्षा को पूरा करेगी। अलबत्ता यह कब होगा का सवाल भी करना फ़िलहाल ज़ल्दबाज़ी होगी।
ज़्यादा नहीं चलनी एल्गोरिदम की आंधी
हां, यह ज़रूर कह सकता हूं अगर देश लोकतंत्र रहा तो अपेक्षाकृत जल्द ही होने वाला है एक लोकोन्मुखी पत्रकारिता के समय का प्रारंभ। क्योंकि एल्गोरिदम की आंधी ज़्यादा दिन नहीं चलेगी। गूगल के डायरेक्शन पर चलने वाली पत्रकारिता लाइक और कमेंट्स के भरोसे चाहे जितनी रीच हासिल कर ले, इससे जनमत नहीं बन सकता।
पत्रकारिता का अर्थ कभी भी सनसनी फैलाना, मनारंजन करना या चटख़ारे लेना नहीं रहा है बल्कि यह तो पत्रकारिता के सिद्धांतों के विरुद्ध रहा है। उदंत मार्तंड के संपादक जुगलकिशोर शुक्ल ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके द्वारा लगाया गया हिंदी पत्रकारिता का पौधा दो साल बाद एक धारा को जन्म देगा और यह भी नहीं कि इसमें से निकली हिंदी पत्रकारिता की एक धारा मिठाई और नमकीन की दुकानों पर खड़ी स्वाद का राज़ जान रही होगी या कि हैशटैग से ख़बरें वायरल करने की जुगत में लगी होगी, लेकिन आंचलिक पत्रकारिता के नाम पर अगर ऐसा हो रहा है तो यह ज़्यादा दिन नहीं चलने वाला।
‘चार मरे, चालीस घायल’ वाली सूचनात्मक पत्रकारिता से अघाये लोग ‘कुछ राष्ट्रीय हो जाए’ की तर्ज़ पर सीनियर-पत्रकारों को सर्च करने लगे हैं। इस बात में दो-राय नहीं कि अख़बार या चैनलों की बजाय पत्रकारिता में क्रांति वेब-जर्नलिज़्म से ही आती नज़र आ रही है, यहीं से जनसरोकारों की पक्षधर पत्रकारिता का एक रास्ता बनेगा, लेकिन कुछ इंतज़ार करना पड़ेगा।
बिज़नेस टाइकूनों ने बर्बाद किया
बहरहाल, हम जिस दौर में है, उसे पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता तक पहुंचने की लालसा रखने वाले बिज़नेस टाइकूनों में ख़राब कर रखा है। कम शब्दों में कहें तो ये लोग सत्ताधीशों के चालीसे पढ़वाते हैं। स्तुतियां गवाते हैं। प्रशस्तियों का वाचन करवाते हैं। बदनाम पत्रकार होते हैं। ऐसे पत्रकार जो यह कहते हुए नहीं सकुचाते हैं कि हम तो सेठों की नौकरी करते हैं। जैसा कहेंगे लिखना पड़ेगा। प्रकारान्तर से मानते हैं कि नौकर हैं।

नौकर कभी पत्रकार नहीं हो सकता। पत्रकार कभी नौकर नहीं हो सकता। यह भाव ही इस कर्म को बदमज़ा कर देता है। और इसी से आगे बढ़ते हुए मैं यह कह सकता हूं कि पूरा अख़बार या कोई भी एक समाचार उत्पाद नहीं हो सकता। पाठक उपभोक्ता नहीं हो सकता। अगर ऐसा किया जाता है तो यह पत्रकारिता की नैतिकता के विरुद्ध है। अफ़सोस, ऐसा हो रहा है। आज से नहीं, कईं वर्षों से हो रहा है।
इसकी शुरूआत सबसे पहले समाचार पत्रों से संपादक नाम की संस्था के ख़त्म होने के साथ हुई। आज जब हम बात कर रहे हैं, उस समय तक तो प्रबंध संपादक तय करता है कि कौन-सा समाचार छपेगा और कौन-सा नहीं। प्रबंधन के साथ स्थानीय संपादक, समाचार संपादक या कि कार्यकारी संपादक यह तय करते हैं कि विज्ञापन लाने के लिए किस सेगमेंट पर काम किया जा सकता है। बाक़ायदा, ऐसे नामों के संपादकों के नाम लाभांश में इन्सेन्टिव भी बनता है, लेकिन यह लाभांश नीचे के पत्रकारों तक नहीं पहुंचता। सिर्फ़ यही नहीं। पहले एक ही अख़बार पूरे देश या प्रदेश में देखा जा सकता था। अब तो शहर में भी अख़बार बदले हुए मिलते हैं।
हालात ये हैं कि किसी महानगर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचकर अगर एक ही अख़बार को देखा जाये तो अंदर के पेज बदले हुए मिलेंगे। पहले ऐसा डाक एडिशन में होता था। फिर ज़िलों में होने लगा। फिर हर क़स्बे के लिए अलग अख़बार बनने लगा और आज तो किसी भी महानगर की पूर्व दिशा में बंटने वाले अख़बार में पश्चिम दिशा की ख़बर नहीं हो तो चौंकना नहीं चाहिए।
आंचलिकता की परिभाषा ही बदल दी
अख़बारों की भाषा में यह नयी आंचलिकता है, जिसे अख़बार वालों ने अपनी सुविधा से तोड़ा-मरोड़ा है। आंचलिक-पत्रकारिता का आशय पहले यह नहीं था। छोटे शहरों से निकलने वाली बड़ी ख़बरों के रूप में इसे देखा जा सकता था, लेकिन अब तो इसके पैमाने ही बदल चुके हैं। नयी परिभाषा में एक क्षेत्र की, एक क्षेत्र के लिए, एक क्षेत्र तक की ख़बर करने वाले को आंचलिक पत्रकार कहते हैं। नब्बे के दशक में आंचलिक पत्रकारों ने अपने-अपने क्षेत्रों से बड़ी-बड़ी ख़बरें करके शासन-प्रशासन को चौकन्ना कर दिया था।
लेकिन अब जो नया कॉसेंप्ट सामने आया है, उससे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय तो दूर की बात प्रादेशिक समाचारों से भी स्थानीय पाठक वंचित है। चिंतनीय पक्ष यह है कि वे अख़बारों से ऐसी अपेक्षा भी नहीं करते कि अंतराष्ट्रीय या राष्ट्रीय मुद्दों पर उन्हें इन अख़बारों में सामग्री मिलेगी। ऐसे में वेनेज़ुएला में क्या हुआ या कि ईरान या इज़राइल के बीच चल रहे द्वंद्व की वास्तविक वजहें क्या है और मणिपुर, पश्चिमी बंगाल या पंजाब में क्या चल रहा है… उसकी ख़बरें दिखायी ही नहीं देतीं।
आंचलिक पत्रकारिता के लिए एक नया नैरेटिव बनाया गया है कि लोगों को अपने आस-पास की जानकारियां चाहिए और इस स्थापना के साथ पाठकों को सूचनाएं दी जाने लगी हैं, विश्लेषण और फ़ॉलो-अप मिलता ही नहीं। इन्वेस्टिगेटिव न्यूज़ भी ख़त्म हो चुकी है। बचा है तो सनसनी फैलाने के लिए ‘ब्रेकिंग’ का प्रचलन और इस ‘ब्रेकिंग’ में भी ख़बर आती है- मुख्यमंत्री अपने घर से रवाना, सचिवालय पहुंचे; सांसद ने साइकिल चलायी या विधायक ने क्रिकेट खेला…
पत्रकार नहीं, दोषी पत्रकारिता का कॉर्पोरेटिकरण
लेकिन इसके लिए पत्रकारों को दोषी ठहराना सही नहीं है। इसके लिए पत्रकारिता का कॉर्पोटिकरण कर देना सबसे बड़ा दोष है। पत्रकार द्वारा लायी गयी हार्ड-ख़बर के स्थान पर सॉफ्ट ख़बरों की मांग करने वाले प्रबंधन ने निर्विवाद ख़बरें छापने का यह तरीक़ा अपनाया है, जिससे अख़बार भी भर जाये, दूसरे दिन शिकायतें भी कम आएं और पैसा भी कमाया जा सके।
अख़बार से पैसा कमाने का तरीक़ा सर्वाधिक प्रचलन में है। मेरा इशारा यहां अख़बार के मालिकों द्वारा चलाये जाने वाले दूसरे उपक्रमों से क़तई नहीं है। हालांकि इस तरह के मालिकों के द्वारा चलाये जाने वाले दूसरे व्यावसायिक उपक्रमों पर देश के तंत्र को संज्ञान लेना चाहिए और यह जांच करनी चाहिए कि क्या वास्तव में अख़बार से होने वाले फ़ायदे से पत्रकारों को फ़ायदा मिल रहा है? अगर इस दिशा में कोई बड़ी जांच हो तो चौंकाने वाले परिणाम मिलेंगे। इसलिए यहां इस विषय को मैं नहीं छेड़ना चाहता कि अख़बार और चैनलों के मालिकों का पत्रकारिता से क्या तल्ला-बल्ला है बल्कि मैं तो अख़बार से पैसा कमाने के तरीक़ों पर बात कर रहा हूं।
अख़बारों के प्रबंधन में इन दिनों एक शब्द बड़ा चर्चित है। और वह शब्द है ‘स्पेस-किलिंग’। पहले यह शब्द न्यूज़-रूम में काम में लिया जाता था कि ख़बर को अनावश्यक विस्तार दिया गया है। फिर स्मार्ट-कॉपी का विचार प्रचलन मे आया। रिपोर्टर को तीन सौ शब्द से बड़ी ख़बर लिखने के लिए बाक़ायदा संपादक की सहमति या अनुमति लेनी पड़ती थी। यहीं से पत्रकारिता में प्रबंधन का दख़ल शुरू हुआ। अख़बार में कंटेंट की कमी और ले-आउट पर ज़ोर दिया जाने लगा ताकि स्पेस-किलिंग बंद हो सके। इस शब्द को प्रबंधन ने पकड़ा और हर ख़बर पर इस थर्मामीटर से विचार होने लगा कि छपने वाली ख़बर को कितने लोग पढ़ते हैं और इस पर भी विचार होने लगा कि अख़बार के एक हिस्से में छपने वाली ख़बर पर कितना रुपया लगता है और हद तो तब हो गयी, जब यह तय हुआ कि क्यों न उसी ख़बर को छापा जाये, जिससे इतना फ़ायदा हो और… वैसा होने भी लगा व्यवसाय की ख़बरें तो बाक़ायदा इसी गणित से छापी जाने लगी हैं।
इसके अलावा फ़ीचर इम्पैक्ट जैसे शब्द भी चल निकले हैं, जो चुनाव के दिनों में खुलेआम छपते हैं। इसका मतलब सीधा-सीधा विज्ञापन ही होता है, लेकिन पाठकों को भ्रमित करने के लिए न्यूज़ के फ़ॉरमेट में छपा हुआ, जिसे पेड-जर्नलिज़्म के रूप में भी पहचाना गया है। पत्रकारों के नाम से लिया जाने वाला यह पैसा पत्रकारों का कभी नहीं मिलता, लेकिन बदनाम वही होते हैं।
संपादक नाम की संस्था कबसे ख़त्म
यहां तक कि अख़बार के पहला पेज को पूरी तरह से बेच दिया जा रहा है। नाम दिया जाता है जैकेट। और इस बात पर सवाल उठाने वाली संपादक नाम की संस्था को बीस साल पहले ही ख़त्म किया जा चुका है। अब तो हेड्स होते हैं। साढ़े दस बजे न्यूज़-रूम में जो डमी आती है, उसमें तय होता है कि कितना विज्ञापन होगा। बची हुई जगह में ख़बरों को खपाना है और ऑल्टर करके संबंधित क्षेत्र के पाठकों तक पहुंचाना है। ऐसे में अब यह बीते समय की बात है कि लोकसभा या विधानसभा में अख़बारों की प्रतियां लहरायी जाएं।
आंचलिक-पत्रकारिता का सिर्फ़ यही हश्र नहीं है। अनेक ऐसे पत्रकार समाज में सक्रिय हैं, जिन्हें सही-से इंट्रो तक लिखना नहीं आता, लेकिन वे अपने हौसले से पत्रकार बन गये हैं। यह एक मुश्किल दौर है, जहां बिगाड़ा तो पत्रकारिता को व्यवसाय बना देने से हुआ है, लेकिन बदनाम पत्रकार हो रहा है। पत्रकारों को न सिर्फ़ दूसरे-दूसरे नामों से पुकारा जाने लगा है बल्कि एक शेर भी मकबूल हो रहा है
पहले छपकर बिकता था
अब मैं बिककर छपता हूं
पत्रकारिता बनाम नीति-शून्यता
इसका बड़ा कारण मेरा मानना है, देश की आज़ादी के बाद भले ही हमने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा हो, लेकिन ऐसा नीतिगत कुछ है नहीं। पत्रकारिता चौथा स्तंभ है ही नहीं। सच तो यह है कि पत्रकारिता के प्रति देश के नीतिकार कभी गंभीर नहीं हुए। जिस तरह से तीन पायों के लिए नीतियां बनीं, पत्रकारिता के लिए कोई नीति नहीं बनी जबकि तब तक बल्कि आगे के बीस सालों तक भी पत्रकारिता की कमान पत्रकारों के हाथों ही थी। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को लेकर जिस तरह के नियम-क़ानून थे, वैसे अगर पत्रकारिता के लिए बनाये जाते तो जवाबदेह पत्रकारिता का रास्ता साफ़ हो जाता।
हालात ये हैं कि देश में वेब-जर्नलिज़्म इन दिनों चरम पर है, लेकिन आज तक इसके लिए कोई नीति नहीं है। पत्रकारिता ने लगातार अपना रूप-स्वरूप बदला है, लेकिन इसके लिए कहीं कोई चर्चा नहीं है। आज भी पत्रकार अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। आजीविका को लेकर परेशान है। रिटायरमेंट के बाद मुफ़लिसी में जीने के लिए मजबूर हैं तो दूसरी ओर देखते हैं बड़े मीडिया समूह में काम करने वाले प्रबंधक ख़ूब कमा रहे हैं और देखते ही देखते किसी बड़े पत्रकार को निकाला भी जा रहा है।
पेंफ़लेटीकरण और भोंपूकरण
मीडिया बिज़नेस-मैन के हाथों जाने से अख़बारों का पेंफ़लेटीकरण हो गया और चैनल सरकारी भोंपू में तब्दील हो गये। अपनी मर्ज़ी से विज्ञापन लिये। अपने तरीक़े से इमदादें पायीं और इस तरह से पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गयी।
अगर इन अख़बारों का पूरा फ़ायदा सिर्फ़ पत्रकारों में बांटा जाता तो ये दिन देखने को नहीं आते, क्योंकि अख़बार तो वास्तव में पत्रकार ही चला रहे हैं, लेकिन ज़्यादा प्रतियां छापने की होड़ में, ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन ऐंठने की कलाबाज़ियों में और अख़बार के माध्यम से अपने दूसरे काम करवाने की ट्रिक से पत्रकारों को भी इसमें खपा दिया गया। आज अनेक पत्रकार इस बात के लिए अभिशप्त हैं कि वे अपने रुतबे का उपयोग मालिकों के काम निकलवाने के लिए करें।

पत्रकार नहीं है नौकर…
आख़िर पत्रकार नौकर हो ही कैसे सकता है? वह तो अख़बार का नियंता है, लेकिन ऐसा हुआ। अख़बारों ने नौकरियां दीं। समाचारों को उत्पाद की तरह पेश किया गया और पाठक को ग्राहक माना गया जबकि यह थ्योरी ही ग़लत थी। अख़बार अगर प्रेस से छपने के कारण उत्पाद है भी तो इसकी फ़ितरत मांग और आपूर्ति का सिद्धांत नहीं है। पत्रकार कहां ठकुरसुहाती करते थे। करने लगे तो हालात सभी के सामने हैं। अब तो पत्रकारों को ब्लैकमेलर तक कह दिया जाता है।
पत्रकारिता आज अपने रास्ते से भटक चुकी है। भ्रम में है। पत्रकारिता को कोई धणधोरी नहीं है। अब तो बिज़नेस-मैन क्या, राजनीतिक पार्टियों के भी अख़बार हो चुके हैं।
ऐसी परिस्थितियों में मेरा मानना है अगर पत्रकारिता को बचाना है तो सबसे पहले पत्रकारों को बचाना होगा। पत्रकारों को बचाने के लिए ऐसे युवा पत्रकारों की ज़रूरत है, जो सिर्फ़ पत्रकारिता करना चाहें। ऐसे पत्रकारों के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए अच्छे संस्थानों की ज़रूरत है। बाक़ायदा पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोले जाएं। देश के विधान के तहत यह शर्त रखी जाये कि आने वाले पांच साल बाद वही व्यक्ति पत्रकारिता कर सकेगा, जो मान्य विश्वविद्यालय से डिग्रीधारक होगा। हालांकि अब यह नीति और आचरण यह भी दरकार है कि इन विश्वविद्यालयों का हश्र भी सरकारी कठपुतलियों जैसा न हो।
समस्या की शुरूआत यहीं से हुई कि पत्रकारिता करने के लिए किसी तरह की योग्यता की अनिवार्यता नहीं रही, जिससे अनपढ़ मालिकों ने अख़बार जैसे गंभीर कर्म को बतौर बिज़नेस शुरू कर लिया। धंधा नहीं होता तो क्या होता। फिर काम के लिए पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखा। पत्रकार चेहरा रहा, फ़ायदे में रहे कोई और, यह क्रम लगातार चल रहा है।
नियम कड़े हों, पत्रकारों को लाभ भी मिले
पत्रकारिता को जन सरोकारों वाली पत्रकारिता बनाना है तो कड़े नियमों की ज़रूरत है। अब तय होना चाहिए कि अख़बार हो, चैनल हो चाहे वेब-जर्नलिज़्म, इसके मालिक का भी पत्रकारिता से शिक्षित-दीक्षित होना ज़रूरी होगा। ताकि माल तो मालिक कमाये और जब कोई विवाद का अवसर आये तो पीआरबी एक्ट के तहत संपादक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सके।
यही नहीं, समाचारों के चयन, प्रकाशन और समाचार-तत्वों पर भी वरिष्ठ पत्रकारों की संस्था का हस्तक्षेप होना चाहिए जो किसी भी तरह के ‘एजेंडे’ के तहत होने वाली पत्रकारिता को समझ सके और ज़रूरत पड़ने पर कारण भी पूछ सके। इस तरह की संस्थाओं में शामिल निष्पक्ष और गंभीर हों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ पत्रकारिता के अर्थ को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार ही हों।
इस तरह से जवाबदेह पत्रकारिता की संभावना बनेगी। हर व्यक्ति, जिसके पास एक अदद मोबाइल है, वह पत्रकार बना नहीं फिर पाएगा। पत्रकारिता करने के लिए मान्य संस्थान से परिचय-पत्र जारी हो न कि किसी व्यावसायिक संस्थान से। जैसे सरकारों ने पत्रकारों को अधिस्वीकृत करने की व्यवस्था कर रखी है, इस व्यवस्था को सरलीकृत करते हुए प्रशिक्षित पत्रकारों को कार्ड उपलब्ध करवाए जाएं ताकि इन पत्रकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।
जिस तरह कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के कल्याण के लिए समय-समय पर सरकारें नीतिगत फ़ैसले करती हैं, पत्रकारों के कल्याण के लिए भी हों। यही नहीं, अख़बार निकालने वाले संस्थान चाहे वे व्यावसायिक हों, चाहे ट्रस्ट या संस्थान द्वारा संचालित, लाभांश का अधिकतम हिस्सा पत्रकारों पर ख़र्च हो, क्योंकि पत्रकारों की वजह से ही अख़बार है और अख़बार ही पत्रकार की आजीविका का आधार है।
ऐसा होने पर ही संभव है कि जवाबदेह पत्रकारिता शुरू हो सके। सनद रहे, यह अंकुश के लिए नहीं बल्कि पत्रकारिता के भविष्य के होना चाहिए। किसी भी देश का लोकतंत्र तब ही सफल माना जाता है जब उसके नागरिकों की सक्रिय सहभागिता हो और लोकतंत्र की सार्थकता प्रेस के स्वतंत्र, निष्पक्ष और गंभीर होने में है।

हरीश बी. शर्मा
लेखक और बेबाक पत्रकार के रूप में पहचान। अब तक एक दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके हरीश नाटकों और कहानियों में बोल्डनेस के लिए पहचाने जाते हैं। हिंदी और राजस्थानी दोनों में समानांतर लेखन। महाभारत के आख्यान पर खंड-काव्य 'महाकल्प'। तीन हिंदी कहानी संग्रहों का संपादन 'कथारंग' नाम से किया और 'कथारंग' साहित्य-वार्षिकी का संपादन भी। राज्यगीत दर्जा प्राप्त रचना के अलावा प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के साक्षात्कार भी। राजस्थान साहित्य अकादमी सहित अन्य संस्थाओं से भी सम्मानित। इन दिनों बीकानेर से प्रकाशित साप्ताहिक 'राजसूय' के संस्थापक-संपादक। संपर्क: 9672912603, ईमेल-harishbsharma@gmail.com
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