
- May 30, 2026
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निबंध अजय शर्मा की कलम से....
हिंदी पत्रकारिता नहीं, मानसिकता के 200 साल
हिंदी पत्रकारिता में “महिला” भी दरअसल अक्सर सवर्ण मध्यवर्गीय महिला है। दलित औरत, अल्पसंख्यक औरत और आदिवासी औरत, वहाँ अदृश्य है। उनकी राजनीति, श्रम, नेतृत्व, विचार, शिक्षा, संस्कृति, इन पर गंभीर रिपोर्टिंग न के बराबर है। हिंदी पत्रकारिता स्त्रियों के अधिकारों की बात तब तक सहजता से करती है, जब तक वह “सुरक्षा” तक सीमित हो, लेकिन जैसे ही वह यौन स्वतंत्रता, विवाह और परिवार के दायरे से बाहर जीवन, पितृसत्ता की आलोचना, धर्म और परिवार की आलोचना करती है, हिंदी का संसार पूरी तरह से असहज हो जाता है।
बच्चे हिंदी पत्रकारिता के लिए अदृश्य प्राणी हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे चूहा। उन्हें लेकर न तो प्रश्न उठाए गए और न ही कभी हिदी पत्रकारों ने बच्चों के जीवन, शिक्षा, सेहत जैसे मसलों को गंभीर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया और आज भी वे नहीं हैं।

ग्रामीण भारत की रिपोर्टिंग हिंदी पत्रकार अक्सर सामंती और जातीय दृष्टिकोण से करता रहा है, जहाँ ग़रीब बेचारा है, नागरिक नहीं।
हिंदी में मुसलमान और बाक़ी अल्पसंख्यक
हिंदी के जन्म के दौरान ही उसके भीतर उर्दू और मुस्लिम सांस्कृतिक असर से दूरी बनाने की चेतना बहुत गहराई से मौजूद थी। इसलिए हिंदी पत्रकारिता की शुरुआती मानसिक बनावट में ही मुसलमान एक “बाहरी तत्व” था। यह दूरी हमेशा प्रत्यक्ष घृणा के रूप में नहीं दिखी है, पर रिपोर्टिंग की भाषा, शब्द चयन, फ़्रेमिंग और विषय चयन में लगातार दिखती रही है। लंबे समय तक हिंदी अखबारों में मुसलमान तीन संदर्भों में दिखते रहे– दंगे, अपराध, धार्मिक आयोजन। जब हिंदी पत्रकारिता खुद को धर्मनिरपेक्ष कहती थी, तब भी उसके शब्द चयन में एक गहरा बहुसंख्यकवादी स्वर था, जैसे मुस्लिम इलाक़ा, मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र, हिंदू-मुस्लिम तनाव, दो समुदायों में झड़प आदि। सबसे ख़तरनाक बात यह कि हिंदी पत्रकारिता ने अक्सर मुसलमानों को राष्ट्रवाद की कसौटी पर रखकर देखा।
1990 के बाद से हिंदी पत्रकारिता में मुसलमान एक स्थायी राजनीतिक पात्र बना, जो एक सामान्य नागरिक समुदाय नहीं बल्कि अब 2026 में एक स्थायी संदिग्ध है। हिंदी पत्रकारिता ने ऐतिहासिक तौर पर शायद ही कभी यह समझने की कोशिश की है कि अल्पसंख्यक भी उसी समाज का हिस्सा हैं, जिसकी वह रोज़ रिपोर्टिंग करती है।
और यह बात सिर्फ़ मुसलमानों तक सीमित नहीं। ईसाइयों, सिखों, आदिवासियों, पूर्वोत्तर भारत के समुदायों, सभी के साथ हिंदी पत्रकारिता का संबंध दूर का रहा है। पूर्वोत्तर भारत तो लगभग अदृश्य है, सिवाय हिंसा, उग्रवाद या किसी सनसनीखेज घटना के। इसलिए हिंदी पत्रकारिता में अल्पसंख्यकों की रिपोर्टिंग केवल पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का मसला नहीं है। यह उस गहरे सांस्कृतिक ढाँचे का हिस्सा है, जिसमें बहुसंख्यकों के अनुभव को ही सामान्य भारतीय अनुभव मान लिया गया है। इसीलिए हिंदी पत्रकारिता में अल्पसंख्यक नागरिक कम और प्रतीक ज़्यादा दिखाई देते हैं।
1970 का दशक: पहली बार पत्रकारिता
हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है 1970-80-90 के दशक। जब आज़ादी के बाद सत्ता को चुनौती देने वाला एक वास्तविक विपक्ष उभरा। कांग्रेस की सर्वशक्तिमान छवि पर चोट लगी, और इसी दौरान रविवार, दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, माया जैसी पत्रिकाएँ सामने आईं। इन पत्रिकाओं ने पहली बार हिंदी को साहित्य से बाहर निकालने का प्रयास किया और अंग्रेज़ी पत्रकारिता जैसी रिपोर्टिंग शैली अपनाई। इसी दौरान रिपोर्ट, साक्षात्कार, ग्राउंड स्टोरी, राजनीतिक विश्लेषण, फ़ीचर लेखन, इन सबकी शुरुआत और उनका विकास हुआ।
साहित्यिकता और नैतिकतावाद की छाया अब भी पूरी तरह से मौजूद थी। और इसी समय एक और चीज़ स्थायी हो गई। हिंदी पत्रकारिता पूरी तरह से राजनीतिक पत्रकारिता का पर्याय बन गई, जो आज तक है। आज भी हिंदी पत्रकारिता का 90 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता है। अगर कोई दूसरा विषय कभी सुनाई भी पड़ता है, तो अपने राजनीतिक कोणों की वजह से, जैसे पर्यावरण।
एक और चीज़ जो 1960 के दशक में हिंदी पत्रकारिता में देखने में आती है, वह है वैचारिक धड़ेबंदी। दुनियाभर में मार्क्सवाद को लेकर चले आलोड़न और ख़ासकर अंग्रेज़ी पत्रकारिता का इस ओर झुकाव हिंदी पत्रकारिता में भी झलकने लगा। ख़ास बात यह कि इस वैचारिक धड़ेबंदी का किसी अख़बार या पत्र-पत्रिका के मालिकों से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें पता था कि इसके सहारे वो बाज़ार में टिके नहीं रह सकते थे। वामपंथ का हिंदी पत्रकारिता में प्रवेश तो एक ख़ास वक़्त में हुआ, जब वह अपने इलीट पुरोधाओं के हाथों से निकली और सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों जैसे जेपी आंदोलन और नक्सल आंदोलन की वजह से विमर्श का विषय बनी। मगर दक्षिणपंथ शुरू से ही हिंदी पत्रकारिता में सूक्ष्म रूप में मौजूद रहा है, जो बहुसंख्यक पूर्वाग्रहों, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के ज़रिए उभरता है। दक्षिणपंथ का हिंदी पत्रकारिता में औपचारिक आगमन 1990 के राममंदिर आंदोलन से ट्रेस किया जा सकता है।
उदारीकरण, बाज़ार और नया हिंदी मीडिया
1990 के बाद हिंदी पत्रकारिता का तीसरा अवतार पैदा हुआ। आर्थिक उदारीकरण के साथ आई उपभोक्ता आधारित पत्रकारिता। भारत में कॉर्पोरेट जन्म ले रहा था और इसी के साथ हिंदी का समाचार पाठक-उपभोक्ता में बदल गया। और वह इसके लिए तैयार भी था। इस पाठक वर्ग में ज़्यादातर सीमित वेतनभोगी सरकारी कर्मचारी थे, जिनकी महत्वाकांक्षा नए खुले बाज़ारों में मौजूद अत्याधुनिक उत्पादों को घर लाने की थी जो उनके जीवन में आराम ला सकें, और उनके फ़ायदे के हों, साथ ही उन्हें आधुनिक और संपन्न होने का अहसास करा सकें।
नतीजतन ख़बरें धीरे-धीरे विज्ञापन में बदलनी शुरू हुईं। उपभोग और उपयोगिता हिंदी पत्रकारिता के नए मूल-मंत्र बने। अगर कोई ख़बर ऑटो, रियल एस्टेट, लाइफ़स्टाइल या राजनीति को नहीं छूती, तो वह ख़बर नहीं हो सकती थी। हिंदी का पत्रकार पहली बार नेताओं के साथ-साथ कंपनियों और प्रोडक्ट पर भी नज़र रख रहा था। इसका एक और पहलू यह था कि हिंदी पाठक राजनीति के बाद पहली बार आर्थिक मामले जानने के लिए उत्सुक हुआ क्योंकि वह उसके जीवन से सीधे जुड़ा था। इसी के चलते 1990 के दशक के अंत में हिंदी में आर्थिक रिपोर्टिंग को बाक़ायदा शुरू किया गया, जिसका मूलाधार पर्सनल फ़ाइनेंस था।
हिंदी पत्रकारिता में प्रोफ़ेशनलिज़्म का अंश दिखा, पर यह अंग्रेज़ी पत्रकारिता के इंस्टीट्यूशनल और ऐतिहासिक प्रोफ़ेशनलिज़्म से भिन्न था। चूँकि ज़्यादातर हिंदी अख़बारों और चैनलों के मालिक मध्यमवर्गीय हिंदू सवर्ण कारोबारी थे, तो उनके यहाँ संपादकीय स्वायत्तता हमेशा से सीमित थी या पूरी तरह से ग़ायब थी। अख़बार उनके लिए कारोबारी विस्तार मात्र थे। अपने ही हिंदी भाषा-भाषियों की मुसीबतों, उनकी रूढ़ियों, हिंसा, अज्ञानता, लोकतंत्र के प्रति उदासीनता के प्रति उनकी कोई जवाबदेही या लेना-देना नहीं था।
टेक्नोलॉजी, ग्लैमर और कॉर्पोरेटाइज़ेशन
साल 2000 के आसपास इंटरनेट, कंप्यूटर समेत मुद्रण तकनीकी और रिपोर्टिंग के उपकरणों के विस्तार के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जन्म हुआ और हिंदी पत्रकारिता में ग्लैमर आया। उत्तर भारत के क़स्बों और छोटे शहरों से युवा पत्रकार बनने राजधानी दिल्ली पहुँचने लगे, उसी तरह जैसे वे फ़िल्मों में काम पाने के लिए मुंबई जाते रहे हैं। दिल्ली स्थित कथित ‘राष्ट्रीय’ अख़बारों और चैनलों के लखनऊ, भोपाल, चंडीगढ़, पटना केंद्रों के विस्तार के साथ हिंदी के पत्रकार अब राजधानियों में काम करने लगे।
इस ग्लैमर की वजह से आदिकालीन हिंदी पत्रकार की झोलाछाप छवि में थोड़ा बदलाव आया। मगर यह कहानी भारत की राजधानी में कुछ सवर्ण हिंदू और पहुँच वाले पत्रकारों की ही थी। इनमें आबादी के हिसाब से न तो दलितों और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व था और न ही महिलाओं का। महानगरों में हिंदी पत्रकारों का वेतन कुछ बढ़ा ज़रूर, लेकिन क़स्बों और गाँवों के स्ट्रिंगर महानगरों में बैठे संपादकों के टहलुआ ग़ुलाम (मेरे एक श्रद्धेय संपादक से उधार लिए शब्द) बने रहे। उनके लिए अपने गाँवों-क़स्बों में एकमात्र आकर्षण था प्रेस कार्ड, और वही सबसे बड़ा संसाधन भी रहा, जिसके भरोसे वे अपने स्थानीय राजनीतिक संबंध और छोटे-मोटे कारोबार और फ़ायदे हासिल कर पाते हैं।
गोदी मीडिया का उदय
अंग्रेज़ी पत्रकारिता की तर्ज पर 1990-2000 के बीच हिंदी पत्रकारिता में जो थोड़ी बहुत व्यवस्था-विरोधी चेतना विकसित हुई थी, वह 2010 के आसपास भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान आख़िरी बार बहुत तेज़ी से भभकी और फिर बुझ गई।
इसी के साथ आया एडवाइज़री नाम का एक तौक़। पिछले 50 साल में सत्ता को समझ आ गया था कि हिंदीभाषी प्रेस-मीडिया की उत्तर भारतीय चेतना को तैयार करने में बड़ी भूमिका है। तो इनकी बची-खुची संपादकीय स्वतंत्रता पर धीरे-धीरे एडवाइज़री के ज़रिए अंकुश लगाने शुरू किए गए।

2014 के आम चुनाव के बाद उत्तर भारत में मुख्यधारा के हिंदी मीडिया के बड़े हिस्से ने सत्ता के साथ अपनी वफ़ादारी ज़ाहिर की। इसकी ऐतिहासिक ज़मीन पिछले 200 सालों में ही तैयार हुई है। 2019 के चुनाव तक क़रीब-क़रीब 95 प्रतिशत कथित राष्ट्रीय और मुख्यधारा के हिंदी मीडिया ने सत्ता के साथ सहवरण (कोऑप्ट) कर लिया है। बचे-खुचे स्वतंत्र हिंदी पत्रकार और हिंदी डिजिटल मीडिया ने इसे गोदी मीडिया का नाम दिया है। ध्यान रहे कि यह केवल राजनीतिक समर्थन नहीं है, यह पूर्ण वैचारिक समर्पण है। ऐतिहासिक तौर पर हिंदी पत्रकारिता से यही अपेक्षित था और है।
डिजिटल प्रतिरोध और विस्तार
हिंदी पत्रकारिता पूरी तरह से सत्ता का अनुषांगिक अंग बनने से बची तकनीकी की वजह से। गोदी मीडिया के साथ ही सोशल मीडिया आया था। जिसका फ़ायदा शुरू में सरकार ने और गोदी मीडिया ने भरपूर उठाया। मगर इंटरनेट हमवार ज़मीन मुहैया कराता है। इसलिए जल्दी ही इन्हीं डिजिटल प्लेटफ़ार्मों पर हिंदी पत्रकारिता का एक नया चेहरा सामने आया, स्वतंत्र, स्व-प्रेरित, व्यवस्था-विरोधी डिजिटल हिंदी पत्रकारिता। गोदी मीडिया के उलट यह वर्ग पूरी तरह से शक्तिहीन और संसाधन विहीन तो है ही विशालकाय सरकारी प्रचार तंत्र और गोदी मीडिया से भी जंग लड़ रहा है।
इस दूसरे वर्ग के बहुत से पत्रकार मूल रूप से कभी मुख्यधारा के मीडिया के असंतुष्ट हैं। कुछ ऐसे हैं, जो ख़ुद अपना कैमरा और माइक लेकर सिर्फ़ जुनून के सहारे या जीविका कमाने के मक़सद से डिजिटल क्रिएटर बन गए हैं।
फिर भी विडंबना कायम है, कि हर तरह के हिंदी डिजिटल मीडिया में राजनीति और मनोरंजन अब भी केंद्र में हैं। पर्यावरण, विज्ञान, तकनीक, इतिहास, संस्कृति, श्रम, शिक्षा, सेहत, इन पर काम अब भी एक प्रतिशत से भी कम है। जबकि डिजिटल ने इन विषयों के दिखाई देने की जगह मुहैया करा दी है।
त्रासदी
हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि वह पक्षपाती है। दुनिया की लगभग हर पत्रकारिता किसी न किसी वैचारिक झुकाव पर चलती है। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह पेशेवराना नहीं है, उसे लगता है कि वही जनता है। वह अपने पूर्वाग्रहों को पूर्वाग्रह मानती ही नहीं। वह उन्हें जनता की आवाज़, राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा, जनमानस जैसे सत्ता की शब्दावली में छिपा लेती है। और इसी में उसकी बौद्धिक जड़ता की जड़ें मौजूद हैं।
दुनिया की विकसित पत्रकारिताएँ अपने समाज और राजनीति से हमेशा एक आलोचनात्मक दूरी बनाकर चलती हैं। वे अपने पाठकों के सरोकारों को तो स्वर देती हैं, पर उनकी इच्छाओं को चुनौती भी देती हैं। इसके उलट हिंदी पत्रकारिता उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू बहुसंख्यक पुरुष मानस का विस्तार है। हिंदी पत्रकारिता ने शुरू से अपने समाज की आलोचना के बजाय उसकी असुरक्षाओं और रूढ़ियों को वैधता दी है।
हिंदी पत्रकारिता की दूसरी बड़ी त्रासदी यह है कि उसने सूचना को कभी पर्याप्त नहीं माना है। उसे हमेशा नैतिक निष्कर्ष चाहिए। इसीलिए उसमें तथ्य कम और भावनात्मक उद्वेग और निष्कर्षण अधिक दिखाई देते हैं।
हिंदी पत्रकारिता की एक स्थायी बीमारी है, अति-सरलीकरण। उसके पास न धैर्य है, न शोध की संस्कृति, न बौद्धिक अनुशासन। वह जटिलताओं से असहज हो जाती है।
हिंदी पत्रकारिता ने अपने पाठक को कभी विकसित नहीं होने दिया। उसने उसे उसी सीमित भावनात्मक दायरे में क़ैद रखा, जहाँ धर्म, राजनीति, मनोरंजन और सनसनी सबसे ऊपर होते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विज्ञान, तकनीक, दर्शन, अर्थशास्त्र, पर्यावरण, श्रम-अध्ययन, मानवाधिकार, विश्वविद्यालयी बहसें, इन सबको हिंदी मीडिया ने दशकों तक गैरज़रूरी माना। हिंदी पत्रकार को लगता रहा है कि उसके पाठक को इन चीज़ों में दिलचस्पी नहीं है। असल में यह संपादकीय आलस्य, बौद्धिक अक्षमता और आर्थिक असुरक्षा ही है।
मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता ऐतिहासिक तौर पर सत्ता के साथ सहज है। उसने सत्ता की भाषा को ही जनभाषा माना है। इसीलिए हिंदी पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता हमेशा सीमित रही है। संस्थागत भ्रष्टाचार, सेना, न्यायपालिका, बड़े उद्योग, धार्मिक संगठनों, जातीय नेटवर्कों, इन सब पर व्यवस्थित खोजी रिपोर्टिंग की परंपरा कभी मज़बूत नहीं हो पाई।
भविष्य
हिंदी पत्रकारिता का भविष्य तकनीकी उलझनों से भरपूर, काफ़ी जटिल और भयावह है। हिंदी दुनिया के सबसे बड़े भाषाई बाज़ारों में एक है और हिंदी पत्रकारिता जिस मानसिक, सामाजिक और संस्थागत ढाँचे पर खड़ी है, वह भीतर से पूरी तरह से जर्जर है।
मगर यह सिर्फ़ तकनीक से तय नहीं होगा, बल्कि व्यापक हिंदी पट्टी के रेस्पॉन्स से तय होगा। क्या हिंदी ख़ुद को लोकतांत्रिक, बौद्धिक और आधुनिक बनाना चाहती है। हिंदी मीडिया संस्थान कॉन्टेंट फ़ैक्ट्रियों में बदल रहे हैं। यानी ख़बर अब सार्वजनिक सूचना नहीं, उपभोक्ता व्यवहार का उत्पाद होगी। आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस इस प्रक्रिया को और तेज़ करेगी। और इस वजह से हिंदी पत्रकारिता अत्यधिक प्रतिक्रियावादी, शोर आधारित और सतही होती जाएगी।
भविष्य पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं। पहली बार हिंदी के डिजिटलाइज़ेशन के चलते बहुलता दिखने लगी है। वो लोग लिख-बोल रहे हैं जो पहले अदृश्य थे, दलित, महिला, क्वीयर लेखक, छोटे शहरों के स्वतंत्र रिपोर्टर, आदिवासी लेखक, क्षेत्रीय इतिहासकार, विज्ञान और पर्यावरण लेखक…
मगर डिजिटलाइज़ेशन ने अवसर के साथ ही अराजकता भी दी है। फ़ेक न्यूज़, सांप्रदायिक प्रचार, मॉब नैरेटिव, ट्रोल आर्मी, डीपफ़ेक वीडियो, एआई से पैदा किया गया झूठ, इन सबके घालमेल का सबसे बड़ा मैदान हिंदी बनने वाली है। क्योंकि विशाल आबादी, कम मीडिया साक्षरता, तेज़ राजनीतिक ध्रुवीकरण और भावनात्मक सूचना संस्कृति हिंदी क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं। एक पंक्ति में कहें तो हिंदी पत्रकारिता का भविष्य तकनीकी रूप से समृद्ध पर बौद्धिक रूप से और अधिक असुरक्षित होने जा रहा है।

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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