
- June 7, 2026
- आब-ओ-हवा
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डायरी शशि खरे की कलम से....
तब भी न्याय न मिलता माणिक मेहता!
14.05.26, रायपुर
कल स्टेशन से घर आते हुए दाहिनी तरफ़ के पहले मकान पर नज़र गयी। उसके सामने एक सफ़ेद कार खड़ी रहती है। कुछ साल पहले आटो न मिलने पर माणिक मेहता मुझे उसमें बिठाकर स्टेशन छोड़ने गये थे। रास्ते में अपनी कार का नाम रामप्यारी बताया था। रामप्यारी की आदतें, नखरे इस तरह बता रहे थे जैसे वह कार नहीं इंसान हो। रामप्यारी के डैशबोर्ड पर छोटा-सा तिरंगा लगा था। याद नहीं आ रहा कल रामप्यारी वहाँ थी या नहीं।
सुबह की ख़बरें पढ़ते हुए अनिल ने कहा तुम्हारे माणिक मेहता अगली यात्रा पर निकल गये हैं, कल, कल दोपहर या शाम। पड़ोसियों ने देखा 12 ता. की सुबह 10 बजे से बाहर का दरवाज़ा खुला तो फिर रात भर और अगले दिन तक खुला ही पड़ा रहा। तब पुलिस आयी।
अब पीएम रिपोर्ट से पता चलेगा कि हार्ट अटैक या मर्डर।
पिछली डायरी पढ़ने के लिए क्लिक करें: यही तो है ड्रैकुलावाद
साल भर पहले एक दोपहर साढ़े तीन बजे लाल भभूका चेहरा लिये थके-पस्त-से माणिक घर आये थे। उस दिन वह बहुत वृद्ध लग रहे थे जबकि आज पेपर में पढ़ा, वह तो अभी 54 साल के हुए थे।

वह शिकायत करने आये थे- कैसी बाई भेजी आपने! उसने बुरी तरह धोखा दिया। कहती थी सुबह आ जाऊँगी, उसके इंतज़ार में काम पड़ा रहा, आज पेशी थी। भूखा-प्यासा कार दौड़ाता बिलासपुर हाईकोर्ट गया। लेकिन फिर भी देर हो गयी थी, मुश्किल से जज को मनाया, तीन हज़ार फ़ाइन दिया। झूठ क्यों बोला उस बाई ने?
ये काम वाली घरेलू बाई लोग मुफ़्त-मुफ़्त सारी सुविधाएँ पाकर किसी की तकलीफ़ नहीं समझतीं। ऊपर से दिन-रात अतार्किक विचारों का प्रचार कि ये प्रताड़ित हैं, दबे-कुचले हैं… इन बातों ने इन्हें इतना स्वार्थी और अमानवीय बना दिया है कि इन्हें लाश से भी इनाम लेने की इच्छा होती है।
माणिक वैसे भी ब्रेन हेमरेज से उबरे थे। बहुत बीमार थे, लेकिन अपनी बहन के सम्मान के लिए जो युद्ध कर रहे थे, उसमें ‘जीतकर ही रहूँगा’ का जज़्बा था।
उस इंसान के आत्मविश्वास और साहस के बारे में सोचकर हैरान होती थी… इस बीमारी के बाद अकेले नहीं रहना चाहिए लेकिन वे दूर-दूर तक गाड़ी ख़ुद ही ड्राइव करते थे।
उस दिन माणिक मेहता ने बताया था पूरे सिस्टम से लड़ रहा हूँ।
वह मेरा प्रतिपक्षी वह अपराधी एक के बाद एक प्रमोशन लेता रहा है क्योंकि उसने कइयों के काले चिट्ठों के प्रमाणों की फ़ाइलें बना रखी होंगी। मैंने भी बहुत मेहनत की है, मैं एक अकेला ही सबको नाकों चने चबवा रहा हूँ। अगले माह फैसला आ जाएगा।
उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलका। अपनी पूरी ज़िंदगी की तपस्या के लिए संतुष्टि झलकी।
साल भर पहले किसी ने बताया था “उनकी बहन, उनकी डॉक्टर बहन ने आत्महत्या नहीं की थी, हत्या हुई थी।” यह प्रूफ़ करने के लिए माणिक मेहता ने पूरी ज़िंदगी ख़र्च कर दी, न विवाह किया न घर का सुख-चैन लिया।
सुरक्षा के लिए कैमरे और दो कुत्तों का साथ, रेशम और शेरा।
कितनी कठिन होती है ज़िंदगी। बस एक मुक़द्दमे में न्याय पाने की आशा में इंसान जीना ही छोड़ देता है।
केवल साँसें चलती हैं, फ़ाइलें बनती हैं, पेशी पर पेशी देते हुए ब्रेन हेमरेज, हार्ट अटैक सब मिलेगा पर हमारे महान गरिमा, गौरव वाले देश के प्रजातंत्र में न्याय व्यवस्था में न्याय जीते-जी नहीं मिलेगा।
एक कहानी तो बन गयी, एक मिसाल बन गयी कि एक डॉक्टर बहन ने शादीशुदा आदमी के बहकावे में आकर स्वयं की और पूरे परिवार की ज़िंदगी बर्बाद कर दी। किन्तु बहन की इस नासमझी इस भूल को माफ़ करने वाला वह कितने बड़े दिल का भाई था, जिसने बहन को इंसाफ़ दिलाने के लिए अपना घर तक नहीं बसाया था।
बहन के सम्मान के लिए लड़ते-लड़ते जान चली गयी।
क्या वकील ऐसा नहीं कर सकते कि कभी रहम दिखा दें?
नौकरशाही, वकीलों के द्वारा केस लंबा खींचने के लिए नित नये दाँव-पेंच, सब समझते हुए भी अगली तारीख़ देने को मजबूर न्याय व्यवस्था— माणिक मेहता आप अपनी पूरी उम्र जीते, तब भी न्याय नहीं मिलता।
ये सिलसिला लड़कियों का शोषण करने के बाद उनकी मौत का सिलसिला चलता ही जा रहा है। इसी दिन भोपाल में एक और बहन की “आत्महत्या” ‘कर’ दी गयी। एक अच्छी-ख़ासी खुशमिज़ाज लड़की की ज़िंदगी शुरू होते ही ख़त्म हो गयी।
सरसराहट महसूस हुई तो नज़र गयी ड्रैकुला पर। वह परेशान-सा सिर हिलाने लगा.. नुकीले नाख़ून वाले हाथों से लगातार न-न-न का चिह्न बनाते हुए बोला– यह मैं नहीं, मैंने नहीं किया। मैंने किसी भोली, मासूम, नासमझ को शिकार नहीं बनाया। नहीं मारा। मेरे शिकार केवल लालची लोग बनते हैं…
मैंने दुबारा उसे ध्यान से देखा, उसकी हमेशा जलती सुर्ख़ आँखें आज बुझी हुई थीं। उनमें हल्की-सी नमी थी। उसने सर झुका लिया और चला गया।

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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सिस्टम और इस सिस्टम में काम करते संवेदनहीन, लालची लोगों ने न जाने कितने व्यक्तियों, घर-परिवारों की जिंदगी नर्क बना रखी है। बहुत मार्मिक घटना है।