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नियमित कॉलम भवेश दिलशाद की कलम से....

ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?

             महाकाव्यों का सबसे बड़ा विरसा होता है कि ये देश और काल की हदों को बेमानी कर देते हैं। कभी अप्रासंगिक नहीं होते। अब भी प्रासंगिक रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ आज के हालात को समझने के लिए हमें सूत्र देते हैं। मसलन, युद्धों की विभीषिका, विडंबना और भयानक परिणामों को समझने के लिए हम ऐसे अनेक महाकाव्यों के पात्रों और घटनाओं से जुड़ जाते हैं क्योंकि ये हमारी साइकी के हिस्से होते हैं।

मिसाल के तौर पर, आज के हालात में हमें राजनीतिक शुचिता या नैतिकता पर बात करना बेमानी लग सकता है। क्यूंकि ये शब्द आज के बदले हुए आचरण एवं वैचारिक व्याकरण में खोखले-से लगते हैं। राजनीतिक शुचिता की मांग पक्षपाती दिखती है। एक तरफ़ हम सत्ता और राजनीति के स्थापित घाघों के सौ ख़ून माफ़ करने को तैयार हैं दूसरी तरफ़, नौजवान पीढ़ी के विद्रोह के समय उसकी नैतिकता और शुचिता जांचने के लिए गांधी से लेकर भगवद्गीता के पन्ने तक खोले हैं। ऐसे बर्ताव से होता यह है कि हम ​कुछ विशिष्ट विचारों और शब्दों की ध्वनि एक काल विशेष में ध्वस्त या भंग कर देते हैं।

शब्द बेजान लगते हैं, तब हम जड़ों की ओर लौटते हैं। रामायण या महाभारत जैसे ग्रंथों से राजनीति के पाठ लेकर आते हैं और प्रतीकों व रूपकों में बांधकर, यादों का लिबास पहनाकर अपनी बात, अपनी आवाज़ को नया स्वर, नयी ताक़त देने की कोशिश करते हैं। ज़ाहिर है किसी प्राचीन नाद का पुनर्पाठ इतना आसान भी नहीं कि गला किसका है—कोयल का या कौवे का— फ़र्क ही न पड़े। यह जोखम लेने का काम कला में सिद्धि के बग़ैर हास्यास्पद भी हो सकता है। दूसरा पहलू यह कि कला में सिद्धि श्राप से कम भी नहीं होती।

महाकाव्यों को नये सिरे से टटोलने का जोखम कोई सिद्ध कलाकार कब और क्यूं उठाता है? जवाब कई हो सकते हैं और उनमें से एक यह भी मुमकिन है कि जब कलाकार अपने समय को पुकारने के लिए अपने समकाल से किसी आवाज़ को पुरअसर और संपूर्ण नहीं पाता, तब वह सभ्यता की जड़ों की ओर लौटता है, जहां हर पल फैलती हुई वैचारिक आकाशगंगाओं के ब्लैक होल्स महफ़ूज़ हैं।

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सिद्ध कलाकार वह है, जो अपनी एक छाप, एक दृष्टि और अपना एक अनूठापन हासिल कर लेता है। इसे कोई क्राफ़्ट कह सकता है, कोई सिग्नेचर स्टेटमेंट। होमर रचित महाकाव्य ‘ओडिसी’ को पर्दे पर लाने की वजह से सुर्ख़ियों में बने हुए क्रिस्टोफ़र नॉलन बेशक हमारे समय के ऐसे फ़िल्मकार हैं, जो पर्दे पर अपने अंदाज़ का एक अनुभव रच पाने के लिए ख़ासी इज़्ज़त पा चुके हैं। विश्व सिनेमा के समकाल में वह अपनी अलग पहचान रखते हैं और उनके कुछ समर्थक तो यहां तक कहते हैं कि वह स्वीकार्यता की हदों से पार निकल गये हैं यानी आप उन्हें पसंद करें या नापसंद… आलोचना से फ़र्क नहीं पड़ता!

सृजन-आलोचना-पुनर्सृजन… यह एक क्रम है। नॉलन आलोचक या कलाशास्त्री हैं या नहीं… रचयिता ज़रूर हैं। आलोचक अपनी प्रतिक्रियाएं शब्द में दे सकता है और एक रचयिता का सबसे सटीक जवाब उसकी रचना होती है। इस लिहाज़ से भी एक नज़र देखा जा सकता है कि नॉलन की पिछली फ़िल्म ‘ओपेनहाइमर’ को लेकर हुई कुछ आपत्तियों को वह हालिया फ़िल्म ‘ओडिसी’ में कैसे डील करते हैं।

‘ओपेनहाइमर’ से सबसे प्रमुख शिकायतों में से एक क्या थी! अस्वाभाविक और तेज़ रफ़्तार संवादों की झड़ी-सी लगा दी ​गयी जिससे वैज्ञानिकों, विचारधाराओं और राजनेताओं के बीच बने हुए तत्कालीन एक बड़े भयानक जाल की समझ के बजाय और उलझाव की स्थिति बन गयी।

इस आलोचना को ‘ओडिसी’ में नॉलन कुछ हद तक डील करते हुए दिखते हैं, हालांकि पश्चिम में सिनेमा की विद्वान आलोचक का सबसे तीखा पक्ष इस​ फ़िल्म की पटकथा और संवादों से बुरी तरह खिन्नता है। भारतीय कलाविदों के किसी मंच पर एक टिप्पणी में कहा गया, “एमिली विल्सन की बात अपने संदर्भ में सही हो सकती है। यूनानी महाकाव्य से अत्यधिक परिचित दर्शक/आलोचक शायद पात्रों और कथानक की अधिक गहरी पुनर्व्याख्या चाहते हों। लेकिन हमारे हिस्से की दुनिया में, जहाँ ‘ओडिसी’ उतनी लोकव्यापी नहीं है, यह आलोचना कुछ अधिक कठोर लगती है।”

ग़ैर-रेखीय होने की वजह से भी ‘ओपेनहाइमर’ के अव्यवस्थित और उलझाऊ होने की शिकायतें थीं। ग़ैर-रेखीय तो ‘ओडिसी’ है ही क्योंकि महाकाव्य अमूमन ऐसे ही होते हैं। अंतर्कथाओं और जाने कितनी ही सतहों पर एक साथ चलते हुए, तो ‘ओडिसी’ से यह शिकायत करना बेमानी हो सकता है।

जो भी है, पश्चिम में ‘ओडिसी’ के लिए नॉलन आलोचना के घेरे से बाहर तो नहीं हैं। एमिली विल्सन, डैनियल मेंडलसन जैसे आलोचक होमर रचित महाकाव्य ‘ओडिसी’ के तत्वों को नये सिरे से पेश करने के लिहाज़ से नॉलन की फ़िल्म ‘ओडिसी’ को खरी-खोटी सुनाने में पीछे नहीं रहे। दुनिया भर में नॉलन की फ़िल्म अतिवादी प्रतिक्रियाओं के लिए चर्चित है। चाहने वाले ख़ूब चाह रहे हैं और नापसंद करने वाले एकदम ख़ारिज कर रहे हैं।

इन आलोचनाओं को ख़ारिज करने के लिए नॉलन के प्रशंसकों की तरफ़ से भी प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है और एमिली आदि को ऑनलाइन ट्रोलिंग लॉबी तक बताया जा रहा है। तमाम दलीलों में एक यह भी है कि फ़िल्म की व्यावसायिक सफलता हर आलोचना का जवाब है! इस स्तर के तर्क क्या कला-विमर्श को अपाहिज नहीं करते?

माना जा सकता है नॉलन अपने क्राफ़्ट के इतने हो चुके हैं कि अब उनके लिए किसी स्ट्रक्चर का हो पाना संभवत: संभव ही न हो। यहां मक़सद इस फ़िल्म की समीक्षा या प्रशंसा नहीं है बल्कि उनके रचना-संसार से उनकी रचना प्रक्रिया के कुछ और सूत्रों को समझने की चेष्टा है।

मुझे याद है एक इंटरव्यू में, एक सवाल के जवाब में गुलज़ार साहब ने माना था कि हर कलाकार का एक मरक़ज़ी अहसास होता है और वह ज़िंदगी भर जो कुछ रचता है, ज़्यादातर उसकी तलाश उसी केंद्र के आस-पास होती है। दूसरे शब्दों में, कलाकार किसी एक ख़ास शय को अलग-अलग तरह से टटोल रहा या एक्स्प्लोर कर रहा होता है। मैं इंटरव्यूअर होता तो पूछता कि क्या यह मुमकिन है कि कलाकार ख़ुद इससे बेख़बर हो!

नॉलन के बारे में बात करते हुए उनकी पिछली कुछ फ़िल्मों पर ध्यान जाता है। मैंने उनकी जो फ़िल्में देखी हैं, उनमें से मेमेंटो, इन्सेप्शन और ओपेनहाइमर के हवाले से मेरा ख़याल है कि ‘ओडिसी’ तक पहुंचने से पहले वह ‘ओडिसी’ के केंद्रीय भाव को टटोल रहे थे। अलका साहनी अपनी टिप्पणी में इस बात को यूं रखती हैं कि घर लौटने की छटपटाहट या खोये हुए, गुमे हुए को पाने की बेचैनी मेमेंटो (2000), बैटमैन बिगिन्स (2005), इन्सेप्शन (2010) और इंटरस्टेलर (2014) के मुख्य पात्रों की रचना में रही है।

अलावा इसके, मुझे लगता है इस छटपटाहट के साथ ‘ओडीसियस’ के पास एक अपराध बोध बहुत आकर्षक और ग़ौरतलब रूप में उभरकर आया है। फिर मुझे इन्सेप्शन और ओपेनहाइमर के मुख्य पात्र के अपराध बोध (भले ही डैनियल ने आरोप लगाया कि होमर के ओडीसियस के आकर्षण को छीनकर नॉलन ने उसे ओपेनहाइमर या मेमेंटो के नायकों के समान अपराध बोधग्रस्त, कमज़ोर नायक में बदल दिया) की भी याद आती है। नॉलन ‘ओडिसी’ में इन केंद्रीय भावों को परिपक्वता और सुगढ़ व्याख्या के साथ हासिल करते हुए लगते हैं।

सोचिए एक कलाकार किसी पूर्ववर्ती कलाकार की कृति को नये सिरे से गढ़ते हुए अपने आपको, अपनी किसी धुरी को हासिल कर पाता है… कुछ हद तक ही सही या कहें कि कुछ पलों के लिए ही सही ख़ुद को छू पाता है, देख पाता है… सदियों की लंबी दूरी को पार करते हुए… यह कितना हैरतअंगेज़ और तसल्लीबख़्श अहसास है।

मुझे याद है ‘राम की शक्तिपूजा’ और उस पर लिखे गये ‘बहुत कुछ’ में से ‘कुछ-कुछ’ के अध्ययन के दौरान मैंने जाना था कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने इस कविता में अपनी सृजन यात्रा के केंद्रीय भाव का चरम छुआ। जाना था कि ‘तुलसीदास’, ‘सरोज स्मृति’ आदि कविताओं में वह अपने जिस मरक़ज़ के आस-पास दिख रहे थे, ‘राम की शक्तिपूजा’ में उसे छू लेते हैं, कुछ आलोचकों के हिसाब से तो पा भी लेते हैं और क्या ख़ूब।

निराला के साथ यही हुआ कि उन्हें वह मरक़ज़ एक महाकाव्य की पुनर्व्याख्या या नया रूप देने की चेष्टा में ही मिला। हर काल में राम-कथा को नये रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती रही है। साहित्य ही नहीं बल्कि रंगमंच, सिनेमा और न जाने कितने कला माध्यमों में। आधुनिक काल में निराला जैसी तसल्ली किसी और के नाम हो, कह नहीं सकता।

नॉलन को नया निराला कहना कहां तक ठीक होगा? मैं वाक़ई नहीं जानता। ‘ओडिसी’ देखकर बहुत कुछ महसूस हुआ। कई जिज्ञासाएं भी जागीं तो उसके बारे में कुछ और भी पढ़ने का, जानने का मन हुआ। पिछले कुछ दिनों में कुछ-कुछ टटोला। एमिली ने अपनी आलोचना में यह भी कहा कि नॉलन ने अपनी ‘ओडिसी’ में देवताओं की भूमिका उतनी बड़ी नहीं रखी, जितनी होमर के महाकाव्य में है।

बताते हैं नॉलन ने ख़ुद कहा कि वह देवताओं को अधिक मानवीय रूप देना चाहते थे। अलौकिक घटनाओं को प्राकृतिक घटनाओं की तरह समझाना चाहते थे। यहां फिर निराला याद आ रहे हैं।

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हमने कितने ही प्राध्यापकों और किताबों से पढ़ा था कि निराला के राम, तुलसी के राम से अधिक मनुष्य हैं, मनुष्यतर हैं और ‘राम की शक्तिपूजा’ की यह उपलब्धि ऐतिहासिक रही है। कहीं यह भी पढ़ा था कि “वह रहा एक मन और राम का जो न थका”… निराला की इस कविता की प्रमुख विचारभूमि ही अर्नेस्ट हेंमिग्वे के ‘दि ओल्ड मैन एंड द सी’ का एक बड़ा विचार रही थी।

अब इस सिरे से बात की जाये कि एक पूर्ववर्ती महाकाव्य की पुनर्व्याख्या के प्रयास को अपने समय के संदर्भ में भी तो समझना होता है। मसलन, अध्ययन से पता चलता है तुलसीदास ने अपने समय की नब्ज़ को समझकर ही लोक-चेतना के उद्देश्य से वाल्मीकि रामायण को लोकभाषा में ढालने का जतन किया था। और निराला ने यह जतन अपने समय में किया। भाषा के अलावा वैचारिक ज़रूरतों को समझना भी एक पक्ष है।

‘राम की शक्तिपूजा’ का प्रकाशन 1936 और उसकी लोकप्रियता बाद के अरसे में रही। वह स्वाधीनता के लिए संघर्ष का समय था। तरह-तरह की मुश्किलात से आंदोलनों का शिथि​ल होना या क्रांतिवीरों के मन विचलित होना स्वाभाविक बात थी। वैसे यह किस समय में नहीं होता! निराला ऐसे में, राम को मनुष्यतर भूमिका में लाये। हारा हुआ, टूटा हुआ महसूस रहे राम को फिर एक जीवट के साथ खड़ी होती हुई शक्ति के ​रूप में स्थापित कर पाये।

नॉलन जब ‘ओडिसी’ का पुनर्पाठ रच रहे हैं तब? जगज़ाहिर है पिछले कुछ अरसे से दुनिया युद्धों की भेंट चढ़ी हुई है। युद्ध-भूमियों का विस्तार हो रहा है। मनुष्य जल, थल, वायु के अलावा अब अंतरिक्ष में भी युद्ध कर रहा है। ‘अवतार’ सीरीज़ के माध्यम से जेम्स कैमरून युद्धों के पीछे की हवस पर्दे पर ला रहे हैं और बज़ाहिर या बाक़ायदा किसी एपिक से जुड़े बग़ैर भी उनके दृश्य-संसार में एपिक्स के तत्व हैं ज़रूर। और भी कलाकार हैं जो युद्ध के विरुद्ध अपना-अपना हांका लगा रहे हैं।

युद्ध कितना बड़ा गुनाह बन चुका है? जगह-जगह विस्थापितों की, उजड़े हुओं की, बिछड़े हुओं को, खोये हुओं की गिनती भी किसी को क्या याद! और उधर, युद्ध करने वाले उन्मादियों के भीतर मनुष्य या तो सो चुका है या खो चुका है… इन हालात में नॉलन ‘ओडीसियस’ के पात्र में ये दोनों छायाएं रच रहे हैं।

वह अपनों से बिछड़ा हुआ है, सफ़र में भटका हुआ है, घर लौटने के लिए तड़प रहा है… और उधर, युद्ध की सच्चाई से टूटा हुआ है, युद्धजनित अपराध बोध से ग्रस्त है, पछता रहा है (शायद डेनियल इसे मूल ‘ओडीसियस’ की विकृति देख पाये हों) और जीतकर भी हारा हुआ है।

यह ज़रूर है कि ये सब कहने के लिए फ़िल्म उस ‘क्लासिकीयत’ को अपना रही है, जो ‘जादुई’ तत्वों से बनती है… जैसे शक्तिपूजा में राम के अवसाद के चरम पर मूर्ति से स्वयं शक्ति प्रकट हो जाती हैं, उसी तरह ‘ओडिसी’ में भटके हुए ओडीसियस को राह दिखाने के लिए देवता, आत्माएं आदि हैं। बावजूद इसके ‘ओडिसी’ का यह पुनर्पाठ समकाल से पूरी तरह कटा हुआ नहीं कहा जा सकता।

युद्ध के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने का एक सशक्त विचार मुझे फ़िल्म में यह भी दिखता है कि कहानी एक कवि कह रहा है। एक प्रश्न भी मन में उठता है कि क्या इस समय में नॉलन फिर काव्य और कवि की ज़रूरत व अहमियत के सवाल उठाना चाहते हैं!

नॉलन को नया निराला कहने में फिर भी मुझे एक झिझक यूं है क्यूंकि मैं मानता रहा हूं कि तुलना श्रेष्ठता का पैमाना नहीं होती। दूसरे, मुझे यह भी लगता है कि अध्ययन आधारित विश्लेषण हमेशा अपूर्ण ही होते हैं। बावजूद इसके, कुछ चीज़ों में कुछ और चीज़ों की झलक देखना शायद हमारी वैचारिक परवरिश का हिस्सा रहा है इसलिए इस चेष्टा को मैं बिल्कुल सतही या बनावटी भी नहीं कह सकता।

मुझे यह भी लगता है कि हमारे मानस की जो सदियों की परवरिश है, क्या पता उसी का नतीजा हो कि यह मानस अपने आप में एक महाकाव्य की तरह ही है। हम ध्वनियों के शोर से जब उकता जाते हैं तब इसी गूंज की तरफ़ लौटते हैं, जो महाकाव्यात्मक है…

यहां मैं इस ज़िक्र से ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूं कि गूंज के लिए एक चाव नॉलन के सिनेमाई क्राफ़्ट का एक दिलचस्प पहलू दिखता है। ओडीसियस अपने बेड़े में सबके कानों में मोम भरवा देता है, एक और दैवीय अवज्ञा करते हुए ख़ुद मायावी मत्स्य-कन्याओं का सम्मोहक गान सुनता है। इस दृश्य में ऐन उस गान के समय, संगीत बंद हो जाता है, एक हल्की-सी बीप रह जाती है और रोते-बिलखते-चीखते ओडीसियस के हाव-भाव बस पर्दे पर दिखते हैं, कोई साउंड नहीं… इस दृश्य से मुझे उसी पल ‘ओपेनहाइमर’ की याद आयी, जब परमाणु बम के परीक्षण और प्रयोग के समय कोई धमाका नहीं, सिर्फ़ चित्र और एक सन्नाटा… यह सन्नाटा ही मुझे ​किन्हीं पलों में वो गूंज लगता है, जो सदियों से हमारे भीतर है।

महाकाव्यों का सबसे बड़ा कारनामा शायद यही है कि वो डीएनए का हिस्सा हैं और सदियों तक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे सामूहिक अवचेतन को ड्राइव करते हैं। शायद कलाकार के ड्राइविंग फ़ोर्स को समझने का अध्ययन हमेशा अधूरा ही रहे… बहरहाल, शाब्दिक रूप से ड्राइविंग एक कौशल भर है। अनुभवी ड्राइवर चाहता है आधुनिकतम वाहन जबकि अनुभवी कलाकार पुरानी-से-पुरानी याद में लौटता है, मानव सभ्यता के अर्जित सत्य, विश्वासों को दोबारा गढ़ने-मढ़ने के लिए, शायद शापित होता है। फिर चाहे वह निराला हों या नॉलन।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

1 comment on “ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?

  1. बहुत सधा हुआ, बारीकी से लिखा है आपने. आपकी कई बातों, विचारों, से सहमत भी होती गई पढ़ते हुए.

    काश ये ऐसे कलाकारों तक पहुंचे जो इस पर अपनी राय भी रखें.

    अगले एडिशन के इंतज़ार में

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