qissa shiv mangal singh suman ki qaid ka by ramprakash tripathi
याद बाक़ी...संस्मरण (कुछ वर्ष पहले लिखित) रामप्रकाश त्रिपाठी की कलम से....

क़िस्सा डॉ. शिवमंंगल सिंह सुमन की क़ैद का

           जिसका ज़िक्र इस इस फ़साने में है, वह शहर ग्वालियर एक क़दीम महलनुमा इमारत है, जिसे कभी विक्टोरिया कॉलेज की तरह माना जाता था, अब वह महारानी लक्ष्मीबाई कला-वाणिज्य-विधि महाविद्यालय के नाम से मशहूर है। विक्टोरिया कॉलेज के ज़माने से उसमें जनतंत्र के बीज थे। छात्र यूनियन भी। विख्यात गणितज्ञ केशव शंकर विष्णुशंकर अभ्यंकर तब छात्र यूनियन के अध्यक्ष थे। छात्र अटल बिहारी वाजपेयी उपाध्यक्ष थे। तब यूनियन का अध्यक्ष  प्राचार्य ही हुआ करता था। उस दौर में दौर में अटल बिहारी वाजपेई जी कवि और डिबेटर माने जाते थे। वक्तृत्व कला में प्रावीण्यता उन्होंने इसी महाविद्यालय में अर्जित की थी।

इसी कॉलेज में उत्तरदेश की एक छोटी रियासत अगरपुर के ज़मींदार के राजकुंवर यहीं  कॉलेज में पढ़कर यहीं व्याख्याता नियुक्त हुए थे। नाम था शिवमंगल सिंह सुमन। अब शाही-शोख़ राजकुंवर को भी कविता का भीषण रोग था। संस्कृत-हिन्दी-उर्दू यहाँ तक कि अंग्रेज़ी के नामी-गिरामी कवियों की प्रसिद्ध कविताएँ उन्हें कंठस्थ थीं।

उस ज़माने में कवि सम्मेलन और मुशायरों का बड़ा मान और चलन था। कॉलेज के वार्षिक समारोह में कवि सम्मेलन-मुशायरे का संयुक्त आयोजन किया गया। प्राध्यापक वर्ग से सुमन ही उसके इंचार्ज थे।

इसी ग्वालियर के एक और ख्यात महाविद्यालय “कमलाराजा कन्या महाविद्यालय” (के.आर.जी) की प्राचार्या कमला जोहरी थीं। वही श्रीमती जौहरी जिनका ज़िक्र कविवर हरिवंशराय बच्चन ने अपनी जीवनी “क्या भूलूं क्या याद करूं” में बड़ी शिद्दत से किया। ज़ाहिर है उनकी कलाभिरुचि में कविता से संगीत तक सब शुमार था। कार्यक्रम से पूर्व के.आर.जी. परिसर स्थित उनके बंगले में बतौर “पूर्व रंग” रस-रंजन का कार्यक्रम था। ऐसे अवसरों पर ‘सोमरस’ काव्य के नवरसों पर प्राय: वरीयता पा जाता है। आचमन वालों को काल-बोध से परे ले जाने की क्षमता रखता है।

मुख़्तसर यह कि चषक दर चषक रस-पान के साथ-साथ रस-निष्पत्ति का निर्बाध वातावरण बना। वक़्त फिसलता गया। बतौर आयोजक-प्रतिनिधि सुमन जी भी रस-प्लावित हुए। रात ढलने लगी थी। को-एड कॉलेज में आयोजन को अनन्तकाल तक मुल्तवी नहीं रखा जा सकता था और सूरते-हाल यह कि आमंत्रित कवियों सहित संयोजक तक का अता-पता नहीं!

उस समय महाविद्यालय में गिरिजाकुमार माथुर, राम कुमार चतुर्वेदी चंचल, राजनारायण बिसारिया जैसे ख्यात कवियों के अलावा महाविद्यालय के छात्र और ग्वालियर के मशहूर कवि उपलब्ध थे। अटल बिहारी बाजपेयी ने आमंत्रितों का इंतज़ार किये बग़ैर कवि सम्मेलन शुरू करवा दिया।

कवि सम्मेलन ने ढाई घंटे तक एक सफल दौर जब पूरा कर लिया और घड़ी ने रात के दस बजे का काँटा पार कर लिया तब तीन ताँगों में लदा-फदा लहराता-मदमाता कवि-जत्था  कॉलेज के पोर्च में पहुंचा और सभागार में उसकी आहट पहुँची तो प्रतीक्षा त्रस्त और क्रोधित अटल ने कवि सम्मेलन के समापन की घोषणा कर दी। कविगणों ने यह घोषणा महलवत भव्य कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ते हुए सुनी। अटल जी की इस हरकत से सुमनजी का नशा हिरण हो गया।

जब मैं 1968-69 में महाविद्यालय का छात्रसंघ का महासचिव चुना गया, तब तक ये क़िस्से चटखारे लेकर कहे-सुने जा रहे थे। सुनाने वाले उनके ही समकालीन और सहपाठी थे। सुमन जी के प्रेम प्रसंगों ‌की विविधवर्णी कहानियां, उनका मज़ेदार ढंग से आख्यान शैली में हमारे वरिष्ठजन और पूर्व छात्र करते रहते थे। इन क़िस्सों में मगर किसी को अपमानित करने या निंदा का भाव नहीं होता था।

qissa shiv mangal singh suman ki qaid ka by ramprakash tripathi

कह सकते हैं कि ये क़िस्से रंजक और आनंदमार्गी ही अधिक थे। हमारे वक़्त आते तक विक्रम विश्वविद्यालय का विघटन होना शुरू हो चुका था। उसमें से जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर वैसे ही निकला था जैसे कभी आगरा विश्वविद्यालय से विक्रम निकला था। सुमन जी विक्रम विश्वविद्यालय में चले गये लेकिन जीवाजी के शाषी परिषद के सदस्य बने रहे। इस वजह से उनका आना-जाना बना रहा।

हमारे कॉलेज के प्राचार्य श्री मदनलाल कौल थे, जो मूलतः उज्जैन के ही थे और सुमन जी के परम मित्र भी।

एक दिलचस्प प्रसंग यह है कि हम महाविद्यालय में तुलसी जयंती पर उत्कृष्ट व्याख्यान के आग्रही थे किन्तु उपयुक्त मेहमान हमें नहीं मिल रहे थे। संयोगवश उसी समय जीवाजी विश्वविद्यालय की किसी बैठक में डॉ. सुमन और प्रो. वेंकटाचलम आये हुए थे। चूंकि विश्वविद्यालय का अपना भवन और परिसर अभी तक नहीं बना था इसलिए हमारे कॉलेज ने विश्वविद्यालय के नगरसेकरे अध्ययन केंद्र के लिए स्थान अपने परिसर में उपलब्ध करवाया था। विश्वविद्यालय की अधिकतर बैठकें यहीं सम्पन्न होती थीं। अध्ययन केंद्र विद्या विहार के नाम से जाना जाता था। श्रीराम कॉलोनी के जुड़वां भवनों में जहांँ विश्वविद्यालय जैसे-तैसे चल रहा था, वहाँ बैठकों के लिए स्थान नहीं था।

यह विरल संयोग था कि तुलसी जयंती के ठीक एक दिन पहले डॉ. सुमन और प्रो. वेंकटाचलम विद्या विहार में आयोजित बैठक में आये थे। हमें लगा मानो हमें मनचाही मुराद मिल गयी। इनके व्याख्यानों का लाभ हमारे महाविद्यालय के छात्र -छात्राओं और स्टाफ को मिल सकता था।

हमने दोनों से एक दिन रुककर तुलसी जयंती के लिए व्याख्यान का आग्रह किया। प्रो. वेंकटाचलम ने तो आग्रह सहज ही स्वीकार कर लिया लेकिन सुमन जी ने साफ़ इनकार कर दिया। हमारी मिन्नतें काम नहीं आयीं। वे बोले पूर्व सूचना देनी चाहिए थी।

किंचित क्रोध और उद्दंडता से मैंने कहा इस महाविद्यालय के महासचिव के नाते मैं महाविद्यालय के पूर्व छात्र डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन को आदेश देता हूँ कि वे तुलसी जयंती के लिए रुकें और व्याख्यान दें।

मगर यह आक्रोश मिश्रित परिहास चिकने घड़े पर पानी की तरह फिसल गया। लगा अब इज़्ज़त पर बन आयी है। छात्र संघ के ईगो और महाविद्यालय के रसूख़ का सवाल था। हम कुछ और कहते इसके पहले सुमन जी ने सिगरेट सुलगायी और सभागार में चहल-क़दमी करने लगे।

जब उनका ध्यान आकर्षित करने की सारी कोशिशें विफल रहीं, तभी विद्या विहार के फाटक के कुंदे पर चाबी सहित ताला लटका हुआ नज़र आया। मेरी छात्र नेताई और उद्दंडता ने ज़ोर मारा और मैंने झटके से किवाड़ बंद करके ताला जड़ दिया। अब डॉ. सुमन अंदर बंद थे और क्रोध में मुझे सबक़ सिखाने से लेकर रेस्टीकेट करने तक के मंत्र जाप कर रहे थे। लगा उत्साह में ग़लती तो कर बैठे पर अब क्या निदान हो!

ध्यान आया कि प्राचार्य कौल उनके मित्र हैं। मैं सीधे प्राचार्य कक्ष में गया और सुमन जी को क़ैद करने का पूरा प्रसंग बताया। यह भी कहा कि सर, ताला अब तब ही खुलेगा जब सुमन जी एक दिन रुकने और तुलसी जयंती पर व्याख्यान का वचन देंगे।

स्वाभाविक था कि प्राचार्य को बहुत ग़ुस्सा आता। उन्होंने मुझे बहुत भला-बुरा कहा और डाँटा-फटकारा। तत्काल उठे और वहाँ से मेरे साथ पहुँच गये, जहाँ सुमन जी बंद थे।

मैं असमंजस में था कि यदि कौल साहब ने ताला खोलने को कहा तो सुमन जी के सामने उनकी आज्ञा की अवहेलना कैसे कर पाऊँगा? न ही मेरा क़दम जनतांत्रिक था। इसके पीछे छात्रसंघ का भी कोई निर्णय ऐसा नहीं था जिसके तहत यह संभव होता। यह कारवाई जुनूनी ढंग से, ज़िद से की गयी अवैध हरकत थी। कौल साहब ने मगर ताला खोलने का निर्देश नहीं दिया। उन्होंने खिड़की पर जाकर सुमन जी से कॉलेज की तरफ़ से माफ़ी माँगी और कहा- मान जाओ भाई। जब सुमन जी ने मेरी बदसलूकी की भी शिकायत की तो नाराज़ होने के बजाय उन्होंने कहा- यहाँ के छात्र आप पर अपना हक़ मानते हैं। समझते हैं कि उज्जैन से ज़्यादा आप उनके हैं। शायद इसी भावावेश में ऐसा हो गया… सुमन जी ने मेरी तरफ़ इशारा करके कहा जब तक यह नालायक़ माफ़ी नहीं माँगेगा, मैं सहमति नहीं दूँगा। कौल साहब ने नालायक़ की ओर देखा तो नालायक़ ने अपने दोनों कान पकड़कर उठक-बैठक करते हुए माफ़ी मांगी।

अगले दिन सुबह कॉलेज का हॉल खचाखच भरा था। जब प्राचार्य जी के साथ सुमन जी ने सभागार में प्रवेश किया तो हमारी सहपाठिनों ने उन पर खीलों-पुष्पों की वर्षा की। जयशंकर प्रसाद की कहानी से आया यह आइडिया मेरी सहपाठी आशा मोघे ने दिया था। इस वर्षा में सुमन जी का न सिर्फ़ मलाल जाता रहा बल्कि वे गदगद नज़र आये।

मंच पर पहले से ही प्रो. वेंकटाचलम, प्रो. शिवनाथ उपाध्याय, छात्र मंच प्रभारी प्रभुदयालु अग्निहोत्री, छात्रसंघ अध्यक्ष महिपाल सिंह भदौरिया उपस्थित थे। प्राचार्य जी और सुमन जी के आसन ग्रहण करते ही उल्लसित हर्षल ध्वनि से मेहमानों की रही-सही शिकायत भी जाती रही… मुझे संचालन करना था।

मैंने सुमन जी को सताने और मनाने का रोचक ढंग से क़िस्सा सुनाया, बेशक अपनी माफ़ी के साथ। मंच और प्रकृतिस्थ हुआ। प्रो. वेंकटाचलम को व्याख्यान के लिए आमंत्रित करते हुए कहा कि वे संस्कृत के आचार्य हैं, तमिल उनकी मातृभाषा है, अंग्रेज़ी के लेखक हैं, उनकी कई किताबें हैं, वे यहाँ हिंदी में व्याख्यान देंगे। आज जब कर्कष भाषा-विवाद चरम सीमा पर है, तब तुलसी व्याख्यान के लिए मुझे लग रहा है, मानो मैं उनके रूप में भारत की भावनात्मक एकता को आवाज़ दे रहा हूँ।

मेरे इस संचालन ने एक बार फिर तालियां बटोरीं। इसमें कोई ख़ास बात नहीं थी। मैं महाविद्यालय छात्र संघ का प्रमुख था और सभागार मेरे मित्रों व सहपाठियों से भरा हुआ था। विशेष बात यह थी कि तुरंत डॉ. सुमन उठकर आये और मुझे ठेलकर माइक पर बोलने लगे कि प्रो. वेंकटाचलम को भारत की भावनात्मक एकता के रूपक में आमंत्रित केवल प्रोफेसर शिवनाथ उपाध्याय का छात्र ही कर सकता है।

डॉ. अग्निहोत्री बोले, सुमन जी वह छात्र संघ का महासचिव भी है। डॉ. सुमन ने यह कहकर उत्तर दिया कि इस महाविद्यालय के संस्कार स्पृहणीय हैं।

यह आलेख सुमन जी के औदार्य के प्रति प्रणति निवेदन के साथ अपने पद के घमंड और नेता होने के घमंड की स्वीकारोक्ति भी है।

रामप्रकाश त्रिपाठी, ram prakash tripathi

रामप्रकाश त्रिपाठी

साहित्यकार, संस्कृतिसेवी और राजनीतिक एक्टिविस्ट के रूप में दशकों से पहचान। जनवादी लेखक संघ के मौजूदा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष। तक़रीबन छह दशकों से लेखन, रंगमंच, विचारधारा आधारित एक्टिविज़्म में सक्रिय। मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के पूर्व अधिकारी। अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ संबद्धता। अनेक पत्र पत्रिकाओं में नियमित लेखन और इसके बावजूद कोई पुस्तक अब तक प्रकाशित नहीं।

1 comment on “क़िस्सा डॉ. शिवमंंगल सिंह सुमन की क़ैद का

  1. लंबी चलने वाली बैठकों की गपशप जैसा बेहद रोचक अंदाज है, बहुत सराहनीय है।

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