इप्टा के नाटक, आख़िरी शमां, ipta play, akhiri shama
नियमित ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

मुशायरे: रिवायत, अहमियत और फ़ायदे

मुशायरा उर्दू ज़बान व अदब की एक ज़िंदा और दीप्तिमान रिवायत है, जो शायरी की उन्नति, सांस्कृतिक मूल्यों (तहज़ीबी अक़दार) की शाश्वतता और अवामी जज़्बात (जनमानस की भावनाओं) के इज़हार का सबसे बड़ा ज़रिया है। ये वो विशिष्ट साहित्यिक सभा (मुनफ़रिद अदबी महफ़िल) है, जहाँ शायर अपने जज़्बात प्रत्यक्ष (बराहे-रास्त) रूप से अवाम तक पहुँचाते हैं। मुशायरे की रिवायत दकन और मुग़ल दौर-ए-हुकूमत से शुरू होकर आज पूरी दुनिया में फैल चुकी है।

पुराने वक़्तों में मुशायरे एक तयशुदा तरह (मिसरा-ए-तरह) पर होते थे, जहाँ शोअरा इसी वज़्न और ज़मीन पर शेर कहते थे। दाद व तहसीन यानी श्रोताओं का “वाह-वाह” कहना और शेर की दाद देना इस रिवायत का ख़ास और दिलकश हिस्सा है। उर्दू ज़बान को ज़िंदा रखने और उसे अगली नस्ल तक पहुँचाने में मुशायरों का बहुत बड़ा हाथ है। ये महफ़िलें जात-पात और मज़हब से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ती हैं और मोहब्बत का पैग़ाम देती हैं। नौजवान शोअरा को बड़ा स्टेज और अवाम के सामने अपनी सलाहीयत दिखाने का मौक़ा मिलता है।

इन तफ़्सीलात (विस्तृत विवरण) से ये बताना मक़सूद था कि ये मुशायरे न सिर्फ़ अवामी इदारे (संस्थान) थे बल्कि इन मुशायरों ने इस्लाह-ए-सुख़न (काव्य संशोधन) की भी एक महान परंपरा क़ायम की, जिससे शेर-फ़हमी (काव्य की समझ) और शेर-गोई (शेर की रचना) को रिवाज मिला। लेकिन जैसे-जैसे ये रिवायत बढ़ती गयी, इसमें ये प्रतिस्पर्धा (तसाबुक़) और प्रतिद्वंद्विता (तक़ाबुल) के जज़्बात अपमान (तज़लील) व तौहीन में तब्दील होते गये। और आज इसकी जो शक्ल है वो सब जानते हैं। लेकिन हर रिवायत जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसमें कुछ मुफ़ीद (लाभप्रद) और ख़ुशगवार तब्दीलियाँ भी आती हैं। आज मुशायरे की रिवायत बहुत आगे बढ़ चुकी है। इसके विभिन्न प्रकार हैं— रेडियो मुशायरे, टेलीविज़न मुशायरे, यादगारी मुशायरे, मुल्की (अखिल भारतीय/राष्ट्रीय) और बैनल-अक़वामी (अंतर्राष्ट्रीय) मुशायरे—अदब और शायरी के उत्थान (फ़रोग़) में नुमायाँ किरदार (विशिष्ट भूमिका) अदा कर रहे हैं।

इसके अलावा इन मुशायरों से एक समाजी फ़ायदा ये भी है कि हमारी मुश्तरका तहज़ीब (साझा विरासत) की वो रिवायत गवाह है जब हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे के उत्सवों में शिरकत किया करते थे, जो सियासत की फ़िरक़ावाराना ज़ेहनियत (सांप्रदायिक मानसिकता) के सबब तक़रीबन ख़त्म होती जा रही है। वरना एक ज़माना था मुहर्रम के जुलूस में हिंदुओं की शिरकत होती थी और बहुत-से हिंदू घरानों से ताज़िये निकला करते थे। और मुसलमान होली और दीवाली के त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। मगर अब ये सब क़िस्सा-कहानी बनकर रह गये हैं। लेकिन ये मुशायरे अब भी उन समाजी संपर्कों को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसी सूरत में अब सिर्फ़ मुशायरा ही ऐसी तक़रीब (समारोह) है, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम जमा होकर एक-दूसरे के समाजी और तहज़ीबी असरात (सांस्कृतिक प्रभाव) क़बूल करें।

इस तरह कहा जाये तो बेजा न होगा कि हमारी मुश्तरका तहज़ीब को जो सांस्कृतिक विरासत (सक़ाफ़ती विरसे) मिली, उनमें एक बेशक़ीमती विरसा “मुशायरा” भी है। मुशायरा यानी शायरों का एक ऐसा इज्तिमा (सम्मेलन) जिसमें शोअरा तक़ाबुल और तसाबुक़ का जज़्बा लेकर जमा हों और शाइकीन-ए-सुख़न (शायरी के शौकीनों) को अपना कलाम सुनाकर दाद-ए-सुख़न (सराहना, प्रशंसा) हासिल करें। मुशायरे के मुक़ाबले में हिंदी ज़बान में कवि सम्मेलन का रिवाज भी पाया जाता है। जो बहुत क़दीम (प्राचीन) है।

आज मुशायरे की रिवायत जो आम है, वो माज़ी (अतीत) के मुशायरों से बहुत मुख़्तलिफ़ है क्योंकि जो तहज़ीब व आदाब मुशायरे की पहचान हुआ करते थे, अब वो नयी तहज़ीब और मुशायरा-बाज़ शायरों के हाथों मिसमार हो रहे हैं। क्योंकि आज के मुशायरों में अदब कम और अदाकारी का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) ज़्यादा हो गया है। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में और शोहरत हासिल करने की हवस में अश्लीलता (इब्तिज़ाल), फ़क्कड़पन, सतहीयत (स्तरहीनता) और तुकबंदी से शोअरा काम चला रहे हैं। इस लेख के लेखक (राक़िमुल-हुरूफ़) का शेर है:

अजब हाल में महफ़िलें हैं अदब की
सुख़न कम हुनर कम तमाशा बहुत है

माज़ी के मुशायरों की ख़ुसूसियत थी कि मुशायरे अवाम के अंदर अदब का ज़ौक़ (रुचि) पैदा करते थे, और अब अवाम के मज़ाक़ (स्वाभाविक प्रवृत्ति) और ज़ेहनियत (मानसिकता) को सामने रखकर कलाम लिखे जा रहे हैं। गोया अब हमारा मुआशरा (समाज) मुशायरे के मिज़ाज को तय करता है। इसीलिए आम तौर पर ये ख़याल किया जाता है कि मुशायरे के शायर अव्वल दर्जे के शायर नहीं होते। हालाँकि जब हम माज़ी पर निगाह डालते हैं तो हैरत होती है कि इन मुशायरों को मोतबर शोअरा ने ही शुरू किया। इन मुशायरों के ज़रिये नये शोअरा की तरबियत की गयी। और मुशायरों ने न सिर्फ़ इन्फ़िरादी सतह पर ये काम किया बल्कि इन मुशायरों ने मुख़्तलिफ़ स्कूल के तौर पर अदब के नये रुजहान व रवैये को भी तय किया। इसीलिए लखनऊ, दिल्ली, कलकत्ता, हैदराबाद, रामपुर और अज़ीमाबाद के मुशायरे इन इलाक़ों में अदब की रविशों (रवैयाें) को बताते थे।

इप्टा के नाटक, आख़िरी शमां, ipta play, akhiri shama

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के अलावा अब जहाँ-जहाँ उर्दू बस्तियाँ आबाद हैं, वहाँ मुशायरे अहमियत के हामिल रहे हैं।

हिंदी के कवि सम्मेलन की परंपरा

हिंदी में अलबत्ता “कवि सम्मेलन” और पंजाबी में “कवि दरबार” की रिवायत है। ख़ास तौर से कवि सम्मेलन की तारीख़ तबसे है जब हिंदी ज़बान वुजूद में ही नहीं थी और अदबी ज़बान संस्कृत समझी जाती थी।

उर्दू मुशायरे हिंदुस्तान में कब से राइज़ हुए, इस पर पूरे यक़ीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। सिवा अनुमान लगाने (ख़याल-आराई) के… मगर कहा जा सकता है कि मुशायरे, शायरों के उस जज़्बे के तहत शुरू हुए होंगे कि दूसरे भी उनका कलाम सुनें और सराहें। शोहरत मिले। शिनाख़्त हासिल हो। और इब्तिदाई तौर (प्रारंभ) से निजी महफ़िलें आरास्ता (आयोजित) हुई होंगी और धीरे-धीरे अवामी मुशायरे का रूप लिया होगा।

कवि सम्मेलन के ऐतिहासिक प्रमाण (तारीख़ी शवाहिद) मिलते हैं। इसका ज़िक्र सबसे पहले राजशेखर (880–920 ईस्वी) की “काव्य मीमांसा” में मिलता है। इसमें न सिर्फ़ कवियों की रोज़मर्रा के क्रियाकलाप का ज़िक्र है कि उसे क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। वो कवियों के समय प्रबंधन (निज़ाम-उल-अवक़ात) को चार हिस्सों में बाँटने की सलाह देते हैं।

  • — सुबह पूजा-पाठ से फ़राग़त (फ़ुर्सत) हासिल करके मुतालआ (अध्ययन) करने बैठें।
  • — अगले पहर वो कविता लिखने की कोशिश करें।
  • — दोपहर के लगभग नहा-धोकर खाना खाएं। ग़िज़ा से फ़ारिग़ होकर (भोजन के पश्चात्) शायरी की नशिस्त (गोष्ठी) करें।
  • — जब तन्हाई मयस्सर हो, तो अपनी ताज़ा रचना पर पुनर्विचार (नज़र-ए-सानी) करें और अच्छी तरह जाँचे-परखें। नशिस्त में हुई तारीफ़ और तनक़ीद (आलोचना) का जायज़ा लें।
  • — ख़ास चेतावनी थी कि शायर अपना ना-मुकम्मल कलाम किसी को न सुनाएं।

मगर इससे अंदाज़ा ये भी होता है कि उस ज़माने में शायरी एक पूर्णकालिक यानी मुस्तक़िल मशग़ला था। और ये हक़ीक़त भी है कि दरबारों में बाक़ायदा शायरों को जगह दी जाती थी और उन्हें बड़ी क़द्र की निगाहों से देखा जाता था। कवि सम्मेलन को राज-सभाओं और दरबारों की शोभा समझा जाता था। बल्कि दूसरे ललित कलाओं (फ़ुनून-ए-लतीफ़ा) के विशेषज्ञों (माहिरीन) को भी दरबार का ख़ास हिस्सा माना जाता था।

संस्कृत का श्लोक है:

विद्वानः कवयो भटाः गायकाः परिहासकाः
इतिहासपुराणदाः सभा सप्ताह संयुक्ताः

(दानिशवर, शायर, भाट, मुग़न्नी (गायक), विदूषक, मुअर्रिख़ (इतिहासकार) और पुराण जानने वाले सभी राजसभा के ज़रूरी अज्ज़ा (अंग) और शोभा हैं।)

प्राचीन पुस्तकों (क़दीम कुतुब) के लिहाज़ से एक शायर को व्याकरण (क़वायद), लुग़त (शब्दकोश), छन्द शास्त्र (अरूज़), दीगर फ़ुनून-ए-लतीफ़ा, नृत्य (रक़्स) व सुरूद (गायन), मुसव्वरी (चित्रकला), कामशास्त्र का भी इल्म लाज़िमी (अनिवार्य) था।

राजशेखर ने तो राजाओं को कवियों, नाज़िमों (संचालकों) और दानिशवरों (बुद्धिजीवियों) का इम्तिहान लेते रहने की सलाह भी दी, जिसके लिए “ब्रह्म सभाओं” का आयोजन होता था। कहा जाता है ऐसी ही सभाओं से कालिदास, हरिचंद, पाणिनी, पिंगल, वरीच, वग़ैरह सामने आये।

उर्दू में जैसे बदीह-गोई है, वैसे ही “समस्या पूर्ति” का निज़ाम भी था, जिसमें एक-दो लफ़्ज़ दिये जाते थे, जिनको शायरी में पिरोना होता था।

इससे अंदाज़ा होता है कि फ़ारसी और उर्दू शायरी की बदीह-गोई या तरही मुशायरों की रिवायत से पहले भारत में इस तरह के प्रयासों की शुरूआत (काविशात की इब्तिदा) हो चुकी थी। जिसका ज़िक्र निज़ामी गंजवी (इंतिक़ाल—1209) ने बहुत बाद में “चहार मक़ाला” में किया।

क़ुली क़ुतुब शाह, बहादुर शाह ज़फ़र की तरह कई हिंदू राजा भी शायर थे। जैसे रुद्रवर्मन, समुद्रगुप्त, धार के राजा भोज वग़ैरह।

अरब के इतिहास के कुछ पन्ने

उर्दू मुशायरे की तारीख़ को समझने के लिए हमें वहाँ जाना पड़ेगा जहाँ अस्ल में उर्दू शायरी की जड़ें हैं। अच्छे से सबको पता है कि अरब में इल्म-ए-अरूज़ और शायरी के तमाम दूसरे अवयव (दीगर लवाज़िमात) ईजाद हुए। वहाँ से ये फ़ारस पहुँचे और फिर हिंदुस्तान। लिहाज़ा पहले देखते हैं अरब में भी मुशायरों की रिवायत थी या नहीं।

हालांकि इस बारे में एक पूरी किताब लिखी जा सकती है,​​ फिर भी कुछ ख़ास-ख़ास नोट्स यहां जान लेते हैं।

  • — अरब मुआशरे में अशआर पढ़ने और सुनाने को “इंशाद” और “नशीद” कहते थे। और तब शायर अपना कलाम गाकर ही सुनाते थे।
  • — शायरी के मुक़ाबले होते थे, जो क़बीला फ़तहयाब (विजयी) होता उसके अहल-ए-क़बीला जश्न मनाते थे। औरतें रबाब पर गाती थीं।
  • — उस वक़्त शायरों के तीन दर्जे थे: पहले तो बाकमाल शायर जो विचार, भाषा और रचनाधर्मिता में निपुण थे। दूसरे जिनका कलाम औसत दर्जे का हो लेकिन शायरी के फ़ितरी जौहर (प्राकृतिक गुण) हों। और तीसरे जिनमें शायरी स्वाभाविक गुण न था पर मश्क़ (अभ्यास) वग़ैरह करके शायरी करते और आम तौर से बेमज़ा और भर्ती के अशआर कहते।
  • — चूँकि क़सीदे पढ़े जाते इसलिए मुशायरों को मुक़ासदा नाम मिला।
  • — औरतें भी मुशायरे में शरीक होती थीं। बाक़ायदा क़सीदे पेश करती और तनक़ीद भी करती थीं।
  • — अवामी पेशकश की दो और क़िस्में भी थीं: मुफ़ाख़रा, जिसमें फ़ख़्रिया (गर्वयुक्त) कलाम पढ़ा जाता था। और मुनाफ़रा, जिसमें मुनाफ़िरत (घृणा) के कलाम पढ़े जाते थे।

अब फ़ारस यानी ईरान की बातें

  • — बक़ौल हाफ़िज़, जश्न-ए-नौरोज़ के मौक़े पर नौशेरवाँ के दरबार में शोअरा जमा होकर उसकी प्रशंसा (मद्ह) में अशआर पढ़ा करते थे।
  • — दरबार के अलावा क़हवा-ख़ानों, बाज़ारों, दुकानों पर एक तरह से “मुसाबक़ा” और “मुक़ाबला” होता था। यही मुशायरों की इब्तिदाई शक्लें थीं।
  • — अल्लामा शिबली नोमानी “शेर-उल-अजम” में फ़ग़ानी के दौर में मुशायरों की इब्तिदा बताते हैं।
  • — ईरान में तीन तरह के मुशायरों का ज़िक्र मिलता है: 1. दो शायरों के बीच मुशायरा। 2. कई शोअरा का बाहम मुशायरा। 3. दरबारी मुशायरा।

अब हिंदुस्तान और उर्दू मुशायरे

ये बातें मुख़्तसरन इसलिए ज़रूरी थीं कि समझा जा सके उर्दू मुशायरे ने हिंदी कवि सम्मेलनों और फ़ारसी मुशायरों की कोख से जन्म लिया है। मगर ईरानी मुशायरों से सब कुछ सीखा है और इसमें इज़ाफ़ा किया है।

उर्दू में मुशायरे से वो महफ़िल या मजलिस मुराद है, जहाँ एक निर्धारित (मुअय्यन) वक़्त और मक़ाम (स्थान) पर कई शोअरा जमा होकर बारी-बारी कलाम सुनाते और दाद पाते हैं।

शुरूआत फ़ारसी शोअरा से ही हुई क्योंकि सदियों तक वो हिंदुस्तान में रहे और फ़ारसी ही राज-पाट और पठन-पाठन (दर्स-ओ-तदरीस) की ज़बान बनी रही। बादशाह अपने साथ फ़ारसी शोअरा भी लाये थे और मनोरंजन के लिए मख़्सूस महफ़िलें होती थीं। “बाबरनामा” में ज़िक्र है सफ़र के दौरान मौक़ा मिलता, तो शेर-ओ-शायरी की बज़्म सजने लगती।

उर्दू ज़बान बनने की प्रक्रिया (तशकील के अमल) से गुज़र रही थी। ख़ानक़ाहों में उर्स के दौरान शेर-ओ-शायरी भी हुआ करती थी। अकबर के दरबार में हिंदुस्तान की मुक़ामी बोलियों मसलन ब्रजभाषा, अवधी वग़ैरह में शायरी सुनी जाने लगी। कहते हैं ख़ुद शहंशाह अकबर सदारत (अध्यक्षता) फ़रमाते। शोअरा में अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना, मतीराम बड़े मोतबर शोअरा थे।

उस ज़माने में ग़लतियों पर सर-ए-महफ़िल टोकने और साहित्यिक चोरी (सरक़ा व तवारुद) की निशानदेही को बुरा नहीं माना जाता था। इसलिए लोग ऐबों से बचने का ख़ास ख़याल रखते थे और रफ़्ता-रफ़्ता उस्ताद-शागिर्दी का बाक़ायदा सिलसिला चल निकला, जो इस्लाह करके ख़ामियाँ निकाल देते थे।

वली के ज़माने में भी मुशायरों की मामूली झलक मिलती है।

पहले-पहल निजी गोष्ठियां (इन्फ़िरादी मुशायरे) शायरों के घरों पर शुरू हुई होंगी। रफ़्ता-रफ़्ता इज्तिमाई मुशायरे होने लगे होंगे। पहले जो पूरी तरह से अदबी इज्तिमा होता था, वो अवामी होते ही अर्ध साहित्यिक (नीम-अदबी) और अर्ध मनोरंजक (नीम-तफ़रीही) होने लगा। मीर, सौदा के ज़माने तक मुशायरे अवामी नहीं थे। शोअरा या कुलीन वर्ग (उमरा) अपने घरों पर महफ़िल कर लेते थे।

मीर ने सबसे पहले “मजलिस-ए-रेख़्ता” का ज़िक्र किया है। मीर से पहले ख़्वाजा मीर दर्द के यहाँ इज्तिमा होता था। हर क़मरी महीने (लूनर मंथ) की 15 तारीख़ को मजलिस-ए-रेख़्ता मीर के घर होती थी। इसे कहीं “मजलिस-ए-यारान-ए-रेख़्ता” और “मजलिस-ए-शायरान-ए-रेख़्ता” भी कहा गया है।

इसे आम तौर से “मराख़्ता” कहते थे। यानी ऐसी महफ़िल-ए-शेर-ओ-सुख़न या मुशायरा जिसमें रेख़्ता यानी उर्दू कलाम पढ़ा जाये।

एक इस्तिलाह “मुतारहा” है, यानी ऐसी महफ़िल जिसमें एक ही परिवार (क़बील) के क़ाफ़िये और एक ही रदीफ़ में शेर पढ़े जाते थे। यानी मिसरा-ए-तरह पर शोअरा अपना-अपना कलाम सुनाते थे।

(अगली क़िश्त अंक 56 में)

(चित्र परिचय: इप्टा मुंबई के चर्चित नाटक “आख़िरी शमां” का एक दृश्य। यह नाटक मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग की तहरीर “दिल्ली का यादगार मुशायरा” पर आधारित है, जिसका नाट्य रूपांतरण व लेखन कैफ़ी आज़मी और मूल डिज़ाइन व निर्देशन एम.एस. सथ्यू ने अंजाम दिया था।)

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!