
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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मध्य प्रदेश की पहली महिला पत्रकार को जानते हैं आप? सफ़ेद बाल, साधारण सूती साड़ी और घरेलू भाषा में बातचीत... यदि आप सोचते हैं अरे यह तो साधारण महिला है तो धारणा से नहीं जानकारी से काम लेने का मन बनाइए। हम आपकी मुलाक़ात उनसे करवा रहे हैं, जिन्होंने सन् 1974 से पत्रकारिता शुरू की। जब आम तौर पर महिलाएँ घर के बाहर क़दम नहीं रखती थीं, इन्होंने पेशेवर जीवन में न केवल क़दम रखा बल्कि मध्य प्रदेश की पहली हिंदी महिला पत्रकार के रूप में नाम रोशन किया। अलकनंदा साने पत्रकारिता और साहित्य में जाना-पहचाना हस्ताक्षर हैं। अनुवाद और कला समीक्षा में भी सक्रिय रही हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी अलकनंदा जी के सफ़र को लेकर उनकी सुपुत्री और रचनाकार स्वरांगी साने ने बातचीत की, जिसके अंश आब-ओ-हवा के लिए विशेष रूप से...
साहित्य, कला, पत्रकारिता अब मिशन कहां?: अलकनंदा

स्वरांगी साने: नमस्कार, आपसे पहली बात तो यही कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आप कैसे आयीं और मध्य प्रदेश की पहली महिला पत्रकार बन गयीं।
अलकनंदा साने: पत्रकारिता मुझे विरासत में मिली। मेरे पिताजी रघुनाथ शिरढोणकर ने मध्यप्रदेश में मराठी पत्रकारिता की शुरूआत की थी। उसके बाद मेरे भाई भी पत्रकार थे और इस तरह मैंने पत्रकारिता में आने के लिए विशेष प्रयास नहीं किये। एक तरह से यह मेरे अंदर से निकलकर आया, ऐसा मैं मानती हूँ। यह भी सुयोग रहा कि माणिकचंद जी वाजपेई जैसे संपादक के साथ सबसे पहले काम करने का अवसर मिला, जिन्हें पत्रकारिता जगत में ‘मामा जी’ के नाम से ज़्यादा जाना जाता रहा।
स्वरांगी: यह ज़रूर बताइए कि पहली बार कुछ करना… यानी क्या उस वक़्त आपको एहसास था कि पत्रकारिता में कोई महिला पहली बार आ रही है या आप इतिहास बनने से बेख़बर थीं?
अलकनंदा: हमारे परिवार की बहुत बड़ी परंपरा है। जैसे मेरे पिताजी ने मराठी भाषा में पत्रकारिता की। इससे बहुत सारे लोगों को ग़लतफहमी हो जाती है। वे उत्तर भारत में मराठी पत्रकारिता करने वाले पहले पत्रकार थे। इसी तरह से मेरे भाई हैं, जो दृष्टिहीन थे और वह मध्य प्रदेश के पहले आर्थो सर्जन थे। यह परंपरा भी आगे बढ़ती जा रही है। एक मेरी भांजी संगीता अग्निहोत्री है, तबलावादक है, वह मध्य प्रदेश की पहली महिला है, जिसने तबला बजाना शुरू किया। इसी तरह मेरी बेटी भी। उसकी कविताएँ यूट्यूब के इतिहास में किसी अख़बारी चैनल पर सबसे पहले आयीं। बेटा भी कम उम्र में संपादक के स्तर तक पहुँच गया तो उसके लिए भी यह डीएनए का ही असर कहा जाएगा। तो मुझे लगता है यह कहानी बनना तो हमें ईश्वर की देन है या विरासत है। जैसा मैंने पहले कहा कुछ अलग इसलिए महसूस नहीं हुआ क्योंकि मेरे आस-पास ‘पहली बार’ वाले बहुत सारे लोग थे।
स्वरांगी: तो हम ऐसा कह सकते हैं कि आप बहुत ही सौभाग्यशाली रहीं कि आपको ऐसा परिवार मिला।
अलकनंदा: वरदान ही कहना चाहिए क्योंकि जब मैंने पत्रकारिता शुरू की, तब एक तो हमारे समय में इतना कुछ सोचा नहीं जाता था कि पढ़ने-लिखने के बाद क्या करना है। करियर नाम का शब्द तो बहुत बाद में आया है। मुझे वरदान की तरह लगता है। और इसी से बहुत ज़्यादा सीखने को मिला, यह मैं ज़रूर करूंगी।
स्वरांगी: लेकिन आपके पिताजी की मृत्यु बहुत जल्दी हो जाने के बाद दुःखों के जो पहाड़ टूटे, वो संघर्ष भी तो रहा।
अलकनंदा: मुझे लगता है हर व्यक्ति को अभाव में संघर्ष करने का मार्ग मिलता है और बहुत सारे लोग इस तरह से अभावों से निकलते हैं। तो मुझे नहीं लगता मैंने कोई बहुत अद्भुत कार्य किया है। दरअसल मेरी परिस्थितियाँ भी वैसी थीं, पढ़ने-लिखने का वातावरण था, पत्रकारिता का माहौल था। घर में भले ही पिताजी की मृत्यु के बाद आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही थी लेकिन मेरी माँ ने कहा भले ही दो रोटी कम खाना लेकिन पढ़ना-लिखना। तो ऐसी प्रेरणाओं से प्रगति हुई। मैंने अपनी ओर से कुछ सायास किया, ऐसा नहीं कह सकती। बहुत कुछ अपने आप होता गया, यही लगता है।
स्वरांगी: पत्रकारिता की चुनौतियों के बारे में बताइए। आप आधी सदी से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं, आपको उस समय की और आज की चुनौतियों में क्या अंतर लगता है?
अलकनंदा: मुझे लगता है चुनौतियाँ हमेशा बनी रहती हैं। मेरे समय चुनौतियाँ थीं सामाजिक परिपाटियों से जूझने की। मुझे याद है मैं रिपोर्टिंग करके रात को 11:00 बजे लौटती थी और उस ज़माने में किसी पुरुष का या किसी युवक का भी 11 बजे सड़क पर निकलना अच्छा नहीं समझा जाता था, तब। पान की दुकानों पर या शराब के अड्डों पर बहुत कम लोग खड़े रहते थे। और उन्हें अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था लेकिन उन पुरुषों की ओर से मुझे दिक़्क़त नहीं हुई। कितनी ही बार ऐसा लगा कि अपने क्षेत्र में उनका मुझे सहारा है। कुछ भी हो जाएगा तो ये मुझे जानते हैं कि मैं क्या करती हूँ, कहां से लौटकर आ रही हूँ… मुझे कभी भी किसी भी तरह के बुरे व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ा।
अब मुझे लगता है कि आज कुछ बदल गया है। लड़कियाँ घर से बाहर निकलती हैं, तमाम पुरुष भी और रात-रात भर आवाजाही चलती रहती है सड़क पर, मुश्किल से एक-दो घंटे के लिए कहीं कोई रुकता हो… तब भी इस माहौल में लड़कियाँ असुरक्षित हैं, जबकि मैं उस माहौल में भी अपने आपको सुरक्षित समझती थी। मुझे लगता है यह बड़ी चुनौती है आज की। हमारे समय दूसरी चुनौतियाँ थीं काम को लेकर, लेकिन इस तरह के ख़तरे तब इस तरह नहीं थे।
स्वरांगी: जी, आज के दौर में संवेदनशीलता ख़त्म होना एक चुनौती बन रहा है। यह भी याद आता है कि आपने दृष्टिहीनों के लिए भी काम किया है और आपके जीवन के ऐसे पहलू बहुत कम लोगों को पता हैं। इस बारे में बताते हुए यह भी बताएं कि क्या संवेदनशील होना आपके कवि होने का बड़ा कारण है?
अलकनंदा: निश्चित रूप से लिखने के लिए तो संवेदनशील हर लेखक होता है। साहित्यकार है तो संवेदनशील पहले है क्योंकि जो आस-पास का माहौल है या कोई घटना, उसे लेकर उसके मन में संवेदनशीलता की वजह से ही विचार और भाव उमड़ते हैं। संवेदनशीलता पहली चीज़ है, तभी कोई व्यक्ति पत्रकार बनता है या लेखक। जब तक अंदर संवेदनशीलता नहीं होगी, आप उन सारी चीज़ों को अलग नज़रिये से देख नहीं पाएंगे।
दृष्टिकोण की बात करूँ तो जैसे मैंने कहा मेरे चचेरे भाई दृष्टिहीन थे, डॉक्टर म.वि. शिरढोणकर, मध्य प्रदेश के पहले फ़िज़ियोथैरेपिस्ट, तो घर में ही एक तरह से हमने उनका संघर्ष देखा था। उनके साथ मैं काम करने लगी और फिर वो मुझे अच्छा भी लगने लगा। उन दृष्टिहीनों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। जैसा कि आपने कहा कि मेरा बचपन अभावों में बीता लेकिन मुझे लगा जो अभाव उनके हैं या जो दुःख वे झेल रहे हैं, हमारा तो उनके सामने कुछ नहीं।
स्वरांगी: इन कार्यों के लिए आपको सम्मान भी मिला था।
अलकनंदा: विकलांग सेवा के लिए मुझे राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया था। उसके पीछे की एक छोटी-सी घटना थी कि सन् 1990 विश्व विकलांग वर्ष घोषित हुआ था और उसमें यूनेस्को ने उनकी अपनी नीति बनायी थी, जो भी दृष्टिहीन बच्चे हैं वे सामान्य बच्चों के साथ में पढ़ाई-लिखाई करेंगे ताकि उनको किसी भी तरह की असमानता का सामना नहीं करना पड़े। तब मैं दृष्टिहीन विद्यालय में काम करती थी। वहाँ जनसंपर्क अधिकारी थी तो उन 10वीं पास पाँच बच्चियों को सरकारी विद्यालय में या किसी भी विद्यालय में उन्हें प्रवेश दिलवाना था। लेकिन जहाँ भी मैं जाती मनाही मिलती। फिर मैं सीधे भोपाल चली गयी थी और मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कैबिन के बाहर सुबह 10 से शाम 5:00 बजे तक बैठी रही। उनके सचिव ने मुझे मिलने नहीं दिया। शायद उन्हें लगा कि मैं तो बेकार की बात लेकर आ गयी हूँ। पूरे 7 घंटे मैं वहाँ बैठी रही और तब सीधे अर्जुन सिंह के कमरे में चली गयी, दरवाज़ा खोलकर। वे भी दंग रह गये।
उस समय मैं बिल्कुल नयी-नवेली लड़की-सी थी और शायद वह इस साहस से इसलिए दंग थे। जब मैंने उनको सारी बात बतायी तो उन्होंने मुझे बिठवाया और एक पत्र टाइप करवाकर दिया। बोले, अब आप किसी भी स्कूल में ले जाइए और कोई मना करता है तो मुझे इस नंबर पर सूचित कीजिए। बस उसके बाद से उन लड़कियों के प्रवेश का सिलसिला शुरू हो गया और वो आसान भी हो गया। इसी आधार पर मुझे राज्य स्तरीय सम्मान दिया गया था।
स्वरांगी: अपने समाज में बदलाव लाने की कोशिश का यह क़िस्सा वाक़ई महत्वपूर्ण है। तो अब यह बताइए कि आप ख़ुद को एक कवि के रूप में पहचानती हैं या पत्रकार के रूप में अपने आप को ज़्यादा देखती हैं।
अलकनंदा: अब देखा जाये तो व्यावहारिक रूप से तो मेरी पत्रकारिता मतलब समाप्त हो गयी है। पत्रकारिता तो मैं अब कर नहीं रही हूँ लेकिन वो जो अंश हैं दिमाग़ में, वही मुझे शायद कविता की ओर ले जाते हैं। वही जो एक संवेदनशीलता है, लेखक या कवि के रूप में उभरती है। कवि के रूप में ही अब मैं अपने आपको अधिक पाती हूँ।
स्वरांगी: पत्रकारिता के समय से अब तक आप भाषा को लेकर बहुत सजग रहती हैं। भाषा की बात पर या मराठी भाषा को लेकर आपके क्या विचार हैं?
अलकनंदा: आजकल जो अपने आपको बहुत बड़ा पत्रकार कहते हैं, उन्होंने सबसे ज़्यादा भाषा का नुक़सान किया है। उनके लिखे में अंग्रेज़ी बहुत ज़्यादा है। पहले मराठी की बात करूँ तो क्योंकि मेरी मातृभाषा है तो निश्चित रूप से मुझे उसके प्रति अधिक लगाव है और वो हमारे घरों में बोली जाने वाली भाषा है। मराठी साहित्य भी काफ़ी समृद्ध है। तो भाषा के प्रति आग्रह होने का कारण तो यह है कि हमें अपनी भाषा नहीं भूलना चाहिए। दूसरी बात यह है कि एक भाषा के साथ में सिर्फ़ लिखावट या सिर्फ़ लिपि नहीं चलती है, उसके साथ उस समाज में चलने वाले रीति रिवाज, परंपराएँ, संस्कृति ये सारी बातें जुड़ी हैं। भाषा के साथ न सिर्फ़ साहित्य, कलाएं बल्कि आपके रिश्ते, व्यवहार, आपके रिश्तों की मर्यादाएं आदि सब कुछ जुड़ा हुआ है।
स्वरांगी: पुराने समय में देखें तो गुप्तकाल को स्वर्ण युग कहते हैं। तब कलाएं बहुत विस्तार पाती थीं, उसकी एक वजह यह भी थी कि उस समय का समाज जो था, आर्थिक रूप से संपन्न था। संपन्नता तो अभी भी आयी है फिर कलाएँ कैसे पीछे गयी हैं? और कला समीक्षा के रूप में जो आपकी ख्याति रही है, वैसे कला समीक्षक कहां गये?
अलकनंदा: अब ये दो सवाल बिल्कुल अलग-अलग हैं। उस समय कलाकारों को राज्याश्रय मिलता था। राज्याश्रय आज भी मिल रहा है लेकिन राज्याश्रय उसे मिल रहा है, जो चापलूसी कर रहा है, जो आगे बढ़ने के लिए अपनी ओर से कुछ प्रयत्न कर रहा है, मतलब उसमें क़ाबिलियत है या नहीं यह कोई नहीं देख रहा है। जो शीर्ष पर बैठा है उस व्यक्ति की नज़रों में उसका क्या अस्तित्व है, इसे देखकर आश्रय मिलता है। तो उस समय की सिर्फ़ आर्थिक समृद्धि से तुलना करने में कोई अर्थ नहीं, बल्कि आज तो आर्थिक समृद्धि मतलब पहुँच है। हर व्यक्ति का समूह है। इस समूह के लोग हैं, वो अलग हैं, उस समूह के लोग अलग हैं। कला की आराधना कितने लोग कर रहे हैं! कला का रियाज़ और कला के लिए वातावरण कितना है? लोगों को कितनी प्रतिक्रिया मिल रही है, उस पर सबका ध्यान है। लाइक मिल रहा है, बहुत लाइक मिल रहा है, तो अच्छा है। यह जो वातावरण बन रहा है बहुत ख़राब है। जो नया लिख रहे हैं, उनके लिए तो बहुत ज़्यादा घातक।

पहले जो कला समीक्षक होते थे, वो पहले निष्णात होते थे और कलाकारों के गुण-दोषों का सम्यक विवेचन करते थे। अब कला समीक्षक रिपोर्टर्स हैं, जो बाक़ी की ख़बरें करते हैं। जो मैंने अभी कहा कि माध्यम का जो ज़ोर है, वैसा तब नहीं था। हमारे समय जब मैं शासकीय संगीत के कार्यक्रमों के समीक्षा करने जाती थी तो मैं स्वयं बैठती थी, उनसे पूछती थी कि आप क्या गाएँगे, कैसे गाएँगे और हम बैठकर पूरा सुनते थे उन्होंने कौन-सी तान ली, किस स्वर पर उनका ठहराव था, उन्होंने किस तरह से राग का विस्तार किया, वो सब लिखते थे क्योंकि मैं संगीत जानती थी इसीलिए मुझे वैसे कार्यक्रमों में भेजा जाता था।
अब क्या है कि आप दफ़्तर में बैठे हैं, मोबाइल पर ही सब डिटेल्स ले लिये। कार्यक्रम में क्या हुआ, उससे कुछ मतलब नहीं बस कुछ भी लिख दिया, छाप दिया। कोई आपत्ति नहीं ले रहा कि क्या ग़लत छापा है। बिलासखानी तोड़ी और बिलासखानी में कोई अंतर नहीं है। राग विभास और बिलासखानी में अंतर है, यह जिसे पता नहीं, वह लिख रहा है तो मुझे नहीं लगता वह समीक्षा कर रहा है। यह सिर्फ़ प्रबंधित समाचार है। और समाचार भी उनके हैं जो विज्ञापनदाता हैं। अर्थ का प्रबंधन ज़्यादा है, इसमें साहित्य या कला या पत्रकारिता एक तरह से जो मिशन होती थी, वो तो निश्चित रूप से ख़त्म है।
स्वरांगी: आपके जीवन को यदि हम एक संक्षेप में, सारभूत ढंग से समझना चाहें तो आप कैसे बताएंगी?
अलकनंदा: जो लोग मुझे जानते हैं, उन्हें पता है मैं बहुत कड़क अनुशासन वाली महिला हूँ। मुझे लगता है अनुशासन से हमें बहुत कुछ हासिल होता है। मेरे जीवन की आरंभिक चुनौतियों का उल्लेख हुआ हालांकि बाद में भी आती रहीं। सभी के जीवन में आती हैं। मतलब कभी हम ऊँचाई पर होते हैं कभी ढलान पर। लेकिन जब हम अनुशासन में रहते हैं तो हमारा संघर्ष बेहतर होता है। चाहे वह समय का अनुशासन हो, व्यक्ति के साथ बात करने का अनुशासन हो, यही पूरे जीवन में फैला हुआ है। हम इस अनुशासन के रास्ते पर यदि चलते हैं तो हमारी उन्नति कोई नहीं रोक सकता।
(चित्र परिचय: 1. बातचीत करते हुए अलकनंदा साने व स्वरांगी साने। 2. 80 के दशक में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका प्रभा अत्रे के साथ अलकनंदा साने अपने बच्चों के साथ।)

स्वरांगी साने
प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। यूट्यूबर, कविता, कथा, अनुवाद, संचालन, स्तंभ लेखन, पत्रकारिता, अभिनय, नृत्य, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षा, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर वार्ता और काव्यपाठ। 2 कविता संग्रह, 6 किताबों का अनुवाद, 3 का संपादन, फ़िल्मों के हिंदी सबटाइटल्स, पेटेंट दस्तावेज़ों व भारत सरकार के वेब इंटरफ़ेस आदि स्टार्ट अप्स के लिए अनुवाद।
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