
- August 14, 2026
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नियमित ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
हिंदी ग़ज़ल के गिरोह की भावना
डॉ. भावना की हैसियत बिहार में परवीन शाकिर से कहीं अधिक है। इनके चारों ओर आलोचकों और समीक्षकों की एक पूरी फ़ौज निरंतर गश्त करती रहती है। जितनी किताबें इन्होंने लिखी नहीं हैं, उससे कहीं अधिक किताबें इन पर लिखी जा चुकी हैं। ग़ज़ल के लिहाज़ से इन्हें मगध और पाटलिपुत्र की पटरानी कहा जाये तो अतिशयोक्ति न होगी। ग़ज़ल पर इनका बड़ा काम है, ऐसा पाटलिपुत्र की प्रजा कहती है। इनके मुखारविंद से कोई शब्द निकलता नहीं कि समीक्षक और आलोचक तराज़ू और बटखरा लेकर दौड़ पड़ते हैं। कोई इनके शिल्प का गुणगान करने लगता है, कोई इनकी भाषा के माधुर्य की प्रशंसा में डूब जाता है। इसी को कहते हैं “ठुमकी गैया सदा कलोर” अर्थात् पढ़ने का दायरा अगर सीमित नहीं होता तो ये आलोचक इतनी बकवास नहीं करते।
नचिकेता साहब इन्हें परंपरा की वाहिका मानते हुए कहते हैं- ‘नवोदित कवयित्री (ग़ज़लकारा) भावना की, ‘अक्स कोई तुम-सा’ पुस्तक में संकलित ग़ज़लों में प्रेम कविता की एक मज़बूत कड़ी दृष्टिगोचर होती है। भावना की इन प्रेम ग़ज़लों में व्यक्त प्रेम न तो उर्दू ग़ज़ल के प्रेम की भाँति अवैध है न ही नितांत काल्पनिक है, प्रत्युत उनके दुःख, दर्द, वियोग और मिलनोच्छ्वास में यथार्थ का खुरदुरापन भी समाहित है। जिससे ये ग़ज़लें कल्पना की ऊँची-ऊँची उड़ानें नहीं भरतीं, न ही इनमें ख़ूबसूरत अंदाज़े-बयाँ है और न ही अत्यधिक नाज़ुक-ख़याली है, बल्कि इनकी जगह भोगे हुए यथार्थ की जीवन्त उष्मा है।’ नचिकेता जी की इन बातों को पढ़कर सबसे पहले तो मैं यही कहूं कि जब इनमें कुछ है ही नहीं, तो ये ग़ज़ल लिखती ही क्यों हैं!
सच्चाई तो यह है कि नचिकेता जी इन तमाम बकवास बातों के माध्यम से भावना की कमज़ोर, दो टके की ग़ज़लों के लिए एक सुरक्षा घेरा तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी बात यह कि नचिकेता को उर्दू ग़ज़ल का प्रेम अवैध क्यों लगा? आख़िर ऐसी कौन-सी किताब पढ़ ली थी उन्होंने? चलिए थोड़ी देर के लिए मान लेता हूँ कि नचिकेता जी उस समय सठिया गये थे, मगर भावना के प्यादों को तो समझना चाहिए था। टोकना चाहिए था।
नचिकेता जी के अनुसार भावना की ग़ज़लों में आया प्रेम ग़ालिब, फ़िराक़, ज़ौक़ और मीर के शे’रों में आये प्रेम से बड़ा हो गया है, क्योंकि ये तमाम शायर उर्दू के हैं, उर्दू वालों के शे’र तो अवैध प्रेम के पक्षाघात से पीड़ित रहते हैं। भावना की तुलना में इन छोटे-मोटे शायरों के कुछ शेर देख लेते हैं:
काव-काव-ए-सख़्त जानी हाय तनहाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का आना है जू-ए-शीर का
अब नचिकेता जी के अनुसार ग़ालिब की ये बेचैनी अवैध प्रेम का द्योतक है। फ़िराक़ साहब का भी एक शेर देख लेते हैं, जो नचिकेता के अनुसार लंपटता के दलदल में सना पड़ा है:
साथ रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी मेज़बानी भी
आपको इस शेर में भी कोई गंदगी नज़र आती है क्या? एक शेर ज़ौक़ का भी देख लें:
तुम भूलकर भी याद नहीं करते हो कभी
हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके
इस शेर में भी अवैध प्रेम दिखता है क्या आपको? नचिकेता साहब ने इन शेरों को क्यों नहीं पढ़ा, नहीं जानता। मीर के कितने शे’र याद किये जाएं!
उठ गया कौन पास से मेरे
जानो-दिल हैं उदास से मेरे
अब इस सादा, मुक़द्दस शेर पर क्यों आरोप लगाने पर आमादा हैं? नचिकेता साहब को तो भावना को बड़ा बताना है। मन में जो ऊल-जलूल आया बक दिया। वली से लेकर इक़बाल तक और जिगर से जौन तक के शे’रों पर नचिकेता साहब अगर होते तो क्या कहते? भावना में डूबे नचिकेता संभवतः प्रेम भाव के तमाम शेरों को धत् बता देते।
क्या इन शे’रों से ऊपर का शे’र है भावना के पास? या किसी अन्य हिन्दी शायर के पास ही है? नचिकेता को इतना तो पता होना चाहिए था कि उर्दू के शेरों को बुरा बताना इन तमाम शायरों को बुरा बताने जैसा है। इसी को कहते हैं “टाट का लंगोटा और नवाब से यारी”, आता कुछ नहीं लिखेंगे आलोचना। हो सकता है कुछ ख़राब शेर मिले हों, किन्तु समग्र रूप से उर्दू शायरी में आया प्रेम उत्तम कोटि का ही है, अवैध नहीं। ख़ैर… अब भावना की तरफ़ चलते हैं। जिस किताब में ये बातें नचिकेता साहब ने लिखी हैं, उसी किताब की पहली ग़ज़ल का पहला मिसरा देखिए:
रात रौशन है फिर पूरी जवानी लेकर
चाँद तारों से भरी एक कहानी लेकर
जश्न का मौसम है आओ नाचे गायें
बादल आ रहे हैं दूर से पानी लेकर
सबसे पहले तो ये बता दूँ कि पहली ग़ज़ल का मतला ही बह्र से ख़ारिज़ हो गया है। उसके बाद भी इतनी बड़ी-बड़ी बातें करना बिहार गैंग के सबसे बड़े समीक्षक की बेशर्मी नहीं तो और क्या है? एक बात और कहना चाहूँगा कि गैंग चाहे जहाँ का भी हो, हिन्दी ग़ज़ल में एक प्रवृत्ति चटक रूप से दिखायी देने लगी है कि तमाम समीक्षक गदहों को घोड़ा बनाने की पैरवी में जुटे हुए हैं। इन्हें ये जानना चाहिए कि गदहे को कितना भी नाल क्यों न ठोक दिया जाये वे घोड़ा/घोड़ी नहीं बन सकते हैं। ख़ैर, हम ज़रा शेर पर आते हैं, शे’र का रुक़्न है:
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
इस लिहाज़ से मतले का पहला मिसरा गच्चा खा गया है। इस ग़ज़ल में बाद के तीनों शे’र इतने छिछले हैं कि इन्हें शे’र कह के नचिकेता साहब ने शे’र की आत्मा पर वज्राघात किया है। इससे बेहतर तुकबंदी तीसरी-चौथी जमात के बच्चे कर सकते हैं।
हमारे गाँव में छठवीं-सातवीं की बच्चियाँ जब नये वर्ष पर अपनी सखियों, ख़ासकर जीजा-जीजी को कार्ड भेजती हैं, तो कुछ इसी तरह की तुकबंदियाँ, शायरी समझकर लिखती हैं:
यह जो हँसता गुलाब है साहेब
क़सम से लाजवाब है साहेब
जिस पर लिखा नहीं कोई नग्मा
दिल तो कोरी किताब है साहेब
बाद की वाहियता तुकबंदियों पर कुछ कहना समय की बर्बादी ही होगी, फिर भी अंतिम शेर पर कुछ कहने को मन कह रहा है। शेर देखें:
हर एक घर का बच्चा जाग उठा
आज फिर इन्क़लाब है साहेब
भावना को यह बात जाननी चाहिए कि इन्क़लाब एक मुसलसल प्रक्रिया है। ऐसा नहीं होता कि आज इन्क़लाब है, कल छुट्टी है, परसों फिर इन्क़लाब है। ‘इन्क़लाब’ के आगे ‘आज फिर’ लगाकर भावना ने ग़ज़ल की गरिमा को चोट पहुँचायी है। ऐसा लग रहा है ‘इन्क़लाब’ न हुआ ‘इतवार’ हो गया।
पुस्तक ‘अक्स कोई तुम-सा’ के फ्लैप पर रेवती रमण साहब लिखते हैं- ‘मीर तक़ी मीर और रघुपति सहाय फ़िराक़ की शायरी से गुफ्तगू के बिना यह भाषा और तेवर संभव नहीं। क़िस्सा कुल इतना कि उम्मीद बची हुई और मुस्कान होठों पर बरकरार है। शोख़ नज़रों में हसीन ख़्वाब और शायरी सजाने का शऊर बेमिसाल है।’
इन बातों के द्वारा रेवती रमण साहब भावना के वक़ार में कितना इज़ाफ़ा कर पाये हैं, ये तो भविष्य बताएगा, किन्तु वर्तमान उनकी फ़जीहत साफ़ देख रहा है। ये बात ठीक वैसी ही लग रही है, जैसे किसी निर्वस्त्र को देखकर कुछ लोग बलपूर्वक चिल्ला रहे हों कि देखो-देखो इसका ब्लेज़र कितना सुन्दर है, देखो-देखो इसका पैंट कितना सुंदर है। अब जब रेवती रमण साहब ने इतना दावा कर ही दिया है, तो भावना की बेमिसाल शायरी के कुछ नमूने देख ही लेते हैं:
आँखें जो कातर थीं अब तक
वह भी रुककर जाम हुई हैं
अब रेवती रमण और भावना ही बता सकते हैं कि मीर और फ़िराक़ का कौन-सा अंदाज़ इसमें आया है? सच तो ये है कि रेवती रमण ने प्रशंसा नहीं की है, अपनी धोती खुलवायी है। आख़िर भावना को ख़ुश करने की ऐसी कौन-सी मजबूरी थी रेवती रमण के पास। थोड़ा आगे बढ़कर एक और शे’र देख लेते हैं:
ज़मीर लुटा पहले उन सबका
आबरू अब नीलाम हुई है
मीर का अंदाज़े-बयां तो आप लोग देख ही रहे होंगे! मैं तो सिर्फ़ इतना बता दूँ कि ये शे’र बेबह्र भी है। एक और शे’र देखें जो भावना के वक़ार पर कालिख पोत रहा है। इस ग़ज़ल के पैरोकारों को चुल्लू भर पानी खोज लेना चाहिए…
मेरे जिस्म में जब तक ये जान बाक़ी है
मेरी शक्ल में तेरी पहचान बाक़ी है
इस मतले में ‘ये जान’ क्या है? क्या कोई और जान भी है? दूसरे मिसरे का अर्थ भी गोलगप्पे के पानी की तरह भरभंड हो गया है। एक और शे’र देखें:
वह तनहा ही चलता आया मीलों से
उसके चेहरे पर अब भी थकान बाक़ी है
जिसे रेवती रमण साहब मीर का अंदाजे-बयाँ कह रहे हैं, उस शे’र का कथ्य इतना सामान्य है कि उस पर कुछ भी कहना निरर्थक है। न तो कोई नवीनता है और न ही कोई चौंकाने वाली बात। ‘तनहा ही चलता आया मीलों से’ और ‘चेहरे पर थकान बाक़ी है’ के बीच कोई कलात्मक संबंध स्थापित नहीं हो पाया है। दूसरे मिसरे में आये ‘अब भी’ कोई अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा। इस शे’र में न ही किसी तरह का बहुअर्थी संकेत है, न ही किसी तरह की प्रतीकात्मकता। काव्यात्मक ऊँचाई का नितांत अभाव है।
ऐसे शे’रों की तुलना मीर के शे’रों से करना क्या दंडनीय अपराध नहीं है? क्या मीलों तक चलने के बाद थकान नहीं होगी? पता नहीं क्यों ऐसे लेखकों को शर्म नहीं आती। हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य है कि ऐसे शे’रों की पैरवी करने वालों की एक बड़ी भीड़ है। क्या होगा उन बच्चों का, जो इस तरह के दो टके के लोगों पर थीसिस लिखते हैं! इस बात पर एक बड़ा अभियान चलाया जाना चाहिए। ऐसे भ्रमित करने वाले भूमिका राइटरों पर रोक लगनी चाहिए।
भावना की एक और पुस्तक ‘शब्दों की क़ीमत’ देखते हैं, जिसमें इन्होंने शब्दों का कौड़ी भर भी मान नहीं रखा है। पेपर के फ्लैप पर ज़हीर क़ुरैशी साहब लिखते हैं, ‘निस्संदेह दूसरे ग़ज़ल संग्रह तक आते-आते परिपक्व भावना शब्दों की क़ीमत समझने लगी हैं।’ अगर ज़हीर साहब का ऐसा दावा है तो क्यों न परिपक्व भावनाा के शब्दों को फटक-पछोर के देख लिया जाये…
वो अमरूद फाँके, वो ताशों के पत्ते
वो पत्तों का बँटना वो अमरूद का खाना
ज़हीर जी द्वारा भावना को मितव्ययी कहा जाना भावना पर इतना असर डालता है कि भावना ने ‘अमरूद फाँके’ के बीच से करण-कारक की विभक्ति ‘से’ का अपहरण कर लिया। दूसरी व्याकरणिक अशुद्धि देखते हैं। ‘ताशों के पत्ते’ होना चाहिए या ‘ताश के पत्ते’? भावना को व्याकरण के बेसिक बातों का पता नहीं है, मगर ज़िद ये है कि अपने आप को ग़ज़ल साम्राज्ञी मनवाने पर अड़ी हैं। तीसरी बात कि इन दोनों पंक्तियों में शे’र क्या है? यहाँ तो चूहा भी नज़र नहीं आ रहा। मतलब ये है कि ज़हीर साहब जिसे प्रीमियम क्वालिटी का पेट्रोल बताने पर तुले हुए हैं उसमें पंचानबे प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ है। कुछ और शे’र देखें:
चलो फिर लुत्फ़ लेते हैं अकेले
विदेशी व्यंजनों के ज़ायक़े का
भला इस शे’र का क्या संदर्भ लिया जा सकता है? संदर्भ के अभाव में ये आधारहीन-सी बकबक है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने व्यर्थ तुकबंदी कर दी हो। इस तुकबंदी की एक और बात सोचने लायक़ है कि विदेशी व्यंजनों के ज़ायक़े का लुत्फ़ भावना अकेले क्यों लेना चाहती हैं? या यह व्यंजन कोई और बला है? एक और शेर देखें:
छोड़कर वक़्त का फिर अफ़साना
कबका इतिहास लिये बैठे हैं
उपर्युक्त शे’र का ऊला मिसरा पढ़कर ऐसा लग रहा है मिसरा आसन्न भूतकाल या पूर्ण भूत काल में है। ऐसे में बीते हुए वक़्त का अफ़साना इतिहास ही तो है, फिर ये कहने की ज़रूरत क्या है कि बीते हुए वक़्त का अफ़साना छोड़कर इतिहास लिये बैठे हैं। क्या पाठकों को ये सब फूहड़ नहीं लगता? कुछ और भी:
शांत था चौपाल का मंज़र यहाँ
जाने कैसे बग़ावत हो गयी
इसमें मंज़र के बाद आया ‘यहाँ’ आख़िर क्या कहना चाहता है? चौपाल का मंज़र तो सिर्फ़ चौपाल में ही होगा। ये यहाँ, वहाँ क्या है? ख़ैर…
इस लेख में मेरी शुरू से कोशिश रही है कि मैं भूमिका राइटरों से रचनाकारों को सावधान कर सकूँ। रचनाकारों को ये बता सकूँ कि किस तरह भूमिकेबाज़ झूठी प्रशंसा कर रचनाकारों को आत्ममुग्धता का शिकार बना देते हैं। रचनाकारों को विकसित होने का मौक़ा ही नहीं देते। भावना इसका सबसे अधिक शिकार हुई हैं। ज़हीर क़ुरैशी साहब ने भावना के बारे में जो कुछ भी लिखा है, उनकी ग़ज़लों से गुज़रकर समझ आ जाता है, सब पूरी तरह झूठ है। ऐसा करने में उनका क्या लाभ रहा, मैं नहीं जानता। ज़हीर साहब का कहना है ‘भावना की ग़ज़लों में वज़्न और बह्र की कमियाँ न्यूनतम हैं।’ उपर्युक्त शे’र को ही देख लीजिए, इस दावे की पोल खुल जाएगी।
ज़हीर साहब को बह्र का अच्छा ज्ञान होता तो ऐसी बात नहीं करते। भावना की पुस्तक में ऐसी कोई ग़ज़ल ही नहीं जिसमें कोई न कोई ग़लती न हो। ज़हीर साहब का ‘परिपक्वता’ वाला दावा याद रखते हुए कुछ और बेढंगी ग़लतियाँ देखिए:
कुछ भी दे दो बहल जाएगा
वह तो बच्चा है रोता हुआ
इससे वाहियात बात और क्या हो सकती है? पहली बार जाना कि रोता हुआ बच्चा कुछ भी देने से बहल जाता है। अब तक तो ये समझता था कि रोता हुआ बच्चा, वो चीज़ पाकर बहलेगा, जिसके लिए वो रो रहा हे। एक और शेर का सौन्दर्य देखें:
कह रही ठोकर लगी यह पाँव अब
दर्द दिल में है दबाना रात-दिन
ये ‘ठोकर लगी पाँव’ क्या होता है?
जैसे ही मोम हूँ मैं वो जलता हुआ दिया
वैसे मेरा वजूद पिघलता चला गया
क्या इतना बकवास शेर आप लोगों ने कभी पढ़ा था? उपर्युक्त शे’र का मतलब निकाल पाना मेरे लिए तो दुष्कर है।
वो मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है
मगर फिर भी वो चलता जा रहा है
‘मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है’ का क्या अर्थ है? क्या ‘पिछड़ना’ शब्द का सही इस्तेमाल किया गया है? सुशील कुमार साहब ने भी इनकी कम पैरवी नहीं की है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि सुशील कुमार, नचिकेता, ज़हीर क़ुरैशी, दरवेश भारती, वशिष्ठ अनूप, अशोक मिज़ाज तथा ज़ियाउर रहमान जाफ़री जैसे लोग भावना को परवीन शाकिर क्यों बनाना चाह रहे हैं! जिसमें शब्दों को बरतने तक का शऊर नहीं है, क़ाफ़िया का ज्ञान नहीं है, बह्र का ज्ञान नहीं है, उस पर लोग इतना मेहरबान क्यों है? ख़ैर… लगे हाथ काफ़िया भी देख लें:
वो कहते हैं डरूँ मैं
भला यह क्यों करूँ मैं
उसे चाहत ये क्यूँ है
किसी दिन रो पड़ूँ मैं
इस शेर में ‘डरूँ’, ‘करूँ’ के बाद क़ाफ़िया, ‘पड़ूँ’, ‘लड़ूँ’, ‘मरूँ’ और ‘जड़ूँ’ हो गया। ऐसे में क्या कहा जाये- ज़हीर साहब को कुछ नहीं आता या भावना को कुछ नहीं आता या फिर दोनों को कुछ नहीं आता!
चाँद शरमा के छुप गया ऐसे
शब ने धीरे-से कुछ कहा जैसे
कोई मरहम न है किसी की दुआ
दर्द दिल से उतर रहा कब से
इस ग़ज़ल में भी ‘ऐसे’ ‘जैसे’ के बाद ‘कब से’, ‘जब से’, ‘कैसे’ और ‘तबसे’ क़ाफ़िये आकर पाठक की भावनाओं का चीरहरण कर रहे हैं। अब आइए बह्र की तरफ़ चलते हैं।
‘अक्स कोई तुम-सा’ में नचिकेता साहब भावना के लिए लिखते हैं- ‘यह बात दीगर है कि भावना की प्रेमाभिव्यक्ति में स्त्री सुलभ झिझक है। वाचाल खुलापन नहीं, इसलिए विश्वसनीय लगती है।’ अगर ऐसा है तो क्यों न इस झिझक की नाज़ुकी पर थोड़ा-सा दृष्टिपात कर लिया जाये:
उसने क्या कह दिया प्यार से
इक नशा-सा बदन में रहा
ऐसे जज़्बात बिकने लगे
जैसे घर कोई कोठा हुआ
नंगा मन और नंगा तन
बन बैठी है आदिम रात
ठंड में अक्सर जाड़े की
बन जाती है ज़ालिम रात
अधजगी रात सारी होती है
इश्क़ का जब बुखार आता है
इन तमाम शेरों की मौजूदगी के पश्चात् भूमिका राइटर द्वारा कहना कि भावना की प्रेमाभिव्यक्ति में स्त्री-सुलभ झिझक है, कितना उचित ठहराया जा सकता है? स्त्री-पुरुष की रंगीन रातों का, जाड़े की रंगीन रातों का इतना सजीव वर्णन तो लखनऊ के उन पुराने शायरों में भी कम ही देखने को मिलता है, जिसकी वजह से मीर लखनऊ जाकर काफ़ी दुःखी हुए और लिखना पड़ा:
ख़राबा दिल्ली का हरचन्द बेहतर लखनऊ से था
वहीं मैं काश मर जाता सरासीमा न आता यों
आबाद, उजड़ा लखनऊ चुगदों से अब हुआ
मुश्किल है इस ख्रराबे में आदम की बूद-ओ-बाश
भावना के कुछ और शे’र आप को दिखाता हूँ। भले ही बिहार में भावना की तूती बोलती है, मगर इन शेरों पर अपनी स्वीकृति दे देना जीती मक्खी निगलने से कम नहीं होगा। प्रो. वशिष्ठ अनूप लिखते हैं कि डॉ. भावना की ग़ज़लें अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों ही स्तरों पर विशिष्ट हैं। ऐसे में प्रोफ़ेसर साहब और भावना, दोनों को ही परख लेना आवश्यक हो जाता है।
फ़ुटपाथ के परिंदों की तक़दीर है यही
ताउम्र उसको जीना है दामन पसार कर
इस शे’र की अभिव्यक्तिगत और अनुभूतिगत स्पष्टता दोनों ही अधर में लटकी हैं। ‘फ़ुटपाथ के परिंदे’ न तो कोई प्रतीक बना पा रहे हैं, न ही कोई विशेष अर्थ छोड़ पा रहे हैं। ‘दामन पसार कर’ भी कोई मुहावरा नहीं बना पा रहा। ऐसे में डॉ. भावना के साथ-साथ वशिष्ठ साहब की भी कलई खुलती नज़र आती है। वशिष्ठ अनूप की आख़िर ऐसी कौन-सी विवशता थी कि उन्हें ये भ्रम फैलाना पड़ रहा है। इतनी बड़ी बात लिखने के पहले उन्हें भावना के शे’रों को ज़रूर पढ़ लेना था। कुछ और बचकाने और वाहियात नमूने:
दिखी है आइने में शक्ल जबसे
हर इक मंज़र बदलता जा रहा है
आपको कुछ समझ आ रहा है? ये शक्ल किसकी है, शक्ल में आख़िर ऐसा क्या है? दहशत है या आनन्द है? कुछ भी समझ पाये आप? कहीं कोई भूत तो नहीं दिख गया? एक और देखें:
नहीं हो मान जब पगडंडियों का
तो क्या मतलब वतन की संधियों का
हो सकता है बिहार गैंग इसका अर्थ जानता हो, मगर यहाँ स्पष्ट नहीं हो पा रहा। शायद वशिष्ठ अनूप को पता हो। वे प्रोफ़ेसर हैं, कोई भी अर्थ लाद सकते हैं। और देखें:
प्रेम बूँदों में ढल के जब आये
कितने दिन तक बचा करे कोई
इस ‘प्रेम की बूँद’ पर NASA और ISRO को ज़रूर रिसर्च करना चाहिए। इज़राइल वालों को ज़रूर पता होगा… मैं तो घुटने पर आ गया हूँ। एक और:
गंध होती क्या बदन की शख़्स वह कह पाएगा
छाँव का जो आशियाना टाँगता है धूप में
वाह! क्या बात है। क्या ही मज़मून निकाला है। किसी के बाप की मजाल है जो इसे समझ ले! वशिष्ठ अनूप साहब की मैं नहीं जानता। हो सकता है वो समझ लें। यह भी देखिए, पाठकों की नानी न मर जाय तो कहिए:
झील में ही अक्स अपना देखना
ये गगन है आसमानी आज भी
ग़ालिब और मीर के बाप की भी औक़ात नहीं थी जो गगन को आसमानी बनाने का ख़्याल उनके मन में आता। इसे सिर्फ़ भावना लिख सकती हैं और वशिष्ठ अनूप, नचिकेता, रेवती रमण, ज़हीर क़ुरैशी और जीवन सिंह जैसे लोग सराह सकते हैं। इसी को कहते हैं “जैसे बाबा आप लबार, वैसे उनका कुल परिवार।” कहने का अर्थ कि भावना तो लबर-सबर लिखी ही थीं, लबार आलोचकों ने और भद्द कर दी।

अंत में चलते-चलते विज्ञान व्रत साहब की भी बात उद्धृत कर दूँ। विज्ञान व्रत लिखते हैं, ‘भावना जी जिस गति और नैरंतर्य के साथ साहित्य में अपनी रचनात्मक उपस्थिति का आभास कराते हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं, वह साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा का सुखद परिचायक है।’
मैं विज्ञान व्रत की इस बात से सहमत हूँ। वाक़ई इनकी गति बहुत तेज़ है। यह गति साहित्य की गति नहीं है। साहित्य का पहला नियम है कि जैसे-जैसे साहित्य की समझ बढ़ती है, रचनाकार की गति धीमी होती है। लेकिन यहाँ सब उल्टा चल रहा है। एकदम वैसे ही जैसे “जोरू चिकनी मियाँ मजूर” अर्थात बातें बड़ी-बड़ी, ग़ज़ल फुस्ऽ… ‘चुप्पियों के बीच’ ग़ज़ल पुस्तक कुछ उलटने-पलटने लायक़ ज़रूर है मगर इसकी वज्ह भावना नहीं दरवेश भारती हैं। ‘अक्स कोई तुम-सा’ और ‘शब्दों की क़ीमत’ ग़ज़ल पुस्तकें तमाम पैरोकारों की पैरवी के बाद भी डस्टबिन में फेंकने लायक़ हैं। जिन्हें ग़ज़ल का थोड़ा-सा भी इल्म है, वे मेरी बात से ज़रूर सहमत होंगे।
घोर आश्चर्य होता है जब ‘चुप्पियों के बीच’ पुस्तक पढ़ता हूँ। काफ़ी चुस्त-दुरुस्त नज़र आती है। अब इसमें भावना की मेहनत है या दरवेश भारती की! हिंदी ग़ज़ल के संसार की ख़बर रखने वाला कौन नहीं जानता। हालांकि भूमिका में दरवेश भारती ने भी ऐसी मनगढ़ंत तारीफ़ें टांक दी हैं, जिन्हें तार-तार करने दो मिनट न लगें।
लुब्बे-लुबाब यह कि भावना का रचना-संसार, मेरा मतलब साहित्यिक रचना-संसार बहुत ही संदिग्ध और तीव्र गति वाला है, जो साहित्य की दुनिया से मैच नहीं करता। इनकी ग़ज़लें बिल्कुल ही छिछली और इकहरी हैं।
अंततः यही कहना चाहूँगा कि इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति-विशेष को कठघरे में खड़ा कर उसे ध्वस्त करना नहीं है, बल्कि हिन्दी ग़ज़ल में पनप गयी और पनप रही उस प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकर्षित करना है, जिसमें पेड समीक्षकों द्वारा एक प्लैनिंग के तहत रचना से अधिक रचनाकार की प्रशंसा का शोर मचाया जाता है। किसी भी रचनाकार का वास्तविक मूल्यांकन उसकी रचनाओं के आधार पर होना चाहिए। भूमिका-लेखकों, समीक्षकों अथवा साहित्यिक समूहों की गिरोहबाज़ी द्वारा निर्मित प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं।
यदि किसी पुस्तक में बह्र, क़ाफ़िया, रदीफ़, भाषा, व्याकरण, कथ्य और अभिव्यक्ति से जुड़ी बेसिक कमियाँ हैं, तो आलोचक का दायित्व है उन्हें रेखांकित करे। अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा के माध्यम से कमियों को ढँक देना साहित्य के साथ बेईमानी है। झूठी सराहना किसी भी रचनाकार का अहित करती है, उसे आत्ममुग्धता की ओर ले जाती है और आत्म प्रक्षालन की संभावना को समाप्त कर देती है। सबसे ज़्यादा नुक़सान पाठकों का और अंतत: उस विधा एवं काव्य परंपरा का होता है, जिसके कंधे पर चढ़कर आप व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति कर लेते हैं। स्वस्थ साहित्यिक संस्कृति वही है, जिसमें रचनाएँ कसौटी पर कसी जाएँ, आलोचक निष्पक्ष रहें और रचनाकार अपनी कमियों को स्वीकार करने का साहस रखें।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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