August 14, 2026 आब-ओ-हवा टिप्पणी अगस्त-47 से आज तक: आज़ादी का सफ़र खुर्शीद मलिक की कलम से…. अगस्त 1947 से आज तक: आज़ादी का सफ़र 15 अगस्त 1947 को जब भारत ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा विश्लेषण सीजेपी आन्दोलन और लोकतंत्र का कल डॉ. वीरेन्द्र कुमार शेखर की कलम से…. सीजेपी आन्दोलन और लोकतंत्र का कल कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका वास्तविक महत्व उनके घटित होने... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा नज़रिया लोकतंत्र सुरक्षित है व्यंग्य रवि श्रीवास्तव की कलम से…. लोकतंत्र सुरक्षित है वह मेरे पास आकर बैठ गया। हताश और उदास। राह चलते मुलाक़ात हो जाती... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा इत्यादि व्यंग्य का दरोगा व्यंग्य-कथा संजीव परसाई की कलम से…. व्यंग्य का दरोगा दरोगा-राज में सब सुखी थे। लोग ले-देकर अपने काम आसानी से करवा लेते। देने वाले... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा जो है सो है हिंदी ग़ज़ल के गिरोह की भावना नियमित ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से…. हिंदी ग़ज़ल के गिरोह की भावना डॉ. भावना की हैसियत बिहार में परवीन शाकिर से कहीं... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा उर्दू के शाहकार जंग-ए-आज़ादी, आज़ादी और उर्दू शायरी इस बार इस कॉलम में कुछ ऐसी रचनाएं, जो न सिर्फ़ आज़ादी की बात करती हैं बल्कि तक़्सीम-ए-हिंद (भारत विभाजन) पर सवाल भी खड़ा करती हैं; आज़ादी के मतवालों... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा Truth in हेल्थ प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ के मन में स्वास्थ्य से जुड़ी हमारी धारणाओं, प्रैक्टिसों, नीतियों और अप्रोच आदि को लेकर यह ब्लॉग लगातार चिंतन प्रस्तुत कर रहा है। ‘आज़ादी का ऑडिट’ अंक में देश की स्वास्थ्य नीतियों... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा सिनेमा: विश्वकथा सिनेमा को ‘वैचारिक’ बनाने वाला पहला फ़िल्मकार पहले विश्वयुद्ध के बीच रूस की क्रांति ने एक फ़िल्मकार को उभारा, जिसने पहली बार सिनेमा को वैचारिकी का माध्यम बनाने का सफ़र शुरू किया। इस सफ़र में वह... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा 25 बरस 25 फ़िल्में ‘मुल्क’ से बदलते सिनेमा का अनुभव सिनेमा जगत में एक ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी आज़ादी का माहौल है तो दूसरी ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी पाबंदी का। इस बीच एक... Continue Reading
August 14, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं सात दशक बाद भी रही आस की आस आज जब हम हर शब्द के मायने भूल रहे हैं, हर शब्द अपना अर्थ खोता जा रहा है तब ‘आज़ादी’ शब्द के अर्थ को क़ायम रखना हमारा कर्तव्य हो... Continue Reading