
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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"साथ, यक़ीं, वाबस्तगी, बिकने थे बेदाम/ आज़ादी जो रख दिया, बंटवारे का नाम"... 1947 में विभाजन की क़ीमत पर आज़ादी मिली। आज हम कितने आज़ाद हैं और कितने विभाजित? हर साल 14-15 अगस्त पर यह सवाल हमारे सामने होता है। तमाम फ़नकार अपने हिस्से की फ़िक्र इस मौक़े पर रखते हैं। इस बार आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स की राजकुमार संतोषी निर्देशित फ़िल्म 'बंटवारा' रिलीज़ हो रही है जिसमें शबाना आज़मी, सनी देओल, प्रीति ज़िंटा, विकी कौशल जैसे अभिनेता मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फ़िल्म हमारे दौर के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत के लोकप्रिय नाटक 'जिस लाहौर नइं देख्या ओ जम्याइ नइं' पर आधारित है। उनके नाटकों, सिनेमाई दृष्टि और हाले-हाज़रा पर असग़र वजाहत से भवेश दिलशाद ने फ़ोन पर बातचीत की। आब-ओ-हवा के लिए ख़ास पेशकश...
साहित्य जनमत बनाने के सिवा करे भी क्या: असग़र वजाहत

भवेश दिलशाद: वजाहत साहब नमस्कार। सबसे पहले तो मुबारकबाद कि एक और फ़िल्म आ रही है आपकी कहानी या कहें आपके लिखे और हम सबके पसंदीदा नाटक पर।
असग़र वजाहत: जी बहुत शुक्रिया। हम सबके लिए बहुत ख़ुशी की बात है। ज़रूर देखेंगे हम सभी।
दिलशाद: मेरा ख़याल है यह नाटक ‘जिस लाहौर नइं देख्या..’ हमारे दौर के सबसे कामयाब और मशहूर नाटकों में से एक रहा है।
वजाहत: हां साहब, मेरा ख़याल है भारत की सारी भाषाओं में तक़रीबन 2000 शो इसके हो चुके हैं। 400 शो तो केवल दिनेश ठाकुर द्वारा स्थापित, मुंबई के ‘अंक’ रंग समूह ने ही किये। हबीब साहब ने भी कई शो किये इस नाटक के और… और भी बहुत रंग समूहों ने इसे खेला।
दिलशाद: हम इस नाटक की यात्रा को एकदम शुरू से देखें, मुराद यह कि किताब की शक्ल में आया यह नाटक और फिर मंचन कहां से, कैसे शुरू हुआ?
वजाहत: नाटक तो होते ही मंचन के लिए हैं, केवल लिखा हुआ नाटक तो नाटक माना ही नहीं जाता, है ना साहब… श्रीराम सेंटर में उन दिनों एक वर्कशॉप जैसी गतिविधि हुआ करती थी, जिसमें नाटककारों को बुलाकर उनके नये नाटक सुने जाते थे। मैंने भी वहां पढ़ा था यह नाटक, जो ऑडियो लाइब्रेरी में सुरक्षित हो गया था। ये तब की बात है, जब हबीब तनवीर साहब प्रसिद्धि पा चुके थे तो श्रीराम सेंटर वालों ने उन्हें बुलाकर अनुरोध किया कि उनके लिए वे कोई नाटक करें।
हबीब साहब रेपर्ट्री की स्क्रिप्ट लाइब्रेरी से नाटक निकलवाकर सुना करते थे। सुनकर यह नाटक उन्हें पसंद आया और उन्होंने इसे मंचित करने की बात कही। तब मैं यूरोप में था, मुझे सूचना मिली तो मुझे आश्चर्य भी हुआ क्योंकि हबीब साहब का तो रंगमंच अलग ही स्टाइल का था ना…
दिलशाद: जी उनका काम तो लोकनाट्य की तरफ़…
वजाहत: हां बिल्कुल, और इस नाटक का लोक-शैली से कोई संबंध था नहीं। यह तो शहरी मंच के हिसाब का नाटक था। तब भी, हबीब साहब नामी डायरेक्टर तो थे ही, तो… इस तरह पहला शो हुआ और हबीब साहब की अद्भुत क्षमता से इस नाटक को लोकप्रियता मिलने का सिलसिला भी चल पड़ा।
दिलशाद: आपको याद है ये किस वर्ष की बात रही होगी?
वजाहत: ये 1989-90 के आसपास की।
दिलशाद: यानी हम कह सकते हैं तक़रीबन 40 सालों की यात्रा इस नाटक की रही है। इस यात्रा में और भी कई यादगार क़िस्से, लमहे रहे होंगे। उनमें से कुछ आप साझा करें।
वजाहत: हबीब साहब का नाटक देखने उस ज़माने में कराची से आये हुए थे ख़ालिद अहमद। वह कराची में यह नाटक करना चाहते थे लेकिन वहां पुलिस ने स्क्रिप्ट देखने के बाद इजाज़त नहीं दी। तीन ऑब्जेक्शन लगाये — पहला तो यही कि लेखक पाकिस्तानी नहीं है, दूसरा नाटक में मौलवी की हत्या पर ऐतराज़ और तीसरा यह कि नाटक का मुख्य किर्दार हिंदू बुढ़िया का है, जो बहुत हावी है या कहिए प्रभावशाली है। पुलिस से अनुमति नहीं मिली तो ख़ालिद साहब ने इस नाटक को फिर कराची में जर्मनी के गोएथे इन्फ़रमेशन सेंटर में किया। फिर प्रेस में इसके रिव्यू उसी तरह के आये जैसे यहां के अख़बारों में आये थे… उसके बाद सत्ता बदली तो अब पाकिस्तान में पंजाबी और हिंदी दोनों में यह नाटक होता है।
दिलशाद: कराची में मंचन की बात आप बता रहे हैं 90-92 के आस-पास की?
वजाहत: हां, 92 के आस-पास।
दिलशाद: और तब यहां सांप्रदायिक दंगों का माहौल था।
वजाहत: हां, जी हां।
इसके बाद इस नाटक का एक शो वॉशिंग्टन डीसी में हुआ था। कैनैडी सेंटर को संसार का सबसे बड़ा कल्चरल सेंटर माना जाता था और आम तौर से वहां हिंदी नाटक नहीं होते थे। वर्ष 2000 के आस-पास यह पहला हिंदी नाटक था, उमेश अग्निहोत्री के निर्देशन में जिसके दो शो हुए, दोनों शो हाउसफुल रहे।
और इसका एक शो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हुआ था। वहां से एक बड़ा रोचक फ़ीडबैक आया था। पाकिस्तान के एक मुहाजिर परिवार ने वहां यह नाटक देखा। एक महिला को आंखों की ऐसी बीमारी थी कि आंखों में पानी नहीं आता था, सूखी रहती थीं। किसी नर्व की सर्जरी होना थी उनकी, लेकिन नाटक देखकर उनको जो भी याद आया, महसूस हुआ, वो इस क़दर रोयीं कि अगले दिन डॉक्टर ने कह दिया कि अब सर्जरी की ज़रूरत नहीं है। इमोशनल प्रेशर से वह नर्व खुल गयी थी।
दिलशाद: बतौर एक लेखक जब आपको इस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलतीं तो ज़ाहिर है एक तसल्ली तो होती ही होगी!
वजाहत: हां साहब, ये इफ़ेक्ट होता है, लगता है कि लोग इससे जुड़ पा रहे हैं और लेखन अपने उद्देश्य में कामयाब हो रहा है।
दिलशाद: वजाहत साहब, मेरी भी कुछ यादें इस नाटक के साथ बतौर दर्शक रही हैं। 2006-07 में मैंने पृथ्वी थिएटर में दिनेश ठाकुर के निर्देशन वाला शो देखा था। कुछ-एक दृश्यों में आपत्तिजनक समझी जाने वाली गालियों का इस्तेमाल भावुकता की रौ में किया गया था। यहां दो सवाल — एक तो क्या आपके मूल नाटक में इस तरह की गालियां प्रकाशित हुई थीं? और दूसरे यह कि कला साहित्य में इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आप क्या सोचते हैं?
वजाहत: नहीं, मेरे लिखित नाटक में इस तरह की गालियों का इस्तेमाल नहीं था। वो असल में हुआ यह था कि दिनेश ठाकुर उस नाटक को थोड़ा अग्रेसिवली स्टेज करने के पक्ष में थे इसलिए गालियों वाला प्रयोग करते थे। हमारी बात हुई थी। कुछ अरसे बाद उन्होंने जो मंचन किये, उनमें फिर गालियों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया। दरअसल यह नाटक जो है, अंडरकरंट का कंटेंट रखता है, इसमें ऐसा नहीं है कि आप इसे कोई सांप्रदायिक नारा बनाकर छोड़ दें।
दिलशाद: बेशक, दूसरा सवाल अभी मुंतज़िर है।
वजाहत: हां भाषा… देखिए आप जानते हैं, वही बात है अगर किसी कहानी की मांग है और कुछ ऐसे शब्दों के बग़ैर काम चल ही नहीं सकता तो ठीक है लेकिन बेवजह गालियां डालना, केवल सेंसेशनलाइज़ करने के लिए उचित नहीं है।
दिलशाद: यह तो परफ़ेक्ट जवाब है ही। मैं एक और याद आपसे साझा करूं… 21वीं सदी से ऐन पहले जब मैं सतीश मेहता जी के रंग समूह ‘प्रयोग’ में बतौर अभिनेता था, तब वह बताते थे वजाहत साहब ने ख़ुद कहा कि कई जगह खेला गया है लेकिन इस नाटक का अब तक का सबसे अच्छा मंचन आपने किया…
वजाहत: अच्छा, हो सकता है मैंने कहा हो, अब पुरानी सभी बातें तो याद कैसे रहें।
दिलशाद: मैं इस प्रसंग से यह समझना चाहता हूं एक लेखक और रंगमंच के निर्देशक के बीच दृष्टिकोण को लेकर किस तरह संवाद होता है, क्या तालमेल होता है।
वजाहत: देखिए, जब एक निर्देशक नाटक का मंचन करना चाहता है तो इसका मतलब है कि उसने बार-बार पढ़कर उस नाटक के कथ्य को पसंद किया और उसकी मूल चेतना से प्रभावित हुआ। अब सवाल यह है कि वह इस मूल चेतना को सुरक्षित रखेगा या नहीं, है ना। अब अगर निर्देशक बुद्धिमान है तो वह इसे सुरक्षित और विकसित करेगा.. अगर निर्देशक मूर्ख है या अहंकारी है तो उसकी पहली कोशिश रहेगी कि अपना ठप्पा लगाकर इसे बदल दूं, है ना। कि साहब मैं तो निर्देशक हूं, मैं जा चाहूं कर दूं। इस अहंकार से नाटक पर बुरा असर पड़ता है।
अच्छा, बहुत-से निर्देशक मिल-जुलकर काम करने में यक़ीन करते हैं। जैसे हबीब साहब के साथ मेरी काफ़ी बात होती थी। कई बातों पर हम सहमत होते थे और कुछ पर नहीं भी होते थे। ठीक है, यह असल में कलेक्टिव आर्ट है इसमें एक्टिंग, लाइट, साउंड कई विधाओं के कलाकारों का योगदान होता है, तो चीज़ें स्थिति अनुसार बदली जाती हैं।
फिर ऐसा भी है कि नाटक कोई गीता या क़ुरआन तो है नहीं कि इसमें कुछ फेरबदल मुमकिन न हो। कभी अभिनेताओं के कारण कुछ चीज़ें घटाना-बढ़ाना पड़ती हैं। कुल मिलाकर इस कलेक्टिव आर्ट की मांग यही है कि निर्देशक व लेखक के बीच सहमति हो। दोनों के बीच एक अंडरस्टैंडिंग हो तभी मंचन अच्छा हो सकता है।
दिलशाद: आपकी ये बातें गोविंद निहलाणी साहब के उन शब्दों की याद दिलाती हैं जब मुंबई में मैंने उन्हें एक समारोह में विजय तेंदुलकर के साथ क्रिएटिव रिश्तों के संदर्भ में कहते सुना कि लिखा हुआ नाटक और पर्दे पर आ रहा नाटक कुछ स्तरों पर अलग हो सकता है।
वजाहत: बिल्कुल सही बात है। लिखा जा रहा नाटक जब ख़ास तौर से स्क्रीन पर आता है, तो बिल्कुल अलग नज़र आ सकता है। मीडियम का फ़र्क तो पड़ता ही है।
दिलशाद: लेखक रंगमंच के लिए तो नाटक लिख ही रहा है लेकिन सिनेमा के पर्दे पर जाते हुए लेखक की अप्रोच में क्या कुछ फ़र्क होता है?
वजाहत: बहुत फ़र्क आता है क्योंकि मंच की सीमाएं सिनेमा की नहीं हैं और नाटक की जो गतिशीलता है वह सिनेमा की नहीं है, है ना। मंचन हर बार अलग है इसलिए जीवंत है, लेकिन सिनेमा एक बार जो बन गया, हमेशा के लिए है। अब सिनेमा में जैसे क्लोज़अप शॉट है, वह मंचन में मुमकिन नहीं है। जैसे माई के मरने का जो दृश्य है, सिनेमा में बहुत प्रभावशाली बना है। तो लाइट, साउंड, कैमरा आदि सिनेमा को अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं।
अब दूसरी बात होती है पात्र परिचय/बैकग्राउंड। रंगमंच में तो आप यह सीधे कहकर बता सकते हैं कि ये कौन-सा किरदार है लेकिन सिनेमा का व्याकरण अलग होता है। तो ज़ाहिर है मीडियम के लिहाज़ से स्क्रिप्ट को बदलना होता है।
दिलशाद: चूंकि सिनेमाई लेखन से कुछ राब्ता रहा मेरा इसलिए जानता हूं कि इस विमर्श में निर्देशकों का यह पुख़्ता दावा है, कभी-कभी ऐरॅगैंस भी कि सिनेमा निर्देशक का माध्यम अधिक है लेखक का कम, आप किस तरह देखते-समझते हैं?
वजाहत: मैं समझता हूं यह भी एक कलेक्टिव आर्ट ही है। कई तरह के तकनीकी पहलू और कलाकार मिलकर किसी कहानी को पर्दे पर साकार करते हैं। निर्देशक का दायित्व होता है कि वह कथ्य को और प्रभावशाली, और शक्तिशाली ढंग से प्रस्तुत करे। इसमें निर्देशक का अहंकार बीच में आता है तो काम ख़राब होगा ही। मिला-जुलाकर यह है कि कलेक्टिव आर्ट है, जिसके लिए सबसे प्रमुख नज़रिया निर्देशक का होता है और वह एक तरह से पाठ को या कथ्य को री-शेप करता है।

दिलशाद: आपके नाटक पर बन रही फ़िल्म ‘बंटवारा’ पर बात करने से पहले मुझे याद आता है फ़िल्मों से आपका नाता पुराना रहा है। मुज़फ़्फ़र अली साहब के लिए ‘गमन’ की स्क्रिप्ट पर आपने काम किया। फ़िल्मी लेखन की आपकी यात्रा क्या अनवरत रही या..?
वजाहत: 1977-78 में ‘गमन’ फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, जिसकी स्क्रिप्ट पर उनके असिस्टेंट केतन मेहता के साथ मैंने काम किया था। अब लगातार तो नहीं रह सका फ़िल्मी लेखन, फिर भी मैं इससे जुड़ा रहा। जामिया में पटकथा लेखन पढ़ाता रहा। फिर पटकथा लेखन को लेकर मेरी एक किताब राजकमल से छपी।
कुछ काम मैंने टीवी के लिए भी किया। 1989-90 में आपको याद हो तो दूरदर्शन के लिए धारावाहिक ‘बूंद-बूंद’ के एपिसोड मेरे ही थे, जो विवादों और क़ानूनी केस के लिए ज़्यादा याद किया जाता रहा। ‘ग़ज़ल की कहानी’ टाइटल से 16एमएम पर एक डॉक्युमेंट्री बनायी थी। मिला-जुलाकर यह रहा कि मैं कुछ काम करता रहा और पढ़ाता भी रहा तो अनुभव के लिहाज़ से मुझे फ़ायदा रहा। यानी मुझे यह समझ में आता रहा कि मार्केट क्या है, राजकुमार संतोषी जैसे निर्देशक किस तरह से स्क्रिप्ट पर काम करते हैं।
दिलशाद: राजकुमार संतोषी ‘बंटवारा’ बना रहे हैं, इससे पहले 2023 में उन्हीं की फ़िल्म ‘गांधी गोडसे एक युद्ध’ आपके नाटक ‘गोडसे@गांधी.कॉम’ पर आधारित थी। संतोषी जी के साथ आपका सिनेमाई कलात्मक रिश्ता कैसे शुरू हुआ?
वजाहत: देखिए संतोषी जी ने ‘जिस लाहौर नहीं देख्या..’ नाटक पहले पढ़ा था और उस पर वह बड़े पैमाने पर फ़िल्म बनाना चाह रहे थे। तब उन्हें उसके लिए फ़ंड नहीं मिल पाया था…
दिलशाद: यह कबकी बात हुई सर?
वजाहत: ये 12-13 साल पहले की बात होगी। ख़ैर फ़ंड नहीं मिला तो वह बोले गांधी और गोडसे वाला छोटा नाटक है, इसे पहले बना लेते हैं। हालांकि मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ क्योंकि यह तो काफ़ी सियासी नाटक था और इसे बनाना तो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा ही था। फिर भी उनका उत्साह था और मुझे लगता है अच्छी, प्रभावशाली फ़िल्म बनायी उन्होंने। हालांकि कुछ लोगों को शायद समझ नहीं या गोडसे को देखकर ही वे लोग डर गये… असल में निगेटिव कैरेक्टर दिखता ही ज़्यादा पावरफ़ुल है।
दिलशाद: मुझे याद है इस फ़िल्म की प्रतिक्रिया में दो बातें बहुत चर्चा में थीं, एक तो यह कि गोडसे को गांधी के बरअक्स खड़ा करना एक क़िस्म का महिमामंडन माना गया और दूसरे जनवादी लेखक संघ के साथ आपकी लंबी पारी पर भी असर पड़ा…
वजाहत: देखिए, लोग केवल गोडसे का नाम सुनते थे। पहली बार पर्दे पर उस किर्दार को सबने साकार देखा। एक प्रभावशाली अभिनेता ने वह रोल किया तो सबको पहली बार अहसास हुआ कि इस किर्दार में क्या पावर है, अब इसे लोगों ने गोडसे का महिमामंडन कह दिया। आप याद करें तो उस फ़िल्म में एक संवाद है जिसमें गोडसे इस प्रश्न पर निरुत्तर रह जाता है कि तुमने अंग्रेज़ों को तो एक पत्थर तक नहीं मारा, गांधी पर गोली चला दी… यह कहना तो बेवकूफ़ी की बात है कि महिमामंडन हो गया।
असल में, उस फ़िल्म पर ऐसी प्रतिक्रिया की वजह थी ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस से जुड़ी कुछ बातें। गांधी तो कांग्रेस को डिज़ॉल्व कर ही देना चाहते थे। जब ऐसी बातें फ़िल्म मेंं आयीं तो लेफ़्ट के लोगों को खल गयीं क्योंकि अब लेफ़्ट के पास अपना तो कोई आधार बचा है नहीं, उनकी सारी आशाओं को केंद्र तो कांग्रेस ही है।
दिलशाद: और जनवादी लेखक संघ वाला मामला भी..
वजाहत: असल में, जनवादी लेखक संघ में दो-तीन लोग मुझसे अक्सर शिकायत करते थे कि मैं लेफ़्ट की आलोचना क्यों करता हूं। मेरा मानना है आप तटस्थ नहीं रह सकते। अगर आप किसी को चाहते हैं तो उसकी ख़ूबियों के साथ कमियां भी आप देखेंगे ही… तो वो लोग ख़फ़ा होते थे। मैंने कुछ ऐसी कहानियां भी लिख दी थीं जो 75 के आंदोलन से जुड़ी थीं, है ना। कम्युनिस्ट आंदोलन को मैं काफ़ी आलोचनात्मक दृष्टि से देखता रहा, अब भी देखता हूं…
इन शिकायतों के बीच उन्हें फिर यह भी मिल गया कि मैंने गांधी और गोडसे को बराबर खड़ा कर दिया। अब यह ऐसी वैग बात है कि इसे कैसे समझा जाये, है ना! क्या मैंने विचारों में बराबर कर दिया या बातचीत बराबर से रख दी या सिविकली बराबर किया… कैसे बराबर कर दिया, है ना?
अब देखिए हमारे देश में संवाद का माहौल नहीं रहा। हार्ड हिंदुत्व और सॉफ़्ट हिंदुत्व के बीच डायलॉग नहीं है। जब गांधी और गोडसे के बीच में डायलॉग करवाने की कोशिश फ़िल्म में की गयी, तब आपने उसे भी ठीक से समझा नहीं और आरोप मढ़ दिये कि साहब बराबर खड़ा कर दिया। बग़ैर डायलॉग के आप समाज को बेहतर कैसे कर सकेंगे।
दिलशाद: बेशक, अब बात कुछ आगामी फ़िल्म पर की जाये। 47 का ‘बंटवारा’ ज़ाहिर है, आज के हालात में अप्रासंगिक तो नहीं है, बल्कि कई कोणों और कई परतों में हमारे सामने है। आप गाहे-गाहे इस विषय को अपने नाटकों व कथा साहित्य में लाते रहे हैं। विभाजन केंद्रित साहित्य की एक लंबी परंपरा रही है…
वजाहत: देखिए, हमारे पूर्ववर्ती लेखक जो थे, वो उस विभीषिका को, उस ट्रैजडी को ही सामने लाते थे, है ना। हमारी पीढ़ी उसके आगे बढ़ी। हमारी पीढ़ी के लेखकों ने उस त्रासदी के सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक कारणों और समस्याओं को सामने लाने का काम किया है और यह ख़ास अंतर है।
अब जैसे मंटो को आप पढ़ें तो वह ट्रैजडी को सामने ला देते हैं कि इतनी बड़ी ट्रैजडी हो गयी। ठीक है, लेकिन उसके कारण क्या थे, उसके प्रभाव क्या थे, शायद इन बातों के लिए वह सही वक़्त भी नहीं था लेकिन अब हम लोगों की पीढ़ी इस तरफ़ काम करती है।
दिलशाद: आपकी पीढ़ी अब अनुभवी श्रेणी में है। विभाजन की विभीषिका से जो नफ़रत का एक संसार, एक बाज़ार खड़ा हुआ… एक संवेदनशील और अनुभवी लेखक के तौर पर आप उसे किस तरह देख पाते हैं?
वजाहत: आज का ज़माना मल्टीकल्चरल वैल्यूज़ का है। शिक्षा, जागरूकता और संपन्नता से ही आप इन मुश्किलों पर क़ाबू पा सकेंगे।
दिलशाद: ये कैसे होगा? साहित्य और कलाओं का इसमें क्या रोल है?
वजाहत: करने वालों को ही करना है, हमारा काम तो जनमत बनाने का है और तो कुछ हम नहीं कर सकते।
दिलशाद: आर्ट, लिटरेचर जनमत बना पा रहे हैं?
वजाहत: बिल्कुल, बहुत बड़े पैमाने पर। यह आम तौर से दिखता नहीं है और इसका कोई आंकड़ा भी नहीं बनता है लेकिन हो रहा है। और बड़े स्तर पर होना चाहिए, यह और बात है कि हो नहीं पाता।
दिलशाद: यह जो पैमाने की बात आप कह रहे हैं, क्या यही वजह है कि अब लेखक सिनेमा के लिए लालायित दिख रहे हैं?
वजाहत: बड़े माध्यम से बात दूर तक जाती है। नाटक है, सिनेमा है, ये मास मीडिया हैं। अगर आपकी बात में वज़न है और मास मीडिया से जाती है तो जनमत बनाने में मदद मिलती ही है।
दिलशाद: पीछे का एक ज़माना था, प्रेमचंद से जो शुरू हुआ, जब लेखक सिनेमा से खिन्न रहते थे। शिकायत करते थे कि सिनेमा ने हमारी कहानी, हमारे उपन्यास को बर्बाद कर दिया। अब लेखक ख़ुद सिनेमा के माध्यम का उपयोग करना चाह रहे हैं।
वजाहत: देखिए समय बदलता रहता है, रुचियां बदलती रहती हैं। ‘बधाई हो’, ‘विक्की डोनर’, ‘लंच बॉक्स’ जैसी फ़िल्में अब उस ज़माने में कहां बन सकती थीं! तो सिनेमा बदला है।
दिलशाद: ज़रूर। अच्छा, 14 अगस्त पर आपकी फ़िल्म ‘बंटवारा’ आ रही है और अभी कुछ हफ़्ते पहले बंटवारे की थीम पर ही एक और फ़िल्म आयी ‘मैं वापस आऊंगा’, आपने देखी?
वजाहत: हां देख ली।
दिलशाद: कैसी लगी आपको?
वजाहत: देखिए विषय तो अच्छा है, महत्वपूर्ण है लेकिन उसका स्क्रीनप्ले बहुत शिथिल है। कहानी पर, ख़ास तौर से स्क्रीनप्ले पर जो काम किया जाना चाहिए था, किया नहीं गया। देखिए कहानी कुछ और है और बीच में कहीं स्टैंडअप कॉमेडी आ रही है तो कहीं प्रेमचंद पर पाठ आ रहा है, है ना… अरे यार, ये कोई बात है! कहानी कहने के लिए कहानी का कंटेंट डेवलप कर नहीं पाये, भर्ती का माल डाल दिया गया है… ख़ास तौर से इंटरवल तक फ़िल्म बहुत ढीली दिखती है।
दिलशाद: दिलचस्प बातचीत के आख़िरी मोड़ पर दो-एक सिरे से बात और करना चाहता हूं। यह बात दोहरायी जाती है कि साहित्य जनस्मृति का विश्वसनीय इतिहास होता है। इधर, इतिहास हम देख रहे हैं राजनीति का औज़ार अब तो ज़ियादा ही है.. तो साहित्य की विश्वसनीयता भी क्या संकट में है?
वजाहत: देखिए इतिहास को सांप्रदायिक ताक़तें अगर अपने हित में इस्तेमाल कर रही हैं तो उन्हें इतिहास से कोई सरोकार है नहीं, उन्हें मतलब है सत्ता से। अब बात साहित्य की। साहित्य बड़ा काम अदृश्य स्तर पर करता है। साथ ही, जागरूकता भी साहित्य से, कलाओं से फैलती है। जैसे अभी जो आंदोलन हुआ तो उसमें यह दिखायी दिया।
दिलशाद: मैं कहना चाह रहा था कि जैसे इतिहास लेखन में विचारधाराएं रही हैं, वैसे ही साहित्य में भी ख़ेमों के प्रति निष्ठाएं हैं कि ये मार्क्सवादी है, ये दक्षिणपंथी है, ये… ऐसे में साहित्य की विश्वसनीयता…
वजाहत: इतिहास का मतलब कुछ भी लिख देना नहीं है, इतिहास एक बात के समर्थन में दस प्रमाणों से बनता है। और साहित्य में जिसकी जो निष्ठा हो, हमें तो इस बात से मतलब है कि कौन कैसा लिख रहा है। अब कोई कहे मैं जनवादी हूं या प्रगतिशील हूं तो कह देने से क्या होता है, आप क्या लिख रहे हैं वह काम की बात है। और अब तो मार्केट ने बहुत खेल बिगाड़ा है, मार्केट का दबाव बहुत है लेखन पर, कला पर।
दिलशाद: मार्केट का दबाव है, ख़ेमों के प्रति निष्ठा है, सियासत है.. आख़िर में यह बताइए कि इन हालात में आने वाली पीढ़ियां साहित्य और इतिहास के ज़रिये बंटवारे जैसी त्रासदी से किस तरह कनेक्ट कर पाएंगी?
वजाहत: होना तो यह चाहिए कि उनके लिए यह कोई मुद्दा न रहे। मुद्दा हमारे लिए है क्योंकि हम अब भी उसी मानसिकता से दो-चार हैं। हो यह कि उनके वक़्त में यह केवल इतिहास का विषय रह जाये, उनके लिए और दूसरे बड़े मुद्दे होंगे।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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वाह! बहुत रज कर बात की वजाहत साहब ने. अहम मुद्दों पर सवाल किए आपने.
शुक्रिया