
इंद्रधनुष-9 : नोमान शौक़
“मेरे नज़दीक इस मुश्किल वक़्त में शायरी करना क़ब्रिस्तान में वायलिन बजाने जैसा है।” यह कहना रहा है हमारे समय के मक़बूल शायर नोमान शौक़ का। ग़ज़लों और नज़्मों व कविताओं के कुछ संग्रह छपकर आ चुके हैं और वह लगातार मुशायरों, साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया पर अपना दख़्ल बनाये हुए हैं। कहते हैं, “पता नहीं किसने कहा था ‘अगर किसी समाज से उसके लेखक और कवि दस साल के लिए निकाल दिये जाएं, तो पूरा समाज एक जंगली आबादी में तब्दील हो जाएगा।’ यहाँ तो मामला ही बिल्कुल उलट है; यहाँ समाज को ही कविता और साहित्य से बाहर निकाल दिया गया है।” सोशल मीडिया और बाज़ार के ख़तरों और ढब का आलम है कि मंचों पर ऐसे ही शेर आ रहे हैं, जिनसे स्पॉन्सरशिप पर किसी तरह की आंच न आती हो। नोमान शौक़ कहते हैं, “ऐसे में युद्ध, नरसंहार, राजनीतिक दमन और मॉब लिंचिंग जैसे विषय शायरी की सूची से बाहर हो गये हैं, लेकिन मेरे लिए इन विषयों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करना किसी महापाप से कम नहीं।” एक ख़ास तेवर के शायर को जानें — आब-ओ-हवा के तमाम पाठकों की ख़िदमत में ख़ास पेशकश…

नोमान शौक़ की ग़ज़लें और नज़्में
नज़्म: मसख़रा डरा हुआ है
चुन चुन कर निमटा दी जाएंगी
तमाम छोटी-बड़ी चुनौतियां
सारे बहुरूपियों की निर्वस्त्र लाशें
लटका दी जाएंगी चौराहों पर
जनसाधारण को अनुमति होगी
तो सिर्फ़ एक इच्छाधारी के गुणगान की
उसका रूप, उसकी साज-सज्जा,
हर दूसरे क्षण एक नये अवतार की तरह
प्रकट होने की अभूतपूर्व क्षमता से लैस
एक महाशक्तिशाली बहुरूपिया
बहुत डरा हुआ है
जब मार दिये जाएंगे
सारे मसख़रे,
किसी भी पल एक अध्यादेश द्वारा
ज़रूरी क़रार दिया जा सकता है
हंसना, तालियां बजाना
किसी सत्तासीन मसख़रे की
एक हंसी के लिए…
———*———
ग़ज़ल
उड़ता जाता है ग़ुब्बारा ज़िंदाबाद
प्यारा आदमख़ोर हमारा ज़िंदाबाद
अंधे ज़िंदाबाद अंधियारा ज़िंदाबाद
जिस जिसका चमका है सितारा ज़िंदाबाद
रोक न पाया चाह के भी मक़तूल हंसी
भीड़ में इक हैवान पुकारा ज़िंदाबाद
सूरज चांद सितारे तुझ पर टूट पड़ें
जैसे ही तू बोल अंधियारा ज़िंदाबाद
रोशनियां सब एक दिशा में चलती हैं
तेरा मेरा सबका तारा ज़िंदाबाद
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ग़ज़ल
राज किया नीलाम किया ताराज किया
कल जो सब करते थे हमने आज किया
वक़्त गवाही देगा गर इन्साफ़ बचा
किसकी लाज रखी किसको बे-लाज किया
राज सिंहासन देने वाला हाथ मले
आंख दिखाने वाले को बे-ताज किया
उसकी माया सब देवों से ऊपर है
जिस पत्थर पर हाथ रखे पुखराज किया
जीना मरना सब कुछ तय है नारों पर
बच गये सारे जिन्होंने जय महराज किया
जिनकी ख़ातिर जीते थे वो मारने आये
दोस्त हमारे थे जिनको यमराज किया
धन वर्षा की अपने सारे कुबेरों पर
मेहनतकश थे जो उनको मोहताज किया
मामूली शायर हो हमसे डर के रहो
उसका सर काटा जिसने सरताज किया
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ग़ज़ल
उसके दुश्मन थे हमीं स्वर्ग सिधारे हुए लोग
मौत के घाट फिर उतरे वो ही मारे हुए लोग
हाथ उठाएं जो हिमायत में हैं पहली सफ़ में
उनके पीछे हैं सभी हाथ पसारे हुए लोग
आइना-गर्दी वो ही दाद-तलब नज़रों की
दिन में सौ बार नये जिस्म को धारे हुए लोग
हां तुझे और तिरी आवाज़ के जादू को सलाम
फिर नहीं आये कभी मेरे पुकारे हुए लोग
कैसे फैलाये गये झूठी ख़ुदाई के भ्रम
किसको मालूम नहीं कैसे तुम्हारे हुए लोग
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नज़्म : मेरे साथ समय
हंसने के लिए
मजबूर न करो मुझे
बेहूदा चुटकुले सुनाकर
देखा है मैंने
छोटी-छोटी परछाइयों को बदलते हुए
बड़ी-बड़ी आकृतियों में
मेरे माथे पर लिखी हैं
भूख की लहलहाती फसलें
जिन्हें कभी नहीं देख पाएंगी
सरकारी आंकड़े जमा करने वाली आंखें…
प्यास की बिलखती नदी
सिर पटक रही है मेरी धमनियों में
तुम सिर्फ़ मेरी सांसें गिन सकते हो
ज़िन्दगी नहीं…
मेरा युग नहीं समा सकता
तुम्हारे पंचांग में
तुम देख सकते हो
सिर्फ़ दिन और तारीख़ को बदलते हुए
आभास नहीं कर सकते
समय के बदलाव का
जो चल रहा है
———*———
नज़्म: उनकी आँखों में
जब हमारे चारों तरफ़
नगाड़े की तरह बज रही है मौत
अपनी नींद का आख़िरी कड़वा घूंट
उतारना है हलक के नीचे
उतर जाना है
मीठे सपनों के संगीतमय आवेग के साथ
उनकी आँखों में
जो नाच रहे हैं
हैवानों की तरह!
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ग़ज़ल
हर चंगेज़ हलाकू कैसा मज़े में है
जो सफ़्फ़ाक है जितना उतना मज़े में है
जितना ज़ोर से हम रोते चिल्लाते हैं
उतना झूम रही है दुनिया मज़े में है
जिसका है आकाश नचाये धरती को
उड़ता है जिसका ग़ुब्बारा मज़े में है
नाच रही है दुनिया उसकी धुन पर अब
जो भी है उसका हरकारा मज़े में है
जितना भी तड़पा ले उसको चैन नहीं
ताने भी सुनता हूं ‘साला मज़े में है’
मुर्दा जिस्मों के परचम लहराओ अब
फ़ातेह हो तुम अलम तुम्हारा मज़े में है
मालामाल है बेशर्मी की दौलत से
कौन भला हाकिम से ज़ियादा मज़े में है
तू भी चल घुटनों के बल उसके आगे
अपनी आंखें खोल ज़माना मज़े में है
मैं नाकारा सबके दुख में रोऊंगा
भाड़ में जाये गर जग सारा मज़े में है
